शनिवार, 14 नवंबर 2009

कविता



प्राण शर्मा की तीन कविताएं
(१)
पहले अपनी बोली बोलो
फिर चाहे तुम कुछ भी बोलो
इंग्लिश बोलो, रूसी बोलो
तुर्की बोलो, स्पैनिश बोलो
अरबी बोलो, चीनी बोलो
जर्मन बोलो, डेनिश बोलो
कुछ भी बोलो लेकिन पहले
अपनी माँ के बोली बोलो
अपने बोली माँ के बोली
मीठी- मीठी, प्यारी- प्यारी
अपनी बोली माँ की बोली
हर बोली से न्यारी- न्यारी
अपनी बोली माँ की बोली
अपनी बोली से नफ़रत क्यों
अपनी बोली माँ की बोली
दूजे की बोली में ख़त क्यों
अपनी बोली का सिक्का तुम
दुनिया वालों से मनवाओ
खुद भी मान करो तुम इसका
औरों से भी मान कराओ
माँ बोली के बेटे हो तुम
बेटे का कर्त्तव्य निभाओ
अपनी बोली माँ होती है
क्यों ना सर पर इसे बिठाओ
(२)
क्यों कर हो आज तुम उल्टे तमाम काम
अपने दिलों की तख्तियों पर लिख लो ये कलाम
तुम बोंओंगे बबूल तो होंगे कहाँ से आम
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

कहलाओगे जहान में तबतक फकीर तुम
बन पाओगे कभी नहीं जग में अमीर तुम
जब तक करोगे साफ़ न अपना ज़मीर तुम
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

ये प्रण करो कि खाओगे रिश्वत कभी नहीं
गिरवी रखोगे देश की किस्मत कभी नहीं
बेचोगे अपने देश की इज्ज़त कभी नहीं
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

देखो, तुम्हारे जीने का कुछ ऐसा ढंग हो
अपने वतन के वास्ते सच्ची उमंग हो
मकसद तुम्हारा सिर्फ बुराई से जंग हो
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

उनसे बचो सदा कि जो भटकाते हैं तुम्हे
जो उल्टी--सीधी चाल से फुसलाते हैं तुम्हे
नागिन की तरह चुपके से डस जाते हैं तुम्हे
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

जो क़ौमे एक देश की आपस में लड़ती हैं
कुछ स्वार्थों के वास्ते नित ही झगड़ती हैं
वे कौमें घास- फूस के जैसे ही सड़ती हैं
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

जग में गंवार कौन बना सकता है तुम्हे
बन्दर का नाच कौन नचा सकता है तुम्हें
तुम एक हो तो कौन मिटा सकता है तुम्हे
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

होने न पायें देश में भाषा - विवाद फिर
होने न पायें देश में बलवे - जिहाद फिर
होने न पायें देश में दंगे - फसाद फिर
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ


चलने न पायें देश में नफ़रत की गोलियां
फिरकापरस्ती की बनें हरगिज़ न टोलियाँ
सब शख्स बोलें प्यार की आपस में बोलियाँ
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

सोचो, जरा विचारो कि तुमसे ही देश है
हर गंदगी बुहारो कि तुमसे ही देश है
तुम देश को संवारो कि तुमसे ही देश है
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

मिलकर बजें तुम्हारी यूं हाथों की तालियाँ
जैसे कि झूमती हैं हवाओं में डालियाँ
जैसे कि लहलहाती हैं खेतों में बालियाँ
मेरे वतन के लोगो मुखातिम मैं तुमसे हूँ

(३)
कौवे ने कोयल से पूछा ,हम दोनो तन के काले हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है मुझसे नफ़रत क्यों करता है
कोयल बोली ,सुन ए कौवे ,बेहद शोर मचाता है तू
अपनी बेसुर कांय - कांय से कान सभी के खाता है तू
मैं मीठे सुर में गाती हूँ, हर इक का मन बहलाती हूँ
इसीलिये जग को भाती हूँ,जगवालों का यश पाती हूँ

शेर हिरन से बोला -प्यारे ,हम दोनो वन में रहते हैं
फिर जग तुझ पर क्यों मरता है ,मुझसे नफ़रत क्यों करता है
मृग बोला -ए वन के राजा , तू दहशत को फैलाता है
जो तेरे आगे आता है, तू झट उसको खा जाता है
मस्त कुलांचें मैं भरता हूँ , बच्चों को भी बहलाता हूँ
इसीलिये जग को भाता हूँ , जगवालों का यश पाता हूँ

चूहे ने कुत्ते से पूछा , हम इक घर में ही रहते हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है ,मुझसे नफ़रत क्यों करता है
कुत्ता बोला- सुन रे चूहे, तुझमें सद्व्यवहार नहीं है
हर इक चीज़ कुतरता है तू ,तुझमें शिष्टाचार नहीं है
मैं घर का पहरा देता हूँ ,चोरों से लोहा लेता हूँ
इसीलिये जग को भाता हूँ , जगवालों का यश पाता हूँ

मच्छर बोला परवाने से , हम दोनो भाई जैसे हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है मुझसे नफ़रत क्यों करता है
परवाना बोला मच्छर से , तू क्या जाने त्याग की बातें
रातों में तू सोये हुओं पर करता है छिप- छिप कर घातें
मैं बलिदान किया करता हूँ , जीवन यूँ ही जिया करता हूँ
इसीलिये जग को भाता हूँ, जगवालों का यश पाता हूँ

मगरमच्छ बोला सीपी से , हम दोनो सागर वासी हैं
फिर जग तुझ पर क्यों मरता है,मुझसे नफ़रत क्यों करता है
सीपी बोली- जल के राजा ,तुझमें कोई शर्म नहीं है
हर इक जीव निगलता है तू , तेरा कोई धर्म नहीं है
मैं जग को मोती देती हूँ, बदले में कब कुछ लेती हूँ
इसीलिये जग को भाती हूँ, जगवालों का यश पाती हूँ

आंधी ने पुरवा से पूछा , हम दोनो बहने जैसी हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है , मुझसे नफ़रत क्यों करता है
पुरवा बोली- सुन री आंधी , तू गुस्से में ही रहती है
कैसे हो नुक्सान सभी का , तू इस मंशा में बहती है
मैं मर्यादा में रहती हूँ ,हर इक को सुख पहुंचाती हूँ
इसी लिए जग को भाती हूँ,जगवालों का यश पाती हूँ

कांटे ने इक फूल से पूछा , हम इक डाली के वासी हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है, मुझसे नफ़रत क्यों करता है
फूल बड़ी नरमी से बोला , तू नाहक ही इतराता है
खूब कसक पैदा करता है,जिसको भी तू चुभ जाता है
मैं हंसता हूँ , मुस्काता हूँ , गंध सभी में बिखराता हूँ
इसीलिये जग को भाता हूँ , जगवालों का यश पाता हूँ
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प्राण शर्मा का जन्म १३ जून १९३७ को वजीराबाद (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में. पंजाब विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी). १९५५ से लेखन . फिल्मी गीत गाते-गाते गीत , कविताएं और ग़ज़ले कहनी शुरू कीं.१९६५ से ब्रिटेन में.१९६१ में भाषा विभाग, पटियाला द्वारा आयोजित टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार. १९८२ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार. १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स, लेस्टर द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार.लेख - 'हिन्दी गज़ल बनाम उर्दू गज़ल" पुरवाई पत्रिका और अभिव्यक्ति वेबसाइट पर काफी सराहा गया. शीघ्र यह लेख पुस्तकाकार रूप में प्रकाश्य.२००६ में हिन्दी समिति, लन्दन द्वारा सम्मानित."गज़ल कहता हूं' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित.Coventry CVESEB, UK3, Crakston Close, Stoke Hill Estate,E-mail : pransharma@talktalk.net--

24 टिप्‍पणियां:

सुभाष नीरव ने कहा…

प्राण जी की ये कविताएं सुन्दर ही नहीं, उद्देश्यपरक हैं। बधाई !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

(1)
जो भी बोलो, पर सबसे पहले अपनी बोली, यही है माँ, यही है माँ की सीख........बहुत ही बढिया
(2)जैसा करोगे,वैसा पाओगे
(3)तीसरी रचना में स्वभावगत विशेषता और अवगुण के फर्क को सूक्ष्मता से दर्शाया है,.....
तीनों रचना बहुत ही अच्छी हैं

Udan Tashtari ने कहा…

पहले अपनी बोली बोलो
फिर चाहे तुम कुछ भी बोलो

-बहुत उम्दा बात की है....निज भाषा सम्मान सर्वोपरि!!


तुम बोंओंगे बबूल तो होंगे कहाँ से आम
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ


-काश, सब यह संदेश समझ पाते!!


मिलकर बजें तुम्हारी यूं हाथों की तालियाँ
जैसे कि झूमती हैं हवाओं में डालियाँ
जैसे कि लहलहाती हैं खेतों में बालियाँ
मेरे वतन के लोगो मुखातिम मैं तुमसे हूँ


-बेहतरीन साहब!! क्या खूब!!


मैं मीठे सुर में गाती हूँ, हर इक का मन बहलाती हूँ
इसीलिये जग को भाती हूँ,जगवालों का यश पाती हूँ


-मृदुवाणी है जग जीती...........


मैं मर्यादा में रहती हूँ ,हर इक को सुख पहुंचाती हूँ
इसी लिए जग को भाती हूँ,जगवालों का यश पाती हूँ


-हर बात एक सीमा या मर्यादा में रहे, तभी भली लगती है......




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एक से एक उम्दा संदेश देती तीनों रचनाएँ मन को प्रफुल्लित कर गईं. प्राण साहब की लेखनी के हम यूँ ही दीवाने थोड़े न हैं..जादू सर चढ़ कर बोलता है उनकी एक एक पंक्तियों का.

बलराम अग्रवाल ने कहा…

प्राण शर्मा जी की ये तीनों ही कविताएँ चेतना में नए प्राण फूँक देने वाली हैं। जितना आनन्द मिला है, उतना व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। अपने वतन के लोगों से मुखातिब होने वाली कविता में उनके मन की व्यथा स्पष्ट है।

Devi Nangrani ने कहा…

Pran sharma ji ki lekhan kala ko kisi shringaar ki zaroorat nahin rahti. jo kavya ka hriday hai vah unki shabdavli mein samohit rahti hai..ek chalti phirti kavya sudha hai ye rachnayein

kitni sadgi aur sarlata se ham sab ki mukhatib hokar kah uthte hain..

चलने न पायें देश में नफ़रत की गोलियां
फिरकापरस्ती की बनें हरगिज़ न टोलियाँ
सब शख्स बोलें प्यार की आपस में बोलियाँ
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

bahut adbhut rachnayein
sadar
Devi nangrani

दिगम्बर नासवा ने कहा…

प्राण साहब जो भी लिखते हैं बहूत दूर का, बहूत गहरा लिखते हैं ...... कुछ कहता हुवा ही लिखते हैं .... अपनी पहली रचना में जो बात उन्होने लिखी है वो बिल्कुल सच है ... इंसान अपनी माँ की भाषा ही बोलता है जब उसे समझ नही होती तो फिर काहे उसको छोड़ दे ....... अपनी भाषा भी माँ होती है ......
अपनी दूसरी रचना में आने वाली भावी पीडी को वो एक ऐसा संदेश देना चाहते हैं जिससे आने वाला कल सुनहरा बन सके ... अपने देश पर, अपने आप पर सब नाज़ कर सकें ...
और तीसरी कविता तो कमाल की है ..... बॉल सुलभ भोले अंदाज़ में लिखी रचना जैसे अपने किसी को समझाय जाए .....

प्राण साहब की लेखनी जादू बन कर छा जाती है .......

सुरेश यादव ने कहा…

प्राण शर्मा जी की तीनो रचनाएँ देश और जीवन का सन्देश देने में सफल रही हैं .सहजता इनकी विशेषता भी है और आकर्षण भी.प्राण शर्मा जी को हार्दिक बधाई और भाई चंदेल जी को धन्यवाद.09818032913

Nirmla Kapila ने कहा…

आदरणीय भाई साहिब प्राण शर्मा जी की गज़ल हो या कविता या कहानी समाज को किछ न किछ संदेश देती है।
मैं हंसता हूँ , मुस्काता हूँ , गंध सभी में बिखराता हूँ
इसीलिये जग को भाता हूँ , जगवालों का यश पाता हूँ
मनुश्यमात्र के लिये जीवन मे सुखी रहने का संदेश देती कविता
अपनी बोली का सिक्का तुम
दुनिया वालों से मनवाओ
खुद भी मान करो तुम इसका
औरों से भी मान कराओ
माँ बोली के बेटे हो तुम
बेटे का कर्त्तव्य निभाओ


चलने न पायें देश में नफ़रत की गोलियां
फिरकापरस्ती की बनें हरगिज़ न टोलियाँ
सब शख्स बोलें प्यार की आपस में बोलियाँ
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

ओन दोमो कविताओं मे राष्ट्र प्रेम की चेतना को जन जन तक पहुँचाने और आपस मे मिलजिल कर रहने का सुन्दर संदेश है बहुत ही सुन्दर और सार्गर्भित रचनायें हैं उन्हें बहुत बहुत बधाई।

Shardula ने कहा…

वाह, अति उत्तम ! कवितायेँ पढ़ मन भीतर तक प्रसन्न हो गया! जैसे किसी ने पानी से आँगन धो दिया हो! प्राण जी और चंदेल साहब दोनों बधाई के पात्र हैं.

MANOJ KUMAR ने कहा…

आदरणीय सर,
तीन दिन में तीन पोस्ट देते तो तीनों पर अलग-अलग टिप्पणी देने का मज़ा ही कुछ और होता। अब जब तीनों एक साथ हैं तो एक साथ ही टिप्पणी देना पड़ रहा है। व्यावहारिकता और संदेशों के ज़रिये आपकी रचनाएं चाय के प्याले में तूफान उठाने की सीमाओं से बाहर निकल कर समाज और देश को बदलने का प्रयास करती दिखती हैं। रचना को धारदार बनाने के लिए भाषिक संयम की अनूठी मिसाल हैं। आज जब मानवीय संवेदना, लोकोपचार, भारतीय परंपराएं लुप्त-सी होती जा रहीं हैं, और उनकी जगह गुल्लक को फोड़कर धन्न टनन हो रहा है, पप्पू कांट डांस की चुनौती दी जा रही है, बीड़ी जलैइले पर निमंत्रण दिया जा रहा है, ऐसे में आपकी ये रचनाएं न सिर्फ मानसिक सुकून प्रदान करती हैं बल्कि एक आह्वान भी करती दिखती हैं। इतनी लंबी टिप्पणी को समेटते हुए अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि इतनी प्रभावशाली रचना को लिखने के लिए अदम्य साहस और भरपूर प्रतिभा चाहिए और ये आपमें हैं।
नमन।

पंकज सुबीर ने कहा…

पहली रचना वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में अत्‍यंत सामयिक है । अपनी भाषा का सम्‍मान यदि नहीं किया तो हमने अपना ही सम्‍मान घटा लिया है । दूसरी कविता में संदेश के साथ जो बात अनूठी है वो है एक नये प्रकार के छंद का उपयोग । ये छंद कम लोग उपयोग में लाते हैं किन्‍तु प्राण साहब जैसे विद्वानों के लिये तो छंद बहर जैसी चीजें बच्‍चों का खेल हैं । मां सरस्‍वती का आशीष ऐसे विद्वानों को भरपूर मिला होता है । और तुलनात्‍मक रूप से लिखी हुई तीसरी कविता का सौंदर्य तो अनोखा है । ये कविता नीति काव्‍य के रूप में बच्‍चों के पाठ्यक्रम में रखे जाने योग्‍य कविता है । नीति काव्‍य लिखने की परंपरा को बहुत दिनों बाद किसी कविता में साकार होते देखा है । आदरणीय प्राण साहब की लेखनी को वंदन और उनको मेरा प्रणाम ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

आदरणीय प्राण भाई साहब की लेखनी सतत नया बोध पाठ देती हुई प्रवाहीत होती रहे और हमें
हमारे बर्ताव और व्यवहार के प्रति सजा करती रहे यही उम्मीद है और दुआ भी --
कितनी सुन्दर सीख देती तीन कविता आपने पढवाई -- आपका भी आभार रूप भाई साहब
सादर,
- लावण्या

महावीर ने कहा…

तीनों ही अपनी अपनी अलग छटा दिखा रही हैं.
कुछ भी बोलो लेकिन पहले
अपनी माँ के बोली बोलो
अपनी बोली माँ होती है
क्यों ना सर पर इसे बिठाओ
इसमें संदेह नहीं कि अपनी बोली के समक्ष सभी बोलियाँ गौण हो जाती हैं.
शर्मा जी की शायरी पर टिपण्णी क्या दें, शायरी तो प्राण शर्मा की पर्याय बन चुकी है. ग़ज़ल हो, क़ता हो या रुबाई हो - एक एक पंक्ति पर 'दाद' देनें को मन बाध्य हो जाता है. देखिये:
चलने न पायें देश में नफ़रत की गोलियां
फिरकापरस्ती की बनें हरगिज़ न टोलियाँ
सब शख्स बोलें प्यार की आपस में बोलियाँ
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ
'वाह'!

कौवे ने कोयल से पूछा .......
बहुत ही सुन्दर शब्द, भाव, रस और सुन्दर उपमाओं के द्वारा सीख देती सार्थक रचना है.
आपकी बहुमुखी साहित्यिक कला को नमन.

"अर्श" ने कहा…

waah tino kavitayen apane aap me nipunataa pradarshit kar rahi hai,.. pahali kavita to vartamaan samay ki ruprekha ko prilakshit kar rahi hai to dusari kavita khud bhi abhibyakti ko saaf aur swachh kar rahi hai ...magar wahi tisari kavita me jis tarah se aapne byng diyaa hai har chij ko wo apne aap me guni jano ka hi kaam ho sakta hai .... kis kavita pe kya likhun yah mere aap ke baahar hai ... bas salaam aapko jis tarah se lekhani ki asim kripaa hai aapke upar wo to apne aap me saubhagya ki baat hia aur ho bhi kyun naa jis tarah se aap sevaa kar rahe ho wo khud me badi baat hai...

bas salaam aur salaam....


arsh

ashok andrey ने कहा…

bahut hee sahaj bhaashaa me liikhee teeno rachnaaon ne man ko chhoo liya hai inme pravaahit sandesh har praanee ko sochne ke liye uddhat kartaa hai esee kavitaaon kee rachnaa ko koi
majhaa hua kavee hee kar saktaa hai-
kaante ne ik phool se puchhaa,ham ik daali ke vaasee hain
phir jag tujh par kayon martaa hai, mujhse nafrat kayon kartaa hai

in bahut sundar rachnaaon ke liye main priya bhai pran jee ko badhai detaa hoon
ashok andrey

नीरज गोस्वामी ने कहा…

प्राण साहब की कलम की ताकत ही है के वो इतनी मन भावन रचनाएँ रच लेते हैं...तीनो रचनाएँ अद्भुत हैं...पहली जहाँ अपनी माँ की बोली बोलने की बात करती है वहीँ दूसरी हमारे देश के आम जन से सीधे सरल लेकिन तीखे सवाल करती है...अगर उन सवालों का जवाब हम इमानदारी से दें और उस रचना में दी गयी शिक्षा को ग्रहन करें तो ये देश फिर से सोने की चिड़िया बन जायेगा...तीसरी रचना मेंजिस ख़ूबसूरती से उन्होंने जीवन में अपनाये जाने योग्य गुणों के बारे में बतलाया है वो विलक्षण है..पंचतंत्र की कथाओं सी सरल लेकिन प्रेरक रचना सही में पंकज सुबीर जी के कहे अनुसार बच्चों को स्कूल में पढाई जानी चाहियें...प्राण जी सदा स्वस्थ रहें इश्वर से येही कामना करते हैं...

नीरज

Dr. Sudha Om Dhingra ने कहा…

प्राण भाई की पहली कविता मैंने 'हिंदी चेतना' पत्रिका में लगाई थी, तब भी सराही थी और आज भी सराह रही हूँ..
सन्देश देती तीनों कविताएँ सुंदर हैं.
प्राण जी की ग़ज़ल हो या कविता मेरे जैसा विद्यार्थी उसमें कुछ न कुछ अपने लिए ढूँढ ही लेता है..सुबीर जी की बात से मैं सहमत हूँ कि तीसरी कविता पाठ्यक्रम में लगनी चाहिए.
बहुत -बहुत बधाई.

रविकांत पाण्डेय ने कहा…

आदरणीय प्राण जी,
तीनों ही कविताएं अनूठी हैं। अपनी बोली, अपनी भाषा के लिये जो अलख आपने जगाई है लेखनी के माध्यम से वो स्तुत्य है।
"मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ" मन को छू गई ये कविता। हर जागरूक एवं जिम्मेदार नागरिक का हृदय धड़कता है इस कविता में। काश! देश की सोयी आत्मा इस पुकार को सुन पाये!
तीसरी कविता के बारे में क्या कहूं? निःशब्द हूं। प्रतीकों के माध्यम से सद्गुणों के महत्त्व का प्रतिपादन सुंदर बन पड़ा है। थोड़े में कहूं तो-हमारी बोली में नवीन पंचतंत्र- का उपहार दिया है आपने।

बेनामी ने कहा…

परम आदरणीय शर्मा जी
सादर प्रणाम


आपकी तीनो कविताये पढी , पढकर मन प्रफुल्लित हो गया,

पहली कविता आपकी बेहद प्रासन्गिक है, और मुझे लगता है कि ये भाषायी धर्मान्ध लोग अवसरवादिता की जब तक राजनीतिक रोटी सेकते रहेन्गे यह कविता तब तक उतनी ही प्रासन्गिक रहेगी जितनी आज है.

दूसरी कविता तो और भी प्रासन्गिक और सर्वकालिक है,अत्यन्त सहज एवम ग्राह्य शब्दो का चयन कर आपने बखूबी उजागर किया है उन कमजोरियो को, जो हमारी जडे खोद रही है.

तीसरी कविता के बारे मे तो सिर्फ यही कह सकता हू कि अद्भुत, बहुत सुन्दर , उन विरोधाभाषी युगलो का चयन करने मे मशक्कत करनी पडी होगी.

सारी कविता मे ऐसा लगा जैसे अलन्कार और छन्द स्व आयातित है.

सम्मान के साथ
सादर
राकेश

chandrapal ने कहा…

प्राण जी विदेश में रहते है और देश उनके अन्दर रहता है. बेहद खुबसूरत कविताए.
'पहले अपनी बोली बोलो
फिर चाहे तुम कुछ भी बोलो'

को हमने अपने ज्ञापन में भी शामिल किया है.
chandrapal@aakhar.org

AlbelaKhatri.com ने कहा…

aadarneeya pran sharmaa ji !

aapki in teenon kavitaaon ko baanch kar bada sukh mila aur badi urja mili ..


nisandeh aapki har kavita samaaj ko aur samaaj ke karndhaaron ke liye sahi maarg darshan deti hai

in kavitaaon ki mahak mere bheetar main kai dinon tak anubhav karoonga , aisa mera vishwas hai..........

aapka haardik abhinandan !

रंजना ने कहा…

क्या कहूँ.......जो मन में उतरा रहे हैं,उन भावों को समेट कर शब्दों में कैसे बाँधूं सोच रही हूँ....
रचना कला में तो आप सिद्ध हस्त हैं,इसलिए उसके विषय में क्या कहूँ, पर आपके पवित्र मन और विचारों को देखा मन में आता है काश ,दुनियां के दस पंद्रह प्रतिशत लोग भी ऐसे हो जाएँ तो फिर यह दुनिया ऐसी नहीं रहेगी जसी अभी इसे इंसानों ने बना रखी है...
ईश्वर से प्रार्थना है की ये सुन्दर और कल्याणकारी भाव जन जन के मन तक तरंगित हो उसमे अपना वास बनाये......
जीवन को सुन्दर दिशा देती इन अप्रतिम कृतियों के लिए आपके सम्मुख नतमस्तक हूँ....

kavi kulwant ने कहा…

एक से बढ़कर एक कविताएं..

बेनामी ने कहा…

sharmaji,
rachnasamay par aapki kavitayen to padheen kintu vatayan ki site nahin khuli isliye kahani nahin padh saka. kavitayen.achhi hain. inhen paathyakram mein hona chahiye.
yadi samay mile to raviwar.com
par mera ek lekh laga hai- prem gali ati sankari
dekhen.achha na lage to bhi ek najar dalen.
aapka
krishnabihari