शुक्रवार, 17 फरवरी 2012

धारावाहिक उपन्यास



Potrait by Ivan Kramskoi

(1873)




हाजी मुराद


लियो तोतलस्तोय


अनुवाद : रूपसिंह चन्देल


चैप्टर - ग्यारह

तिफ्लिस में हाजी मुराद के ठहरने के पाँचवें दिन प्रधान सेनापति का परि-सहायक लोरिस-मेलीकोव, उसके अनुरोध पर उससे मिलने के लिए आया ।
''मेरा सिर और मेरे हाथ सरदार की सेवा में हाजिर हैं,'' परम्परागत कूटनीतिक भाव से सिर झुकाते और छाती को हाथों से स्पर्श करते हुए हाजी मुराद ने कहा, ''मैं क्या कर सकता हूं?'' लोरिस-मेलीकोव की आंखों में देखते हुए उसने गर्मजोशी से कहा ।
लोरिस मेलीकोव मेज के बगल में बांहदार कुर्सी पर बैठ गया । हाजी मुराद उसके सामने नीचे एक दीवान पर बैठा । उसने घुटनों पर अपने हाथ रखे , सिर झुकाया और ध्यानपूर्वक लोरिस-मेलीकोव के शब्दों को सुनने लगा । लोरिस-मेलीकोव ने, धाराप्रवाह तातारी में बोलते हुए कहा कि यद्यपि प्रिन्स हाजी मुराद के अतीत से परिचित थे तथापि वह व्यक्तिगत रूप से उससे उसकी सम्पूर्ण जीवन गाथा सुनना चाहते थे । ''आप मुझे बताइये, ''लोरिस-मेलीकोव ने कहा, ''और मैं उसे लिख लूंगा, फिर उसका रूसी में अनुवाद करूंगा, और प्रिन्स उसे सम्राट को भेज देंगे ।''
हाजी मुराद चुप रहा (वह बीच में हस्तक्षेप नहीं करता था, बल्कि वह सदैव यह जानने की प्रतीक्षा करता था कि उसके साथ वार्तालाप करने वाला व्यक्ति इसके अतिरिक्त और क्या कुछ कहना चाहता था ), फिर उसने सिर ऊपर उठाया, सिर के पीछे टोपी को हिलाया और बच्चों जैसी विलक्षण मुस्कान मुस्कराया जिसने मेरी वसीलीव्ना को मुग्ध कर दिया था ।
इस विचार से कि उसकी कहानी ज़ार के समक्ष पढ़ी जायेगी, स्पष्टरूप से संतुष्ट होते हुए वह बोला, ''वह मैं कर सकता हूं ''।
''बिल्कुल प्रारंभ से बिना जल्दबाजी किये आप मुझे सब कुछ बताएं ।'' अपनी जेब से नोटबुक निकालते हुए, लोरिस-मेलीकोव बोला ।
''बहुत कुछ है, बतलाने के लिए बहुत कुछ है । मैं आपको बता सकता हूं । बहुत कुछ घटित हुआ'' हाजी मुराद बोला ।
''यदि आप एक दिन में नहीं बता सकते, आप अगले दिन समाप्त कर सकते हैं,'' लोरिस-मेलीकोव बोला ।
''मुझे प्रारंभ से ही षुरू करना होगा?''
''हाँ, बिल्कुल प्रारंभ से -- आप कहाँ पैदा हुए थे, और कहाँ रहे ?''
हाजी मुराद ने सिर झुका लिया और लंबे समय तक बैठा रहा, फिर उसने सोफे के पास पड़ी एक छड़ी उठा ली, उस्तरे जैसी पैनी हाथी दांत की मूठवाली स्वर्ण-जटित स्टील की जेबी चाकू बाहर निकाली, और छड़ी को तराशते हुए अपनी कहानी कहने लगा ।

''लिखें -- मैं एक 'मिलर्स थंब' (एक प्रकार की मछली) जितने बड़े, जैसा कि पहाड़ों में हम कहते हैं, जेलमेस नामके, एक छोटे से गाँव में पैदा हुआ था ।'' उसने कहना प्रारंभ किया । ''हमसे बहुत दूर नहीं, कुछ मीलों की दूरी पर ही, हन्जख था, जहाँ खान लोग रहते थे । हमारे परिवार का उनसे गहरा संबन्ध था । वे तीन खान थे । अबू नुसल खाँ, मेरे भाई उस्मान का दूध-रिश्ते का भाई ; उम्मा खाँ, मेरा हमशीर, और सबसे छोटा बुलक खाँ, जिसे शमील ने खड़ी चट्टान से नीचे गिरा दिया था । लेकिन बाद में वह आ गया था । मैं प्रन्द्रह का था जब मुरीदों ने गाँव से होकर जाना प्रारंभ किया था । वे लकड़ी की तलवारों से पत्थरों पर वार करते और चीखते थे, ''मुसलमानों ज़ेहाद (रूसियों के विरुध्द पवित्र युद्ध) में शामिल हो जाओ !'' सभी चेचेन उनके पास गये और अवारों ने उनके साथ शामिल होना शुरू कर दिया था। उन दिनों मैं महल में रह रहा था । मैं खानों के भाई के समान था । मैंनें वह किया जो मैं चाहता था और धनवान हो गया था । मेरे पास घोड़े और हथियार थे, और धन था । मैं जैसा पसंद करता, रहता था और संसार में किसी की परवाह नहीं करता था ।
मैं इस प्रकार तब तक रहता रहा, जब तक कासी मुल्ला मारा नहीं गया । हमज़ा ने उसका स्थान ले लिया था । हमजा ने खान लोगों के पास यह कहने के लिए दूत भेजे कि यदि वे ज़ेहाद में शामिल नहीं होंगे तो वह हन्ज़ख को तबाह कर देगा । इस बात ने हमें सोचने के लिए विवश किया । खान बन्धु रूसियों से डरते थे । ज़ेहाद में शामिल होने से भी भयभीत थे । खान की माँ ने मुझे अपने दूसरे पुत्र, उम्मा खॉ के साथ, रूसी प्रधान सेनापति के पास हमज़ा के विरुद्ध सहायता मांगने के लिए तिफ्लिस भेजा । प्रधान सेनापति रोजेन, एक बैरन था । वह मुझसे या उम्मा खाँ से नहीं मिला । उसने यह कहलवाया कि वह हमारी सहायता करेगा, लेकिन किया कुछ नहीं। उसके बाद उसके अधिकारी हमसे मिलने आने लगे और उम्मा खाँ के साथ ताश खेलने लगे । वे उसे शराब देने लगे और उसे खराब अड्डों में ले जाने लगे । उम्मा खाँ ताश में वह सब हार गया जो उसके पास था । वह बैल की भांति ताकतवर और शेर की भाँति बहादुर था, लेकिन उसकी आत्मा पानी जैसी कमजोर थी । वह अपने अंतिम घोड़े और हथियार भी हार चुका होता, यदि मैं उसे वहाँ से हटा न ले जाता । तिफ्लिस पहुंचने के बाद मेरे विचारों में परिवर्तन हुआ, और मैंने नौजवान खान और उनकी माँ से ज़ेहाद में शामिल होने की गुजारिश की ।''
''आपके विचार क्यों बदले?'' लोरिस-मेलीकोव ने पूछा, ''क्या आप रूसियों को पसंद नहीं करते?''
हाज़ी मुराद चुप रहा ।
''नहीं, मैं उन्हें पसंद नहीं करता था,'' उसने सुस्पष्टरूप से कहा और आंखें बंद कर लीं, ''और भी कुछ ऐसा घटित हुआ जिसने मुझे ज़ेहाद में शामिल होने के लिए मुतासिर किया ।''
''वह क्या था ?''
'' एक बार जेलमस के निकट खान और मेरी भिडंत तीन मुरीदों के साथ हुई । दो भाग निकले थे और एक को मैंने अपनी पिस्टल से मार दिया था। जब मैं उसके हथियार लेने उसके पास आया, तब तक वह जीवित था । उसने मेरी ओर देखा । ' तुमने मुझे मार दिया ' वह बोला । 'यह अच्छा है । लेकिन तुम एक नौजवान और हृष्ट-पुष्ट मुसलमान हो । ज़ेहाद में शामिल हो जाओ । खुदा का यह हुक्म है ।''
''हूं, तुम शामिल हुए ?''
''नहीं, लेकिन मैंनें सोचना प्रारंभ कर दिया था'' हाज़ी मुराद ने कहा और अपनी कहानी जारी रखी ।
''जब हमज़ा हन्ज़ख के पास पहुंचा, हमने अपने बुजुर्गों को भेजा और उनसे गुजारिश की कि वे उससे कहें कि यदि वह हमें दानिशवर करने के लिए एक काबिल आदमी भेजता है तो हमें जे़हाद में शामिल होना मंजूर है । हमज़ा ने बुजुर्गों की मूंछें मुड़वा दीं, उनके नथुने छेदवा दिए, उनकी नाकों से आटे के केक लटका दिए और उन्हें वापस भेज दिया। बुजुर्गों ने कहा कि हमज़ा ज़ेहाद के विषय में हमें दानिशवर करने के लिए एक शेख को भेजने को तैयार था, लेकिन तभी जब खान्शा बंधक के रूप में उसके पास रहने के लिए अपने छोटे बेटे को भेजे । खांशा ने उस पर विश्वास किया और बुलक खाँ को हमज़ा के पास भेज दिया । हमज़ा ने बुलक खाँ का अच्छी प्रकार स्वागत किया और उसे बड़े भाइयों को भी लाने के लिए वापस भेज दिया । उसने यह कहने के लिए उससे गुजारिश की कि वह खान लोंगों की उसी प्रकार सेवा करना चाहता था जिस प्रकार उसके पिता ने उनके पिता की की थी ।''
''उनकी माँ कमजोर, मूर्ख और बे-फ़हमी (अविवेकी महिला थी, जैसा कि सभी महिलाएं होती हैं जब वे स्वयं घर की मालकिन होती हैं।) थी. वह दोनों बेटों को भेजने से भयभीत थी, और उसने केवल उम्मा खाँ को भेजा । मैं उसके साथ गया । हम मुरीदों से एक मील पहले मिले, जो हमारे चारों ओर गाते और गोलियॉ दागते पोइयाँ चाल से चल रहे थे । जब हम पहुंचे, हमज़ा तम्बू से बाहर आ गया। उसने उम्मा खां की रकाब पकड़ ली , और एक खान की भाँति उसका स्वागत किया । वह बोला - ''मैंने आपके घर को कोई नुकसान नहीं पहंचाया है और न ही ऐसा करूंगा । आप केवल मुझे मरवायें नहीं और न ही ज़ेहाद के लिए लोगों को भर्ती करने से मुझे रोकें। मैं अपनी पूरी सेना सहित आपकी वैसी ही सेवा करूंगा, जैसी मेरे पिता ने आपके पिता की की थी । मुझे अपने घर में रहने दें । मैं अपनी सलाहों से अपकी सहायता करूंगा, लेकिन आप जो चाहें करने के लिए आजाद होंगे ।''
उम्मा खाँ धीमे बोलता था । वह नहीं समझ पाया कि उसे क्या कहना है, और चुप रहा । तब मैंने कहा कि, यदि वास्तव में ऐसा है, तब हमज़ा हन्ज़ख चला जाये । खांशा और खाँ उसका आदर -सत्कार करेंगे । लेकिन उन्होंने मेरी बात बीच में काट दी, और यहीं पहली बार मैंने शमील का विरोध किया था। वह इमाम के पास खड़ा हुआ था ।
''हम आपसे नहीं, बल्कि खान से पूछ रहे हैं'' वह बोला था।
''मैं और अधिक नहीं बोला और हमज़ा उम्मा खाँ को तम्बू के अंदर ले गया । फिर हमज़ा ने मुझे बुलाया और मुझसे अपने पैगम्बरों के साथ हन्जख जाने का अनुरोध किया। मैं गया। पैगाम्बरों ने खांशा को समझाने का प्रयास किया कि बड़े खान को भी हमज़ा के पास जाना चाहिए ।''
''मुझे विश्वासघात की गंध आई, और मैंने खांशा से कहा कि वह अपने बेटे को न भेजें । लेकिन एक औरत के दिमाग में उतनी ही अक्ल होती है जितनी एक अण्डे पर बाल। उसने उस पर विश्वास किया और अपने बेटे को जाने के लिए कहा । अबू नुसल खाँ ने इंकार कर दिया । तब वह बोली, ''तुम जरूर ही डर रहे हो ।'' वह एक मधुमक्खी की तरह जानती थी कि डंक कहाँ अधिक जख्मी करता है । अबू नुसल खाँ क्रोध से धधक उठा, कुछ नहीं बोला । उसने अपने घोडे़ पर जीन कसवा दी । मैं उसके साथ गया । हमज़ा ने उम्मा खां से भी अच्छा हमारा स्वागत किया । वह हमसे मिलने के लिए पहाड़ी पर दो फर्लागं चलकर आया । पताकाएं फहराते हुए घुड़सवार उसके चारों ओर गाते और गोलियाँ चलाते तेजी से चल रहे थे। जब हम कैम्प में पहुंचे हमज़ा खान को तम्बू के अन्दर ले गया । मैं घोड़ों के साथ रुका रहा था।''
''मैं पहाड़ी में नीचे की ओर था जब मैनें हमज़ा के तम्बू से गोली चलने की आवाज सुनी । मैं दौड़कर तम्बू में गया । उम्मा खाँ पीठ के बल खून से लथपथ पड़ा हुआ था, और अबू नुसल खाँ मुरीदों से जद्दोज़हद ( संघर्ष ) कर रहा था । उसका आधा चेहरा कट गया था और नीचे की ओर लटका हुआ था । उसने उसे एक हाथ से पकड़ रखा था, और दूसरे हाथ से अपनी तलवार से अपने निकट आने वाले हर व्यक्ति को काटता जा रहा था । मेरी दिशा में उसने हमज़ा के भाई को काट गिराया था और दूसरे की ओर बढ़ रहा था, लेकिन तभी मुरीदों ने उस पर गोली चलायी थी, और वह गिर गया था।''
हाजी मुराद रुका, धूप से जला उसका संवलाया चेहरा लज्जित हो उठा, और उसकी आंखें रक्तिम हो उठीं थीं ।
'' मुझ पर भय सवार हो गया था, और मैं भाग खड़ा हुआ था।''
''क्या?'' लोरिस-मेलीकोव बोला, ''मैं सोचता था कि आप कभी किसी से नहीं डरते ।''
''फिर कभी नहीं । उसके पश्चात् मैनें उस शर्मनाक घटना को सदैव याद रखा, और जब मैनें उसे याद किया किसी से भी भयभीत नहीं हुआ ।''

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शनिवार, 4 फरवरी 2012

धारावाहिक उपन्यास

हाज़ी मुराद
लियो तोलस्तोय
अनुवाद - रूपसिंह चन्देल
चैप्टर - १०


अगले दिन जब हाजी मुराद को वोरोन्त्सोव के पास लाया गया, प्रिन्स का प्रतीक्षा-कक्ष लोगों से खचाखच भरा हुआ था। खुरदरी मूंछोंवाला जनरल पूरी फौजी ड्रैस और तमगे धारण किये हुए, छुट्टी मंजूर करवाने के लिए वहाँ उपस्थित था। एक रेजीमेण्टल कमाण्डर वहाँ था, जिसे रेजीमेण्ट की सप्लाई के दुरुपयोग के लिए अभियोग की चेतावनी मिली हुई थी। डाक्टर आन्द्रेयेवस्की का संरक्षण प्राप्त एक धनी आर्मेनियन वहाँ उपस्थित था, जिसका वोद्का के व्यवसाय में एकाधिकार था और वह अपने अनुबंध का नवीनीकरण करवाना चाहता था। युद्ध में मारे गये एक अधिकारी की पत्नी बच्चों के पालन-पोषण के लिए अपनी पेंशन अथवा राज्य के वित्तीय भत्ते के लिए आयी हुई थी। भव्य जार्जियन वेशभूषा में, जार्जिया का एक बरबाद हो चुका प्रिन्स वहाँ था जो चर्च की खाली सम्पत्ति पर कब्जा चाहता था। काकेशस पर विजय प्राप्त करने के लिए नयी योजना वाले कागजातों का बड़ा पुलिन्दा थामे एक पुलिस अधिकारी भी वहाँ था। इनके अतिरिक्त एक स्थानीय खान वहाँ था जो केवल इसलिए आया था कि वह अपने लोगों के बीच यह बता सके कि प्रिन्स ने किस प्रकार उसका स्वागत किया था।
वे सभी अपने अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे और सुन्दर बालों वाले खूबसूरत युवा परिसहायक द्वारा एक के बाद दूसरा प्रिन्स की स्टडी में भेजे जा रहे थे।
जब हाजी मुराद ने हल्की लंगड़ाहट के साथ प्रतीक्षा कक्ष में प्रवेश किया, सभी की आँखें उसकी ओर घूम गयीं और कक्ष के विभिन्न कोनों से अपने नाम की फुसफुसाहट उसे सुनाई दी थी।
हाजी मुराद ने सुन्दर चाँदी का गोटा लगे खाकी कपड़े पर लंबा सफेद टयूनिक पहना हुआ था। उसकी पतलून और चुस्त-दुरस्त जुराबें काली थीं, और उसने पगड़ी के साथ फर का टोप पहना हुआ था -जिस पगड़ी को पहनने के कारण उसे अहमद खां द्वारा अपमानित और जनरल क्लूगेनाऊ द्वारा गिरफ्तार किया गया था, और वही शमील से उसके मिलने का कारण बना था। हल्की लंगड़ाहट के साथ छोटी टांग पर अपने छरहरे शरीर को झुलाता हुआ हाजी मुराद तेजी से प्रतीक्षा कक्ष की फर्श पर चल रहा था। उसकी बड़ी आँखें शांतिपूर्वक सामने की ओर देख रहीं थीं और किसी को भी न देखने का आभास दे रही थीं।
खूबसूरत सहायक ने उसका स्वागत किया और तब तक बैठ जाने की प्रार्थना की जब तक वह प्रिन्स के पास जाने के लिए उसे नहीं पुकारता। लेकिन हाजी मुराद ने बैठने से इंकार कर दिया। उसने कटार पर अपना हाथ रखा और एक पैर आगे बढ़ाकर वहाँ एकत्रित लोगों का तिरस्कारपूर्वक पर्यवेक्षण करता हुआ खड़ा रहा।
एक दुभाषिया, प्रिन्स तर्खानोव हाजी मुराद के पास आया और उसे वार्तालाप में व्यस्त कर लिया। हाजी मुराद ने अनिच्छापूर्वक और एकाएक उत्तर दिए। एक कुमिक प्रिन्स, जिसने पुलिस अधिकारी के विरुद्ध शिकायत की थी, स्टडी से बाहर आया, और उसके पश्चात् सहायक ने हाजी मुराद को बुलाया और अंदर का मार्ग दिखाने के लिए स्टडी के दरवाजे तक उसके साथ गया।
वोरोन्त्सोव ने मेज के पास खड़े होकर हाजी मुराद का स्वागत किया। वृद्ध सुप्रीम कमाण्डर का गोरा चेहरा पिछले दिन जैसा मुस्कराहट भरा नहीं था, बल्कि कठोर और गंभीर था।
बड़ी मेज और हरे रंग की बड़ी बंद खिड़कियों वाले विशाल कमरे में प्रवेश करते ही हाजी मुराद ने धूप से झुलसे अपने छोटे हाथों को छाती पर रखा जहाँ सफेद टयूनिक की तहें एक दूसरे को काटती थीं; और, ऑंखे झुकाकर कुमिक भाषा में, जिसे वह भलीभाँति बोल सकता था, धीरे-धीरे, स्पष्ट और सम्मानपूर्वक बोला।
''महान जार और आपके उदात्त संरक्षण के लिए मैंने अपना आत्म-समर्पण किया है। मैं खून की आखिरी बूंद तक बा-एतेमाद (निष्ठापूर्वक) गोरे जार की सेवा करने का वचन देता हँ और आपके और मेरे दुश्मन शमील के खिलाफ लड़ाई में फायदामंद होने की उम्मीद करता हँ।''
दुभाषिये को सुन लेने के बाद वोरोन्त्सोव ने हाजी मुराद की ओर, और हाजी मुराद ने वोरोन्त्सोव की ओर देखा।
दोनों की आँखें एक-दूसरे से मिलीं और आँखों ने एक दूसरे से बहुत कुछ कह दिया, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता था और न ही बिल्कुल वैसा जैसा दुभाषिये ने कहा था। उन्होंनें बिना शब्दों के पूर्ण सत्य सीधे एक दूसरे को अभिव्यक्त कर दिया था। वोरोन्त्सोव की आँखों ने कहा कि वह हाजी मुराद के कहे एक भी शब्द पर विश्वास नहीं करता, क्योंकि वह जानता था कि वह रूसियों के सब कुछ का शत्रु था, और सदैव रहेगा, और वह केवल इसलिए इस समय आत्म-समर्पण कर रहा है क्योंकि ऐसा करने के लिए वह बाध्य था। हाजी मुराद ने यह समझ लिया, फिर भी उसने उसे अपनी निष्ठा का पूर्ण आश्वासन दिया। हाजी मुराद की आँखों ने कहा कि वोरोन्त्सोव जैसा बूढ़ा आदमी मृत्यु के विषय में सोच रहा होगा, न कि युद्ध के विषय में। हालांकि अगला बूढ़ा हो चुका था, फिर भी वह धूर्त था, और उसे उससे सतर्क रहना आवश्यक था। और वोरोन्त्सोव ने यह सब समझा, फिर भी उसने हाजी मुराद को बताया कि युद्ध की सफलता के लिए वह क्या आवश्यक समझता था।
''उससे कहो'' वोरोन्त्सोव ने लापरवाही से नौजवान दुभाषिये से कहा, ''कि हमारे सम्राट उतने ही दयालु हैं जितने कि वह शक्तिशाली हैं और पूरी संभावना है, कि मेरे अनुरोध पर, वे उसे क्षमा कर देगें और उसे अपनी सेवा में अंगीकर कर लेगें। तुमने अनुवाद कर दिया।'' हाजी मुराद की ओर देखते हुए उसने पूछा। ''जब तक मैं अपने स्वामी का कृपापूर्ण निर्णय प्राप्त करूं, उससे कहो, उस समय तक उसके स्वागत और उसे अपने साथ ठहाराने की व्यवस्था की जिम्मेदारी मेरी होगी। यह उसे स्वीकार्य है।''
हाज़ी मुराद ने एक बार पुन: हाथ अपने वक्षस्थल पर रखा और सोत्साह बोलना प्रारंभ किया।
उसने कहा, जैसा कि दुभाषिये ने वर्णन किया, कि 1839 में, जब वह आवेरिया में शासन करता था, उसने निष्ठापूर्वक रूसियों की सेवा की थी और उन्हें कभी धोखा नहीं दिया था लेकिन उसके शत्रु अहमद खाँ ने, जो उसके पतन का षडयंत्र करना चाहता था, जनरल क्लूगेनाऊ से उसके विषय में निन्दात्मक बातें कही थीं।
''हाँ, मैं जानता हँ'' वोरोन्त्सोव ने कहा ( हालांकि यदि वह जानता भी था, तो वह उसे बहुत पहले भूल चुका था ) ''मैं जानता हँ,'' बैठते हुए उसने कहा और दीवार के पास पड़े दीवान की ओर संकेत करते हुए हाजी मुराद से बैठने के लिए कहा। लेकिन हाजी मुराद बैठा नहीं। अपने मजबूत कंधों को उचका कर उसने संकेत दिया कि इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति की उपस्थिति में वह बैठना नहीं चाहता। वह पुन: बोला :
''अहमद खाँ और शमील, दोनों मेरे शत्रु हैं,'' दुभाषिये को संबोधित करते हुए उसने कहना जारी रखा। ''प्रिन्स को बता दो कि अहमद खाँ मर चुका है और मैं उससे प्रतिशोध नहीं ले सका, लेकिन शमील अभी भी जीवित है, और जब तक मैं उससे बदला नहीं चुका लेता, मैं मरूंगा नहीं,'' त्यौरियाँ चढ़ा और दांतों को भींचते हुए वह बोला।
''ठीक है '' वोरोन्त्सोव शांतिपूर्वक बोला, ''शमील से वह किस प्रकार बदला चुकाना चाहता है ?'' दुभाषिये से उसने कहा, ''और उससे कहो कि वह बैठ जाये।''
हाजी मुराद ने पुन: बैठने से इंकार कर दिया, और प्रश्न का उत्तर यह कहते हुए दिया कि वह रूसियों के पास शमील को नष्ट करने में उनकी सहायता करने के लिए आया है।
''अच्छा, अच्छा,'' वोरोन्त्सोव बोला, ''वास्तव में वह करना क्या चाहता है ? बैठ जाइये, बैठ जाइये...।''
हाजी मुराद बैठ गया और बोला कि यदि वे उसे लेज्गियन मोर्चे पर भेजें और उसे सेना दें तो वह इस बात की गारण्टी देता है कि वह सम्पूर्ण डागेस्तान पर अधिकार कर लेगा और तब शमील वहाँ डटे रहने में असमर्थ हो जाएगा।''
''यह अच्छा है। यह संभव है,'' वोरोन्त्सोव ने कहा, ''मैं इस पर विचार करूगा।''
दुभाषिये ने वोरोन्त्सोव के शब्दों का हाजी मुराद के लिए अनुवाद किया। हाजी मुराद क्षणभर तक सोचता रहा।
''सरदार को बताएं,'' उसने कहा, '''कि मेरा परिवार मेरे शत्रु के हाथों में है, और जब तक मेरा परिवार पहाड़ों में है, मैं बंधा हुआ हँ और मैं सेवा नहीं कर सकता। यदि मैं उस पर सीधे आक्रमण करता हूँ तो वह मेरी पत्नी, मेरी माँ ओर मेरे बच्चों को मार देगा। युद्ध- बन्दियों के बदले में प्रिन्स मेरे परिवार को मुक्त करा लें, और तब मैं या तो शमील को उखाड़ फेकूंगा या मर जाऊँगा।''
''अच्छा, अच्छा,'' वोरोन्त्सोंव बोला, ''हम इस विषय में सोचेगें। अब उसे सेनाध्यक्ष के पास ले जाओ और उसे विस्तार से उसकी स्थिति, उसकी योजनाओं और उम्मीदों के विषय में बताओ।''
इस प्रकार वोरोन्त्सोव के साथ हाजी मुराद का पहला साक्षात्कार समाप्त हुआ।


Leo chat with Alexander Goldenweiser

(Second on right)
उसी शाम एशियाई ढंग से नव-सज्जित थियेटर में इटैलियन ओपेरा का एक प्रदर्शन था। वोरोन्त्सोव बॉक्स में बैठा हुआ था। सिर पर पगड़ी के ऊपर टोप पहने हाजी मुराद की लंगड़ाती स्पष्ट आकृति नाटयशाला में प्रकट हुई। वोरोन्त्सोव द्वारा उसके साथ सम्बद्ध किया गया एक सहायक, लोरिस-मेलीकोव के साथ वह प्रविष्ट हुआ और आगे की पंक्ति में सीट ग्रहण कर बैठ गया। वह प्राच्य मुस्लिम गौरव को प्रदर्शित करने वाले प्रथम दृश्य तक बैठा रहा। उसने आश्चर्य का कोई भाव व्यक्त नहीं किया, बल्कि एक प्रकार से वह उदासीन-सा बैठा रहा। फिर वह उठा, दर्शकों पर शांत दृष्टि डाली और सभी दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता हुआ चला गया।
अगला दिन सोमवार था। इस दिन वोरोन्त्सोव प्राय: 'घर' में रहता था। शिशिरोद्यान के जगमगाते हॉल में दिखाई न देने वाला एक ऑकेस्ट्रा ऊँचे स्वर में बज रहा था। गले, बांहों और वक्षस्थलों को प्रदर्शित करने वाले परिधानों में सजी-संवरी युवा और प्रौढ़ महिलाएं आकर्षक वस्त्र पहने हुए पुरुषों की बाहों में तेजी से थिरक रही थीं। उपहार कक्ष में लाल जैकेट, जुराबों और स्लिपर्स में पहाड़ी बैरे शैम्पेन सर्व कर रहे थे और महिलाओं को मिष्ठान्न परोस रहे थे। सरदार की पत्नी, उम्रदराज होने के बावजूद, तंग वस्त्रों में गर्मजोशी से मुस्कराती हुई अतिथियों के बीच घूम रही थी और दुभाषिये के माध्यम से उसने कुछ कृपालु शब्द हाजी मुराद से कहे थे, जो उसी उदासीन भाव से लोगों का निरीक्षण कर रहा था, जैसा थियेटर में उसने किया था। मेहमानदारी के बाद अंगों का कुछ अधिक ही प्रदर्शन करने वाली दूसरी महिलाएं हाजी मुराद के पास आयीं और सभी नि:संकोच उसके सामने खड़ी हो गयीं, मुस्कराती रहीं, और फिर वही प्रश्न किया -- 'उसने जो देखा उसे कैसा लगा ?' वोरोन्त्सोव भी सोने के तमगे धारण किये, 'शोल्डर ब्रेड', गले में सफेद क्रास और रिबन पहने हुए आया और स्पष्टरूप से आश्वस्त होते हुए भी, हाजी मुराद के सभी प्रश्नकर्ताओं की भाँति, उससे वही प्रश्न किया, कि उसने जो सब कुछ देखा उसे पसंद आया या नहीं। और हाजी मुराद ने वोरोन्त्सोव को बिना यह कहे कि उसने जो देखा अच्छा था या खराब, उसने वही उत्तर दिया जो उसने सभी को दिया था, कि उन लोगों के पास उस जैसा कुछ नहीं था।
हाजी मुराद ने उस नृत्य सभा में वोरोन्त्सोव से अपने परिवार की फिरौती के प्रश्न को छेड़ना चाहा था, लेकिन वोरोन्त्सोव ने न सुनने का अभिनय किया था और दूर चला गया था। तब लोरिस मेलीकोव ने हाजी मुराद से कहा था कि वह स्थान सौदेबाजी के लिए उपयुक्त नहीं था।
जब ग्यारह बजे का घण्टा बजा, हाजी मुराद ने मेरी वसीलीव्ना द्वारा दी गई घड़ी में समय देखा, और लोरिस -मेलीकोव से पूछा कि क्या वह जा सकता है। लोरिस मेलीकोव ने कहा कि वह जा तो सकता है, लेकिन बेहतर होगा कि वह रुका रहे। फिर भी हाजी मुराद रुका नहीं, और उसके लिए जिस गाड़ी की व्यवस्था की गई थी, उसमें अपने ठहरने के लिए निर्धारित मकान की ओर चला गया था।
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रविवार, 22 जनवरी 2012

धारावाहिक उपन्यास



खेत जोतते हुए लियो तोलस्तोय

(इल्या रेपिन द्वारा १८८७ में बनायी

गयी आयल पेण्टिंग)





’हाज़ी मुराद’

लियो तोलस्तोय

अनुवाद - रूपसिंह चन्देल

चैप्टर ८ और ९


॥ आठ ॥
जिस दिन पीटर आवदेयेव की वोज्दविजेन्स्क अस्पताल में मृत्यु हुई, उसी दिन उसका वृद्ध पिता, भाभी और उसकी जवान बेटी बर्फ़ जमे खलिहान में जई गाह रहे थे। शाम को बहुत अधिक बर्फ़ गिरी थी, और कुछ ही देर में जमकर वह सख्त हो गयी थी। वृद्ध व्यक्ति मुर्गे की तीसरी बांग पर ही जाग गया था, और, तुषाराच्छन्न खिड़की से चाँद की चटख रोशनी देख, उसने अंगीठी बुझाई, जूते, फरकोट और हैट पहने और खलिहान की ओर चल पड़ा था। उसने वहाँ दो घण्टे तक काम किया, फिर झोपड़ी में लौटा और बेटा और महिलाओं को जगाया था। जब औरतें और लड़की बाहर आयीं; फर्श साफ थी, लकड़ी का एक बेलचा मुलायम सफेद बर्फ़ में सीधा खड़ा हुआ था, जिसके बगल में एक झाड़ू रखी हुई थी, जिसकी मूठ ऊपर की ओर थी और साफ फर्श पर जई के पूले एक के बाद एक दो कतारों में रखे हुए थे। उन्होंने मूसल उठाए और तीन समान्तर प्रहारों के लय से गाहना प्रारंभ कर दिया था। बूढ़ा भारी मूसल का प्रयोग कर पुआल को कुचल रहा था। उसकी पोती पूले के ऊपरी हिस्से को संतुलित ढंग से कूट रही थी और उसकी पुत्रवधू उन्हें उलट रही थी।
चाँद अस्त हो चुका था और प्रकाश फैलने लगा था। उनका काम समाप्त होने वाला ही था जब बड़ा बेटा आकिम हाथ बटाने के लिए आया।
''इधर उधर समय व्यर्थ क्यों कर रहा है?'' उसका पिता काम रोक कर और मूसल के सहारे खड़ा होकर उस पर चिल्लाया।
, ''मुझे घोड़ों को खरहरा करना था।''
''घोड़ों को खरहरा करना था,'' बूढ़े ने तिरस्कृत भाव से दोहराया। ''तुम्हारी माँ उन्हें खरहारा कर देगी। एक मूसल ले ले। तुम नशेबाज वीभत्स रूप से मोटा गये हो।''
''मैं आपसे अधिक नहीं पीता,'' बेटा बुदबुदाया।
बूढ़ा क्रोधित हो उठा और कूटना चूक गया। ''वह क्या है?'' उसने धमकी भरे स्वर में पूछा।
बेटे ने चुपचाप मूसल उठा लिया और काम नयी लय के साथ प्रारंभ हो गया, ''ट्रैप…टा…पा…ट्रैप…ट्रैप…।'' बूढ़ा सबके अंत में अपने भारी मूसल से चोट करता था।
''उसकी ओर देखो, उसकी गर्दन एक भेंड़ की भाँति मोटी हो गयी है। मुझे देखो, मेरी पतलूनें नहीं ठहर पातीं।'' बूढ़ा बुदबुदाया, कूटना चूक गया और उसका मूसल हवा में लहराया जिससे कूटने की लय बनी रही।
उन्होंने पूले की पंक्ति समाप्त कर दी और महिलाओं ने पांचे से मुआल समेटना शुरू कर दिया।
''पीटर मूर्ख था जिसने तेरा स्थान ग्रहण किया। उन्होंने फौज में तेरे स्थान पर उस मूर्ख को पीटा होगा, और घर के काम में वह तुझसे पाँच गुना योग्य था।''
''इतना पर्याप्त है, दादा,'' उसकी पुत्रवधू टूटे गुच्छों को उठाती हुई बोली।
''खाने वाले तुम्हारे छ: मुँह हैं और तुममें से कोई एक दिन भी काम नहीं करता। जबकि पीटर दो लोगों के बराबर अकेला काम करता था, किसी लोकोक्ति की भाँति नहीं …।''
बूढ़े की पत्नी बाड़े की ओर के रास्ते से आयी। उसने फीते से सख्त बंधी हुई ऊनी पतलून पहन रखी थी और उसके नये जूतों के नीचे बर्फ़ चरमरा रही थी। आदमी लोग पांचे से बिना ओसाए आनाज को एक ढेर में समेट रहे थे और औरतें उसे उठा रही थीं।
''कारिन्दे ने बुलाया है। वह चाहता है कि सभी जमींदार के लिए ईंटें ढोयें।'' वृद्धा ने कहा, ''मैंनें तुम्हारा लंच बांध दिया है। क्या तुम अब जाओगे?''
''बहुत अच्छा । चितकबरे घोड़े को जोतो और जाओ,'' बूढ़े ने आकिम से कहा। ''और ठीक ढंग से व्यवहार करना, अन्यथा पिछली बार की भाँति तुम मुझ पर दोष मढ़ दोगे। पीटर के विषय में सोचो, वह तुम्हारे लिए एक उदाहरण है।''
''जब वह घर पर था वह उसे कोसता था,'' आकिम भुनभुनाया, ''और अब वह चला गया है तो वह मेरी ओर मुड़ गया है।''
''क्योंकि तुम इसी योग्य हो,'' उसकी माँ ने उसी प्रकार क्रोधित होते हुए कहा। '' पीटर से तुम्हारी कोई तुलना नहीं है।''
''बहुत अच्छा, बहुत अच्छा,'' आकिम बोला।
''नि:संदेह, बहुत अच्छा। तुमने फसल का पैसा शराब पीने में उड़ा दिया, और अब तुम 'बहुत अच्छा' कहते हो।''
''पुरानी खरोचों को याद करना क्या अच्छा है? '' बहू बोली।
पिता और पुत्र के बीच झगड़ा होना पुरानी बात थी। पीटर को सेना में बुलाए जाने के तुरन्त बाद से ही ऐसा हो रहा था। बूढ़े ने तभी अनुभव किया था कि उसने खराब समझौता किया था। यह सही था कि नियमानुसार, जैसा कि बूढ़े ने उसे समझा था, बिना बच्चों वाले आदमी को परिवार वाले के लिए सेना में भर्ती हो जाना उसका कर्तव्य है। आकिम के चार बच्चे हैं, जबकि पीटर के एक भी नहीं, लेकिन पीटर पिता की भाँति एक कुशल कारीगर था : दक्ष, बुद्धिमान, मजबूत और कठोर परिश्रमी। वह पूरे समय काम करता था। काम कर रहे लोगों के पास से गुजरने पर, उनकी सहायता के लिए वह तुरंत हाथ बढ़ायेगा, जैसा कि बूढ़ा किया करता था। वह राई की कई जोड़ी कतारों को काटकर बोझ बांध देगा, एक पेड़ गिरा देगा या ईंधन की लकड़ियाँ काटकर गट्ठर बना देगा। उसे खोने का बूढ़े को गम था, लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था। सेना की अनिवार्य भर्ती मृत्यु की भाँति थी। एक सैनिक शरीर के एक कटे अंग की भाँति था, और उसे याद करना या उसकी चिन्ता करना व्यर्थ था। केवल कभी-कभी, बड़े भाई पर अकुंश के लिए बूढ़ा उसका जिक्र कर दिया करता था, जैसाकि उसने अभी किया था। उसकी माँ प्राय: अपने छोटे बेटे के विषय में सोचती थी और एक वर्ष से अधिक समय से अपने पति से पीटर को पैसे भेजने के लिए प्रार्थना करती आ रही थी। लेकिन बूढ़ा अनसुना करता रहा था।
आवदेयेव का घर समृद्ध था, और बूढ़े ने काफी धन संग्रह कर रखा था, लेकिन अपनी बचत को वह किसी काम के लिए भी नहीं छूता था। इस समय ,जब वृद्धा ने छोटे बेटे के विषय में बात करते हुए उसे सुना, उसने निश्चय किया कि जब वे जई बेच लेगें, वह उससे पुन:, यदि अधिक नहीं, तो एक रूबल ही भेजने के लिए कहेगी। युवतियों के जमींदार के यहाँ काम करने के लिए चली जाने के बाद जब वह बूढ़े के साथ अकेली रह गयी उसने जई की बेच में से पीटर को एक रूबल भेजने के लिए पति को राजी कर लिया। इस प्रकार ओसाई हुई जई के ढेर से जब बारह चौथाई जई तीन स्लेजों में चादरों में भर दी गयी और चादरों को सावधानीपूर्वक लकड़ी की खूंटियों से कसकर बांध दिया गया, उसने बूढ़े को एक पत्र दिया जिसे उसके लिए चर्च के चौकीदार ने लिखा था और बूढ़े ने वायदा किया कि कस्बे में पहुंचकर वह उसे एक रूबल के साथ डाक में डाल देगा।
नया फरकोट, कुरता और साफ-सफेद ऊनी पतलून पहनकर, बूढ़े ने पत्र लिया, और उसे अपने पर्स में रख लिया। आगेवाली स्लेज पर बैठकर उसने प्रार्थना की और कस्बे के लिए चल पड़ा। उसका पोता पीछे की स्लेज पर बैठा था। कस्बे में बूढ़े ने एक दरबान से अपने लिए पत्र पढ़ देने का अनुरोध किया, और बहुत प्रसन्नतापूर्वक निकट होकर पत्र सुनता रहा।
पीटर की माँ ने पत्र का प्रारंभ आशीर्वाद देते हुए किया था। फिर सभी की ओर से शुभ कामनाएं लिखवायी थीं। उसके पश्चात् यह समाचार था कि, ''अक्जीनिया (पीटर की पत्नी) ने उनके साथ रहने से इन्कार कर दिया था और नौकरी में चली गयी थी। हमने सुना है कि वह अच्छा कर रही है और एक ईमानदार जीवन जी रही है।'' रूबल रखने की बात का भी उल्लेख था और दुखी हृदया बूढ़ी औरत ने आँखों में आंसू भरकर चर्च के चौकीदार को पुनष्च उसकी ओर से शब्द-दर शब्द आगे लिखने का अनुरोध किया था।
''ओ, मेरे प्यारे बच्चे, मेरे प्रिय पेन्नयूषा तुम्हारे लिए दुखी मेरी आँखों से किस प्रकार आंसू बहते रहते हैं। मेरी आँखों के चमकते सूरज, किसने तुम्हे मुझसे विलग किया?'' यहाँ बूढ़ी औरत ने आह भरी थी, रोयी थी और कहा था, ''मेरे प्यारे, इतना ही पर्याप्त होगा।''
पीटर के भाग्य में यह समाचार प्राप्त करना नहीं था कि उसकी पत्नी घर छोड़ गयी थी, या रूबल या उसकी माँ के आखिरी शब्द। इस प्रकार यह सब पत्र में ही बना रहा। पत्र और पैसे इस समाचार के साथ लौटा दिये गये कि, ''जार, पितृभूमि, और धार्मिक निष्ठा की रक्षा करता हुआ पीटर युद्ध में मारा गया।'' इस प्रकार फौजी क्लर्क ने लिख भेजा था।
जब वृद्धा को यह समाचार प्राप्त हुआ वह क्षणभर के लिए रोयी थी, और फिर काम पर चली गयी थी। अगले रविवार वह चर्च गयी थी, अंतिम संस्कार किया था, पीटर का नाम मृतकों की स्मरणिका में दर्ज किया था और ईश्वर के सेवक पीटर की स्मृति में पूजा की रोटी के टुकड़े साधुजनों में बांटे थे।
अपने प्रिय पति की मृत्यु पर अक्जीनिया भी रोयी थी, जिसके साथ उसने केवल एक वर्ष का संक्षिप्त जीवन व्यतीत किया था। उसने अपने पति और अपनी उजड़ चुकी जिन्दगी, दोनों के लिए ही मातम मनाया था। उसके शोक ने उसे पीटर के सुनहरे घुंघराले बाल, अपने प्रति उसके प्यार और पितृहीन इवान के साथ अपने पिछले कठिन जीवन की याद दिला दी थी और इसके लिए उसने पीटर को ही दोषी ठहराया था जो अजनबियों के बीच गृहविहीन उस दुखी महिला की अपेक्षा अपने भाई की अधिक चिन्ता करता था।
लेकिन अपने हृदय की गहराई में वह पीटर की मृत्यु से प्रसन्न थी। वह कारिन्दा द्वारा पुन: गर्भवती थी जिसके साथ वह रहती थी, और अब कोई उसे दोष नहीं दे सकता था। अब कारिन्दा उससे विवाह कर सकता था, जैसा कि उसे प्यार करते समय उसने उससे वायदा किया था।

॥ नौ ॥
माइकल साइमन वोरोन्त्सोव की शिक्षा इंग्लैण्ड में हुई थी। वह रूसी राजदूत का पुत्र था और उस समय के ऊँचे पद वाले रूसी सैनिकों और अधिकारियों में विशिष्ट यूरोपीय संस्कृति का पोशक था। वह महत्वाकांक्षी, मृदुभाषी, अपने कनिष्ठों के प्रति सहृदय और वरिष्ठों के साथ जटिल और कूटनीतिज्ञ था। प्रभुत्व और सम्मान के बिना जीवन उसकी समझ से बाहर था। उसने सभी उच्च पद और पदक प्राप्त किये थे और एक अच्छे सैनिक के रूप में उसकी प्रतिष्ठा थी। क्रैस्नोई में उसने नेपोलियन पर विजय प्राप्त की थी। 1851 में वह सत्तर वर्ष से ऊपर था, लेकिन वह पूरी तरह से चौकस था। उसकी चाल में फुर्तीलापन था और सबसे ऊपर, दक्षता की समस्त योग्यताओं और मुआफिक मनोदशा पर उसका पूर्ण अधिकार था, जिनका प्रयोग वह अपने प्रभुत्व, और दृढ़कथनों की रक्षा में और अपनी लोकप्रियता के प्रचार में करता था। वह अपनी और अपनी पत्नी काउण्टेस ब्रैनीत्स्काया, दोनों की विपुल सम्पत्ति का उपभोग कर रहा था और सर्वोच्च कमाण्डर के रूप में मोटा वेतन ले रहा था। अपनी आय का बड़ा हिस्सा उसने क्रीमिया के दक्षिणी तट पर अपने महल और बाग पर खर्च किया था।
चार दिसम्बर, 1851 की षाम एक द्रुत-संदेश वाहक तिफ्लिस में उसके महल तक आया। थका, धूल-धूसरित अधिकारी, जनरल कोजलोव्स्की से हाजी मुराद के रूसियों की ओर पहुंचने का समाचार लेकर लड़खड़ाता हुआ। सुप्रीम कमाण्डर के महल के विशाल प्रवेश द्वार से होकर संतरी के पास पहुंचा। उस समय छ: बजा था, और वोरोन्त्सोव रात्रि भोज के लिए जा रहा था जब संदेशवाहक के आने का समाचार उसे बताया गया। वोरोन्त्सोव ने संदेशवाहक को तुरंत बुला लिया और इसलिए रात्रिभोज के लिए कुछ मिनट का विलंम्ब हुआ। जब उसने डायनिंग रूम में प्रवे्श किया, लगभग तीस अतिथि, जो प्रिन्सेज एलिजाबेथ के इर्दगर्द बैठे हुए थे और कुछ खिड़की के पास खड़े हुए थे, उठ खड़े हुए और उसकी ओर मुड़े। वोरोन्त्सोव ने कंधों पर सादे पट्टे और गर्दन पर सफेद क्रास वाले साधारण विभागीय कपड़े पहन रखे थे। उसके पटु, सफाचट चेहरे पर मनोहर मुस्कान खेल रही थी। उसकी आँखें संकुचित थीं, मानो उसने उपस्थित लोगों का पर्यावलोकन कर लिया था।
विलंब से पहुंचने के लिए महिलाओं से क्षमा मांगते, पुरुषों से अभिवादन का आदान-प्रदान करते कोमल और तेज कदमों से चलते हुए उसने प्रवेश किया। वह पैंतालीस वर्षीया, लंबी, पूर्वदर्शीय सुन्दरतावाली, एक जार्जियन प्रिन्सेज मनाना ऑर्बेलियानी का हाथ पकड़कर उसे मेज तक ले गया। प्रिन्सेज एलिजाबेथ ने अपना हाथ लालबालों और खुरदरी मूंछों वाले एक जनरल को सौंप दिया था। जार्जियन प्रिन्स ने अपना हाथ प्रिन्सेज की मित्र काउण्टेस च्वायसुएल के हाथ में दे दिया। डाक्टर एण्डे्रयेव्स्की, परिसहायक और दूसरे अन्य लोगों ने, कुछ महिलाओं सहित और कुछ अकेले दोनों युगलों के बैठने के पश्चात् अपने स्थान ग्रहण किये। कुर्तें, जुर्राबें और स्लीपर्स पहने बैरों ने कुर्सियाँ छोड़ दी थीं, क्योंकि अतिथियों ने अपनी सीटें ग्रहण कर ली थीं और प्रधान बैरा शाही ढंग से चाँदी की रकाबी से गर्म सूप परोसने लगा था।
वोरोन्त्सोव बड़ी मेज के मध्य में बैठा था। उसके सामने प्रिन्सेज, उसकी पत्नी, जनरल के साथ बैठी थी। उसके दाहिनी ओर उसकी महिला मित्र सुन्दरी ऑर्बेलियानी और उसके बायीं ओर खूबसूरत, गहरे और गुलाबी गालों वाली, शानदार पोशाक में एक युवा जार्जियन महिला थी, जो लगातार मुस्करा रही थी।
''उत्तम, मेरी प्रिये '' वोरोन्त्सोव ने प्रिन्सेज के यह पूछने पर कि दूत क्या समाचार लाया था, उत्तर दिया, ''साइमन का भाग्य अच्छा है।''
और उसने विस्मयकारी समाचार का अंश ऐसे स्वर में बताना प्रारंभ किया कि मेज में बैठे सभी लोगों द्वारा सुना जा सके … एक मात्र वही था जिसके लिए वह समाचार विस्मयकारी नहीं था, क्योंकि बातचीत बहुत पहले से चल रही थी… कि विख्यात और शमील का निर्भीक समर्थक हाजी मुराद ने रूसियों के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया था और एक दिन के अंदर उसे तिफ्लिस लाया जायेगा।
भोजन करने वाले सभी लोग, यहाँ तक कि नौजवान, सहायक और अधिकारी जो मेज के आखिरी छोर पर बैठे थे और उस समय तक किसी विषय पर लतीफे का आनंद ले रहे थे, चुप हो गये थे और सुनने लगे थे।
''जनरल, आप इस हाजी मुराद से मिल चुके हैं ?'' प्रिन्स ने जब बात समाप्त की, प्रिन्सेज ने लाल बालों और खुरदरी मूंछोंवाले अपने पड़ोसी जनरल से पूछा।
''हाँ, प्रिन्सेज, अनेकों बार।''
और जनरल वर्णन करने लगा कि किस प्रकार 1843 में कबीलाइयों द्वारा गेरगेबिल पर अधिकार कर लेने के बाद, हाजी मुराद ने जनरल पासेक की सेना पर आक्रमण किया था और ठीक उनकी आँखों के सामने कर्नल जोलोतुखिन को लगभग मार ही दिया था।
वोरोन्त्सोव ने जनरल को मधुर मुस्कान के साथ सुना। उसे इतना विस्तार से सुनकर वह प्रकटरूप से प्रसन्न हुआ। लेकिन अचानक उसकी मुद्रा विश्शण और उदासीन हो गयी ।
उल्लसित जनरल ने किसी अन्य समय हाजी मुराद के साथ हुई मुठभेड़ के विषय में बताना प्रारंभ कर दिया था।
''महामहिम, शायद आपको स्मरण हो?'' जनरल बोला, ''बचाव अभियान के दौरान उसने खाद्य सामग्री से भरी ट्रेन के लिए घात लगायी थी।''
''कहाँ ? '' आंखों को सिकोड़ते हुए वोरोन्त्सोव ने पूछा।
वास्तव में बहादुर जनरल ने जिसे 'बचाव अभियान' कहा था, वह निष्फल डार्गो युद्ध के दौरान घटित एक घटना थी, जिसमें प्रिन्स वोरोन्त्सोव सहित, जो उसका नियंत्रक था, पूरी सेना निश्चित ही नष्ट हो गयी थी, यदि उसके बचाव के लिए नयी सेना न आ जाती। यह जानकारी आम थी, कि वोरोन्त्सोव द्वारा निर्देशित सम्पूर्ण डार्गो युद्ध, जिसमें अनेक रूसी सैनिक हताहत हुए थे और अनेक तोपें नष्ट हुई थीं, एक असफल युद्ध था और वोरोन्त्सोव की उपस्थिति में यदि कोई उसका उल्लेख करता था तो वह उसे उसी प्रकार कहता था जैसा वोरोन्त्सोव ने जार को भेजी अपनी रपट में उसे 'रूसी सेना का शानदार पराक्रम' बताया था। 'बचाव' शब्द स्पष्टतया यह संकेत देता था कि वह एक 'शानदार पराक्रम' नहीं था, बल्कि एक भूल थी, जिसके कारण अनेकों जानें गयी थीं। सभी ने यह अनुभव किया, और कुछ ने ऐसा अभिनय किया कि वे जनरल के शब्दों का अर्थ नहीं समझे थे। कुछ सशंकितभाव से यह सुनने की प्रतीक्षा करने लगे कि इसके बाद वह क्या कहेगा और शेष ने केवल आपसी मुस्कान का आदान-प्रदान किया था। केवल लाल बालों और खुरदरी मूंछोंवाले जनरल ने कुछ भी ध्यान नहीं दिया था और अपनी कहानी जारी रखते हुए गहरा प्रभाव डालने का प्रयास करते उसने कहा :
''बचाव अभियान में, महामहिम !''
और, एक बार अपने प्रिय विषय पर ध्यान आकर्षित कर जनरल ने विस्तार से वर्णन किया कि किस चतुराई से हाजी मुराद ने सेना को दो भागों में बांट दिया था, कि यदि बचाव सेना हमारी सहायता के लिए न पहुंचे … 'मुक्ति वाहिनी सेना' शब्द का मुहावरे की -सी प्रतीति देते हुए एक विशेष ढंग से उसने उल्लेख किया, ''वहाँ हम सभी बचे रह गये क्योंकि…।''
वह कहानी समाप्त नहीं कर पाया, क्योंकि मनाना ऑर्बेलियानी ने, स्थिति समझकर, हस्तक्षेप करते हुए तिफ्लिस में उसके आवास के सुख - सुविधाओं के विषय में पूछा। जनरल चौंका, उसने अपने सहायक सहित, जो दूर मेज के अंतिम छोर पर बैठा अर्थपूर्ण भाव से उसे ही देख रहा था, घूमकर सभी की ओर देखा और सहसा वस्तुस्थिति समझ गया। प्रिन्सेज को कोई उत्तर न दे उसने त्योरियाँ चढ़ाईं और चुप हो गया, और प्लेट की ओर बिना देखे और बिना स्वाद जाने उसने भोजन निगलना शुरू कर दिया।
वातावरण में सामान्य अकुलाहट थी, लेकिन प्रिन्सेज वोरोन्त्सोव के दूसरी ओर बैठे जार्जियन प्रिन्स ने इसे संभाल लिया था जो एक बहुत मूर्ख किस्म का व्यक्ति था लेकिन उच्चकोटि का कुशल चापलूस और दरबारी था। उसने इस प्रकार वर्णन करना प्रारंभ किया, मानो कुछ हुआ ही न था, कि किस प्रकार हाजी मुराद ने मेख्तूलियन अहमद खाँ की विधवा को कैद कर लिया था।
''रात के समय वह समझौते की स्थिति में पहुंचा था। उसे जो कुछ चाहिए था वह लेकर अपने दल के साथ तेज गति से दौड़ गया था।''
'' लेकिन विशेषरूप से वह उसी स्त्री को क्यों चाहता था ?'' प्रिन्सेज ने पूछा ।
''वह उसके पति का शत्रु था और उसका पीछा करता रहा था, लेकिन उसके जीवन काल में उसे कभी नहीं पकड़ पाया था, इसलिए उसका प्रतिशोध उसने उसकी पत्नी से लिया था।''
प्रिन्सेज ने अपनी मित्र काउण्टेस च्वायसिएल, जो जार्जिया के प्रिन्स के बगल में बैठी थी, के लिए उसका फ्रेंच में अनुवाद किया ।
''कितना भयानक था!'' काउण्टेस ने आँखें बंदकर सिर हिलाते हुए कहा।
''ओह, नहीं,'' मुस्कराते हुए वोसेन्त्सोव ने कहा, ''मुझे बताया गया था कि उसने अपने कैदी से उदात्त और आदरपूर्वक व्यवहार किया था और फिर उसे छोड़ दिया था।''
''हाँ, फिरौती के लिए।''
''निश्चित ही,, लेकिन तब भी उसने मर्यादित व्यवहार किया था।''
प्रिन्स के इन शब्दों से हाजी मुराद के विषय में आगे सभी के किस्सों पर विराम लग गया था। उपस्थित लोगों ने अनुभव किया कि अधिक महत्व इस बात का था कि हाजी मुराद के प्रति जितनी अनुरक्तता प्रदर्शित की जाये, वोरोन्त्सोव उतना ही प्रसन्न होगा।
''उस व्यक्ति में कितना आश्चर्यजनक शौर्य है ! वह एक असाधारण व्यक्ति है।''
ß1849 में उसने दिन दहाड़े तमीर खाँ षूरा पर आक्रमण किया था और व्यवसाय उजाड़ दिया था।''
मेज के अंत में बैठे एक आर्मेनियन ने, जो उन दिनों तमीर खाँ षूरा की सेना में था, हाजी मुराद की इस उल्लेखनीय सफलता पर विस्तार से प्रकाश डाला। कमोबेश पूरा रात्रिभेज हाजी मुराद संबन्धी कहानियों में ही समाप्त हुआ। सभी को उसके शौर्य, बौध्दिकता और औदार्य की प्रशंसा करने की हड़बड़ाहट थी। किसी ने कहा कि किस प्रकार उसने छब्बीस कैदियों की हत्या का आदेश दिया था, लेकिन इस पर सामान्य प्रतिक्रिया ही हुई थी।
'' इससे क्या ? अंतत:, युद्ध युद्ध होता है।''
''वह एक महान व्यक्ति है।''
''यदि वह यूरोप में पैदा हुआ होता, तो वह दूसरा नेपोलियन हो सकता था,” मूर्ख जार्जियन प्रिन्स ने चापलूसी की अपनी योग्यता प्रदर्शित करते हुए कहा।
वह जानता था कि नेपोलियन का प्रत्येक उल्लेख वोरोन्त्सोव को आनन्दित करता था, जिसने उस पर विजय के प्रतीक स्वरूप कंधे पर सफेद क्रॉस धारण किया हुआ था।
''हूँ, शायद नेपोलियन तो नहीं, लेकिन घुड़सवार सेना का प्रतिभाशाली जनरल अवश्य होता। मैं तुमसे सहमत हूँ ।'' वोरोन्त्सोव ने कहा।
''यदि नेपोलियन नहीं, तब मुराद ।''
''वस्तुत: उसका नाम हाजी मुराद है ।''
''हाजी मुराद भाग आया है, और शमील का भी यही अंत है।'' किसी ने कहा ।
''वे अनुभव करने लगे हैं कि अब (इस ''अब'' का अर्थ था वोरोन्त्सोव के सामने ) वे डटे नहीं रह सकते, '' दूसरे ने कहा।
''बस इतना ही। आप सबको धन्यवाद,'' मनाना ऑर्बेलियानी बोली।
प्रिन्स वोरोन्त्सोव ने चापलूसी की लहर को संयत करने का प्रयत्न किया, जिसने उन्हें अभिभूत करना प्रारंभ कर दिया था। लेकिन उसने उसका आनंद लिया, और अपनी महिला मित्र को अच्छी मनोदशा में मेज से ड्राइंगरूम की ओर ले गया।
रात्रि भोज के बाद ड्राइंगरूम में जब कॉफी परोसी गई, प्रिन्स का व्यवहार सभी के प्रति सौजन्यपूर्ण था। वह लाल मूंछोंवाले जनरल के पास आया और उसने उसे यह अनुभूति देने की कोशिश की कि उसने उसकी त्रुटियों पर ध्यान नहीं दिया था।
जब प्रिन्स सभी अतिथियों की ओर घूम आया, वह ताश खेलने के लिए बैठ गया। वह एक पुराने प्रचलन का 'ओम्बर' खेल खेलने लगा। प्रिन्स की पार्टी में जार्जिया का प्रिन्स, एक आर्मेनियन जनरल, जिसने 'ओम्बर' खेलना प्रिन्स के नौकर से सीखा था, और अंतिम था डाक्टर आन्द्रेयेवस्की , जो अपने प्रभाव के लिए भलीभंति प्रसिद्ध था।
वोरोन्त्सोव ने अलेक्जेण्डर प्रथम के चित्र वाला सुनहरा तंबाकू केस बन्द किया, लिनेन ताश के पत्ते खोले ओर उन्हें बांटने वाला ही था कि उसका इटैलियन नौकर ग्यूवानी चाँदी की तस्तरी में एक पत्र लिए हुए प्रविष्ट हुआ।
''महामहिम, एक और समाचार।''
वोरोन्त्सोव ने अपने ताश बंद किये, व्यवधान के लिए क्षमा मांगी और पत्र पढ़ना प्रारंभ किया।
यह उसके पुत्र की ओर से था। उसने हाजी मुराद के पहुँचने और मिलर जकोमेल्स्की के साथ अपनी भिड़ंत का वर्णन किया था।
प्रिन्सेज आ पहुंची और पूछा कि उनके पुत्र ने क्या लिखा था।
''अभी भी वही विषय। उसने स्थानीय कमाण्डर के साथ झगड़ा किया है। साइमन की गलती थी। लेकिन '' अंत भला तो सब भला '' पत्र पत्नी की ओर बढ़ाते हुए उसने कहा, और अपने सहयोगियों की ओर मुड़ते हुए, जो सम्मानपूर्वक उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे, उनको उनके पत्ते समेटने के लिए कहा।
जब वे पहला हाथ खेल चुके, वोरोन्त्सोव ने अपना तंबाकू केस खोला और वही किया जो वह प्राय: किया करता था जब वह अच्छे मिजाज में होता था। उसने अपनी गोरी झुर्रियोंदार उंगलियों में एक चुटकी फ्रेंच तंबाकू ली, उसे नाक पर रखा और झटके से ऊपर की ओर खींच लिया।

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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

धारावाहिक उपन्यास

’हाज़ी मुराद’
लियो तोलस्तोय
अनुवाद : रूपसिंह चन्देल
चैप्टर - ६ और ७

(१९०८ की गर्मियों में यास्नाया पोल्याना
में अपनी स्टडी में)






छः

वोरोन्त्सोव इस बात से बहुत प्रसन्न था कि शमील के बाद रूस के सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली शत्रु को प्रलोभित करने में, कोई अन्य नहीं, बल्कि वह सफल रहा था। केवल एक ही रोड़ा था। वह था वोजविजेन्स्क में फौजी कमाण्डर, जनरल मिलर जकोमेल्स्की, और सच कहा जाये तो पूरा मामला उसके ही माध्यम से संचालित होना चाहिए था। वोरोन्त्सोव उसे बिना सूचित किये शुरू से अंत तक कार्यवाई करता रहा था, और इस बात की अप्रिय प्रतिक्रिया संभव थी। इस विचार से वोरोन्त्सोव की प्रसन्नता कुछ देर के लिए मेघाच्छन्न हुई।
जब वोरोन्त्सोव घर पहुंचा, उसने हाजी मुराद के अगंरक्षकों को क्षेत्रीय कमाण्डर के सुपुर्द किया और हाजी मुराद को अपने आवास में ले गया।
प्रिन्सेज मेरी वसीलीव्ना ने हाजी मुराद का ड्राइंग-रूम में स्वागत किया। उसने सुरुचिपूर्ण ढंग से कपड़े पहन रखे थे और मुस्करा रही थी और उसका छः वर्षीय खूबसूरत पुत्र उसके साथ था। हाजी मुराद ने अपने हाथों से अपनी छाती दबायी और दुभाषिये के माध्यम से शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए कहा, कि वह अपने को प्रिन्स का मित्र मानता है। चूंकि उन्होंने अपने घर में उसका स्वागत किया है, इसलिए मित्र का परिवार उसके लिए उतना ही क़ाबिले अदब ( पूज्य ) है जितना कि स्वयं मित्र। मेरी वसीलीव्ना को हाजी मुराद की उपस्थिति और उसका व्यवहार पसंद आया। वास्तविकता यह थी कि उसने उसके प्रति अधिक अनुग्रह दिखाते हुए पहले से ही प्रवृत्त अपना लंबा गोरा हाथ जब उसकी ओर बढ़ाया था तब हाजी मुराद खांसने लगा था और लज्जारुण हो उठा था। मेरी वसीलीव्ना ने उससे बैठने का आग्रह किया और पूछा कि क्या वह कॉफी पियेगा, और उसे कॉफी सर्व किये जाने का आदेश दिया। लेकिन हाजी मुराद ने इंकार कर दिया। वह बहुत मामूली-सी रशियन समझ लेता था, लेकिन उसे बोल नहीं सकता था, और जब वह उसे समझ नहीं पाता था, मुस्करा देता था। उसकी मुस्कान ने मेरी वसीलीव्ना को मुग्ध कर दिया था, जैसा कि पोल्तोरत्स्की ने किया था। मेरी वसीलीव्ना का घुंघराले बालों और तेज आँखों वाला पुत्र, जिसे वह बुल्का बुलाती थी, माँ के बगल में खड़ा, निर्निमेष हाजी मुराद की ओर दे।

हाजी मुराद को अपनी पत्नी के पास छोड़कर वोरोन्त्सोव हाजी मुराद के आत्म-समर्पण की रपट तैयार करके मुख्यालय भेजने की व्यवस्था करने के लिए कार्यालय चला गया। उसने एक रपट ग्रोज्नी में ‘लेफ्ट फ्लैंक‘ के कमाण्डर जनरल कोज्लोवस्की को लिखी, और एक पत्र अपने पिता को लिखा, और इस बात से चिन्तित होता हुआ वह जल्दी ही घर लौट आया कि उसकी पत्नी इस बात से नाराज हो रही होगी कि वह एक अनजान और खतरनाक व्यक्ति को उसके पास छोड़ गया था, जिसका एक ओर नाराज होने का अवसर दिये बिना आतिथ्य करना था तथा दूसरी ओर अतिरिक्त मित्रता भी प्रदर्शित करनी थी। लेकिन उसका भय आधारहीन था। हाजी मुराद वोरोनत्सोव के सौतेले पुत्र बुल्का को घुटने पर बैठाये एक कुर्सी पर बैठा हुआ मेरी वसीलीव्ना की किसी हास्य टिप्पणी के दुभाषिये द्वारा किये गये अनुवाद को सुनकर एकाग्रतापूर्वक सिर झुका रहा था। मेरी वसीलीव्ना कह रही थी कि यदि उसने अपने मित्रों को वह सब दे दिया जिसकी वे प्रशंसा करते थे तो उसे शीघ्र ही अदम की भाँति रहना होगा।
प्रिन्स के प्रवेश करते ही हाजी मुराद ने बुल्का को नीचे उतार दिया, जो उसके घुटने से उतरकर चकित था और रुष्ट होकर खड़ा हो गया था। उसके चेहरे का प्रसन्न भाव तुरंत कठोरता और गंभीरता में बदल गया था। हाजी मुराद तभी बैठा जब वोरोन्त्सोव ने सीट ग्रहण कर ली। बातचीत जारी रखते उसने मेरी वसीलीव्ना की टिप्पणी का उत्तर देते हुए कहा कि यह उसके दस्तूर में है कि एक मित्र जो कुछ भी पसंद करे वह उसे अवश्य दे दी जाये।
“आपका पुत्र मेरा मित्र है,” उसने बुल्का के बालों को सहलाते हुए रशियन में कहा। बुल्का पुनः उसके घुटने पर बैठ गया था।
“आपका बटमार मोहक है।” मेरी वसीलीव्ना ने पति से फ्रेंच में कहा। बुल्का ने उसकी कटार की प्रशंसा करनी प्रारंभ की तो उसने वह उसे दे दी ।
बुल्का ने कटार सौतेले पिता को दिखाई।
“यह बहुत कीमती है।” मेरी वसीलीव्ना ने कहा।
“उसे कुछ उपहार देने के लिए हमें कोई उपाय खोजना आवश्यक है।” वोरोन्त्सोव ने कहा।
हाज़ी मुराद आँखें नीची किए बैठा रहा और बुल्का के घुंघराले बालों पर लगातार हाथ फेरता रहा।
“बहादुर बालक, बहादुर बालक।”



“कितनी प्यारी कटार है!’’ वोरोन्त्सोव ने अच्छे आधारवाले स्टील के बीच में खांचेदार धारवाली कटार को बाहर निकालते हुए कहा। “बहुत धन्यवाद ।”
“उससे पूछो, हम उसके लिए क्या कर सकते हैं,” वोरोन्त्सोव ने दुभाषिये से कहा।
दुभाषिये ने अनुवाद किया और हाजी मुराद ने तुरंत उत्तर दिया कि वह कुछ नहीं चाहता, लेकिन वह एक ऐसे स्थान में जाना चाहेगा जहाँ वह नमाज अदा कर सके। वोरोन्त्सोव ने एक नौकर को बुलाया और कहा कि वह हाजी मुराद की इच्छा को पूरा करे।
जैसे ही हाजी मुराद अकेला हुआ, उसका चेहरा बदल गया। उसके चेहरे पर प्रसन्नता, चाहत और गर्व के मिश्रित भाव तिरोहित हो गये और एक प्रकार की चिन्ता ने उनका स्थान ले लिया।
वोरोन्त्सोव द्वारा उसका स्वागत उसकी अपेक्षा से कहीं अधिक अच्छा था। लेकिन जितना अच्छा स्वागत था उतना ही कम हाजी मुराद को वोरोन्त्सोव और उसके अधिकारियों पर भरोसा था। वह हर चीज से भयभीत था। वह सोचता रहा कि शायद उसे कैद कर लिया गया था। बेडि़यों में जकड़कर उसे साइबेरिया भेज दिया जायेगा या तत्काल मार दिया जायेगा, और इसीलिए वह अपनी सुरक्षा के प्रति चैकन्ना था।
एल्दार अंदर आया और उसने उससे पूछा कि उसके अंगरक्षकों को कहाँ ठहराया गया था और घोड़े कहाँ थे और क्या उन लोगों ने उनसे अपने हथियार ले लिये थे ?
एल्दार ने बाताया कि घोड़े प्रिन्स के अस्तबल में थे। आदमियों को ‘आउट हाउस’ में ठहराया गया था। उन लोगों ने अपने हथियार सौंप दिये थे और दुभाषिया उन्हें भोजन और चाय दे रहा था।
हाजी मुराद ने सिर हिलाकर हैरानी व्यक्त की, कपड़े उतारे और घुटनों के बल झुककर नमाज अदा करने लगा। जब उसने नमाज समाप्त कर ली उसने अपनी चांदी की कटार अपने पास लाने का आदेश दिया। उसने पुनः कपड़े पहने और कोच पर पैर रखकर बैठ गया और प्रतीक्षा करने लगा कि देखें अब क्या होगा।
ठीक चार बजे के बाद उसे प्रिन्स के पास भोजन के लिए बुलाया गया।
भोजन में उसने पुलाव के अतिरिक्त कुछ नहीं लिया, जिसे उसने उसी स्थान से स्वयं परोसा जहाँ से मेरी वसीलीव्ना ने परोसा था।


“उसे भय है कि हम उसे जहर दे सकते हैं,” मेरी वसीलीव्ना ने पति से कहा। उसने स्वयं उसी स्थान से परोसा जहाँ से मैनें।” उसने दुभाषिये के माध्यम से तुरंत हाजी मुराद को संबोधित करते हुए पूछा कि वह अपनी प्रार्थना पुनः कब करेगा ? हाजी मुराद ने पाँचों उंगलियाँ उठायीं और सूर्य की ओर इशारा किया।
“ तब, शीघ्र ही,” वोरोन्त्सोव ने टनटनाने वाली घड़ी निकाली, एक स्प्रिंग दबाई, और घड़ी ने टनटनाकर सवा चार बजे का समय बताया। हाजी मुराद स्पष्ट रूप से उस आवाज से अचम्भित हुआ था, और उसने उसे पुनः टनटनाने के लिए कहा और घड़ी देखने का आग्रह किया।
”इस बार आप करके देखें। घड़ी उसे दे दीजिये,” मेरी वसीलीव्ना ने पति से कहा।
वोरोन्त्सोव ने घड़ी तुरंत हाजी मुराद की ओर बढ़ा दी। हाजी मुराद ने अपनी छाती पर अपना हाथ रखा और घड़ी ले ली। उसने अनेक बार स्प्रिंग दबायी, सुना और प्रशंसा में सिर हिलाता रहा।
भोजनोपरांत मिलर जकोमेल्स्की के परिसहायक (ए डी सी ) के प्रिंस से मिलन की सूचना दी गयी।
परिसहायक ने प्रिन्स को बताया कि जब जनरल ने हाजी मुराद के आत्म समर्पण के विषय में सुना, वह इस बात से बहुत खीझे कि उन्हें इस विषय में सूचित नहीं किया गया, और मांग की कि हाजी मुराद को तुरन्त उसके पास लाया जाये। वोरोन्त्सोव ने कहा कि वह आज्ञा का पालन करेगा। अपने दुभाषिये के माध्यम से उसने जनरल का आदेश हाजी मुराद को बताया और अपने साथ मिलर के पास चलने के लिए उसे कहा।
जब मेरी वसीलीव्ना को ज्ञात हुआ कि परि-सहायक क्यों आया था, उसने तुरन्त स्पष्ट अनुभव किया कि उसके पति और जनरल के मध्य अवश्य एक तमाशा होगा। पति के रोकने के हर संभव प्रयास के बावजूद उसने उसके और हाजी मुराद के साथ जनरल से मिलने के लिए प्रस्थान करने का निर्णय किया।
“बेहतर होगा कि तुम यहीं रुको। यह मेरा मामला है तुम्हारा नहीं।”
“तुम मुझे जनरल की पत्नी से मिलने जाने से नहीं रोक सकते।”
“तुम जाने का कोई दूसरा समय चुन सकती हो।”
“लेकिन, मैं अभी जाना चाहती हूँ।”
“उसके लिए ऐसा कुछ नहीं है।” वोरोन्त्सोव सहमत हो गया, और तीनों चल पड़े।

जब वे पंहुचे, मिलर फीकी विनम्रता के साथ मेरी वसीलीव्ना को पत्नी के पास ले गया, और सहायक को कहा कि वह हाजी मुराद को स्वागत कक्ष में ले जाये और जब तक उसे उसका आदेश न मिले, उसे कहीं बाहर जाने की अनुमति न दे।
“अंदर आइये” अपनी स्टडी का दरवाजा खोलते हुए उसने वोरोन्त्सोव से कहा और अपने आगे प्रिन्स को अंदर प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त किया।
अन्दर एक बार वह प्रिन्स के सामने रुक गया और उसे बैठने के लिए कहे बिना बोला।
”मैं यहाँ का ‘मिलिटरी कमाण्डर’ हूँ, इसलिए शत्रु से कोई भी वार्ता मेरे माध्यम से ही होनी चाहिए थी। हाजी मुराद के आत्म-समर्पण की सूचना आपने मुझे क्यों नहीं दी?”
“एक एजेण्ट मेरे पास आया था और मेरे समक्ष हाजी मुराद के आत्म-समर्पण करने की उसकी इच्छा व्यक्त की थी,” वोरोन्त्सोव ने उत्तर दिया। उत्तेजना से उसका चेहरा विवर्ण हो उठा था क्योंकि उसे क्रुद्ध जनरल से कठोर प्रतिक्रिया की ही अपेक्षा थी। उस समय वह स्वयं क्रोध से प्रभावित था।
“मैं आपसे पूछ रहा हूँ, कि आपने मुझे सूचना क्यों नहीं दी थी ?”
“बैरन, मैं ऐसा करना चाहता था, लेकिन…।”
‘‘बैरन नहीं, बल्कि आपके लिए महामहिम…”
यहाँ बैरन का दबा क्षोभ अचानक फूट पड़ा था। उसने वर्षों से अपने अंदर उबल रही भावनाओं को निकल जाने दिया।
“मैंनें सत्ताइस वर्षों तक सम्राट की सेवा केवल इसलिए नहीं की कि कल को नियुक्त हुआ कोई व्यक्ति अपने पारिवारिक सम्पर्कों का दुरुपयोग कर मेरी नाक के नीचे ऐसे मामले तय करे जिनसे उसका कोई संबन्ध नहीं।”
“महामहिम, मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि अनुचित बात न बोलें।” वोरोन्त्सोव ने उसे बाधित किया।
“मैं सत्य कह रहा हूँ और अनुमति न दूंगा …” जनरल ने और अधिक क्रोधित होते हुए कहना शुरू किया।
इसी समय स्कर्ट की सरसराहट हुई और मेरी वसीलीव्ना ने प्रवेश किया। उसके पीछे अकल्पनीयरूप से नाटे कद की एक महिला थी, जो मिलर जकोमेल्स्की की पत्नी थी।

“बैरन इतना पर्याप्त है। साइमन परेशान नहीं होना चाहता था।” मेरी वसीलीव्ना भड़क उठी।
“प्रिन्सेज, नुक्ता यह नहीं है…”
“अच्छा, इसे भूल जाएं। एक खराब बहस, एक अच्छे झगड़े से बेहतर होती है, आप जानते हैं… मैं क्या कह रही हूँ ?” ठहाका लगाकर वह हँस पड़ी।
क्रुद्ध जनरल उस खूबसूरत युवती की मोहक मुस्कान से कुछ ढीला पड़ा। उसकी मूंछों के नीचे हल्की मुस्कान तैर गयी।
“मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं गलती पर था,” वारोन्त्सोव ने कहा, ”लेकिन…।”
“ठीक है, मुझे हल्का-सा गुस्सा आ गया था।” मिलर ने कहा और प्रिन्स की ओर हाथ बढ़ाया।
शांति स्थापित हुई, और तय यह हुआ कि हाजी मुराद को कुछ समय के लिए मिलर के पास छोड़ दिया जाये, और उसके बाद उसे ‘लेफ्ट फ्लैंक’ के कमाण्डर के पास भेज दिया जाये।
हाजी मुराद बगल के कमरे में बैठा था, और यद्यपि वह यह नहीं समझ पाया कि उन्होंने क्या कहा था, उसने महत्वपूर्ण बात समझ ली थी कि वे उसके विषय में ही झगड़ रहे थे। उसके द्वारा शमील को छोड़ देना रूसियों के लिए अत्यधिक महत्व का विषय था और इसलिए, यदि वे उसे निर्वासित नहीं करते अथवा मारते नहीं तो वह उनसे बहुत कुछ निवेदन कर सकता है। इसके अतिरिक्त, उसने अनुभव किया कि, यद्यपि मिलर जकोमेल्स्की प्रधान था, वह उसके अधीनस्थ वोरोन्त्सोव जितना महत्वपूर्ण नहीं था। वोरोन्त्सोव काउण्ट था जबकि मिलर जकोमेल्स्की काउण्ट नहीं था। इसलिए जब मिलर जकोमेल्स्की ने हाजी मुराद को बुलाया और उससे पूछताछ प्रारंभ की, हाजी मुराद ने उद्धत और तटस्थ रहते हुए कहा कि उसने गोरे जार की सेवा करने के लिए पहाड़ों को छोड़ा था और वह अपने सरदार, कहना चाहिए कि, कमाण्डर-इन-चीफ, प्रिन्स वोरोन्त्सोव के समक्ष तिफ्लिस में ही सब कुछ बयान करेगा।
॥ सात ॥
घायल आवदेयेव को छावनी के निकासी द्वार के निकट के अस्पताल में, जो लकड़ी के एक छोटे-से मकान में था, ले जाया गया और जनरल वार्ड के एक खाली बेड पर लिटा दिया गया। वार्ड में चार मरीज थे। एक सन्निपात-ग्रस्त टायफायड का केस था, और दूसरा निस्तेज, ज्वरग्रस्त, धंसी हुई आँखें, सदैव मरोड़ उठने की आशंका से ग्रस्त और लगातार जम्हुआई लेनेवाला मरीज था । दो और थे जो तीन सप्ताह पहले हुए हमले में घायल हुए थे। एक, जो खड़ा हुआ था, हाथ में और दूसरा; जो बिस्तर पर बैठा हुआ था, कंधे में घायल था। टायफायड वाले मरीज को छोडकर शेष ने नवागन्तुक को घेर लिया और उसे लेकर आने वालों से प्रश्न करने लगे।
'' वे लोग कभी-कभी धुंआधार गोलीबारी करते हैं, लेकिन इस बार उन्होंनें केवल आधा दर्जन बार ही फायर की थी,''- लेकर आने वालों में से एक ने उन्हें बताया ।
''भाग्य की बात है।''
''ओह।'' आवदेयेव दर्द को रोकने का प्रयास करता हुआ कराहा, जब वे उसे बिस्तर पर लेटा रहे थे। जब उन्होनें उसे लेटा दिया, उसने त्योरियाँ चढ़ाई और कराहना बंद कर दिया, लेकिन पैर के कारण बेचैनी अनुभव करता रहा। उसने घाव को अपने हाथों से पकड़ लिया और एकटक अपने सामने की ओर देखने लगा। डाक्टर आया और उन्हें आदेश दिया कि उसे औंधा पलट दें यह देखने के लिए कि क्या गोली पीछे से बाहर निकल गयी थी।
''यह क्या है ?'' डाक्टर ने पीठ और नितम्बों पर बने क्रास के लंबे सफेद निशान की ओर संकेत करते हुए पूछा।
''सर, पुराने घाव का निशान है !'' कराहते हुए आवदेयेव बुदबुदाया।
उसने धन का अपव्यव किया था। उसके लिए उसे जो दण्ड दिया गया था, यह उसीका निशान था।
उन्होंने उसे पुन: पलट दिया, और डाक्टर ने सलाई से उसके पेट में गहराई तक टटोला और गोली तक पहुँच गया, लेकिन उसे निकाल नहीं सका। उसने घाव की ड्रेसिंग की और चिपकनेवाला प्लास्टर चढ़ाया, फिर चला गया। पूरे परीक्षण और घाव की ड्रेसिंग के समय आवदेयेव दांत भींचे और आँखें बंद किये लेटा रहा था। जब डाक्टर चला गया उसने आँखें खोलीं और विस्मय से चारों ओर देखा। उसकी आँखें मरीजों और अर्दली की ओर घूमीं, फिर भी उसे लगा कि वह उन्हें नहीं देख रहा है, बल्कि विस्मित कर देने वाला कुछ और ही देख रहा है।
आवदेयेव के साथी पानोव और सेरेगिन आए हुए थे। वह अचम्भित-सा उन्हें टकटकी लगाकर देखता हुआ, उसी प्रकार लेटा रहा। देर तक वह अपने मित्रों को पहचान नहीं पाया, हालांकि उसकी आँखें सीधे उन्हें ही देख रही थीं।
''पीट, क्या तुम घर से कुछ मंगाना चाहते हो ?'' पानोव ने पूछा।
आवदेयेव ने कोई उत्तर नहीं दिया, हालांकि वह पानोव के चेहरे की ओर ही देख रहा था।
'' मै पूंछ रहा हूँ, तुम घर से कुछ मंगाना चाहते हो ?'' उसके ठण्डे हाथ को स्पर्श करते हुए पानोव पुन: बोला।
आवदेयेव को चेतना वापस लौटती हुई-सी प्रतीत हुई।
''हैलो, अन्तोनिच।''
''हाँ, मैं आ गया। तुम घर से कुछ मंगाना चाहते हो ? सेरेगिन लिख देगा।''
''सेरेगिन,'' कठिनाई से अपनी आँखें सेरेगिन की ओर घुमाते हुए आवदेयेव बोला, ''क्या तुम लिख दोगे ? तब उन्हें यह लिखो - आपका बेटा पीटर मर गया । मुझे अपने भाई से ईर्ष्या थी - यही बात पिछली रात मैं कह रहा था … लेकिन अब मैं प्रसन्न हूँ। ईश्वर उसे सौभाग्यशाली करे। मैं उसकी खुशकिस्मती की कामना करता हूँ। मैं प्रसन्न हूँ। ऐसा ही कुछ लिख दो।”
जब वह यह सब कह चुका, उसने पानोव पर एकटक दृष्टि गड़ायी और लंबी चुप्पी साध ली।
पानोव ने कोई उत्तर नहीं दिया।
''तुम्हारा पाईप, तुम्हारा पाईप, मैं कहता हँ, वह तुम्हें मिल गया ?'' आवदेयेव ने पूछा।
''वह मेरे सामान में था।''
''अच्छा, अच्छा। अब मुझे एक मोमबत्ती दो। मैं मरने वाला हूँ।'' आवदेयेव बोला।
उसी समय पोल्तोरत्स्की उसे देखने आया।
''तुम कैसा अनुभव कर रहे हो … खराब ?'' वह बोला।
आवदेयेव ने आँखें बंद कर लीं और सिर हिलाया। उसका दुबला चेहरा निष्प्रभ और कठोर था। उसने उत्तर नहीं दिया, लेकिन पानोव से पुन: बोला:
''मुझे मोमबत्ती दो, मैं मरने वाला हूँ।''
उन्होने एक मोमबत्ती उसके हाथ में रख दी, लेकिन यह सोचकर कि उसकी उंगलियाँ उसे पकड़ नहीं पायेगीं, उन्होंने मोमबत्ती उसकी उंगलियों के बीच में रखा और उसे थामे रहे। पोल्तोरत्स्की कमरे से बाहर चला गया और उसके जाने के पाँच मिनट बाद अर्दली ने आवदेयेव के हृदय के पास कान लगाया और कहा कि वह मर गया।
तिफ्लिस को जो रिपोर्ट भेजी गई उसमें आवदेयेव की मृत्यु का विवरण इस प्रकार दिया गया था- ''23 नवम्बर को कुरियन बटालियन की दो कम्पनियाँ जंगल साफ करने के लिए छावनी से गयी थीं। वृक्ष काटने वालों पर आक्रमण कर दिया। अग्रिम चौकी पर तैनात दलों ने वापस लौटना प्रारंभ कर दिया, जब कि दूसरी कम्पनी ने संगीनों से धावा बोल दिया और कबीलाइयों को खदेड़ दिया। युद्ध के दौरान हमारे दो सिपाही सामान्य रूप से घायल हुए थे और एक की मृत्यु हो गयी थी। कबीलाइयों के लगभग सौ लोग हताहत हुए थे।''

०००

शनिवार, 31 दिसम्बर 2011

धारावाहिक उपन्यास


वातायन के पाठकों के लिए नववर्ष की मंगल कामनाएं

हाज़ी मुराद
लियो तोलस्तोय
अनुवाद - रूपसिंह चन्देल
(चैप्टर ४ और ५)


चार
शमील के मुरीदों से बचते हुए हाजी मुराद ने तीन रातें बिना सोये बितायी थीं, और जैसे ही सादो ‘शुभ रात्रि’ कहकर कमरे से बाहर निकला था, वह सो गया था। वह पूरे कपड़े पहने हुए ही, लाल गद्दी के नीचे अपनी कोहनी मोड़कर, जिसे उसके मेजबान ने उसके लिए बिछाया था, सो गया था। एल्दार उसके पीछे पसर गया था। उसकी छाती उसके सफाचट नीले सिर से ऊंची उठी हुई दिख रही थी, जो तकिया से नीचे लुढ़क गया था। उसका ऊपरी होठ नीचे के होठ से हल्का-सा दबा हुआ था, और वे इस प्रकार सिकुड़-फैल रहे थे कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई बच्चा चुस्की ले रहा था। हाजी मुराद की भांति वह भी पूरे कपड़ों में, अपनी बेल्ट में पिस्टल और कटार पहने सो गया था। उसके सफेद ट्यूनिक में काली गोलियों की थैलियॉं भरी हुई थीं। अंगीठी में लकड़ियाँ जल रहीं थीं और आले में चिराग टिमटिमा रहा था।
आधी रात के समय दरवाजा चरमराया। हाजी मुराद तुरंत उठ खड़ा हुआ और उसने मजबूती से अपनी पिस्टल पकड़ ली। सादो मिट्टी की फर्श पर दबे पाँव चलते हुए कमरे में प्रविष्ट हुआ।
‘‘तुम क्या चाहते हो ?” हाजी मुराद ने ऐसे पूछा जैसे वह सोया ही नहीं था।
‘‘हमें सोचना चाहिए,” हाजी मुराद के सामने बैठते हुए सादो बोला। ‘‘एक महिला ने छत से आपको घोड़े पर आते हुए देख लिया था,” उसने कहा। “उसने अपने पति को बताया और अब सारा गाँव जान गया है। एक पड़ोसी अभी-अभी अन्दर आया था और उसने मेरी पत्नी को बताया कि बुजुर्ग लोग मस्जिद में एकत्रित हुए हैं और आपको गिरफ्तार करना चाहते हैं।”
‘‘हमें जाना होगा” हाजी मुराद बोला।
‘‘घोड़े तैयार हैं।” सादो ने कहा और तेजी से कमरे से बाहर निकल गया।
‘‘एल्दार” हाजी मुराद फुसफुसाया और एल्दार स्वामी की आवाज सुनते ही अपनी टोपी ठीक करता हुआ उछलकर खड़ा हो गया। हाजी मुराद ने हथियार और लबादा पहना, और एल्दार ने भी वैसा ही किया। उन दोनों ने चुपचाप सायबान की ओर से घर छोड़ दिया। काली आँखों वाला लड़का घोड़े ले आया था। सख्त सड़क पर घोड़ों की टापों की खटखटाहट से बगल वाले मकान के दरवाजे से एक सिर बाहर प्रकट हुआ, और एक आदमी लकड़ी के जूतों की खटखट करता पहाड़ी पर बने मस्जिद की ओर दौड़ गया था।
उस समय चाँद नहीं निकला था। काले आकाश में तारे चमक रहे थे। अंधेरे में छतों के बाहरी किनारे और मस्जिद के शिखर और उसकी मीनारों के बुर्ज गाँव के सबसे ऊंचे भाग से भी ऊपर उठे देखे जा सकते थे। मस्जिद से फुसफुसाहट भरी आवाजें सुनी जा सकती थी।
हाजी मुराद ने तेजी से राइफल पकड़ी, तंग रकाब में पैर रखा और कुशलतापूर्वक उछलकर गद्दीदार काठी पर बैठ गया।
‘‘खुदा आपको इनाम दे” अपने मेजबान को संबोधित करते हुए उसने कहा। उसका दाहिना पैर स्वत: दूसरी रकाब पर पहुंच गया और चाबुक के इशारे से उसने लड़के को हटने का इशारा किया। लड़का पीछे हट गया, और घोड़ा गली से मुख्य मार्ग की ओर तेज गति से दौड़ पड़ा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि बिना कहे वह जानता था कि उसे क्या करना है। एल्दार पीछे चला और सादो अपने फर कोट में बाहें लहराता और संकरी गली में इधर से उधर छंलागें लगाता उनके पीछे दौड़ने लगा। गली के मुहाने पर एक हिलती-डुलती छाया रास्ता रोकती हुई प्रकट हुई, और फिर दूसरी प्रकटी।
“रुको ! कौन जा रहा है ? रुको,” चीखती हुई एक आवाज आई, और अनेक लोगों ने रास्ता रोक लिया।
रुकने के बजाय हाजी मुराद ने बेल्ट से पिस्तौल निकाली और घोड़े की गति बढ़ाकर सीधे रास्ता रोके दल की ओर बढ़ा । लोग तितर-बितर हो गये और हाजी मुराद सहज पोइयां चाल से सड़क पर उतर गया। एल्दार तेज दुलकी चाल से उसके पीछे चलता रहा। उनके पीछे दो धमाके गूंजे और सनसनाती गोलियाँ दोनों में से किसी को भी स्पर्श न कर बगल से निकल गयीं। हाजी मुराद ने अपनी रफ्तार नहीं बदली। तीन सौ गज आगे जाने के बाद उसने अपने घोड़े को रोका, जो हल्का-सा हांफ रहा था। उसने सुनने का प्रयास किया। सामने और नीचे की ओर उसे तेज बहते पानी की आवाज सुनाई दी। उसके पीछे गाँव में मुर्गे बांग दे रहे थे। इन आवाजों से ऊपर पीछे की ओर से निकट आती हुई घोड़ों की टॉपें और आवाजें उसे सुनाई दीं। हाजी मुराद ने घोड़े को छुआ और उसी गति में चलने लगा।
पीछे आनेवाले घुड़सवार सरपट दौड़ रहे थे और तेजी से हाजी मुराद के निकट आते जा रहे थे। वे लगभग बीस थे। वे ग्रामीण थे जिन्होंने हाजी मुराद को गिरफ्तार करने का निर्णय किया था अथवा शमील के सामने अपनी सफाई देने के लिए वे उसे गिरफ्तार करने का नाटक करना चाहते थे। जब वे इतना निकट आ गये कि अंधेरे में भी दिखाई देने लगे तब हाजी मुराद रुक गया। उसने घोड़े की लगाम ढीली की, बायें हाथ से यंत्रवत राइफल केस खोला और दूसरे हाथ में राइफल पकड़ ली। एल्दार ने भी वैसा ही किया।
‘‘तुम लोग क्या चाहते हो ?” हाजी मुराद चीखा। ‘‘क्या तुम हमें पकड़ना चाहते हो ? तब आगे बढ़ो ।“ उसने अपनी राइफल ऊपर उठायी।
ग्रामीण रुक गये। राइफल हाथ में पकड़े हुए हाजी मुराद ने नदी की ओर उतरना प्रारंभ कर दिया। घुड़सवारों ने दूरी बनाए हुए उसका पीछा किया। जब हाजी मुराद नदी पार करके दूसरी ओर पहुँच गया, घुड़सवार इस प्रकार चीखे जिससे वे जो कहना चाहते थे उसे हाजी मुराद सुन सके। हाजी मुराद ने उत्तर में राइफल से फायर किया और घोड़े को सरपट दौड़ा दिया। जब वह रुका तब न किसी के पीछा करने की आवाज थी, न मुर्गों की बांग, केवल जंगल के मध्य पानी की स्पष्ट कलकल ध्वनि थी और कभी-कभी उल्लू चीख उठता था। यह वही जंगल था जहाँ उसके आदमी उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। जब वह जंगल में पहुँच गया, हाजी मुराद रुका, गहरी सांसों से फेफड़ों को भरा, सीटी बजायी और इसके बाद उत्तर सुनने के लिए रुका रहा। एक मिनट बाद ही उसे जंगल से उसी प्रकार की सीटी सुनाई दी। हाजी मुराद ने सड़क से मुड़कर जंगल में प्रवेश किया। सौ गज जाने के बाद पेड़ों के तनों के बीच से आग की चमक और उस आग के चारों ओर बैठे लोगों की छायाएं, और साथ ही हल्की रोशनी में अभी भी काठी कसा लड़खड़ाता हुआ एक घोड़ा उसे दिखाई पड़े। आग के पास चार आदमी बैठे थे।
उनमें से एक आदमी तेजी से उठ खड़ा हुआ, हाजी मुराद के पास आया और उसके घोड़े की लगाम और रकाब थाम ली। वह हाजी मुराद का हमशीर (सहोदर) था जो उसके क्वार्टर मास्टर के रूप में काम करता था।
‘‘आग बुझा दो।“ घोड़े से उतरते हुए हाजी मुराद ने कहा। दूसरे लोगों ने आग को छितराना शुरू कर दिया और जलती लकडि़यों को रौदनें लगे।
‘‘तुमने बाटा को देखा है ?” जमीन पर बिछे हुए चादर की ओर बढ़ते हुए हाजी मुराद ने पूछा।
‘‘हाँ, कुछ देर पहले ही वह खान महोमा के साथ गया था।”
‘‘वे लोग किस रास्ते गये ?”
‘‘इस रास्ते।” हाजी मुराद जिस रास्ते से आया था, उसके विपरीत रास्ते की ओर इशारा करते हुए हनेफी ने उत्तर दिया।
‘‘ अच्छा ” हाजी मुराद बोला। उसने अपनी राइफल उतारी और उसे लोड किया। ‘‘हमें सतर्क रहना चाहिए। मेरा पीछा किया जा रहा था,” उसने उस व्यक्ति से कहा जो आग बुझा रहा था।
यह हमज़ालो था, एक चेचेन। हमज़ालो चादर के पास आया, राइफल को उसके खोल में रखा और चुपचाप जंगल में उस खुले स्थान के किनारे की ओर गया जिधर से हाजी मुराद आया था। एल्दार घोड़े से उतरा, उसने हाजी मुराद के घोड़े को पकड़ा और दोनों घोड़ों की लगामें पेड़ से इस प्रकार बांध दीं कि घोड़ों के सिर ऊपर उठे रहें। फिर हमज़ालो की भांति कंधे पर अपनी राइफल लटकाकर वह जंगल के दूसरे किनारे पर जा खड़ा हुआ। आग बुझ चुकी थी। जंगल पहले जैसा अंधकारमय प्रतीत नहीं हो रहा था। तारे यद्यपि क्षीण हो चुके थे तथापि आकाश में दिखाई दे रहे थे।
हाजी मुराद ने तारों पर दृष्टि डाली और यह देखकर कि सप्तर्षि-मण्डल ने आधी दूरी तय कर ली है, उसने अनुमान लगाया कि आधी रात बीत चुकी थी और रात्रि की नमाज का समय हो गया था। उसने हनेफी से जग मांगा, जिसे वह पिट्ठू बैग में लेकर सदैव चलता था। उसने अपनी चादर ली और नदी किनारे गया। जूते उतारकर हाजी मुराद ने जब वु़जू समाप्त कर लिया तब वह चादर तक नंगे पाँव चलकर आया, पिण्डलियों के बल उस पर उकंड़ू बैठा, उंगलियों से कान बंद किये, आँखें मूंदी और पूरब की ओर मुड़कर रिवाज के अनुसार सस्वर नमाज अदा करने लगा।
जब उसने नमाज समाप्त कर ली, वह उस स्थान पर लौट आया जहाँ उसने पिट्ठू बैग छोड़ा था। चादर पर बैठकर उसने घुटनों पर हाथ रखे और सिर झुकाकर सोचने लगा।
हाजी मुराद सदैव अपनी किस्मत पर यकीन करता था। वह जो भी योजना बनाता, कार्य प्रारंभ करने से पहले ही उसकी सफलता के विषय में आश्वस्त हो लेता था… और सब कुछ भलीभांति सम्पन्न भी होता रहा था। उसके सम्पूर्ण तूफानी यौद्धिक जीवन ने, कुछ अपवादों को छोड़कर, यह सिद्ध भी कर दिया था। इसलिए, उसे विश्वास था, कि अब भी वैसा ही होगा। उसने कल्पना की कि वोरोन्त्सोव द्वारा भेजी गयी सेना के सहयोग से वह शमील पर हमला करेगा, उसे पकड़कर अपना इंतकाम लेगा; जार उसे इनामयाफ़्ता करेगा और वह न केवल अवारिया में, बल्कि सम्पूर्ण चेचेन्या में जो उसकी अधीनता स्वीकार कर लेगी, शासन करेगा।
यही सब सोचते हुए वह सो गया और उसने स्वप्न देखा कि ‘हाजी मुराद‘ कहकर गाते और चिल्लाते अपने योद्धाओं के साथ वह शमील पर आक्रमण कर रहा था। उसने उसे और उसकी पत्नियों को कैद कर लिया था और उसकी पत्नियों का रुदन और क्रन्दन सुन रहा था। अचानक वह उठ बैठा ‘अल्लाह’ का आलाप, ‘हाजी मुराद’ का शोर और शमील की पत्नियों का क्रन्दन वास्तव में गीदड़ों की हुहुआहट और उनकी हंसी थी, जिसने उसे जगा दिया था। हाजी मुराद ने सिर ऊपर उठाया, आकाश की ओर देखा, जिस पर पेड़ों के पार पूरब की ओर रोशनी फैल रही थी और कुछ दूर बैठे मुरीद से उसने पूछा कि क्या खान महोमा लौट आया। यह सुनने के बाद कि वह अभी तक नहीं लौटा था, हाजी मुराद ने सिर नीचे झुका लिया और पुन: सोने की कोशिश करने लगा।
वह खान महोमा की बश्शाश ( उत्फुल्ल ) आवाज से जाग गया, जो बाटा के साथ अपने मिशन से वापस लौट आया था। खान महोमा तुरंत हाजी मुराद के बगल में बैठ गया और बताने लगा कि किस प्रकार सैनिक उनसे मिले और उन्हें लेकर प्रिन्स के पास गये, और उसने प्रिन्स से बात की। उसने उसे बताया कि प्रिन्स कितना प्रसन्न थे, और कैसे उन्होंने मिशिको के बाहर शाला जंगल में जहाँ रूसी सैनिक जंगल की सफाई कर रहे थे, सुबह के समय उनसे मिलने का वायदा किया था। बाटा ने अपने साथी को रोका और विस्तार से बताने लगा।
हाजी मुराद ने उनसे पूछा कि रूसियों की ओर जाने के उसके प्रस्ताव पर वोरोन्त्सोव ने उत्तर में ठीक क्या शब्द प्रयोग किये थे। खान महोमा और बाटा ने एक स्वर में उत्तर दिया कि प्रिन्स ने हाजी मुराद का एक मेहमान की तरह इस्तकबाल (स्वागत) करने और अच्छी तरह देखभाल किये जाने का ध्यान रखने का वायदा किया था। हाजी मुराद ने उनसे रास्ता पूछा, और जब खान महोमा ने उसे आश्वस्त किया कि वह अच्छी तरह रास्ता जानता है और वह उसे सीधे वहीं ले जायेगा तब हाजी मुराद ने अपना पर्स निकाला और वायदे के मुताबिक बाटा को तीन रूबल दिए। उसने अपने आदमियों को उसके पिट्ठू बैग से स्वर्ण जटित पिस्तौल, फर की टोपी और पगड़ी बाहर निकाल लाने का आदेश दिया और मुरीदों से कहा कि रूसियों के सामने अच्छा दिखने के लिए वे अपने को साज-संवार लें। जब वे लोग हथियार, काठी, उपकरण और घोड़ों की साफ-सफाई कर रहे थे, तारे फीके पड़ चुके थे, आकाश में पर्याप्त प्रकाश फैल चुका था और सुबह की सुहानी हवा बहने लगी थी।



(तोलस्तोय परिवार के साथ - १८८४)



पाँच

भोर के समय, जब अभी अंधेरा ही था, पोल्तोरत्स्की की कमान में कुल्हाडि़यों से लैस दो कम्पनियों ने कतारबद्ध संतरियों के पहरे में शगीर गेट के बाहर पाँच मील जाने के लिए प्रस्थान किया। उन्होंने प्रकाश होते ही जंगल काटना प्रारंभ कर दिया। आठ बजे के लगभग कोहरा, जिसमें सीत्कारती और चिटखकर जलती आद्र टहनियों का सुगन्धित धुआँ मिश्रित हो गया था, छंटने लगा था। लकड़ी काटने वाले जो पहले पाँच गज तक भी नहीं देख सकते थे और एक दूसरे को कोहरे में केवल सुन ही पा रहे थे, अब उन्हें आग और पेड़ों से ढके जंगल का रास्ता साफ दिखाई देने लग था। कोहरे में सूर्य एक चमकदार बिन्दु की भाँति रुक-रुककर प्रकट हो रहा था और छुप रहा था। जंगल के एक खुले स्थान में सड़क से कुछ दूर कुछ लोगों का एक दल ड्रमों पर बैठा हुआ था। उनमें पोल्तोरत्स्की और उसका अधीनस्थ तिखोनोव, तीसरी कम्पनी के दो अफसर और द्वन्द्व युद्धाभ्यास के दौरान किसी त्रुटि के कारण कार्यमुक्त हो चुका गारद रेजीमेण्ट का एक पूर्व सैनिक, संचार कोर में पोल्तोरत्स्की का पुराना साथी बैरन फ्रेशर था। सैण्डविच की लपेटन, सिगरेट के टुकड़े और खाली बोतलें उनके चारों ओर छितराये हुए थे। उन्होंने वोदका और स्नैक ली थी और ‘स्टाउट‘ (एक प्रकार की काली बियर) पी रहे थे। ढोल बजाने वाला तीसरी बोतल खोल रहा था। पोल्तोरत्स्की, यद्यपि कम सोया था, पर प्रसन्न और चिन्तामुक्त मन:स्थिति में था, जैसा कि सदैव अपने आसपास खतरा होने पर वह अपने सैनिकों और साथियों के बीच हुआ करता था।
अधिकारी उन दिनों चर्चा का विषय बने हुए जनरल स्लेप्स्तोव की मृत्यु पर उत्तेजनापूर्ण वार्तालाप कर रहे थे। उस मृत्यु में स्लेप्स्तोव के जीवनकाल के महत्वपूर्ण क्षणों, उसके अंत और उसकी मृत्यु के कारणों पर किसी ने विचार नहीं किया। उन्होंने सिर्फ़ एक साहसी अफसर की वीरता पर चर्चा की, जिसने अपनी तलवार से कबाइलियों पर आक्रमण किया था और निर्भीकतापूर्वक उन्हें काट गिराया था।
यद्यपि सभी अधिकारी, विशेषरूप से जिन्हें व्यावहारिक अनुभव था यह जानते थे कि न तो काकेशस में और न हीं कहीं अन्यत्र आमने-सामने तलवारों से युद्ध होता है जैसा कि प्राय: कल्पना की जाती थी और बताया जाता था (अगर ऐसा हुआ भी तो वह भागने वाले के साथ ही होता था जिसे या तो तलवार से काट दिया जाता था या संगीन से घायल कर दिया जाता था)। आपने-सामने लड़ने की कहानी को जो अफसर स्वीकार करते थे वे शांत गर्व और प्रसन्नता से प्रेरित होकर, ड्र्मों पर बैठकर कुछ दिलेरी से, शेष संकोच से तम्बाकू पीते, शराब पीते और मजाक करते हुए उसकी चर्चा किया करते थे। वे मृत्यु की किंचित भी चिन्ता न करते थे, जो उन्हें किसी भी क्षण घेर सकती थी, जैसा कि स्लेप्स्तोव को आ घेरा था। और सचमुच, वार्तालाप में जिस समय वे अपनी अपेक्षा को प्रमाणित करने वाले थे, उस समय राइफल की गोली की एक तीव्र आवाज से उनकी बातचीत बाधित हुई जो सड़क के बायीं ओर तेज कड़क के साथ पुन: सुनाई दी थी। गोली सनसनाती हुई कोहरा मिश्रित हवा को चीरती हुई तेज आवाज के साथ एक पेड़ में जा लगी थी। सैनिकों की राइफलों से भी तेज आवाज करती अनेकों गोलियों ने शत्रु की गोलीबारी का उत्तर दिया था।
‘ओह’ पोल्तोरत्स्की प्रसन्नतापूर्वक चिल्लाया, ‘‘वह सीमा की ओर से आयी थी। क्या वह उधर से नहीं आयी थी? कोस्त्या, तुम्हारा भाग्य” उसने फ्रेशर से कहा, “तुम अपनी कम्पनी में चले जाओ। एक मिनट में हम एक शानदार युद्ध लड़ेंगे। हम एक सैन्य-प्रदर्शन प्रस्तुत करेगें।”
बरखास्त बैरन उछलकर खड़ा हुआ और धुंए में तेजी से अपनी कम्पनी की ओर बढ़ा। पोल्तोरत्स्की अपना छोटा चित्तकबरा घोड़ा ले आया, उस पर सवार हुआ, अपनी कम्पनी में पहुंचा और गोली चलने की दिशा में सीमा की ओर उसका नेतृत्व किया। सीमा रेखा जंगल के किनारे हल्के ढलान वाली छोटी घाटी के सामने थी। हवा जंगल की ओर बह रही थी, और न केवल घाटी की ढलान बल्कि उससे बहुत दूर तक साफ दिखाई दे रहा था।
पोल्तोरत्स्की जब सीमा के निकट पहुंचा, सूर्य कोहरे के बाहर झांकता दिखाई पड़ा। घाटी से दूर; विरल जंगल में वह पुन: प्रकट हुआ। वहाँ से एक फर्लांग की दूरी पर उसने अनेक घुड़सवारों को देखा। वे चेचेन थे जो हाजी मुराद का पीछा करते हुए वहाँ तक आ पहंचे थे और अब रूसी सेना के समक्ष उसको आत्म-समर्पण करते देखना चाहते थे। उनमें से एक ने सीमा रेखा की ओर फायर किया था। सैनिकों ने उसका प्रत्युत्तर दिया था। चेचेन रुक गये थे और फायरिंग बंद हो गयी थी। पोल्तोरत्स्की अपनी कम्पनी के पास पहुँचा और उसने फायर शुरू करने का आदेश दिया। और जैसे ही आदेश दिया गया एक साथ सैनिकों की गोलियाँ कोहरे को भेदती रमणीय शोर करती हुई सनसनाने लगीं। सैनिक इस मनोरंजन का आनंद ले रहे थे। वे उन्मत्त हो रायफलें लोडकर गोलियों की बौछार-दर-बौछार कर रहे थे। प्रकट रूप से चेचेन बहुत क्रुद्ध दिखे। सैनिकों पर लगातार गोलियाँ दागते हुए वे सरपट दौड़ रहे थे। उनकी गोली से एक सैनिक घायल हो गया। यह सैनिक वही आवदेयेव था, जो रात में पहरेदारी कर रहा था। जब उसके साथी उसके निकट पहुँचे, वह दोनों हाथों से अपने पेट का घाव पकड़े मुँह के बल लेटा हुआ था। वह लगातार कांप रहा था और धीमे स्वर में कराह रहा था।

“मैं अभी अपनी राइफल लोड कर ही रहा था कि मैनें एक धमाका सुना,” उसके पास खड़ा सैनिक बोला, “मैनें मुड़कर देखा और इनके हाथ से रायफल गिर गयी थी।”
आवदेयेव पोल्तोरत्स्की की कम्पनी में था। सैनिकों के एक समूह को एकत्रित देखकर पोल्तोरत्स्की वहाँ आ गया।
“क्यों, तुम्हे चोट लगी है ? कहॉं ?” वह बोला।
आवदेयेव ने उत्तर नहीं दिया ।
“सर, मैं अभी अपनी राइफल लोड कर ही रहा था,,” सैनिक ने कहा जो उसके पास खड़ा था, “कि मैनें एक धमाका सुना। मैनें मुड़कर देखा और इनके हाथ से रायफल गिर गयी थी।”
“टट…टट…,” पोल्तोरत्स्की ने अपनी जीभ टटकारी। “अच्छा, आवदेयेव, क्या दर्द अधिक हो रहा है ?”
“सर, अधिक चोट नहीं है, लेकिन मैं चल नहीं सकता। सर, मुझे ड्रिंक करना अच्छा लगेगा।”
उन्हें थोड़ी-सी वोदका मिली जो सैनिकों ने काकेशस में पी थी। पानोव ने निष्ठुरता से त्योरियाँ चढ़ाते हुए आवदेयेव को ढक्कनभर शराब दी। आवदेयेव ने एक घूंट ली, लेकिन तुरंत ढक्कन दूर हटा दिया।
“इसे गिराओगे नहीं,” उसने कहा, “तुम इसे स्वयं पी लो।”
पानोव ने वोदका समाप्त कर दी। आवदेयेव ने उठने का प्रयास किया और एक बार फिर ढह गिरा। वे एक ओवरकोट ले आए और उसे उसके ऊपर डाल दिया।
‘‘सर, कर्नल साहब आ रहे हैं।” सार्जेंट मेजर ने पोल्तोरत्स्की से कहा।
‘‘बहुत अच्छा, उनके लिए तैयार हो जाओ, ” पोल्तोरत्स्की बोला और अपना चाबुक फटकारा। वह वोरोन्त्सोव से मिलने के लिए तेजी से चल पड़ा।
वोरोन्त्सोव एक अंग्रेजी नस्ल के पांगर स्टैलियन पर सवार था। एक कज्जाक रेजीमेण्टल एड्जूटेण्ट, और एक चेचेन दुभाषिया उसके साथ थे।
“यहाँ क्या घटित हुआ ?” उसने पोल्तोरत्स्की से पूछा।
“उनका एक दल निकलकर एकदम बाहर आया और उसने हरावल पर आक्रमण कर दिया।”
“हूँ, मैं समझता हूँ कि यह सब तुमने प्रारंभ किया !”
“नहीं, मैनें नहीं, प्रिन्स, ” पोल्तोरत्स्की मुस्कराता हुआ बोला, “वे ही हम पर चढ़ आये थे।”
“मैनें सुना, यहाँ कोई व्यक्ति घायल हुआ है ?”
“हाँ, यह खेदजनक है। वह एक अच्छा सैनिक है।”
“गंभीररूप से ?”
“मैं ऐसा ही सोचता हूँ, पेट में…”
“और आप जानते हैं मैं कहाँ जा रहा हूँ ?” वोरोन्त्सोव ने पूछा।
“नहीं।”
“सच, तुम अनुमान नहीं लगा सकते ?”
“नहीं।”
“हाज़ी मुराद आया है और हमसे लगभग मिलने ही वाला है।”
“असम्भव।”
“कल उसका एक प्रतिनिधि आया था,” वोरोन्त्सोव संतोषजनक मुस्कान को दबाने का भरसक प्रयत्न करता हुआ बोला, “वह इस समय शालिया के जंगल में हमारी प्रतीक्षा कर रहा होगा, इसलिए अपने रायफलधारियों को जंगल में तैनात करो और मुझे रिपोर्ट दो।”
“जी, सर।” सैल्यूट मारते हुए पोल्तोरत्स्की बोला, और अपनी कम्पनी की ओर चला गया। उसने अपने दाहिनी ओर सैनिकों को पंक्तिबद्ध किया और सार्जेंट मेजर को बायीं ओर पंक्तिबद्ध करने का आदेश दिया। इसी बीच सैनिक घायल आवदेयेव को छावनी वापस ले गये।
पोल्तोरत्स्की वारोन्त्सोव के पास वापस जाते हुए अभी रास्ते में ही था कि उसे पीछे की ओर से आते हुए कुछ घुड़सवारों की झलक दिखाई दी। वह रुक गया और उनकी प्रतीक्षा करने लगा।
आगे, सफेद ट्यूनिक, फर का टोप और पगड़ी पहने हुए, स्वर्ण जटित रायफल लिए प्रभावशली व्यक्तित्ववाला एक व्यक्ति, सफेद घोड़े पर सवार था। यह हाजी मुराद था। वह पोल्तोरत्स्की के पास आया और तातारी में उससे कुछ कहा। पोल्तोरत्स्की ने त्योरियॉं चढ़ाईं, कुछ न समझ पाने का भाव प्रदर्शित करते हुए अपनी बाहें फैलायीं और मुस्कराया। हाजी मुराद भी उत्तर में इस ढंग से मुस्कराया कि पोल्तोरत्स्की को उसकी मुस्कराहट में एक बच्चे जैसी निर्दोषता दिखी। पोल्तोरत्स्की को किंचित् भी यह आशा न थी कि पहाड़ों का यह पुनर्संदिग्ध व्यक्ति ऐसा होगा। उसने उसकी एक निर्दय, रूखे और भयावह व्यक्ति के रूप में कल्पना की थी और यहाँ एक अति सरल व्यक्ति उपस्थित था जो इस प्रकार से मुस्करा रहा था मानो वह पुराना मित्र था। उसमें केवल एक ही विशिष्टता थी, वह थी उसकी बड़ी-बड़ी आँखें जो दूसरे लोगों की आँखों में सतर्क, बेधक और शांतभाव से दखती थीं।
हाजी मुराद अपने साथ चार लोगों को लेकर आया था। उनमें से एक खान महोमा था, जो पिछली रात वोरोन्त्सोव से मिला था। वह गुलाबी गोल चेहरे वाला व्यक्ति था। उसकी खुली आंखें काली और चमकदार थीं और चेहरे पर मुस्कराहट और प्रसन्नता का भाव था। दूसरा, स्थूल, सांवला, घनी भौहों वाला व्यक्ति था। वह हनेफी था, एक तवलियन, जो हाजी मुराद का प्रबंधक था। वह सामग्री से भरे पिट्ठू बैग लादे घोड़े पर चल रहा था। दल के दो लोग विशेषरूप से बाहर रुके हुए थे। उनमें से एक पतली कमर, चौड़े कंधे ,सुन्दर दाढ़ी, बड़ी और खुली आँखों वाला खूबसूरत नौजवान एल्दार था। दूसरा व्यक्ति एक आँख से काना, बिना भौहों या बरौनियों वाला, लाल दाढ़ी और नाक के आर-पार चेहरे तक फैले घाव के निशान वाला व्यक्ति था। वह चेचेन हमज़ालो था।
पोल्तोरत्स्की ने हाजी मुराद से वोरोन्त्सोव की ओर इशारा किया जो सड़क पर दिखाई दिया था। हाजी मुराद उसके निकट पहुंचा और अपना दाहिना हाथ अपने सीने पर रखकर तातारी में कुछ कहा और रुक गया। चेचेन दुभाषिये ने उसके शब्दों का अनुवाद किया।
“मैनें स्वयं को जा़र के समक्ष आत्म-समर्पित कर दिया है,” वह कहता है “मैं चाहता हूँ,” वह कहता है, ‘‘उनकी सेवा करूं। मैं बहुत पहले से ऐसा करना चाहता था। लेकिन शमील ने मुझे छोड़ा ही नहीं।”
दुभाषिये को सुनने के बाद वोरोन्त्सोव ने हिरण की खाल वाले दस्ताने में से अपना हाथ बाहर निकाल हाजी मुराद की ओर बढ़ाया। हाजी मुराद ने हाथ की ओर देखा और एक सेकेण्ड के लिए संकुचित हुआ, लेकिन फिर दृढ़ता से हाथ मिलाया और पहले दुभाषिये की ओर फिर वोरोन्त्सोव की ओर देखता हुआ पुन: बोला -
“वह कहता है कि वह आपके अतिरिक्त किसी अन्य के समक्ष आत्म-समर्पण नहीं करना चाहता, क्योंकि आप सरदार के पुत्र हैं। वह आपका बहुत आदर करता है।”
वोरोन्त्सोव ने धन्यवाद प्रकट करते हुए सिर हिलाया। हाजी मुराद ने अपने दल की ओर इशारा करते हुए आगे कुछ और कहा।

“वह कहता है कि ये लोग उसके अंगरक्षक हैं और उसीकी भाँति रूसियों की सेवा करेंगें।”
वोरोन्त्सोव ने मुड़कर उनकी ओर देखा और उनकी ओर भी सिर हिलाया।
काली और खुली आँखों वाले खान महोमा ने भी सिर हिलाते हुए स्पष्ट रूप से उत्तर में हंसकर कुछ कहा, क्योंकि सांवला अवार मुसकराहट में अपने धवल दांतों को चमकने से नहीं रोक पाया। हमज़ालो ने अपनी एक लाल आँख से क्षणभर के लिए वोरोन्त्सोव की ओर देखा, फिर एक बार और अपने घोड़े के कानों पर अपनी दृष्टि स्थिर कर एकटक देखने लगा।
जब वोरोन्त्सोव और हाजी मुराद, अपने दल के साथ छावनी की ओर वापस गये, सैनिक पंक्ति से बाहर आ घेरा बना खड़े हो गये और अपने-अपने अनुमान लगाने लगे।
“इस शैतान ने कितने लोगों की हत्याएं की, और देखो, वे उसके साथ लार्ड जैसा व्यवहार करने जा रहे हैं।”
“देखो, अल्पकाल में ही वह शैम्मूल का शीर्ष कमाण्डर बन गया था। जरा अब उसे देखो।”
“स्वागतम, यह तुम्हारे सोचने का अपना ढंग है, लेकिन वह एक ‘हीरो’ एक ‘भद्रव्यक्ति‘ है।”
“उस लाल बालों वाले, और भेंगीं आँखों वाले शैतान को तो देखों।”
“सुअर होगा।”
वे विशेषरूप से लाल बालोंवाले व्यक्ति पर ध्यान केन्द्रित कर रहे थे।
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जहाँ जंगल की कटाई प्रगति पर थी, सैनिक हाजी मुराद को एक नजर देखने के लिए दौड़कर सड़क के निकट तक आ गये थे। एक अधिकारी उन पर चीखा, लेकिन वोरोन्त्सोव ने उसे रोक दिया।
“उन्हें अपने पुराने साथी को देख लेने दो। तुम जानते हो यह कौन है ?” वोरोन्त्सोव ने अंग्रेजी लहजे में धीरे से शब्द उच्चारित करते हुए बिल्कुल पास वाले सैनिकों से पूछा।
“नहीं हुजूर, हमें कोई जानकारी नहीं है।”
“हाजी मुराद, तुम लोगों ने उसके विषय में सुना है ?”
“हाँ, हुजूर, हमने उसे अनेकों बार हराया था।”
‘‘उसके साथ एक छोटा दल भी आया है।”
‘‘बहुत अच्छा, हुजूर,” सैनिक ने उत्तर दिया। वह इस बात से प्रसन्न था कि अपने प्रधान से बात करने में वह सफल रहा था।
हाजी मुराद ने अनुमान लगाया कि वे उसके विषय में ही बातें कर रहे थे, और एक हल्की मुस्कान उसकी आँखों में चमक गयी थी। वोरोन्त्सोव हृदय में अच्छा भाव लिए छावनी वापस लौट आया था।
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शुक्रवार, 23 दिसम्बर 2011

धारावाहिक उपन्यास

हाज़ी मुराद
अनुवाद - रूपसिंह चन्देल
चैप्टर - २ और ३

यास्नाया पोल्याना में तोलस्तोय
(१९०४)








॥ दो ॥

उसी रात वोजविजेन्स्क में अग्रिम छावनी से तीन सैनिक और एक वारण्ट अफसर सगीर गेट की ओर रवाना हुए। वे उस गांव से लगभग बारह मील की दूरी पर थे, जहाँ हाजी मुराद रात बिता रहा था। सैनिकों ने फर के जैकेट और टोपियाँ, कंधों पर पट्टियाँ लगे ओवर कोट और घुटनों से भी ऊँचे बूट पहन रखे थे जो उन दिनों कोकेशस में यूनीफार्म का हिस्सा हुआ करते थे। अपने हिथयारों को कंधों पर लादे वे सड़क के साथ-साथ एक फर्लांग तक गए, फिर दाहिनी ओर पत्तों से होकर सरसराते हुए बीस कदम चले, और एक टूटे चिनार के पेड़ के पास खड़े हो गए, जिसका काला तना अंधेरे में अस्पष्ट दिखाई दे रहा था। उस पेड़ के पास प्राय: एक संतरी रात्रि-रक्षक के रूप में नियुक्त रहता था।
जब वे जंगल से होकर गुजर रहे थे, पेड़ों के ऊपर दौड़ने का आभास देते चमकीले तारे वृक्षों की नंगी शाखाओं के पार हीरे जैसा चमकते हुए ठहरे हुए थे।
‘‘ईश्वर को धन्यवाद कि यह सूखा है,” वारण्ट अफसर पानोव बोला। उसने संगीन लगी अपनी लंबी राइफल उतारी और आवाज के साथ पेड़ के सामने टिका दी। सैनिकों ने भी उसका अनुसरण किया।
‘‘हाँ, मैं समझ गया, मैं उसे खो चुका हूँ, ” पानोव बुदबुदाया। “या तो मैं उसे भूल आया अथवा वह रास्ते में गिर गया।”
‘‘आप क्या खोज रहे हैं? ” एक सैनिक ने हार्दिकतापूर्वक, प्रसन्न स्वर में पूछा।
‘‘मेरा पाइप… मुझे लानत है। काश ! मैं जान पाऊँ कि वह कहाँ है।! ”
‘‘आप नली लाए हैं? ” प्रसन्न स्वर ने पूछा ।
‘‘नली … यह रही वह।”
‘‘आप उसे जमीन में गाड़ देगें? ”
‘‘क्या इरादा है? ”
“मैं उसे तुरंत बैठा दूंगा।”
गश्त के दौरान धूम्रपान सख्त वर्जित था, लेकिन यह चौकी मुश्किल से ही छुपी हुई थी। यह एक सीमा-चौकी थी जो कबीलाइयों को चोरी-छुपे तोपखाना लाने से रोकती थी, जैसा कि वे पहले करते थे और छावनी पर बमबारी किया करते थे। अंतत: अपने को तम्बाकू पीने से वंचित करने का पानोव को कोई कारण नजर नहीं आया, और उसने प्रसन्न सैनिक के प्रस्ताव पर सहमति दे दी। सैनिक ने अपनी जेब से चाकू निकाला और जमीन पर एक गड्ढा खोदने लगा। जब गड्ढा खुद गया, उसने उसे बराबर किया, नली का पाइप उस स्थान पर बैठाया, छेद में कुछ तम्बाकू रखा, उसे नीचे की ओर दबाया और सब कुछ तैयार था। दियासलाई धधकी और सैनिक के पिचके मुंह के पास एक क्षण के लिए जल उठी, क्योंकि वह पेट के बल जमीन पर लेटा था। पाइप में सीटी की-सी आवाज हुई, और पानोव ने तंबाकू जलने की रुचिकर सुगंध अनुभव की।
‘‘तुमने उसे बैठा दिया ? ” खड़े होते हुए पानोव ने पूछा।
‘‘काम ठीक ठाक हो गया।”
‘‘बहुत अच्छा किया, आवदेयेव ! एक विशिष्ट दक्ष, लौंडे, एह ? ”
आवदेयेव अपने मुंह से धुआँ बाहर छोड़ता हुआ ऊपर की ओर घूम गया, और उसने पानोव के लिए रास्ता बनाया।
पानोव पेट के बल लेट गया, अपनी आस्तीन से नली को पोछा और तम्बाकू पीने लगा। जब उसने पीना बंद किया सैनिकों ने बाते प्रारंभ कर दी।
‘‘ वे कहते हैं कि कमाण्डिंग अफसर पुन: आर्थिक संकट में फंस गया है। निश्चित ही उसने जुआ खेला होगा, ” एक सैनिक धीरे-धीरे बोला।
‘‘वह उसे वापस लौटा देगा।” पानोव बोला।
‘‘सभी जानते हैं कि वह एक अच्छा अफसर है, ” उसकी बात का समर्थन करते हुए आवदेयेव ने कहा।
‘‘मैं परवाह नहीं करता, यदि वह अच्छा अफसर है, ” पहला वक्ता भुनभुनाया, ‘‘मेरे विचार से कम्पनी का कर्तव्य है कि उससे पूछताछ करे। यदि उसने कुछ लिया है, तो उसे बताना चाहिए कि कितना, और वह उसे कब लौटाएगा।”
‘‘यह निर्णय करना कम्पनी का काम है, ” तम्बाकू पीना रोक कर पानोव ने कहा।
‘‘वह उससे भाग नहीं सकेगा, आप भी यह निश्चित तौर पर समझ सकते हैं,” आवदेयेव ने उसके सुर में सुर मिलाते हुए कहा।
‘‘वह सब बहुत अच्छा है, लेकिन हमें रखने के लिए तो मिली जई और हमने सामान रखने की पेटी मरम्मत करवायी वसंत के लिए… पैसा चाहिए, और यदि उसने वह लिया है…।” असंतुष्ट सैनिक ने कहना जारी रखा। ‘‘यह सब कम्पनी के ऊपर है, मैंने कहा न, ” पानोव ने दोहराया। ‘‘ऐसा पहले भी घटित हुआ था। उसने जो भी लिया है वह उसे वापस लौटा देगा।”
उन दिनों काकेशस में प्रत्येक कम्पनी अपने लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति अपने चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा नियंत्रित करती थी। भत्ते के रूप में उसे प्रति व्यक्ति छ: रूबल पचास कोपेक प्राप्त होते थे, और वह अपने आप आपूर्ति करती थी। वह सब्जियाँ उगाती, चारागाह तैयार करती, परिवहन व्यवस्था कायम करती और अच्छी तरह पोषित घोड़ों पर विशेष गर्व करती थी। फण्ड तिजोरी में रखा जाता था, और चाबी कम्पनी कमाण्डर के पास होती थी। अपनी सहायता के लिए ऋण लेना कम्पनी कमाण्डर के लिए बार-बार की घटना हो गयी थी। इस समय भी यही घटित हुआ था, और वही सैनिकों के चर्चा का विषय था। निकितिन असंतुष्ट था और चाहता था कि हिसाब के लिए कमाण्डर को कहा जाये, लेकिन पानोव और आवदेयेव इस बात की आवश्यकता अनुभव नहीं करते थे।
पानोव ने जब पीना समाप्त किया, तब निकितिन पाइप की ओर मुड़ा। वह अपने ओवर कोट पर बैठ गया और पेड़ के सामने झुक गया। दल के लोग चुप हो गये थे और आवाज केवल उनके सिरों के ऊपर पेड़ों की फुनगियों की ऊंचाई पर हवा के सरसराने की थी। अचानक उन्हें हवा की सरसराहट से ऊपर श्रृंगालों का चीखना और विलखना सुनाई पड़ा।
‘‘ उन्हें लानत, ये कैसा शोरगुल कर रहे हैं।” आवदेयेव बोला।
‘‘वे तुम पर हंस रहे हैं; क्योंकि तुम्हारा चेहरा भैंगा है, ” नरम उक्र्रैनियन लहजे में तीसरे सैनिक ने कहा।
पुन: चुप्पी पसर गयी। हवा केवल पेड़ों की टहनियों को हिला रही थी, जिससे तारे कभी प्रकट होते तो कभी छुप जाते थे।
‘‘अन्तोनिच, मैं कहता हूँ,” मुस्कराते हुए आवदेयेव ने अचानक पानोव से पूछा, ‘‘आप कभी परेशान हुए ? ”
‘‘परेशान ! तुम्हारा अभिप्राय क्या है? ” पानोव ने अनिच्छापूर्वक उत्तर दिया।
‘‘मैं इस समय इतना परेशान हूँ… मात्र परेशान, कि आश्चर्य नहीं कि मैं कहीं आत्महत्या न कर लूं।”
‘‘इसे समाप्त करो।” पानोव ने कहा।
‘‘मैनें पीने में पैसे इसलिए उड़ाये, क्योंकि मैं परेशान था। मैं पीने के लिए परेशान रहता था। और मैनें सोचा, मुझे अंधाधुंध पीना है।”
‘‘नियम से मदिरा-पान करना मनुष्य को बदतर बनाता है।”
‘‘हाँ, लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ।”
‘‘गोया, तुम किस बात से परेशान हो ? ”
‘‘मैं ? मैं गृहासक्त हूँ।”
‘‘क्यों ? क्या तुम घर में बेहतर थे ? ”
‘‘हम अमीर नहीं थे, लेकिन वह एक अच्छी ज़िन्दगी थी, सुन्दर जीवन।”
और आवदेयेव पानोव को उस विषय में बताने लगा, जैसा कि वह पहले भी कई बार कर चुका था ।
‘‘भाई के बजाय मैं स्वेच्छा से सेना में भर्ती हुआ था, ” आवदेयेव ने कहा, ‘‘उसके चार बच्चे थे, जबकि मेरी अभी शादी ही हुई थी। मेरी माँ चाहती थी कि मैं सेना में जाऊं। मैनें कभी उज्र नहीं किया। मैनें सोचा, शायद अच्छे कार्यों के लिए वे मुझे याद करेंगे। इसलिए मैं जमींदार से मिलने गया। वह एक अच्छा आदमी था, हमारा जमींदार, और उसने कहा, ‘‘अच्छा मित्र, तुम जाओ। इस प्रकार भाई के बजाय मैं सेना में भर्ती हो गया।”
‘‘बहुत अच्छा।” पानोव ने कहा।
‘‘लेकिन अंतोनिच, अब आप इस पर अवश्य विश्वास करेंगें, कि मैं परेशान हूँ। यह सब इसलिए बदतर है, क्योंकि मैनें अपने भाई का स्थान लिया था। मैं अपने से कहता हूँ कि इस समय वह एक छोटा जमींदार है, जबकि मैं तंगहाली में हूँ। और मैं जितना ही इस विषय में सोचता हूँ, यह उतना ही बदतर लगता है। इसके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता।”
आवदेयेव रुका। ‘‘क्या हम दोबारा तम्बाकू पियेंगे? ” उसने पूछा।
‘‘हाँ, उसे ठीक करो।”
लेकिन सैनिकों को तम्बाकू पीने का आनन्द नहीं मिला। आवदेयेव अभी उठा ही था और वह पाइप ठीक करने ही वाला था, कि उन्हें हवा की आवाज के ऊपर सड़क पर चलते कदमों की आवाज सुनाई दी। पानोव ने अपनी राइफल उठा ली और निकितिन को झिटका। निकितिन उठा और उसने अपना ओवर कोट उठाया। तीसरा बोन्दोरेन्को भी उठ खड़ा हुआ।
‘‘ क्या मैं स्वप्न देख रहा था … क्या स्वप्न …!”
आवदेयेव बोन्दारेन्को पर फुफकारा, और सैनिक जड़ होकर चुपचाप सुनने का प्रयास करने लगे। जूतों पर चलते शिथिल कदम निकट आते जा रहे थे। अंधेरे में पत्तियों और सूखी टहनियों की चरमराहट साफ सुनाई दे रही थी। तभी उन्हें चेचेन की गुट्टारा भाषा में बातचीत करने की अनूठी आवाज सुनाई दी, और उन्होंने पेड़ों के बीच हल्की रोशनी में दो छायाओं को चलते देखा। एक छाया छोटी और दूसरी लंबी थी। जब वे सैनिकों के बराबर पहुंचे पानोव और उसके साथी हाथ में राइफल थामें सड़क पर आ गये।
‘‘ कौन जा रहा है ? ” पानोव चीखा।
‘‘शांतिप्रिय चेचेन, ” दोनों में से छोटे कद वाला बोला। वह बाटा था। ‘‘न बन्दूक है, न तलवार, ” अपनी ओर इशारा करते हुए उसने कहा, ‘‘प्रिन्स, आप देख सकते हैं।”
लंबा व्यक्ति अपने साथी के बगल में शांत खड़ा था। उसके पास भी हथियार नहीं थे।
‘‘कर्नल से मिलने जानेवाले गुप्तचर हो सकते हैं।” पानोव ने अपने साथियों को स्पष्ट किया।
‘‘प्रिन्स वोरोन्त्सोव से मिलना आवश्यक है, महत्वपूर्ण कार्य है।” बाटा ने कहा।
‘‘बहुत अच्छा। हम तुम्हें उनके पास ले जायेंगे, ” पानोव बोला, ‘‘तुम और बोन्दोरेन्को इन्हे साथ लेकर जाओ,” उसने आवदेयेव से कहा, ‘‘उन्हें ड्यूटी अफसर को सौंपना और वापस लौट आना। और पूरी तरह सावधान रहना। इन्हें अपने आगे चलने देना।”
‘‘यह किसलिए है ? ” अपनी संगीन से धकियाते हुए आवदेयेव बोला। एक को धकियाया और वह मृत व्यक्ति-सा बना रहा।
‘‘तुम उसे कोंचते हो, उससे कोई लाभ ? ” बान्दोरेन्को बोला, ‘‘ठीक है, तेजी से चलो।”
जब गुप्तचरों और उनके अनुरक्षकों के कदमों की ध्वनि सुनाई देनी बंद हो गयी, पानोव और निकितिन वापस चौकी में लौट गये थे।
‘‘रात में शैतान उन्हें यहाँ किसलिए लाया था ? ” निकितिन बोला।
‘‘उनके पास कोई कारण अवश्य है, ” पानोव ने कहा। ‘‘देखो रोशनी फैल रही है,” उसने आगे कहा। उसने अपने ओवरकोट को फैलाया और पेड़ के सामने बैठ गया।
दो घण्टे पश्चात् आवदेयेव और बोन्दोरेन्को लौट आए।
‘‘हाँ, तुम उन्हें सौंप आए ? ” पानोव ने पूछा।
‘‘हाँ। कर्नल अभी तक जागे हुए थे, और वे उन्हें सीधे उन्हीं के पास ले गये थे। सफाचट सिर वाले वे लड़के कितने अच्छे थे!” आवदेयेव ने कहा, ‘‘ मैंनें उनसे अद्भुत बातचीत की।”
‘‘हम जानते हैं कि तुम अद्भुत बातूनी हो, ” निकितिन कटु स्वर में बोला।
‘‘सच, वे बलिकुल रूसियों जैसे हैं। एक विवाहित है।”
‘‘तुम्हारे पत्नी है? ” मैनें पूछा।
‘‘हाँ।” उसने कहा।
‘‘कोई बच्चा ? ” मैनें पुन: पूछा।
‘‘हाँ, बच्चा है”
‘‘एक जोड़ी ?”
‘‘एक जोड़ी” उसने कहा। “हमने अच्छी गपशप की।…शानदार लड़के हैं।”
‘‘मैं शर्त लगाता हूँ, ” निकितिन ने कहा, ‘‘ तुम एक से अकेले मिलो, और वह जल्दी ही तुम्हारी आंते निकाल देगा।”
‘‘भोर जल्दी ही होगी।” पानोव बोला।
‘‘हाँ, अब तारे फीके पड़ने लगे हैं, ” आवदेयेव ने बैठते हुए कहा।
सैनिक पुन: चुप हो गये थे।

॥ तीन ॥

बैरकों की खिड़कियों और सैनिकों के कुटीरों में रोशनी बहुत पहले बुझ चुकी थी, लेकिन छावनी के भव्य-भवन की सभी खिड़कियाँ रौशन थीं। यह कुरियन रेजीमेण्ट के कर्नल प्रिन्स माइकल साइमन वोरेन्त्सोव का घर था, जो राज दरबार के एक उच्च अधिकारी और कमाण्डर-इन-चीफ का पुत्र था। वोरोन्त्सोव इस घर में अपनी पत्नी मेरी वसीलीव्ना के साथ रहता था, जो पीटर्सबर्ग की एक सुन्दरी थी। उसके रहन-सहन में एक प्रकार की ऐसी विशिष्टता थी जो काकेशस के इस छोटी छावनी वाले कस्बे में पहले कभी नहीं देखा गया था। वारोन्त्सोव और उसकी पत्नी सोचते कि वे अभावों से भरपूर बहुत साधारण जीवन जी रहे थे, फिर भी स्थानीय निवासी उनके असाधारण विलासितापूर्ण रहन-सहन से विस्मित थे।
आधी रात का समय था। वोरोन्त्सोव अपने विशाल ड्राइंग रूम में, जिसमें कालीन बिछा हुआ था और लंबे भारी परदे पड़े हुए थे, अतिथियों के साथ मेज पर ताश खेल रहा था, जिस पर चार मोमबत्तियाँ जल रही थीं। खिलाडि़यों में एक स्वयं कर्नल वारोन्त्सोव था। उसका चेहरा लंबा, बाल सुन्दर थे और उसने राज्याधिकारी होने के चिन्ह धारण कर रखे थे। उसका साथी पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय का एक स्नातक था, जिसे प्रिन्सेज ने अपने पहले पति से उत्पन्न पुत्र के ट्यूटर के रूप में नियुक्त किया हुआ था। वह उदास भावाकृतिवाला एक सांवला नौजवान था। दो अधिकारी उनके विरुद्ध खेल रहे थे। उनमें से एक चौड़े गाल, गुलाबी चेहरे वाला कम्पनी कमाण्डर पोल्तोरत्स्की था, जो गारद सेना से स्थानांतरित होकर आया था और दूसरा रेजीमंण्टल एडजूटेण्ट था, जो अपने सुन्दर चेहरे पर ठण्डी भावाकृति लिए सीधा तना हुआ बैठा था। बड़ी आंखों और काली भौंहोवाली सुन्दर महिला प्रिन्सेज मेरी वसीलीव्ना, पोल्तोरत्स्की के बगल में बैठी थी और उसके पैरों को अपने पेटीकोट से छू रही थी और उसके हाथों की ओर देख रही थी। उसके बोलने, उसके देखने और मुस्कराने, उसक शरीर के संचलन और उसके द्वारा प्रयोग किये गये परफ्यूम, से सम्मोहित पोल्तोरत्स्की उसका सान्निध्य पाने के अतिरिक्त सब ओर से बेखबर था। उसने एक के बाद दूसरी गलती की थी और इससे उसका साथी भड़क उठा था।
‘‘नहीं यह तो हद है ! तुमने दूसरा इक्का बरबाद कर दिया।” लाल-पीला होता हुआ एड्जूटेण्ट बोला, क्योंकि पोल्तोरत्स्की एक इक्का फेक चुका था।
पोल्तोरत्स्की ने अपनी सौम्य बड़ी काली आंखों से क्रुद्ध एड्जूटेण्ट की ओर न समझने वाले भाव से ऐसे देखा मानो वह अभी-अभी सोकर उठा था।
‘‘अच्छा, उसे क्षमा कर दें।” मुस्कराती हुर्ह मेरी वसीलीव्ना ने कहा। “मैनें तुमको इतना बताया था,” उसने पोल्तोरत्स्की से कहा। ‘‘लेकिन तुमने मुझे सब गलत बताया था।” पोल्तोरत्स्की ने मुस्कराते हुए कहा ।
‘‘सच ?” वह बोली, और मुस्कराई भी। पोल्तोरत्स्की इस मुस्कराहट से इतना उत्तेजित और प्रसन्न हुआ कि वह शर्म से लाल हो उठा और उत्तेजित-सा पत्ते फेटने लगा ।
‘‘तुम्हारे पत्ते नहीं।” एड्जूटेण्ट कठोरतापूर्वक बोला और अपने गोरे हाथों को घुमाते हुए पत्ते फेटने लगा मानो वह उनसे यथाशीघ्र मुक्ति पा लेना चाहता था।
एक नौकर ड्राइंगरूम में प्रविष्ट हुआ और बोला कि ड्यूटी अफसर ने प्रिन्स से भेंट करने का अनुरोध किया है।
‘‘सज्जनों, क्षमा करें,” अंग्रेजी लहजे में प्रिन्स ने रशियन में कहा, ‘‘मेरी तुम मेरा स्थान ग्रहण कर लो।”
‘‘मैं ?” फुर्ती से पूरी तरह खड़ी होती हुई प्रिन्सेज ने पूछा। उसके सिल्क के कपड़ों में सरसराहट हुई और एक प्रसन्न महिला की भाँति उल्लसित होती हुई वह मुस्काराई।
‘‘मैं सदैव हर बात के लिए तैयार रहता हूँ,” एड्जूटेण्ट बोला। अपने विरुद्ध प्रिन्सेज के खेलने से वह बहुत प्रसन्न था, क्योंकि प्रिन्सेज को खेलने का बिल्कुल ज्ञान नहीं था। पोल्तोरत्स्की ने सहजता से बाहें फैलायीं और मुस्कराया।
प्रिन्स जब ड्राइंग रूम में वापस लौटा खेल समाप्त हो रहा था। वह बहुत उत्तेजित और प्रसन्न था।
‘‘सोचो, मैं क्या सूचित करने वाला हूँ।”
‘‘क्या ?”
‘‘आओ हम शैम्पेन पियें।”
‘‘मैं सदैव तैयार रहता हूँ ,” पोल्तोरत्स्की ने कहा।
‘‘हां, कितना सुखद ,” एड्जूटेण्ट बोला।
‘‘वसीली ! हम लोगों को शैम्पेन सर्व करो !” प्रिन्स ने कहा।
‘‘ तुम्हें क्यों बुलाया था?” मेरी वसीलीव्ना ने पूछा।
‘‘ड्यूटी अफसर एक दूसरे आदमी के साथ आया था?”
‘‘कौन? क्यों?” मेरे वीसीलीव्ना ने उत्सुकतापूर्वक पूछा।
‘‘मैं नहीं बता सकता,” वारोन्त्सोव बोला।
‘‘तुम नहीं बता सकते,” मेरी वसीलीव्ना ने दोहराया, ‘‘हम उस पर विचार कर लेगें।”
शैम्पेन सर्व की गई। अतिथियों ने एक-एक गिलास पिया, खेल समाप्त किया, व्यवस्थित हुए और जाने लगे।
‘‘आपकी कम्पनी को कल जंगल के लिए तैनात किया गया है, क्या नहीं? ” प्रिन्स ने पोल्तोरत्स्की से पूछा।
‘‘हाँ, मेरी ... वहाँ कुछ खास है ?”
‘‘तब मैं आपसे कल मिलूंगा।” प्रिन्स ने फीकी मुस्कान के साथ कहा।
‘‘मैं गौरवान्वित हूँ,” मेरी वसीलीव्ना से हाथ मिलाने के विचार के संभ्रम में पोल्तोरत्स्की प्रिन्स के शब्दों को पूरी तरह ग्रहण नहीं कर पाया था।
मेरी वसीलीव्ना ने, प्राय: की भाँति, उसके हाथ को न केवल दृढ़ता से दबाया बल्कि जोरदार ढंग से हिलाया भी। उसने उसे एक बार पुन: उस समय की त्रुटि की याद दिलाई जब वह क्लबों का संचालन किया करता था। वह उस पर मुस्कराई।
‘‘एक मोहक, उत्तेजक और अर्थपूर्ण मुस्कान,” पोल्तोरत्स्की ने सोचा। वह ऐसी उल्लासपूर्ण मनस्थिति में घर गया, जिसे समाज में उसकी तरह पढ़े-लिखे, उसी की भाँति जन्मे और पले-बढ़े लोग ही समझ सकते थे जो उसी की तरह महीनों के एकाकी सैनिक जीवन के बाद अचानक अपनी किसी पूर्व परिचित महिला से मिलते हैं। और प्रिन्सेज वोरोन्त्सोव एक विशिष्ट महिला थीं।
जब वह अपने निवास पर पहुँचा उसने दरवाजे को धक्का दिया, लेकिन चिटखनी अंदर से बंद थी। उसने खटखटाया, लेकिन वह बंद ही रहा। उसका धैर्य चुक गया और उसने बूट और तलवार दरवाजे पर मारना शुरू कर दिया। अंदर पदचाप सुनाई पड़ी और पोल्तोरत्स्की के नौकर ववीला ने चिटकनी खोली।
‘‘ मूर्ख, तुमने बंद क्यों किया था ?”
‘‘लेकिन सच, अलेक्सिस व्लादीमीर …।”
‘‘दोबारा पी ? मैं तुझे सबक सिखा दूँगा …।”
पोल्तोरत्स्की ववीला को लगभग मारने ही वाला था, लेकिन फिर उसने उसे सुधारने की सोचा।
‘‘तुझे लानत है, सुधरने की कभी मत सोचना। चल, मोमबत्ती जला।”
‘‘इसी क्षण।”
ववीला बुरी तरह पिये हुए था। वह क्वार्टर मास्टर के जन्म दिन के आयोजन में शामिल हुआ था। जब वह घर लौटकर आया, वह अपने जीवन की तुलना क्वार्टर मास्टर इवान मैथ्यू के जीवन से करने लगा। इवान मैथ्यू की निश्चित आय थी, वह विवाहित था और आशा करता था कि एक वर्ष में पैसे देकर वह अपने को सेना से मुक्त कर लेगा। ववीला छोटी आयु में ही नौकरी में आ गया था, और इस समय वह चालीस से ऊपर था, अविवाहित था और अपने अनियंत्रित स्वामी के साथ यौद्धिक जीवन जीता आ रहा था। वह एक अच्छा मालिक था और कभी-कभी ही उसे पीटता था, लेकिन यह भी कोई ज़िन्दगी थी ! ‘‘जब वह काकेशस से लौटा था तब उसने मुझे स्वतंत्र करने का वायदा किया था, लेकिन मैं अपनी स्वतंत्रता का करूंगा क्या ? यह एक कुत्ते जैसी ज़िन्दगी है,” ववीला ने सोचा था। वह इतना उनींदा था कि उसने इस भय से दरवाजा बंद कर लिया था और सो गया था कि कोई घर में घुस आ सकता था और कुछ भी चोरी कर सकता था।
पोल्तोरत्स्की उस कमरे में प्रविष्ट हुआ जहाँ वह अपने साथी तिखोनोव के साथ सोता था।
‘‘अच्छा, तुम हार गये ?” उनींदे स्वर में तिखोनोव बोला।
‘‘भगवन, नहीं ! मैनें सत्तरह रूबल जीते और हमने एक बोतल क्लिकोट पी।”
‘‘और मेरी वसीलीव्ना को देखते रहे ?”
‘‘और मेरी वसीलीव्ना को देखता रहा ।” पोल्तोरत्स्की ने दोहराया।
‘‘जल्दी ही हमारे जागने का समय हो जाएगा।” तिखोनोव ने कहा, ‘‘हमें छ: बजे चल देने के लिए उठना है।”
‘‘ववीला,” पोल्तोरत्स्की चीखा, ‘‘ध्यान रहे, मुझे ठीक पाँच बजे जगा देना।”
‘‘मैं कैसे जगा सकता हूँ जब आप मुझसे झगड़ते हैं ?”
‘‘मैं कहता हूँ, मुझे जगा देना। सुना तुमने?”
‘‘बहुत अच्छा।”
ववीला अपने मालिक के जूते और कपड़े लेकर बाहर निकल गया।
पोल्तोरत्स्की बिस्तर पर गया और एक सिगरेट जलायी। उसने बत्ती बुझायी और मुस्कराया। अंधेरे में उसने मेरी वसीलीव्ना का मुस्कराता चेहरा अपने सामने देखा।
वोरोन्त्सोव दम्पति तुरंत बिस्तर पर नहीं गया था। जब अतिथि चले गये थे तब मेरी वसीलीव्ना अपने पति के पास आयी थी और चेहरे पर कठोरता ओढे़ उसके सामने खड़ी हो गयी थी।
‘‘हाँ, तुम्हे मुझे बाताना ही है ?”
‘‘लेकिन मेरी प्यारी … ।”
‘‘तुम मुझे ‘मेरी प्यारी’ मत कहो। वह एक दूत है, क्या नहीं है ?”
‘‘सच, मैं तुम्हें नहीं बता सकता।”
‘‘तुम नहीं बता सकते ? तब वह मैं तुम्हें बताऊंगी।”
‘‘तुम ?”
‘‘वह हाजी मुराद है ? क्या वह नहीं है ?” प्रिन्सेज ने कहा, जिसने कुछ दिन पहले हाजी मुराद के साथ हुए समझौते के विषय में सुना था। उसने अनुमान लगाया था कि हाजी मुराद स्वयं उसके पति से मिलने आया था।
वोरोन्त्सोव इससे इंकार नहीं कर सका, लेकिन हाजी मुराद की उपस्थिति के विषय में पत्नी का भ्रम निवारण करते हुए उसने कहा, कि वह केवल एक दूत था जिसने उसे बताया था कि अगले दिन हाजी मुराद उससे वहाँ मिलेगा जहाँ जंगल काटा जा रहा था।
छावनी के उकताहटपूर्ण जीवन-चर्या में युवा वोरोन्त्सोव दम्पति इस उत्तेजनापूर्ण समाचार से प्रसन्न थे। वे इस विषय में बातें करते रहे कि इस समाचार से उसके पिता कितना प्रसन्न होंगे। और जब वे सोने के लिए बिस्तर पर गये रात के दो बज चुके थे।

बुधवार, 14 दिसम्बर 2011

धारावाहिक उपन्यास

हाज़ी मुराद
लेखक - लियो तोलस्तोय
अनुवाद : रूपसिंह चन्देल

चैप्टर - एक


1851 के नवम्बर की एक ठण्डी शाम। रूसी सीमा से लगभग पन्द्रह मील दूर चेचेन्या के एक लड़ाकू गांव मचकट में जलते हुए उपलों का तीखा धुआं उठ रहा था, जब हाजी मुराद ने वहॉं प्रवेश किया। अजान देनेवाले मुअज्जिनों का उच्च तीखा स्वर अभी-अभी रुका था और जलते उपलों की गंध से भरी शुद्ध पहाड़ी हवा में नीचे झरने के पास इकट्ठे, बहस करते पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों की कंठ ध्वनियॉं सुनाई दे रही थीं। ये ध्वनियॉं बाड़ों में बन्द किए जा रहे पशुओं और भेड़ों के रंभाने और मिमियाने से ऊपर उठी सुनी जा सकती थीं। पशु और भेड़ें बाड़ों में वैसे ही ठूंसी जा रही थीं जैसे मधुमक्खी के छत्ते में मधुमक्खियॉं।
हाजी मुराद शमील का एक लेफ्टीनेण्ट था जो रूसियों के विरुद्ध शौर्यपूर्ण कार्यों के लिए विख्यात था। वह उसे घेर कर चलते दर्जनों मुरीदों-अनुयाइयों या शिष्यों के साथ, अपने निजी ध्वज के नीचे ही युद्धों में भाग लिया करता था। वह सिर पर टोपी पहने हुए था और उसने लबादा ओढ़ रख था। उसकी राइफल की नाल बाहर निकली दीख रही थी। अपने एक मुरीद के साथ, सड़क पर मिले ग्रामीणों के चेहरों पर अपनी सतर्क काली, तेज आँखों से एक सरसरी दृष्टि डालता हुआ और अपनी ओर उनका ध्यान कम से कम आकर्षित करने का प्रयास करता हुआ वह आ रहा था। हाजी मुराद जब गॉंव के बीच में पहुंचा, तो चौराहे तक जाने वाली सड़क के बजाय वह बांयीं ओर संकरी गली में मुड़ गया। गली में वह दूसरे मकान के सामने पहुंचा, जो पहाड़ी के नीचे दबा-सा दीखता था। यहॉं वह रुका और उसने चारों ओर देखा। उस मकान के आगे सायबान के नीचे कोई नहीं था, लेकिन छत पर नया पलस्तर की गई मिट्टी की चिमनी के पीछे फर का कोट पहने एक आदमी खड़ा था। हाजी मुराद ने चाबुक फटकार कर और जीभ से ट्क-ट्क की आवाज कर उसका ध्यान आकर्षित किया। रात की टोपी और फर के कोट से झिलमिलाता हुआ दिखाई देता एक पुराना वस्त्र पहने वह एक वृद्ध व्यक्ति था। उसकी धुंधली आँखों पर बरौनियाँ नहीं थीं और पलकों को खोलने के लिए वह उन्हें मिचका रहा था। हाजी मुराद ने रिवाजी ढंग से उसे ‘सलाम आलेकुम' कहा और अपना चेहरा दिखाया।
‘आलेकुम सलाम' वृद्ध ने कहा, जिससे उसके दंतहीन मसूढ़े दीखाई पड़े। हाजी मुराद को पहचानते ही वह अपने दुर्बल पैरों को घसीटते हुए चिमनी के पास पड़ी लकड़ी के तलों वाली अपनी चप्पलों तक ले गया। फिर घीमे से और सावधानीपूर्वक उसने अपनी बाहें सकुड़नों भरी मिरजई की आस्तीनों में डालीं और छत से लगी सीढ़ी से चेहरा सामने करके नीचे उतरने लगा। वृद्ध ने धूप से झुलसी दुबली-पतली गर्दन पर टिका सिर हिलाया और दंतहीन जबड़ों से निरंतर बुदबुदाता रहा। जब वह नीचे पहुंचा तब उसने विनम्रतापूर्वक हाजी मुराद के घोड़े की लगाम और दाहिनी रकाब पकड़ ली, लेकिन हाजी मुराद का मुरीद फुर्ती से घोड़े से उतरा और उसने वृद्ध का स्थान ले लिया। उसे एक ओर हटाकर उसने घोड़े से उतरने में हाजी मुराद की सहायता की। हाजी मुराद घोड़े से उतरकर हल्का-सा लंगड़ाता हुआ सायबान के नीचे आया। लगभग पन्द्रह वर्ष का एक लड़का दरवाजे से निकलकर उसकी ओर आया और अपनी छोटी चमकदार आँखों से आगन्तुक को विस्मयपूर्वक देखने लगा।

‘‘दौड़कर मस्जिद तक जा और अपने पिता को बुला ला।" वृद्ध ने उससे कहा। इसके पश्चात् उसने बत्ती जलाई और चरमराहट के साथ हाजी मुराद के लिए घर का दरवाजा खोला। जिस समय हाजी मुराद घर में प्रवेश कर रहा था पीले ब्लाउज और नीले पायजामे पर लाल गाउन पहने एक कृशकाय वृद्धा कुछ गद्दे लिए हुए अंदर के दरवाजे से आयी।

‘‘आपका आगमन सुख-शान्ति लाए," वह बोली और अतिथि के लेटने के लिए सामने की दीवार के साथ दुहरा करके गद्दे बिछाने लगी।

‘‘आपके बेटे जीवित रहें”, हाजी मुराद ने अपना लबादा, राइफल और तलवार उतारकर वृद्ध के हवाले करते हुए कहा।

वृद्ध ने सावधानीपूर्वक राइफल और तलवार गृहस्वामी के हथियारों के साथ दो बड़े प्लेटों के बीच खूंटी पर लटका दिये जो अच्छे ढंग से पलस्तर की हुई सफेदी पुती दीवार पर चमक रहे थे। हाजी मुराद ने पिस्तौल को संभालकर अपने पीछे रख लिया। वह गद्दे के पास आया। उसने अपनी ट्यूनिक उतारकर रख दी और गद्दे पर बैठ गया। वृद्ध अपनी नंगी एडि़यों पर टिककर उसके समने बैठ गया। उसने अपनी आँखे बंद कर लीं और हथेलियों को उभारते हुए हाथ ऊपर उठाये। हाजी मुराद ने भी वैसा ही किया। फिर दोनों चेहरे पर धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए इस प्रकार सस्वर नमाज अदा करने लगे कि उनके हाथ दाढ़ी की नोक का बार-बार स्पर्श करते रहे।

‘‘ ने हबार ? (कोई समाचार)? " हाजी मुराद ने वृद्ध से पूछा।

‘‘हबार योक (कोई समाचार नहीं है)।" वृद्ध ने लाल और उदासीन आँखों से हाजी मुराद के चेहरे के बजाय उसकी छाती की ओर देखते हुए उत्तर दिया। ‘‘मैं मधुमक्खियों में गुजारा करता हूँ, और इस समय मैं अपने बेटे को देखने आया हूँ। समाचार वही जानता है।"

हाजी मुराद ने अनुमान लगाया कि वृद्ध बात नहीं करना चाहता। उसने अपना सिर हिलाया और अधिक कुछ नहीं कहा।
‘‘अच्छा समाचार नहीं है।" वृद्ध बोला, ‘‘समाचार केवल यह है कि खरगोश सदैव चिन्तित रहते हैं कि उकाबों को किस प्रकार दूर रखा जाये और उकाब उन्हे एक-एक कर झपट रहे हैं। पिछले सप्ताह रूसी कुत्तों ने मिशिको में भूसा जला डाला था। लानत है उनकी आँखों को," वृद्ध गुस्से से बुदबुदाया।
हाजी मुराद का मुरीद मजबूत लंबे डग भरता हुआ धीमे से प्रविष्ट हुआ। अपना लबादा, राइफल और तलवार उसने उतार दी जैसा कि हाजी मुराद ने किया था और उन्हे उसी खूंटी पर टांग दिया जिस पर उसके स्वामी के टांगे गये थे। केवल अपनी कटार और पिस्तौल उसने अपने पास रखी।
‘‘ वह कौन है?” मुरीद की ओर देखते हुए वृद्ध ने पूछा।
‘‘वह एल्दार है, मेरा मुरीद," हाजी मुराद ने कहा।
‘‘बिल्कुल ठीक" वृद्ध बोला और हाजी मुराद के पास गद्दे पर आसन गृहण करने के लिए उसे इशारा किया। एल्दार पैर पर पैर रखकर बैठ गया और बातें कर रहे वृद्ध के चेहरे पर अपनी बड़ी खूबसूरत आँखें स्थिर कर दीं। वृद्ध ने उन्हें बताया कि उनके योद्धाओं ने सप्ताह भर पहले दो रूसी सैनिकों को पकड़ा था। एक को मार दिया था और दूसरे को शमील के पास भेज दिया था। हाजी मुराद ने दरवाजे की ओर सरसरी दृष्टि डाली और बाहर से आने वाली आवाज पर ध्यान केन्द्रित करते हुए अन्यमनस्क भाव से वृद्ध की बात सुनी। घर के सायबान के नीचे कदमों की आहट थी। तभी दरवाजा चरमराया और गृहस्वामी ने प्रवेश किया।
गृहस्वामी, सादो, लगभग चालीस वर्ष का व्यक्ति था। उसकी दाढ़ी छोटी, नाक लंबी और आँखें उसी प्रकार काली थीं, यद्यपि उतनी चमकदार नहीं थीं, जैसी उसके पन्द्रह वर्षीय पुत्र की थीं जो उसे बुलाने गया था। वह भी अंदर आया और दरवाजे के पास बैठ गया। सादो ने अपने लकड़ी के जूते उतार दिए। बिना हजामत किए हुए ठूंठी जैसे काले बालोंवाले बड़े सिर पर से जीर्ण-शीर्ण फर की टोपी को उसने पीछे हटाया और तुरंत हाजी मुराद के सामने पाल्थी मारकर बैठ गया।
उसने उसी प्रकार आँखें बंद कर लीं, जिस प्रकार वृद्ध ने की थीं और हथेलियों को उभारते हुए हाथों को ऊपर उठाया। उसने सस्वर नमाज अदा की और बोलने से पहले चेहरे पर धीरे-धीरे अपने हाथ फेरे। फिर उसने कहा कि शमील ने हाजी मुराद को जीवित या मृत पकड़ने का आदेश भेजा था। शमील का दूत कल ही वापस गया था, और इसलिए सावधान रहना उनके लिए आवश्यक था।
‘‘मेरे घर में, जब तक मैं जीवित हूँ” सादो ने कहा, ‘‘कोई भी मेरे मित्र को नुकसान नहीं पहुँचा सकता। लेकिन बाहर के विषय में कौन जानता है ? हमें इस पर विचार करना चाहिए।"
हाजी मुराद ने एकाग्रतापूर्वक उसकी बात सुनी और सहमति में सिर हिलाया, और जैसे ही सादो ने बात समाप्त की, वह बोला -
‘‘हूँ … अब मुझे पत्र देकर एक आदमी रूसियों के पास भेजना है। मेरा मुरीद जाएगा, लेकिन उसे एक मार्ग-दर्शक की आवश्यकता है।"
‘‘मैं अपने भाई बाटा को भेजूंगा," सादो ने कहा। ‘‘बाटा को बुलाओ," उसने अपने बेटे से कहा।
लडका उत्सुकतापूर्वक अपनी टांगों को उछालता और बाहों को लहराता हुआ तेजी से घर से बाहर निकल गया। दस मिनट बाद वह गहरे ताम्बई रंग, छोटी टांगों वाले एक हृष्ट-पुष्ट चेचेन के साथ लौटा। उसने आस्तीनों पर रोंयेदार मुलायम चमड़े का पैबंद लगा चिथड़ा पीला ट्यूनिक, और लंबी काली पतलून पहन रखी थी। हाजी मुराद ने आगन्तुक को अभिवादन किया और एक भी शब्द व्यर्थ किए बिना तुरंत बोला :
‘‘क्या तुम मेरे मुरीद को रूसियों के पास ले जाओगे ?"
‘‘मैं ले जा सकता हूँ।" बाटा ने प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया। ‘‘मैं कुछ भी कर सकता हूँ। कोई भी चेचेन ऐसा नहीं है जो मुझसे बढ़कर हो। कुछ लोग आते हैं और आपसे दुनिया भर के वायदे करते हैं, लेकिन करते कुछ नहीं, लेकिन मैं यह कर सकता हूँ।"
‘‘अच्छा" हाजी मुराद बोला। ‘‘इस काम के लिए तुम्हें तीन रूबल मिलेंगे।" तीन उंगलियॉं दिखाते हुए उसने कहा।
बाटा यह प्रदर्शित करता हुआ सिर हिलाता रहा कि वह समझ गया है, लेकिन उसने आगे कहा कि वह पैसा नहीं चाहता, वह केवल आदर भाव के कारण हाजी मुराद की सेवा के लिए तैयार हुआ था। पहाड़ों में सभी इस बात को जानते हैं कि हाजी मुराद ने किस प्रकार रूसी सुअरों की पिटाई की थी।"
‘‘इतना ही पर्याप्त है।" हाजी मुराद बोला, ‘‘एक रस्सी को लंबा होना चाहिए, लेकिन भाषण छोटा होना चाहिए।"
‘‘तो मैं चुप रहूंगा।" बाटा बोला।
‘‘झरने के सामने जहॉं आर्गुन मोड़ है, वहॉं जंगल में एक खुला स्थान है और वहॉं सूखी घास के दो ढेर हैं। तुम्हे उस स्थान के विषय में मालूम है ?"
‘‘ मुझे मालूम है।‘‘
‘‘मेरे तीन घुड़सवार वहॉं मेरा इंतजार कर रहे हैं।" हाजी मुराद ने कहा।
‘‘अहा।" सिर हिलाते हुए बाटा बोला।
‘‘खान महोमा को पूछना। खान-महोमा जानता है कि क्या करना है और क्या कहना है। क्या तुम उसे रूसी प्रधान, प्रिन्स, वोरोन्त्सोव के पास ले जा सकते हो ?"
‘‘मैं ले जा सकता हूँ।"
‘‘उसे ले जाओ और वापस ले आओ। ठीक ?"
‘‘बिल्कुल ठीक।"
‘‘उसे लेकर जंगल में वापस आओ। मैं वहीं हूंगा।"
‘‘मैं यह सब करूंगा," अपनी छाती पर अपने हाथों को दबाकर, उठकर खड़े होते हुए और बाहर जाते हुए बाटा ने कहा।
‘‘एक दूसरा आदमी मुझे घेखी के पास भेजना आवश्यक है," बाटा के चले जाने के बाद हाजी मुराद ने अपने मेजबान से कहा। ‘‘यह घेखी के लिए है," ट्यूनिक की एक थैली को पकड़ते हुए उसने कहना जारी रखा, लेकिन जब उसने दो महिलाओं को कमरे में प्रवेश करते हुए देखा, उसने तुरन्त हाथ बाहर निकाल लिया और रुक गया।
उनमें से एक सादो की पत्नी थी। वही दुबली-पतली अधेड़ महिला, जिसने लाकर गद्दे बिछाये थे। दूसरी लाल पायजामे पर हरे रंग का वस्त्र पहने एक युवती थी जिसके वस्त्र के वक्ष भाग में धागे से चॉंदी के सिक्के जड़े हुए थे। चॉंदी का एक रूबल उसके मांसल स्कंधस्थल के बीच लटकती मजबूत काली चोटी के अंत में लटका हुआ था। वह कठोर दिखने का प्रयास कर रही थी, लेकिन पिता और भाई की भॉंति मनकों जैसी उसकी आँखें उसके चेहरे पर झपक रही थीं। उसने आगन्तुकों की ओर नहीं देखा, लेकिन स्पष्ट रूप से वह उनकी उपस्थिति से अवगत थी।
सादो की पत्नी एक नीची गोल मेज में चाय, मक्खनवाले मालपुआ, चीज, पावरोटी और मधु लेकर आयी थी। लड़की एक कटोरा, एक सुराही और एक तौलिया लायी थी।
जब तक दोनों महिलाएं मुलायम तलों वाले जूतों से खामोश कदम रखती हुई मेहमानों के सामने सामान रखती रहीं; तब तक सादो और हाजी मुराद चुप रहे। जब तक महिलाएं कमरे में रहीं एल्दार अपनी बड़ी आँखें आड़े-तिरछे रखे पैरों पर गड़ाये पूरे समय मूर्तिवत बैठा रहा था। जब दोनों महिलाएं कमरे से बाहर चली गयीं और दरवाजे के पीछे उनके कदमों की आवाज आनी बंद हो गयी, तब एल्दार ने राहत की ठण्डी सांस ली और हाजी मुराद ने अपनी ट्यूनिक की एक थैली को पकड़ा, उसके अंदर ठुंसी एक गोली, और उसके नीचे लपेट कर रखा पत्र निकाला।
‘‘इसे मेरे बेटे तक पहुँचाना है।" पत्र दिखाते हुए वह बोला।
‘‘ और उत्तर ?" सादो ने पूछा।
‘‘तुम उसे ले लेना और उसे मुझे भेज देना।"
‘‘यह हो जाएगा,” सादो ने कहा और पत्र को अपनी ट्यूनिक की जेब में रख लिया। फिर उसने सुराही अपने हाथ में पकडा और कटोरा हाजी मुराद की ओर सरकाया। हाजी मुराद ने बाहें उघाड़ी, जिससे उनका गोरापन और मांसपेशी दिखाई दीं। उसने अपने हाथों को स्वच्छ ठण्डे पानी की धार के नीचे किया जिसे सादो सुराही से ढाल रहा था। जब हाजी मुराद ने मोटे साफ तौलिये से हाथ सुखा लिये, वह भोजन के लिए मुड़ा। एल्दार ने भी वैसा ही किया। जब वे भोजन कर रहे थे, सादो उनके सामने बैठा रहा था और उनके आगमन के लिए उसने उन्हें अनेक बार धन्यवाद कहा था। लड़का दरवाजे के पास बैठा, अपनी चमकती काली आँखों से उन पर मुस्करा रहा था मानो वह अपने पिता के शब्दों की पुष्टि कर रहा था।
यद्यपि हाजी मुराद ने चौबीस घण्टों से अधिक समय से भोजन नहीं किया था, फिर भी उसने बहुत थोड़ी ब्रेड और चीज खायी और ब्रेड पर चाकू से थोड़ा-सा मधु लगाया।
‘‘हमारा शहद अच्छा है। यह वर्ष शहद के लिए प्रसिद्ध रहा है। यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, और अच्छी गुणवत्ता वाला है," वृद्ध ने कहा और यह देखकर प्रसन्न हुआ कि हाजी मुराद उसका शहद खा रहा था।
‘‘शुक्रिया," हाजी मुराद ने कहा और भोजन लेना छोड़ दिया। एल्दार अभी भी भूखा था, लेकिन अपने स्वामी की भॉंति ही वह भी मेज से हट गया और उसने हाजी मुराद की ओर कटोरा और सुराही बढ़ाया।
सादो जानता था कि हाजी मुराद को रखकर वह अपने जीवन को खतरे में डाल रहा था। जब से हाजी मुराद का शमील के साथ झगड़ा हुआ था, मृत्यु का भय दिखाकर सभी चेचेन- वासियों के लिए उसका स्वागत ममनूअ (निषिद्ध) कर दिया गया था। वह जानता था कि ग्रामीणों को किसी भी क्षण उसके घर में हाजी मुराद के मौजूद होने की जानकारी हो सकती है और वे उसके आत्मसमर्पण की मांग कर सकते हैं। लेकिन घबड़ाने के बजाय वह प्रसन्न था। वह मानता था कि यह उसका कर्तव्य है कि वह अपने मेहमान की रक्षा करे, भले ही इसके लिए उसे अपने प्राण गंवाने पड़ें। उसने इस बात से अपने को प्रसन्न और गौरवान्वित अनुभव किया कि वह एक ‘ड्यूटी कमाण्डेण्ट' की भॉंति व्यवहार कर रहा था।
‘‘जब तक आप मेरे घर में हैं और मेरा सिर मेरे कंधों पर है, कोई भी आपको नुकसान नहीं पहुँचा पायेगा," उसने पुन: हाजी मुराद से दोहराया।
हाजी मुराद ने उसकी चमकदार आँखों की ओर देखा और समझ गया कि वह सच कह रहा था।
‘‘ तुम्हे खुशी और लंबी उम्र मिले।" उसने औपचारिकतापूर्वक कहा।
सादो ने नेक शब्दों के लिए इशारे से इल्तज़ा करते हुए अपनी छाती को अपने हाथों से दबाया।
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जब हाजी मुराद ने किवाड़ बन्द किये और जलाने के लिए तैयार लकडि़यॉं अंगीठी में डालने लगा, सादो विशेषरूप से प्रसन्नचित और सजीव मन:स्थिति में कमरे से विदा हुआ और घर के पीछे की ओर परिवार के लिए बने कमरों में चला गया। महिलाएं उस खतरनाक मेहमान के विषय में बातें करतीं हुई, जो आगे के कमरे में रात बिता रहा था, अभी तक जाग रही थीं।