शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

आलेख


 कविता को लगा कैंसर

डा.दीप्ति गुप्ता

एक लंबे समय से मैं साहित्य की वह विधा, जिसे साहित्य  का प्राण कहा जाता है; पढती आई हूँ और विश्वविद्यालय में पढाती  भी आई हूँ ! जी हाँ, मैं ‘कविता’  की ही बात कर रही हूँ ! कम से कम शब्दों  में यदि इसे  व्याख्यायित करें तो – ‘ह्रदय के कोमलतम  भावों की सौन्दर्यपरक  अभिव्यक्ति कविता कहलाती है’ - कोमलतम भाव यानी सौंदर्य, प्रेम, सुख-दुःख संबंधी वे  शाश्वत भाव  जो जीवन की हर अनुभूति में  समाए होते हैं ! साहित्य के प्रणेताओं द्वारा कविता  के सदियों से प्रतिष्ठित इस कालजयी  रूप को दिलो-दिमाग में संजो कर, आज  कविता  के  नाम पर, जब हम अश्लील, फूहड़  और बेतुक बंदी  को  झेलते हैं  तो दिमाग में  एक ऐसा बवंडर उठ खडा होता है जिसे रोकने के लिए स्वयं से जंग  लड़नी पडती है !  आज कुछ खास कवि, कविताएं लिख रहे है या  इस विधा की आड़ में अपने रुग्ण भावों का जखीरा पेश कर रहे हैं, समझ  नहीं  आता ! ?

कविता – छंद-बद्ध और छंद-मुक्त – दोनों तरह  की हो सकती है किन्तु  भावों और संवेदनाओं की प्रधानता दोनों तरह  की कविताओं की पहली शर्त है ! यदि छंद  की लयात्मकता कविता में नहीं है तो निश्चित रूप से भावों की लयात्मकता तो मिलेगी ही ! महाकवि निराला की तमाम कवितायेँ  छंद  से अधिक भावात्मक लयबद्धता  का सुन्दर उदाहरण हैं ! लेकिन इस सबसे से भी एक महत्वपूर्ण  बात जो कविता  को कविता  बनाती है, वह है – उसमें तैरते भावों का पाठक के साथ ऐसा  अपनत्वपूर्ण  संवाद - जो  पाठक के उदात्त भावों  को स्पर्श कर, उन्हें स्पंदित करे ! उस उदात्त मनस्थिति में कविता, पाठक के ह्रदय को अपनी गिरफ्त में  इस तरह ले लेती है कि कुछ देर बाद सामान्य स्थिति में आने पर भी, उसकी  छाप  अंतर्मन पे लंबे समय के लिए अंकित हो जाती है ! सच्ची  और अच्छी कविता का यह एक सहज  गुण है !

लेकिन तमाम  सहजाताओं से भरी, निर्मल निश्छल कविता आज, पवनकरण  और अनामिका  जैसे  रचनाकारों  के कारण  इतनी असहज  और विकृत हो गई है कि रुग्ण और विकलांग नज़र आती है ! इन दोनों  कवियों की ‘ब्रेस्ट  कैंसर’  जैसे गंभीर  और संवेदनशील विषय पर इतनी अश्लील और उथली कवितायेँ  सामने आई कि  उन्हें पढते हुए भी शर्म आती है ! उनकी आलोचना में कलम चलाने में भी दिल पे जोर पडता है ! किन्तु  साहित्य सेवी  और साहित्य प्रेमी  होने के नाते, कविता जैसी सी सुकोमल और संवेदनशील विधा की  रक्षा करना  अपना फ़र्ज़ बनता है तो कितना भी दिल पे जोर पड़े, उसके रूप को नष्ट-भ्रष्ट  करने वालों की कलम  पे रोक तो लगानी ही  पड़ेगी तदहेतु आलोचना अपेक्षित है ! आज ज़माना कितना बदल गया है कि गलत बात कहने वाले सीना तान कर  अभद्र बाते कहते नहीं हिचकते और  सही बात के पक्षधर, दूसरों की गलती पे शर्म से गड़े हुए, लंबे समय तक संज्ञा शून्य से,  उसके बारे  सोचते  बैठे रह कर, तब मन ही  मन उन अभद्र बातो  के उल्लेख के प्रति  संकोच  से भरे हुए, गलत का विरोध  कर पाते हैं !

 एक कविता संग्रह में पवनकरण जी  की  कविता ‘स्तन’ और ‘ फरवरी २०१२ के ‘पाखी’  के स्त्रीलेखन  विशेषांक में अनामिका जी की ब्रेस्ट कैंसर’ पर कविता पढ़ी  और पढ़ कर मेरे दिलो-दिमाग  का  ज़ायका  बिगड गया ! क्योंकि उनमें कैसर पीड़ित महिला के प्रति न करुणा, न सहानुभूति, या उसकी पीड़ा का उल्लेख  या कैंसर जैसे भयंकर रोग से मुक्ति दिलाने के लिए दुआ और प्रार्थना जैसा  कोई कोमल भाव....अगर  कुछ था तो बस  अश्लीलता, कामुकता का अजस्र  बहाव  तथा थोथी  और छिछली बातों का भंडार !

ब्रेस्ट कैंसर  हो या किसी  अन्य अंग का कैसर,  उससे पीड़ित व्यक्ति जीवन-मरण की  जिस उहापोह , पल-पल जिस भावनात्मक दारुण पीड़ा  तथा एक निर्मम शून्य  और सन्नाटे से गुज़रता है, उसे  बड़ी शिद्दत के साथ कविता में  इस तरह उतारा जा सकता है  कि वह पाठक  की सम्वेदनाओं को स्पर्श  करता  हुआ, उसे भोगने वाले  की पीड़ा का एहसास कराए ! लेकिन  इन दोनों कवियों  की  कवितायेँ जिस बेदर्दी से पाठक की और ब्रेस्ट कैंसर  पीडित की  आशाओं पे पानी फेरती हुई, कुत्सित भावों का तमाशा पेश करती हैं, उसे पढकर वितृष्णा होती है ! ब्रेस्ट कैसर  एक ऐसा शब्द है, ऐसा विषय है, ऐसा रोग है जिससे पीड़ित इंसान के बारे में सुनकर मन में संवेदना जागती है. अधिकतर  लोग संवेदना को  जानते तो हैं, पर ‘समझते’ नही ! संवेदना  यानी  ‘दूसरे की वेदना  को समान  रूप से अनुभूत करना’  और जब वह कविता में  उतरे तो – उसे पढ़ कर पाठक संवेदना  के माध्यम से, मानसिक  और भावनात्मक रूप से – कैसर  ग्रस्त इंसान की वेदना से तादाम्य स्थापित कर  सके ! लेकिन खेद है कि पवनकरण  और अनामिका जी , जैसे संवेदनशील  कवियों ने इस विषय  पर, बड़े ही स्थूल स्तर पे कवितायेँ लिखी ! वे कवितायेँ इतनी विरूप और कुरूप  है कि  पाठक  को संज्ञा  शून्य  सा कर देती है ! उन्हें पढ़ कर मैंने तो अपने को बीमार  सा  महसूस किया ! उनमें उदारता से उडेले गए अभद्र विचारों और अभिव्यक्ति के बोझ तले  मेरा  जैसे  सांस लेना मुहाल हो गया ! ये कवितायेँ हैं या  कि औघड़ता का नग्न तांडव ?

हिन्दी साहित्य का इतिहास उठाकर देखें तो कविता  क्रमश: छायावाद , हालावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, प्रतीकवाद, अभिव्यंजनावाद (इटली के दार्शनिक क्रोशे की देन) से होती हुई  ‘नई कविता ’ के रूप में ढली  और  तदनंतर  ‘अकविता’ बनती  गई, जिसमे नए भावों, नए तथ्यों, नए विषयों  को ‘यथार्थ’  की भूमि  पे प्रतिष्ठित किया गया  ! यथार्थ चिंतन ने आधुनिक काल के कवियों को  नवीन विषयों की परिकल्पना  की विशेष प्रेरणा दी ! कवियों ने आस पास की परिस्थितियों  से प्रेरित  होकर  व्यक्ति सत्यों को  ‘इस ‘नई कविता  और  ‘अकविता’  में प्रस्तुत किया ! इसका  परिणाम 

यह  हुआ कि  उनका  सोच, चिंतन, उनकी अभिव्यक्ति, चित्र सभी यथार्थ से अनुस्यूत हो गए ! तदनंतर  यथार्थ का  विकृतिकरण  होने लगा और  यथार्थवाद  का यह दर्पण अतियाथार्थाता  से ही किरच-किरच हो गया ! कविता अपशब्दों की सीमा तक पहुँच गई ! अज्ञेय  जी ने  जिन  आदर्शों  की प्रतिष्ठा की थी, ‘नई कविता’ और ‘अकविता’ उनको छिन्न-भिन्न कर उग्रता से फूट निकली ! आज २१ वी  सदी में  वही उग्रता और अपशब्द पवन करण और अनामिका जी की कविताओं में  और भी भयंकर रूप से अश्लील और अभद्र होकर मुखर हुए हैं  और ‘ब्रेस्ट कैंसर’ पर कविता के रूप में हमारे सामने आए ! ये तो थोड़े से ही उदाहरण हैं !
  
  कविता में शास्त्रीय दृष्टि से रस  हो न हो, लय हो ना हो, लेकिन  रस  का  मूल उत्स ‘बिम्ब’  ज़रूर होना चाहिए ! अनुभूति जितनी  जीवंत, तीव्र  और सजीव  होगी, बिम्ब उतना ही स्वच्छ और प्रभावशाली होगा !  कहने का तात्पर्य यह है कि यदि  कविता में छंद नही हैं; भावनात्मक लय भी नहीं  है, तो कम से कम बिम्ब तो हो !  लेकिन पवनकरण और अनामिका जो परिपक्व कवि  हैं, उनकी कविताओं में बिम्ब तक नहीं है ! क्यों ? जब अनुभूति की तीव्रता, प्राणवत्ता ही  इन कविताओं में नहीं  है,  तो बिम्ब कहाँ से उभरेगा ?  इन दोनों ही कवियों  की इस समानता  की दाद  देनी पड़ेगी कि  दोनों में किसी को भी कैंसर रोग  से पीड़ित  इंसान के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक कष्ट व पीड़ा से  कोई सरोकार नहीं अपितु  उरोजों का कामुक, अश्लील चित्रण करना, उनसे ओछा वार्तालाप  करना  ही,  उनका  ध्येय  प्रतीत  होता है ! ब्रेस्ट कैंसर के बहाने कविता में शुरू से अंत तक  ब्रेस्ट यानि स्तन  पर ही उनकी दृष्टि करुणा या चिंतन के तहत नहीं अपितु वासना और विकृति के तहत गडी नज़र आती है ! मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, उनके तो शब्द बोल रहे हैं,  उनकी अभिव्यक्ति  तरह तरह के फूहड उपमानों के साथ उरोजों  को प्रस्तुत कर रही है जिससे उनकी कविताएं,  एक पोर्न  चित्रावली  आँखों के सामने चलाने लगती है ! जब बोल्ड मूवीज बनती  हैं तो कम से कम सेंसर बोर्ड उन्हें  एडल्ट मूवीज की श्रेणी में रख कर ‘ए’ सर्टिफिकेट तो देता है ! परन्तु  यहाँ तो इन कविताओं के लिए न तो कोई सेंसर बोर्ड बना है और न किसी तरह का ‘ए’ सर्टिफिकेट है ! सिनेमा  जैसी विधा में तो खुली अश्लीलता एकबारगी ‘ए’ सर्टिफिकेट के तले चल भी जाती है जबकि आलोचना उसकी भी खूब होती यहाँ तक कि  सेंसर बोर्ड की  मति पे भी सवाल उठाए जाते है,  लेकिन कविता  जैसी  सुकोमल, भावप्रधान  उदात्त  विधा में अश्लीलता न  तो अनुमित  होती  है और  न स्वीकार्य !  फिर भी कुछ  जांबाज़ कवि कविता का चीर हरण करते रहते है  और वरिष्ठ  कवि वर्ग सहनशील बने देखते रहते है ! अच्छाई  राम  की  तरह  रावण का यानी बुराई का सामना करने  को तैनात क्यों  नहीं हो जाती ?  क्या बात आड़े आती है – मुझे तो यह बात आज तक समझ नहीं आई ?  एक आदमी सामने खडा भद्दी गलियां दे रहा है, आप  उसे   उसके ही जोड़ की गालियाँ मत दीजिए, परन्तु साहस से उसका  मुँह  कम से कम इस दबंगई से  तो बंद कीजिए कि गाली देने की बात तो  बहुत दूर, मुँह खोलना  भी भूल जाए !

अब  दोनों कविताओं की  स्कैनिंग कर,  उन पर अलग अलग थोड़ा  विस्तार से  सोच-विचार  करना  होगा  ! पवन करण नारी के वक्षस्थल को शहद का छत्ता  और दशहरी आमो की ऐसी जोडी बताते  हैं जिनके  बीच वे  जब तब अपना  सर धंसा लेते  हैं या फिर उन्हें कामुक की तरह आँखें  गड़ा कर देखते रहते हैं – ये  कैसर रोग  को,  स्तन पर झेल रही महिला के लिए उनकी  सम्वेदनशील नज़र है....वाह  क्या नज़र है , क्या  संवेदनशीलता है !!  उन्हें कैसर रोग  से ग्रस्त महिला के दुःख और अवसाद से कुछ लेना-देना नहीं – वे तो उरोजों के  आकार और आकृति को देख रहे हैं - उन की उपमा  शहद के  छत्ते और आम से  दे रहे हैं ! ‘रोगी स्तनों’  की इस तरह की उपमाएं  हमने तो पहली बार पढ़ी ! फिर  उनसे खेलने की बात करते हैं  ! इससे अमानवीय  और निकृष्ट बात और क्या हो सकती है ?  यदि  वे अपने बचाव में अब यह  दलील देने लगे कि वे श्रृंगार  काल के कवियों  की  तरह श्रृंगार रस  से ओत प्रोत कविता लिख रहे हैं, तो मैं  उन्हे  बताना चाहूगी कि  श्रृंगार  काल के बिहारी, केशव, आदि कवियों ने, संस्कृत के कालिदास ने  श्रृंगार रस का  बड़ा ही शालीन और भद्र चित्रण किया है - पवन जी  की तरह  वितृष्णा पैदा करने वाला नहीं ! उसे पढकर सौन्दर्यपरक श्रृंगार  की अनुभूति होती है ना कि पोर्न साहित्य की ! सबसे अधिक  ध्यान  देने योग्य बात यहाँ ये है कि श्रृंगार  काल के कवियों  ने उन कमनीय नायिकाओं का वर्णन किया जो कैंसेर जैसे जान लेवा रोग से ग्रस्त नहीं थी और जीवन की जंग नहीं लड़ रही थीं ! वरना वे संवेदनशील कवि, ऎसी पीड़ित नारी का,  जो ऐसे रोग के कारण भावनात्मक और मानसिक अवसाद व हताशा  से गुजर रही होती है,  उसका कभी श्रृंगारपरक वर्णन  न करते – कामुकता भरी   अभिव्यक्ति  तो बहुत दूर  की बात है ! उसकी  वेदना, पीड़ा  पर  ही उनकी दृष्टी केंदित होती !  यहाँ हमारे परम आघुनिक बिंदास कवि  ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित  नारी के रोग की व्यथा-कथा कहने के बजाय,  उसे खिलौना कह कर , नारी का मखौल उड़ा रहे हैं !  उसके प्रति सहानुभूति, करुणा या सम्वेदना  से  उन्हें कोई लेना देना नहीं !

आज नारी विमर्श के समर्थक  रचनाकार यदि  नारी पर, इस तरह की अश्लील  रचनाएँ  समाज और साहित्य को भेंट चढाने लगेगें  तो शीघ्र ही  समाज और साहित्य  में भी कैंसर के जाले झूलते नज़र आयेगें !  ‘साहित्य’ सदियों से  - समाज और मानव-जाति  को स्वस्थ दिशा, स्वच्छ  दृष्टि देता आया है – उनका ‘हित’ करता आया  है, तभी  ‘साहित्य’ नाम से  जाना गया ! ऐसा नहीं कि साहित्य ने जीवन में घट रहे यथार्थ  को नकारा, साहित्य ने उसका भी चित्रण किया, लेकिन जीवन में वरेण्य क्या है, समाज को होना कैसा चाहिर, वह आदर्श  प्रस्तुत  करके सदैव सद् मार्ग  का सन्देश पाठकों को दिया, सही सोच दी,  दिशा  दी  !  लेकिन आज साहित्य के कुछ सर्जक समाज को सही दिशा देने के बजाए, सही दिशा से भटका रहे हैं !  सत्यम, शिवम, सुन्दरम देने के बजाए, असत्यम, अशिवम और असुन्दरम  दे रहे हैं ! तभी तो पवन करण और अनामिका,

चिंता उपजाने वाले, हँसी-खुशी छीन लेने वाले, शरीर को क्षत-विक्षत कर देने वाले जानलेवा  रोग – ‘कैंसर’ से  ग्रस्त  नारी  पर, एक बेढब  कविता, नारी- विमर्श का मन्त्र गुनगुनाते हुए, शान के साथ  परोस रहे हैं ! आकाश की ओर सर उठा कर, जैसे कोई विजय गीत गा रहे हो !  ऎसी कविता लिखने का क्या औचित्य है ?  वे इस बात का ज़रा  खुलासा  करें  ! उनका  संवेदनशील कवि-मनस कहाँ खो  गया है जो  एक बार भी उन्हें उस नारी की पीड़ा , उसकी मानसिक यंत्रणा  और भावनात्मक खालीपन की याद  नहीं दिलाता, जो शरीर के किसी भी अंग के अलग  कर दिए जाने पर उपजता है और दिल में घर करके बैठ जात्ता है ! दूसरे  की  जान पे बनी है और इन  दोनों रचनाकारों को हँसी मजाक सूझ रहा है तभी पवन करण के लिए उरोज एक खिलौना हैं खुशी का  साधन है  और अनामिका  उनके शरीर से विलग हो जाने के बाद – उन्हें मानो पछाड़ देकर, खुश होती हुई, उन पे व्यंग कस रही है – ‘कहो कैसी रही ...?’

एक हिस्से  को गँवा देने के बाद  कैंसर रोग पीड़ित नारी के जीवन में  हमेशा के लिए जो ‘कमी’ आ जाती है – पवन जी उस कष्ट का कोई उल्लेख न करके, अपने उस नारी के साथ  रिश्ते में आई ‘कमी’  का  रोना रो  रहे हैं ! उनका  उस नारी के  साथ रिश्ता कितना  उथला  था कि एक  अंग  का उच्छेद   होते ही – रिश्ता भी उच्छिन्न हो गया !  बहुत खूब !

पवन करण जी  की ‘स्तन’ कविता , सीधी सीधी एक पोर्न कविता है जिसका भावों, संवेदना और (सहा) अनुभूति आदि  से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं !  अचरज मिश्रित बात यह है कि पवन करण जी की यह  कविता  ‘ब्रेस्ट कैंसर’ को झेलने वाली ‘संगीता रंजन’ को समर्पित  है ! पहले  भयंकर  ‘ब्रेस्ट कैंसर’ को झेलना, फिर इस भयंकर कविता को झेलना – कैसा लगा  होगा उनको ? उनकी भावनात्मक और मानसिक वेदना का तो कविता में कहीं  छींटा भी  नहीं  महसूस हुआ उलटे एक  खिलंदडी  के  से भाव से यह कविता  लिख कर उन्हें समर्पित  कर दी गई ! उनकी  आतंरिक  पीड़ा और वेदना  को महसूसते हुए यदि इस  कविता  को लिखते  तो, इसी कविता  की बात ही कुछ और होती ! पवन करण जी ने अपनी स्थूल सोच कविता में इस  बेदर्दी  से  थोपी है कि उस में चित्रित  नारी को अपनी तरह स्थूल  दृष्टि वाला बना दिया है ! तभी तो वह  पुरुषवादी  नज़र से अपने अंगों देख कर, परवर्ट बनी  हर्षित होती  दीखती  है  और  बाद में एक हिस्से के कट जाने पर उसका  दुःख भी  उसी स्थूलता के साथ पाठक के सामने आता  है – भावनात्मक  तल पर नहीं !  कहा गया है कि – Our  any  creation  reflects  our  thoughts,  our  sensitivity, our insight  and much  much  more. इस  दृष्टि से यदि हम पवन करण जी की कविता का  जायजा ले तो,  उसमें संवेदना, चिंतन और  अंतर्दृष्टि जैसी  किसी चीज़ के दर्शन  नहीं होते !  होते भी कैसे, उस सोच, उस  कुत्सित भावना के ही तो दर्शन होगें जो उनके अंतर्जगत में तैर  रही है ! रचनाकर  जैसा  हैं,  रचना के  आईने  में उसका वैसा ही तो अक्स दिखेगा ! सोच अच्छी  और बुरी कैसी भी हो सकती है ! उस पे किसी तरह की पाबंदी न कभी लगी है, न लगेगी- मनोवैज्ञानिक, मनोविश्लेषक, समाजशास्त्री, साहित्यशास्त्री  सभी इस बात पर एकमत हैं ! जब कायनात में अच्छे  और बुरे का द्वन्द्व है तो मानव स्वभाव में भी होगा ! इसलिए ऐसा  नहीं हैं कि अच्छे इंसान में सब अच्छा ही भरा होगा  और बुरे में सब  बुरा ही होगा ! लेकिन देखा यह जाता है कि इंसान में  कौन से भाव और विचार – सकारात्मक  या नकारात्मक – बहुतायत से स्पंदित रहते है, मुखर  रहते हैं ! भावों के प्रकार की इस मुखरता से ही उसके और उसकी गतिविधियों, क्रिया-कलापों  का  सकारात्मक व उत्तम  होना सिद्ध होता है ! यहाँ वर्त्तमान सन्दर्भ में विचारणीय  यह है कि रचनाकार  का सृजन के प्रति, समाज के प्रति, जीवन के प्रति एक उत्तरदायित्व बनता है, उसका  एक नैतिक कर्तव्य होता है कि जो भी सकारात्मक, स्वस्थ, शिव और सुन्दर है, उसे जीवन और समाज के मद्दे नज़र,  सबसे पहले सृजन में उतारना,  फिर सृजन के माध्यम से समाज  और जीवन में उतारना  तथा इस तरह, अस्वस्थ और नकारात्मक का निराकरण करना ! हमारे आसपास  समाज में, जीवन में जो भी नकारात्मक रात  और दिन की  तरह आता है, जाता है, उसको नज़रंदाज़  नहीं  करना, वरन उसका भी  उल्लेख करना, उसके विषाक्त प्रभावों  को दर्शाना  और उसके साथ-साथ

कदम-दर- कदम सकारात्मक व  स्वच्छ सन्देश पे सृजन की  इति करना ! जिससे  मानव जीवन और उससे  रचा हुआ समाज भटके नही वरन बेहतर से बेहतर बने ! हमारे धर्मशास्त्रों  में हमारे हर छोटे से छोटे और बड़े से बड़े कार्य का उद्देश्य सुख और शांति  की उपलब्धि बताया  गया है ! इसलिए लेखक  जो समाज का प्राणी है, उसका यह नैतिक और रचनात्मक कर्तव्य बनता है कि  वह अपनी लेखनी से जो भी ‘सकारात्मक’ है, वह पाठकों को, समाज को दे – न कि नकारात्मक, अश्लील और भोंडी  चीजे इधर उधर छितरा कर वातावरण खराब करे ! इसलिए यदि कोई  लेखक मात्र एकांगी रूप से कुत्सित और अभद्र बिंदुओं पे केंद्रित होकर, उनका यशगान करे, उनकी महिमा गाए, तो समझिए  कि उसकी लेखनी अस्वस्थ  है !  ऐसे रचनाकारों की जमात एक दिन साहित्य और समाज को ले डूबेगी ! इस सन्दर्भ में पवन करण की कविता  ‘स्तन’ जिस ठंडेपन से स्त्री मांसलता  को पेश करती है, वह निहायत ही  खेद का विषय है ! कोई भी विचारशील ‘सहृदय’ – जिसमे लेखक, पाठक, तथा अन्य  सम्वेदनशील  सामजिक  आते हैं – इस तरह के अपसंस्कृत लेखन का स्वागत नहीं करेगा ! ऐसे लेखन का अपनी-अपनी कलम चला कर कड़ाई से विरोध होना चाहिए !  स्त्री और  उसकी देह को  एक ‘आब्जेक्ट’  के रूप में खिलौने की तरह  देखना, उसके सारे अंग बरकार हो, सुन्दर  हो तो उसे ‘उपयोगी’ करार देना और उसका  कोई अंग कैंसर रोग के कारण छिन्न हो कर छीन जाए तो उसे अनुपयोगी  घोषित  कर देना – और उस नारी से दूरी जताना , नारी जाति  का सरासर अपमान है ...?  नारी मात्र  एक देह  ही क्यों – वह ‘भावना’ और  ‘संवेदना’  पहले है ! नारी भावना के तल पे  अधिक  जीती है न कि शरीर के तल पे ! शरीर के तल पे तो वह पुरुष के द्वारा ही लाई  जाती है – उसमें भी उसके  भाव उभर-उभर आते हैं ! पवन करण जी द्वारा नारी पर अपनी स्थूल मांसल दृष्टि को थोपना  और उसके सुकोमल शरीर से अपनी  सोच जैसी एक संवेदनाहीन, लज्जाविहीन स्त्री की सर्जना करना और फिर कैसर की सर्जरी के बाद, जब वह एक अंग खो बैठे तो उससे ढाढस बंधाने के बजाए, उसकी उपेक्षा  करना और इन सब बातों को निर्ममता से कविता  के  रूप में पन्नों पे  घसीटना... कहाँ तक उचित  और मानवीय है ? क्या यह भावनात्मक नृशंसता नहीं है ? या यह पवन जी पे आज की उपभोक्ता संस्कृति  का प्रभाव है ‘यूज  एंड थ्रो’ !
  पवन करण जी  की  तरह  ही अनामिका जी  की  कविता ‘ब्रेस्ट कैंसर ‘ की शुरुआत इस तरह होती है :

दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने /दूध पिलाया मैंने /हाँ बहा दी दूध की नदियाँ /तब जाकर  मेरे  इन उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में जाले लगे /
इन पक्तियों से दूध ले साथ ममता  और स्त्रीत्व कम, दंभ ज्यादा उमड़ता  नज़र आता है ! बार-बार  ‘दूध पिलाया मैंने, दूध पिलाया मैंने, ‘ की उद्घोषणा  करके, वे क्या कहना  या समझाना  चाहती हैं – यह समझ नहीं आया ! कम से कम मुझ मंदमति को तो स्पष्ट नहीं हुआ ! उन्हें भी स्पष्ट है या नहीं, वे जाने ! फिर  यह अभिव्यक्ति ‘तब जाकर  मेरे इन उन्नत पहाड़ों में जाले लगे ‘ – इससे तो ऐसा  अर्थ ध्वनित  हो रहा है कि वे कैंसर रूपी जाले को गले लगाने के लिए कब से प्रयास रत  थी  और प्रतीक्षा में थी, तब कहीं जाकर  एक दिन उनकी मेहनत रंग लाई और  उन्नत पहाड़ों में कैंसर घर कर पाया ! यह कैसी कामना है ? कौन स्त्री चाहेगी कि उसके वक्षस्थल में, जो कि ममता का उत्स माना  जाता है – वह कैंसर जैसे रोग से ग्रस्त हो जाए ! यह विक्षिप्तता की निशानी है या ज़बरदस्ती शहीद  होने का भाव ? कैसर को इस तरह निमंत्रण ? अनामिका जी की ये पंक्तियाँ तो यह ही संवाद करती नज़र  आई ! इसके आगे वे लिखती हैं : ‘कहते हैं महावैद्य/ खा रहे हैं मुझको ये जाले / और मौत  की चुहिया  मेरे  पहाड़ों में  इस तरह  छिप कर  बैठी है/ कि यह निकलेगी तभी/ जब पहाड़ खोदेगा कोई....’

हिंदी में एक बड़ा पुराना  और प्रसिद्ध मुहावरा है – ‘खोदा पहाड़  निकला चूहा /निकली चुहिया ‘ उस मुहावरे का कविता में प्राकारंतर से अनामिका जी  ने प्रयोग करके जो व्यंजना भाव लाना  चाहा है,  वह तो कहीं खो गया और अभिधा  अर्थ ही  चुहिया  की तरह फुदक फुदक कर सामने  आया ! ‘खोदा पहाड़  निकला चूहा’ में चूहे को एक अमहत्वपूर्ण, निरर्थक वस्तु के अर्थ  में  प्रयोग किया जाता है ! जब कि  अनामिका जी द्वारा मुहावरे के तहत चुहिया को कैंसर जैसे  भारी भरकम गंभीर रोग के उपमान के रूप में प्रयुक्त करना एक तरह का विरोधाभास पैदा करता है ! पहाड जब खुदे  और कैंसर रोग  ना निकले, तब यह  मुहवारानुमा अभिव्यक्ति अधिक समीचीन लगती लेकिन यहाँ तो वह बहुत ही अटपटी और अप्रासंगिक लगती है ! फिर अनामिका जी ने जो यह लिखा है कि  महाववैद्य यानी ‘कैंसर स्पेशलिस्ट’ जब  पहाड खोदेगा.. जैसे  एक डाक्टर / वैद्य हाथ में कुदाल लिए खोदने के  लिए तैयार खड़ा  हो – ऐसा हास्यास्पद बिम्ब ज़ेहन में बनता है – डाक्टर ना हुआ  बेचारा   खुदाई करने  वाला मज़दूर हो गया.....! खैर आगे वे अपनी तमन्ना का

दूसरा फलक उघाडती हैं और लिखती हैं – ‘निकलेगी चुहिया  तो देखूंगी मैं भी’.....इससे वीभत्स और रुग्ण मनोकामना क्या  होगी  कि शल्य चिकित्सा के बाद चीर फाड  के कारण  खून से सने उरोजों को वे सर्जरी प्लेट में देखने को बेताब होगीं ! उनके शब्दों में -  ‘खुदे  फुदे नन्हे पहाड़ों  को ‘..... मतलब  कि जो उन्नत से नत बने सर्जरी प्लेट में पड़े होगें...कितनी अमानवीय कल्पना और कामना है कवयित्री की ! आगे उनसे उरोजों से  संवाद  की  बात लिखती हुई कहती हैं – कि  वे हंस कर चिहुक कर उन निर्जीव स्तनों  को मुँह चिढाती हुई पूछेगी – 

 

‘ हेलो, कहो, कैसी रही ??’
‘कैसी रही’ यह अभिव्यक्ति कितनी  ओछी और छिछोरी  है ! अपने शरीर के अंग को क्या इस  तरह -  पहले चुनौती और फिर मुँह चिढाना – किया जाता है ?  उन ममता  के स्रोतों से क्या अनामिका जी की कोई शर्त लगी थी  कि पहले वे उनमे जाले लगाने की कामना  करती हैं;  जब जाले  लग जाते हैं तो उन्हे  चीर फाड कर खोदने की चुनौती देती  है  और जब वे शरीर से अलग  कर दिए गए  तो उनसे ‘हैलो, हाय’  कहती हुई तंज  से बात करती हैं  कि देखो मैंने तुम्हें कैसी पछाड़  दी  और तुम्हें खुदवा कर , उन्नत से नत, क्षत विक्षत कर दिया !अंतत:  मैंने तुमसे  छुट्टी  पा ली ‘ – इस पंक्ति  तक आते आते कवयित्री की इन ममता के स्रोतों के प्रति वो गर्वोक्ति / दम्भोक्ति छूमंतर हो गई जो पहली दो पंक्तियों में उन्होंने जताने की कोशिश  की  थी – ‘दूध  की नदियाँ  बहा  दी मैंने, दूध पिलाया मैंने’  आदि आदि ! जिन्होंने ‘प्राणतत्व’ दुग्ध  की नदियाँ बहाई , ज़ाहिर हैं नन्हे  शिशुओं को जीवन दान दिया, उनकी भूख तृप्त की – अब उन  ममता के स्रोतों के लिए कोई कृतज्ञता  नहीं, उन्हें  खोदने  का कोई गम नहीं, पीड़ा नहीं, जो नारी के  स्त्रीत्व और ममता का प्रतीक माने गए हैं, उन्हें वे कुछ पंक्तियों में  ‘आफत और बला’ के रूप में देखती हैं;  वे – जो ‘दस वर्ष की उम्र से उनके पीछे पड़े थे’ / जिनकी वजह से दूभर हुआ सड़क पे चलना ...’ ये कैसी  कुत्सित भाव उकसाने वाली अभिव्यक्तियाँ हैं ? ये तो  पाठक के दिमाग में जानबूझकर कामुक  बिम्बों  को उभारना हुआ ! फिर लिखती है ‘बुलबुले  अच्छा हुआ फूटे’!  बुलबुले फोडने के बजाय यदि  वे चुहिया के मरने, निर्जीव होने की बात पर कलम  अधिक  केंद्रित  करती – तब  तो कैंसर से मुक्ति  पाने की बात पाठक तक  पहुँच सकती थी ! पर वे तो पवन करण जी कि तरह ही, उन्नत पहाड़ों पे  शुरू से आखिर तक दृष्टि  गडाए हुए  हैं, उन्हीं से उनका तल्ख़ और तुर्श संवाद चल रहा है ! कभी उन्हें पहाड़ तो,  कभी धराशायी खुदे- फुदे पहाड, तो कभी बुलबुले  बना  रही हैं ! इतना ही नहीं, अंत तक पहुँचते पहुंचते वे ‘ब्लाउज में छिपे तकलीफों के हीरे ‘ बन जाते हैं,  तकलीफ  अनामिका जी को कैंसर से होनी चाहिए थी  ना कि  वक्षस्थल से !कोसना  ही था तो तरह तरह से  वक्षस्थल को कोसने के बजाए,  रोग को कोसना चाहिए था !  इस हीरे की परिकल्पना ने मुझे चौंकाया कि – ये नवीन इतना कीमती आरोपण किस लिए ! शीघ्र ही आगे  की पंक्तियों से खुलासा हुआ – कि स्मगलर  और हीरे के मध्यम से  स्तनों को हीरा  ज़रूर कहा गया लेकिन ‘अवैध हीरे’’  जिन्हें रखना खतरे से खाली नहीं , जो अवैध  व्यापार  द्वारा हासिल किए जाते है ! अब आप ही सोचिए यह क्रिमिनल टाइप  की उपमा – शरीर  में सहज रूप से विकसित ‘ममता के, स्त्रीत्व के  प्रतीक’ के लिए शोभनीय है ? वे जो शिशु और माँ के बीच प्रगाढ़ रिश्ते का आधार होते हैं,  जीवन स्रोत होते हैं – ‘दूध का क़र्ज़ चुकाना है, माँ के दूध  की कसम,  माँ का दूध पिया है तो सामने आ (ताकत और चुनौती का प्रतीक)  इन उक्तियों  के उत्स हैं,  उन्हें  ये इस तरह हिकारत की नज़रों से देख रही  हैं कि जैसे वे सच में  स्मगल्ड हों ! जिन्हें वे इतने वर्षों तक धरोहर  की  तरह सहेजती रहीं ! लेकिन कैंसर  लगे चमक खो देने  वाले हीरों को तो  ‘स्मगलर डान’ भी नहीं लेगा – जिसकी वो अमानत थे ! वो इनसे  लगे हाथ अगर यह पूछ ले  कि इन्हें कैंसर कैसे लगा , इन  हीरों की चमक  कहाँ  उड़ा दी  गई ?  सम्हाल के नहीं रखा  गया इस धरोहर को, तब क्या  होता? अनामिका जी नारी होकर इतनी संवेदना हीनं करुणा विहीन कविता  ‘ब्रेस्ट कैंसर’ जैसे गंभीर विषय पर कैसे लिख सकी, मैं तो यह सोचकर हैरत में हूँ ! उनकी कविता में न तो कैंसर के प्रति क्षोभ, न रोगग्रस्त अंग के प्रति  ममता,  अपनेपन का भाव,  कैसर द्वारा उसे छीन लिए जाने पर, न अवसाद, न निराशा, उलटे उत्सव का भाव,  हँसी, ठिठोली है ! समूची कविता में नज़र आती है तो पुरुष वादी मांसल नज़र,  स्थूल दृष्टि , वैसी ही शब्दावलि, !  अंत  की पंक्ति  में वे कहती हैं  - ‘मेरी स्मृतियाँ ‘वे कौन  सी  स्मृतियों की बात कर रही हैं – जो दस वर्ष की उम्र से उनके ज़ेहन में उरोजों के साथ –साथ उभरी थी और तब से वे उनसे पीछा छुडाने को आतुर थी, सिस्टम से बाहर करने  को  बेचैन थीं ?क्योंकि विकसित होने पे  उरोज स्मगल्ड हीरे बन गए थे जिन्हें छुपाना  मुश्किल हो रहा था – कितनी बेतुकी उपमा है यह !‘दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया’ - इससे कवयित्री  का क्या तात्पर्य  है ? इसका ज़रा खुलासा करें वें  !  ममता की स्मृतियों को दूध पिलाया  कहा  होता; तो एकबारगी बात गले उतरती , एक सलोना सुंदरा बिम्ब भी बन कर आता ! इसी तरह  दूध की  नदियाँ बहा दी’...यह भी बड़ी उग्रवादी  सी  अभिव्यक्ति लगी !  जैसे दुश्मन का सर, हाथ पैर काट कर कोई खून की नदियाँ बहा दे और फिर गर्व से कहे कि मैंने  दुनिया के लिए खून की नदिया बहा दी  और सबका भला किया ! इस तरह कि उक्तियाँ अभिव्यक्तियाँ तो वीर रस, रौद्र रस  की कविताओं में शोभा देती हैं  लेकिन वक्ष स्थल से दूध की नदियाँ  बहा दी – इससे एक विचित्र  सा विरोधी बिम्ब बनता है बल्कि बनता भी नहीं, बनते-बनते पीछे लौट जाता है !

ऐसा है कि कविता जब उचित बिम्ब न बना सके, भावों को न जगा सके , सकारात्मक सोच  स्पंदित न कर सके, शीर्षक के साथ तालमेल में  न हो – ‘ब्रेस्ट कैंसर ‘ इन दो शब्दों में से ब्रेस्ट के ही ऊपर अधिक नज़र हो,  कैसर के ऊपर नाम मात्र की पंक्तियां हों – रोगी के अवसाद , दुःख, कष्ट, पीड़ा की तस्वीर  दिल में न बना सके , तो  वह कविता नही अपितु अनर्गल, अर्थहीन  प्रलाप होता है ! पवन करण और अनामिका जी  की कविता इसी श्रेणी  में आती हैं !
पवन करण और अनामिका जी की  एक गंभीर विषय पर ऎसी उथली, छिछली  और भोंडी कविताओं को पढ़ कर मेरा दिल अवसाद और चिंता से भर गया कि  यह कैंसर रोग  अब शीघ्र ही  साहित्य को लगने वाला  है और साहित्य में भी इसने  सबसे पहले  ‘कविता कामिनी’ को बेदर्दी  से धर दबोचा है ! साहित्य के महावैद्यों से अपील है कि वे अविलम्ब  कविता में लगने वाले इन जालों  की  रोक थाम  के उपाय करें; वरना  धीरे - धीरे यह कैंसर रोग कविता से होता हुआ सम्पूर्ण साहित्य में लग जाएगा !

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पाठकों के सुझाव और मांग पर  अनामिका और पवन करण की आलोच्य कविताएं नीचे प्रस्तुत हैं:


ब्रैस्ट कैंसर
 अनामिका

दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने
हाँ,बहा दी दूध की नदियाँ , तब जाकर
मेरे इन उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में जाले लगे !      
कहते हैं महावैद्य खा रहे हैं मुझको ये जाले
और मौत की चुहिया मेरे पहाड़ों में इस तरह छिपकर बैठी है
कि यह निकलेगी तभी, जब पहाड़ खोदेगा कोई
निकलेगी चुहिया तो देखूंगी मैं भी
सर्जरी की प्लेट में रखे, खुदे - फुदे नन्हे पहाड़ों से
हँस कर  कहूँगी – हैलो, कहो, कैसे हो ? कैसी रही ?
अंतत: मैनें  तुमसे पा ही ली छुट्टी
 दस बरस की उम्र से तुम मेरे पीछे पड़े  थे
अंग-संग  मेरे लगे ऐसे
दूभर हुआ सड़क पर चलना !
 बुलबुले, अच्छा हुआ फूटे !
कर दिया  मैंने तुम्हें अपने सिस्टम के बाहर
s मेरे ब्लाउज में छिपे मेरी तकलीफों के हीरे
हेलो, कहो, कैसे हो ?
जैसे कि स्मगलर  के जाल में ही बुढा गई लड़की
 करती है कार्यभार पूरा अंतिम वाला
 झट अपने ब्लाउज से बाहर किए
और मेज़ पर रख दिए अपनी  तकलीफ  के हीरे !
अब मेरी कोई नहीं लगती ये तकलीफें
तोड़ लिया है उनसे अपना रिश्ता
जैसे कि निर्मूल आशंका के सताए, एक कोख के जाए,
तोड़ लेते हैं सम्बन्ध 
और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है !  
जाने दो, जो होता है, सो होता है,
मेरे किए जो हो सकता था, मैंने किया
दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने
हाँ,बहा दी दूध की नदियाँ , तब जाकर
मेरे इन उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में जाले लगे !
लगे तो लगे, उससे क्या  !
दूधो नहाएँ  और पूतों फलें
मेरी स्मृतियाँ !  

-0-0-0-0-   

स्तन

 पवन करण

इच्छा होती है तब वह धंसा लेता है
उनके बीच अपना सिर
और जब भरा हुआ होता है तो
उनमें छुपा लेता है अपना मुँह
कर देता है उसे अपने  आँसुओं से तर
वह उससे कहता, तुम यूँ  ही बैठी रहो सामने
मैं इन्हें जी भर के देखना चाहता हूँ
और तब तक उन पर आँखें गडाये रहता
जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से
या लजा कर अपन हाथों से छुपा नहीं लेती उन्हें
अंतरंग क्षणों में उन दोनों को   
हाथों में थाम कर उससे कहता है
ये दोनों तुम्हारे पास  अमानत हैं मेरी
मेरी खुशियाँ , इन्हें सम्हाल कर रखना      
वह इन दोनों को कभी शहद के छत्ते
तो कभी दशहरी आमों की जोडी कहता
 न बहस, ना उनके बारे में उसकी बातें
सुन-सुन कर  बौराई
वह भी जब कभी खडी होकर आगे आईने के
इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती
वाकई कई दफे सोचती
इनदोनों को एक साथ उसके मुँह में भर दे
और मूँद ले अपनी आँखें
वह भी घर से निकलती इन दोनों पर   
डाल ही लेती अपनी निगाह
ऐसा करते हुए हमेशा उसे कालेज में
पढ़े बिहारी याद आते
उस वक्त इनके बारे में
सुने गए का नशा सा हो जाता दोगुना
वह उसे कई दफे सबके बीच भी
उनकी तरफ कनखियों से देखता पकड़ लेती
वह शरारती पूछ भि लेता सब ठीक तो है
वह कहती हाँ जी हाँ  
घर पहुँच कर जाँच लेना
मगर रोग ऐसा घुसा उसके भीतर
कि उनमें से एक को लेकर ही हटा देह से
कोई उपाय भि ना था सिवा इसके
ओपचार ने उदास होते हुए समझाया
अब वह इस बचे हुए के बारे में कुछ नहीं कहता उससे
वह उसकी तरफ देखता है
और रह जाता है कसमसा कर मगर
उसे है समय महसूस होता है
उसकी देह पर घूमते उसके हाथ
क्या ढूंढ रहे हैं कि उस वक्त वे
उसके मन से भी अधिक मायूस हैं
उसे खो चुके एक के बारे में भले ही            
एक-दूसरे से न कहते हों वह कुछ
मगर वह विवश जानती है
उसकी देह से उस, एक के हट  जाने से
लिटाना कुछ हट गया उनके बीच से !  
 -0-0-0-0-



डॉ. दीप्ति गुप्ता

शिक्षा: आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी) एम.ए. (संस्कृत), पी.एच-डी (हिन्दी)
रुहेलखंड विश्वविद्यालय,बरेली, हिन्दी विभाग  में अध्यापन (1978 – 1996)

हिन्दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली में अध्यापन  (१९९६ -१९९८)

हिन्दी विभाग, पुणे विश्वविद्यालय में अध्यापन (1999-2001)

विश्वविद्यालयी नौकरी के दौरान, भारत सरकार द्वारा, १९८९ में  मानव संसाधन विकास मंत्रालय’, नई दिल्ली में शिक्षा सलाहकार पद पर तीन वर्ष के  डेप्युटेशन पर नियुक्ति (1989- 1992)
सम्मान : Fannstory.com – American   Literary  site   पर English Poems  ‘’All Time Best’  ’से  सम्मानित.

प्रकाशित कृतियाँ :

1. महाकाल से मानस का हंस सामाजिक मूल्यों और आदर्शों की एक यात्रा, (शोधपरक - 2000)
2. महाकाल से मानस का हंस तत्कालीन इतिहास और परिस्थितियों  के परिप्रेक्ष्य में,     (शोधपरक -2001)
3. महाकाल से मानस का हंस जीवन दर्शन, (शोधपरक 200)
4. अन्तर्यात्रा ( काव्य संग्रह - 2005),
5. Ocean In The Eyes ( Collection of Poems - 2005)
6. शेष प्रसंग (कहानी संग्रह -2007),
7.  समाज और सँस्कृति के चितेरे अमृतलाल नागर, (शोधपरक - 2007
8. सरहद से घर तक   (कहानी संग्रह,   2011),
9.  लेखक के आईने में लेखक संस्मरण संग्रह शीघ्र प्रकाश्य
 
अनुवाद : राजभाषा विभाग, हिन्दी संस्थान, शिक्षा निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली, McGrow Hill Publications, New Delhi,  ICSSR, New Delhi,  अनुवाद संस्थान, नई दिल्ली, CASP  Pune, MIT  Pune,    Multiversity  Software  Company   Pune,    Knowledge   Corporation  Pune,   Unicef,  Airlines,  Schlumberger   (Oil based) Company, Pune   के लिए अंग्रज़ी-हिन्दी अनुवाद  कार्य !

अगस्त, २०११ में  साकेत, दिल्ली से १४ भाषाओं में प्रकाशित ‘द संडे इंडियन’ पाक्षिक पत्रिका द्वारा  भारत और विदेश में बसी हिन्दी साहित्य के उत्थान और विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली सर्वश्रेष्ठ लेखिकाओं में चयनित !

सम्प्रति पूर्णतया रचनात्मक लेखन को समर्पित  और पूना में स्थायी  निवास !
मोबाइल : 098906 33582
  
ई मेल पता: drdeepti25@yahoo.co.in

20 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

प्रिय दीप्ति

मेरा अनुमान है कि तुम मुझसे उम्र में छोटी हो अतः ' जी' नही लिखा आशा करती हूँ तुमको बुरा न लगेगा ,
मैंने पूरा लेख बहुत ध्यान से पढ़ा और मैंने अनामिका जी की कविता कहीं पढ़ी भी थी , सच मानिए पढ़ कर विरक्ति सी हुई और मुहँ का स्वाद कसैला हो गया फिर सोचा 'आधुनिक युग की रचना है , शायद मेरी समझ से बाहर है अतः जिस प्रकार कोई बेस्वाद पकवान को छोड़ देता है वैसे ही मैंने उसे सरसरी निगाह से पढ़ा और त्याग दिया । जिस प्रकार अरुचिकर टीवी चैनल बदल लेते हैं या फिर रेडियो पर भौंडा संगीत सुन कर रेडियो बंद कर देते हैं इसी प्रकार उपरोक्त कविताएं मैं नही पढ़ती । मैंने सिर्फ एक कविता पढ़ी थी वो भी अनमने मन से , सच कहूँ तो मैंने सोचा कि मेरा साहित्यिक ज्ञान उथला है ।
शारीरिक रचना के चलते नारी की अवहेलना हमें कतई स्वीकार नही , फिर वो चाहे साहित्य में हो या अन्य कहीं और । तुमने सही कहा , सत्यम , शिवम सुन्दरम का ह्रास नही होना चाहिये कम से कम लेखन में तो नही
आज की त्रासदी यही है , कि , आधुनिकता के नाम पर एनेको भद्दे मनोरंजन परोंसे जा रहे हैं और लोग उसे चटकारे ले कर चाट भी रहें हैं और हमारे जैसे पिछड़े वर्ग में गिने जाते हैं । कहने को तो बहुत कुछ है , पर संक्षिप्त में इतना कहूंगी कि, इस प्रकार के लेखन का विरोध करना आवश्यक है , किन्तु मेरी एक जिज्ञासा है , जिन को अनामिका जी ने कविता भेटं की थी उनकी क्या प्रतिक्रिया थी ?
मधु (अहमदाबाद)

बेनामी ने कहा…

आदरणीया दीप्ति जी,


आपका ओजस्वी आ लेख "कविता को लगा कैंसर" पढ़ा. आपने जिस साहस और सुलझे ढंग से साहित्य में 'विकृति' को चुनौती दी है, वह बेहद सराहनीय है. इसे साहित्य जगत सदा याद रखेगा. मैंने एक माह पूर्व 'कथादेश' में शालिनी जी का भी सुगठित आलेख पढ़ा था और मुझे बहुत पसंद आया था. उसी श्रृंखला में आपका यह आलेख, संवेदनाओं को जगाता इन कवियों के बारे में बहुत कुछ सोचने को विवश करता है. मेरा तो यह मानना है कि जब अनामिका और पवन करण छिछला और अश्लील साहित्य रचने का दुस्साहस कर सकते हैं, तो आप जैसे संवेदनशील, निष्पक्ष और मूल्यपरक रचनाकार उनके उस भावहीन, संवेदनाओं से परे कामुकता का आव्हान करते साहित्य का विरोध करने का, उस पर आपत्ति जताने का साहस निश्चित ही जोरदार ढंग से कर सकते हैं और क्यों न करें. सामने अन्याय होते देख कर खामोश रहना, परोक्ष रूप से अन्याय में भागीदारी ही मानी जाती है. अन्याय इंसान के साथ हो या साहित्य के साथ, अन्याय तो अन्याय होता है. आपने बहुत ही सधी हुई तेजस्वी भाषा में भ्रष्ट लेखन और उसके सर्जको पर करारी चोट की है. इनके जैसे लोग निरुत्तर होने पर अपनी एक भीड़ इकठ्ठी करके, अपने बचाव में उलटी-सीधी आदर्शवादी बाते किया करते या फिर विरोध करने वालों पे कीचड उछाला करते हैं. किन्तु आप और शालिनी जी अपने लक्ष्य पर अडिग रहिएगा. कहने की ज़रूरत नहीं, आपके विचार, आपकी संवेदनाएँ, आपकी आहत भावनाएँ जानकर मैं तो साथ हूँ ही, साथ ही, स्वच्छ और स्वस्थ सोच वाले अन्य सब लोग भी आपके साथ खड़े होगें.

अनेक शुभकामनाओं के साथ...

सादर
प्रताप

बलराम अग्रवाल ने कहा…

डॉ॰ दीप्ति गुप्ता ने अत्यन्त विचारणीय लेख लिखा है। बड़ी बात यह है कि उन्होंने, विशेषत: समकालीन कविता में प्रयुक्त हो रहे कुछ बिम्बों और प्रतीकों की नकारात्मक भाव-भंगिमा पर उँगली रखी है जो बेहद ज़रूरी है। कुछ कवि और उनके स्तर के ही आलोचक भी इस अक्षमता को बिम्बों/प्रतीकों के अर्थों की 'रूढ़ियाँ' तोड़ने की कवायद भी सगर्व घोषित कर सकते हैं। मैंने अभी तक पवन करण या अनामिका की संदर्भित कविताएँ नहीं पढ़ी हैं, लेकिन डॉ॰ गुप्ता की समीक्षा पढ़कर 'स्तनों' के प्रति अनामिका का दुराव उनमें प्रकारान्तर से 'शिश्न कॉम्प्लेक्स' की ओर इशारा करता प्रतीत होता है। इस लेख के तुलनात्मक आकलन की दृष्टि से, क्या ही अच्छा होता कि सन्दर्भित दोनों कविताएँ भी 'रचना समय' के इस अंक में पाठकों को उपलब्ध रहतीं।

जनविजय ने कहा…

बेहतर होता कि लेख के साथ कविताएँ भी दी जातीं।

बेनामी ने कहा…

Respected Chadel Ji

Dr. Deepti's article is very good and adds to my article. My article has also received a lot of attention and support from readers, Deepti ji's article is also attracting attention.

Thanks for publishing such a wonderful article.
With best wishes

Shalini Mathur

बेनामी ने कहा…

आ.चंदेल जी ,
विचारोत्तेजक लेख पढवाने के लिए आपको बधाई |
पहिले भी इसी विषय पर शालिनी माथुर जी का बड़ा संयत और साहित्यिक गरिमा से पूर्ण लेख पढने को मिला था | तब भी मैंने पवन करण जी की कविता का एक अंश ( कवि के सोच और सरोकार को दर्शाने हेतु ) प्रस्तुत किया था ,मैं ई-कविता के पाठकों के लिए पुनः प्रस्तुत कर रहा हूं |
" भरोसा ,
अब भी मौजूद है ,
नमक की तरह ----
अब भी
पेड़ के भरोसे पक्षी सब कुछ छोड़ जाते हैं ,
वसंत के भरोसे वृक्ष बिलकुल रीत जाते हैं ,
पतवारों के भरोसे नाव समुद्र लाँघ जाती है ,
बरसात के भरोसे बीज धरती में समा जाते हैं |
अनजान पुरुष के साथ ,
स्त्री चल देती है ,
सदा के लिए ,
भरोसा ,
अब भी मौजूद है ,
नमक की तरह --- " _ पवन करण
सादर ,
महिपाल सिंह तोमर , १ २ अगस्त २० १२

बेनामी ने कहा…

आदरणीय चन्देल जी,
डॉक्टर दीप्ति गुप्ता का आलेख पढ़ा l ऐसा आलेख सही मायने में समाज को एक आइना दिखाता है l
ऐसा जनजागृति आलेख लिखने के लिए उन्हें बधाई l
सादर,
कुसुम वीर

बेनामी ने कहा…

मेरी स्वर्गीय पत्नी कैंसर की रोगी थीं. वे हार गयीं, मैं भी हार गया. मैंने उन्हें तड़पते देखा है और अंतिम समय में किस प्रकार वे एक एक सांस के लिए संघर्ष कर रही थीं इसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता. यदि ये दो तथाकथित कवि मेरे सामने आजायें तो उनकी गर्दन दबाने की अपनी मनोकामना पूरी करना चाहूँगा. इस समय यह संभव नहीं है. मेरी हार्दिक इच्छा है कि ये दोनों कैंसर से मरें! कृपया मेरा यह सन्देश उनतक पहुंचा दें. धन्यवाद!
महेंद्र दवेसर 'दीपक' (यू.के.)

बेनामी ने कहा…

प्रिय रूप जी ,
मेरी यह टिप्पणी `रचना समय` में शामिल कीजियेगा.
अब कविता में तो क्या कहानी-उपन्यास में भी अश्लीलता ने पाँव पसार लिए हैं. यह सब सस्ती लोकप्रियता को पाने के लिए हो रहा है. सुखद बात है कि हिन्दी साहित्य में फैल रही अश्लीलता की रोक-थाम के लिए शालिनी जी और दीप्ति गुप्ता जी जैसी सुसंस्कृत व मर्यादित विचारों की महिलायें सामने आ रही हैं, उनके कन्धों से कंधे मिलाने
वाले रूप सिंह चंदेल जी जैसे मूर्धन्य लेखक भी हैं.
वह साहित्य किस काम का, जो माँ-बाप व भाई-बहन से छिप कर पढ़ा जाता है. सच बात तो यह है कि अश्लील रचना को पढ़ने-लिखने से पहले अश्लीलता की वकालत करने वालों की नज़रें भी एक बार शर्म के मारे झुक जाती हैं.
प्राण शर्मा

ashok andrey ने कहा…

aaj jis tarah se kavita men lekhak log kavata ke nam par ghalmel kar rahe hain kaphi chinta ka vishay ban gaya hai. Dr Deepti jee ne bahut gambhir baat karke is vishay par sargarbhit lekh likh kar sabhi ko naye sire se sochne ke liye majboor kar diya hai. samay rehte is par agar thos kadam nahin uthaya gayaa to bahut kuchh kudaa bhee dekhne tatha padne ko milega jo ki ashobhniya hoga poore samaj ke liye.unke is sargarbhit lekh ke liye badhai deta hoon kam se kam unhone achchha lekh likh kar sab ko ek baar phir sochne ke liye disha dee hai.

बेनामी ने कहा…

मित्रो!

दीप्ति जी का ‘कविता को लगा कैंसर ’ लेख पढ़कर तो सचमुच रौंगटे खड़े हो गए. काव्य शास्त्र में नवरसों की बात लिखी गई है, जिसमें एक रस है वीभत्स रस जिसे नाट्यशास्त्र में वर्जित रखा है, काव्य में भी इस प्रकार के वर्णन केवल युद्ध-वर्णनों में ही आए हैं, परन्तु लगता है कि नया कुछ प्रस्तुत करने के चक्कर में हमारे साहित्यकर्मियों ने इसे अजमाया है और श्रृंगार का ऐसा वीभत्स चित्र खींचा है. शृंगार में वीभत्स का ऐसा मिश्रण करके क्या वे वाह-वाही लूटना चाहते हैं ? सबसे अधिक आश्चर्य तो यह है कि यह रचनाएं किसी नौसीखिए या आज की पीढ़ी के रचनाकार की नहीं, प्रौढ़ , अनुभवी, हमारी भारतीय संस्कृति में रचे-बसे और साहित्य जगत के प्रतिष्ठित कवियों की है. सच पूछा जाए तो मुझे इसमें विदेशी संस्कृति के अनुरूप लिखी किसी विदेशी भाषा में लिखी कविता के अनुवाद की बू आ रही है.

दीप्ति, आपका कहना शत-प्रतिशत सही है कि ऐसी कवितायेँ हमारे साहित्य का अंग नहीं बन् सकतीं और यदि बनती हैं तो यह कैंसर का बीज बोने जैसा होगा, अत: हमें सजग होना होगा और इस प्रकार की रचनाओं का हर स्तर पर निष्कासन कर देना चाहिए और इन्हें किसी भी प्रकार की प्रशंसा से दूर रखना चाहिए .

क्या हमारा हिन्दी साहित्य भाव-विहीन, विषय-विहीन हो गया है? या फिर हमारे साहित्यकारों ने संवेदनशीलता खो दी है? हमारा प्राचीन हिन्दी साहित्य आज भी विश्व में अपनी अस्मिता और गौरव बनाये हुए है, यदि हमारे साहित्यकार भाव-शून्य हो गये हैं, उनके अपने मौलिक प्रतिमान लुप्त हो गये हैं तो वे प्राचीन संस्कृत-साहित्य को ही अनुवादित कर दें, हिन्दी साहित्य भी गौरवान्वित हो जाएगा, परन्तु प्लास्टिक संस्कृति का यह कूड़ा हिन्दी साहित्य में इकट्ठा न करें, वरना प्लास्टिक की भांति यह भी समस्या पैदा कर देगा, ना रखा जाएगा न ही फैंका जायेगा. दीप्ति जी और शालिनी जी के इन लेखों ने एक बड़ी चेतावनी हमें दी है, जिस पर हमें गहराई से चिंतन करना होगा और ऐसे साहित्य के विरोध में जंग छेड़नी होगी और केमो-थेरिपी की स्थति से पूर्व ही इस बीज-कैंसर का इलाज करना होगा.

आप सभी साहित्यकारों से मेरा भी अनुग्रह है कि आप भी इन कविताओं को पढ़कर, दीप्ति और शालिनी के लेखों को समझते हुए अपनी प्रतिक्रया अवश्य दें.

हिन्दी साहित्य के उज्ज्वल, स्वस्थ भविष्य की कामना करते हुए—

शुभेच्छुक

मंजु महिमा.

बेनामी ने कहा…

दीप्ति जी ,
आपके लेख को मैं बड़े मनोयोग से पढ़ गया हूँ . आपने बिलकुल सही लिखा है कि कविता
को कैंसर लग गया है . कविता तो क्या , अब तो यह रोग कहानी व उपन्यास को भी अपनी जकड में ले रहा है . ऐसे कैंसर से ग्रस्त लेखन को परिवार के सभी सदस्य मिल कर नहीं पढ़ सकते हैं . कला
या साहित्य का सबसे बड़ा धर्म सत्यम , शिवम् और सुन्दरम है . मानसिक आनंद का संचार इन्हीं
उदात्त भावनाओं से सम्भव है . गला - सड़ा साहित्य कुत्सित विचारों को जन्म देता है . ऐसे साहित्य
से व्यक्ति , समाज और देश को बचना चाहिए . मैं आपके विचारों से सहमत हूँ और आपकी आवाज़
के साथ अपनी आवाज़ मिलाता हुआ ` नंगे साहित्य ` की भर्त्सना करता हूँ .
प्राण शर्मा (लन्दन)

बेनामी ने कहा…

आश्चर्य है कि अनामिका और पवन करण जी को अपनी कविताओं की खामियां, अपसंस्कृत भाषा और भाव नज़र नहीं आ रहे ? क्यों आएगें, जब उन्हें कैंसर पीड़ित का दर्द ही नज़र नहीं आया. औरत होकर अनामिका महोदय मातृत्व के प्रतीक स्तनों का मजाक बना रही हैं उन्हें बला कह रही हैं. पवन जी की तो बात ही करनी व्यर्थ है. उनकी कविता तो साफ़ कामुकता मन में जगाती है. इन लोगों को शर्म आनी चाहिए. दीप्ति जी आपने सही मुद्दा उठाया और साहित्य की गरिमा को बचने हेतु कटिबद्ध हो गई. इस जंग में हम आपके साथ हैं. इनके जैसी छिछोरी कविता कहानी - लिखने वाले सदा से काल के गाल में समाते रहे हैं और उदात्त लेखन करने वाले महादेवी, प्रसाद, गुप्त. निराला की भांति कालजयी हो जाते हैं.

सादर,
मुकेश

बेनामी ने कहा…

दीप्ति जी,

आपकी कलम और साहित्यिक भावना को सलाम !
मैं तो आपका विचारशील आलेख पढ़ कर दंग रह गया. आपने कितने सलीके से तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए , अनामिका जी और पवन जी की बेढब कविताओं के तथ्यों को प्रस्तुत किया है. महिया हो या पुरुष. जो भी अशिष्टता और अभद्रता दिखाएगा - चाहे लेखनी से या मुँह से - उसे शालीन एयर सुलझे हुए लोगों की बातों पर अपने और समोचे साहित्य जगत व समाज के लिए ध्यान तो देना पडेगा. वरना अच्छाई और बुराई की जंग और सघन होती जाएगी. राम ने पहले उसके गलत कार्य के लिए रावण को प्यार से ही फटकारते हुए समझाया था, वह अपने दंभ के थोथे मद में नहीं मना तो सबको पता ही है कि उसे कैसी पराजय झेलनी पड़ी.

मैं और मेरे तमाम साथी आपके विचारों से तहेदिल से सहमत हैं और साथ हैं. हम साहित्य केर नाम पर गंद नहीं फ़ैलने देगें .

कनु एवं साथी

बेनामी ने कहा…

दीप्ति जी,

आपका तर्कपूर्ण औचित्य से भरा हुआ आलेख 'कविता को लगा कैंसर' पढ़ा. बहुत ही अच्छा और अकाट्य तथ्यों लबरेज है. मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ कि साहित्य के नाम पर अभद्र भाषा और बेतुके विचारों को कविता के नाम पर पेश करने वाले अनामिका और पवन करण जी सरीखे साहित्यकारों को आइना दिखाया जाना चाहिए. आपने ठीक किया . साहित्य की रक्षा आप जैसे सुधीजन ही करेगें.
आपको या हमे इनसे कोई व्यक्तिगत दुश्मनी तो है नहीं , ये ऐसा आपत्तिजनक लेखन करेगें और ऊपर से उसे जिद पे अड़े रहकर उसे न्यायसंगत ठहरायेगें तो, दूसरे साहित्यकार और पाठक भी इतने तो अक्ल से पैदल नहीं है कि इनकी हाँ में हाँ मिलाने लगेगें. अनामिका जी एक संभ्रांत महिला हैं शायद किसी जगह पढाती हैं , शिक्षिका होकर तो उन्हें वैसे भी अपनी भाषा और रचना को मांज कर प्रस्तुत करना चाहिए.
पवन करण हो या अनामिका लेखक होने सा के साथ इनकी सामजिक जिम्मेदारी भी बनती है. सामाजिक और साहित्यिक जिम्मेदारी से रहित इन दोनों को समझना चाहिए कि उनका दायित्व क्या है ?

आपके उत्कृष्ट आलेख के लिए बधाई,

शिशिर साराभाई

Santosh Bhauwala ने कहा…

आदरणीय दीप्ती जी,
आपका आलेख पढ़ा I आज समाज को ऐसे आलेखों की बहुत जरूरत है I
"साहित्य समाज का दर्पण होता है" अच्छा साहित्य ही अच्छे समाज का निर्माण कर सकता है अस्तु ...
अनामिका और पवन करण की कवितायों की मै भत्सर्ना करती हूँ I
सादर
संतोष भाऊवाला

Kamal ने कहा…

आ० चंदेल जी द्वारा उधृत पवन करण की कविता " स्तन "और अनामिका की ' ब्रेस्ट कैंसर "पढीं और मन ग्लानि से भर उठा कि क्या आज का कवि इतना पतित हो चुका है कि ऐसी फूहड़, असंवेदनशील, तथा अश्लील रचनाओं तक
उतर आया है ? दीप्ति जी और शालिनी जी ने अपने आलेख में विस्तार के साथ इस अश्लीलता का मुँहतोड़ जवाब दिया है |इसके लिये उनकी जितनी भी पशंसा की जाय कम है | कुछ
कवियों में सेक्स और अश्लीलता कविताओं में भरने का फैशन सा चल पड़ा है और यदि शीघ्र इसका उपचार नहीं किया जाता तो हिंदी कविता की गरिमा, संवेदन और शालीनता को बट्टा
लग जायगा | महिला होकर भी अनामिका द्वारा इतनी अश्लील कविता से स्तब्ध हूँ | सभी रचनाकारों को एक जुट हो कर दीप्ति जी एवं शालिनी जी द्वारा उठाये गये विरोध-अभियान
को सफल बनाने हेतु ऐसे घटिया कविओं का पूर्ण बहिष्कार कर साहित्य की धारा को निर्मल करने में जुटना चाहिए |
कमल - ahutee@gmail.com

बेनामी ने कहा…

अनामिका और पवन करण की दोनों कवितायेँ पढ़ी !
इसे लोग ‘कविता’ कहते हैं, और इनकी समीक्षाएं/आलोचनाएँ लिखने में इतना वक़्त भी जाया करते हैं | हैरान हूँ …, और अफ्सोस्ज़दा भी | साहित्य के नाम पर गन्दगी को परोसा जा रहा है | उस पर कवि होने का दावा भी | इनकी अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं क्या ?
दीप्ति, तुम्हें शाबाश है कि इन्हें आईना दिखाने के लिए अपना अमूल्य समय आलोचना को दिया, और ऐसी बेहूदा चीज़ को चर्चा का विषय भी बना दिया | वर्ना मैं तो इसे किसी कूड़े की तरह बिल्कुल नक़ार ही देता |
ललित

बेनामी ने कहा…

मैंने समीक्षा का आशय समझा. दीप्ति जी ने सही प्रश्न किया है .अनामिका की कविता में केंसर ग्रस्त स्त्री का दर्द नहीं महसूस होता है फिर भी उसे अपने कथ्य के कारण साहित्य की श्रेड़ी में रक्खा जा सकता है .पवन करण ने तो अपनी कविता में भद्दा व मादक मज़ा लिया है जिसकी कटु आलोचना होनी चाहिए .जो साहित्य नहीं, फूहड़ता का प्रतीक है .मेरी अपनी कहानी ``अब और सनबर्न नहीं चाहिए ``भी स्तन केंसर ग्रस्त स्त्री और उसके परिवार की पीड़ा के इर्द गिर्द है ,यह `विपाशा `में प्रकाशित होने वाली है. नवनीत मिश्र एक कोमल कथाकार हैं .उनकी एक कहानी में नायक बाथरूम में से आइना हटा लेता है जिससे उसकी पत्नी ओपरेशन के बाद अपना अधूरापन न महसूस करे .साहित्य का अर्थ ही है कि वह जीवन के हर रूप को इज्ज़त दे व जीने की प्रेरणा दे नाकि स्त्री अंगों का खुले आम मज़ा उडाये .

नीलम कुलश्रेष्ठ

बेनामी ने कहा…

यदि हम पूरे विश्व के देशों पर, उनके सभ्य, सुसंस्कृत और शिष्ट कलेवर पर एक सरसरी नज़र डाले तो भाषा, भाव और अर्थ जो किसी भी देश और उसकी संस्कृति का एक अहम हिस्सा होते हैं; उन्हें दृष्टि में रखते हुए - अमेरिका में, १९७२ में, George Carlin द्वारा अग्रेजी के ५० (लेकिन विशेषरूप से ७) उन शब्दों की सूची तैयार की गई, जिनका प्रयोग अमेरिकन टेलीविज़न, रेडियों और आम जनता में वर्जित माना गया और जो शिष्ट और संभ्रांत समाजम में प्रयुक्त नहीं होते ! बाद में U.S.Supreme Court ने भी उनके प्रयोग पर बाकायदा कानूनी मोहर लगाई ! इसी तरह जर्मनी में शिक्षित, सभी समाज में kunt, kootch आदि शब्दों के प्रयोग की वर्जना मान्य है ! ठीक इस वैश्विक संस्कृति के तहत, अपने देश में किसी को भी भंगी, चमार नहीं कहा जा सकता, पढ़े-लिखे लोगों की गोष्ठियों, मंचों, उनके भाषण, लेखन में अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं किया जा सकता , इतना ही नहीं, अश्लील, कामुक भावो को जगाने वाली, या हिंसा भडकाने वाली शब्दावाली चाहे वह मौखिक हो या लिखित - समाज की, देश की सुख - शांति को बनाए रखने के लिए, वर्जित है ! मतलब कि - इस तरह की भाषा और भाव, उक्तियाँ और अभिव्यक्तियाँ नैतिक, सामजिक, सांस्कृतिक और कानूनी - सभी दृष्टियों स 'अपराध'मानी गई है !
क्या आपत्तिजनक लेखन करने वालों को, फूहड़ कविताएं और कहानियाँ लिखने वालों को इतनी सी बात समझ नहीं आती ? नहीं आती तो, उनके लिए सद बुद्धि की कामना तो की जा सकती है !
God Fobid.......!! समझदार को इशारा काफी ! बच्चो को तो एकबारगी समझा भी लिया जाए लेकिन आयु, अनुभव और समझ में पके लोगों को समझना - 'पत्थर को गलाने' जैसा कठिन काम है !’

चिंतित,
दीप्ति