रविवार, 13 जुलाई 2008

कविता


दिव्या माथुर की कविताएं

पहला प्यार

‘मिट्टी पड़े
तेरे पहले प्यार पर’
कहा था अम्मां ने
इक बार दुखी होकर
और ब्याह दिया था
मुझे बिदेश
पर न तो समय
और न ही दूरी
कर पाये धूमिल
रंग रूप गंध
सभी तो ताज़ा हैं
मिट्टी पड़े
मेरे पहले प्यार पर।

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ऐत तहानी औल मम्मा

‘बहुत रात हो गई मुन्ना
बेटा अब तो तू सो जा’
‘बछ ऐत तहानी औल मम्मा
छुना बी दो ना’
अब मुन्ना बड़ा हो गया है
कहता है - मैं बहुत बोलती हूँ
मुन्ना ज़रा जल्दी चल
स्कूल को देर हो जायेगी
‘मम्मा मेले छोते छोते पाँव
मैं दल्दी दल्दी तैछे तलूँ?’
अब मुन्ना बड़ा हो गया है
कहता है कि
मैं बहुत ‘स्लो‘ हो गई हूँ
‘मम्मा, मुदे दल लदता है
तुमाले छात छोऊँदा तुमाली दोदी में’
अब मुन्ना बड़ा हो गया है
और उसके मुन्ने को चाहिये एक कमरा
उस बड़े से बूढ़ाघर में
मम्मा के नन्हे से प्राण अटके हैं
अपने मुन्ने की राह में।
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दायरा

इच्छा नहीं की
कहीं भागने की
न जीवन को ही
कोसा कभी
हल को कंधे पर साधे सदा
बस आँख झुकाए जुगाली की
रस्सी तुड़ाते
लात मारते
और किसी भी
दिशा भागते
सिर पर जब थे सींग लदे
क्यों झेले तुमने डंडे
आँख पर पी बँधवाए
क्यों रहे घिसटते जीवन भर
एक ही दायरे के भीतर
क्यों सदा लगाते रहे चक्कर
बेतुकी बात, न पैर न सिर
एक ज़रा से तेल की खातिर
बैल ने मुझे दो टूक जवाब दिया,
ये तुम कह रही हो?

क्या कीजे

ग़ुंचों की तबाही का क्या कीजे
आँधी की गवाही का क्या कीजे
अच्छे अच्छों के क़तर दे पर
उस तिरछी नज़र का क्या कीजे
गुदगुदी-सी करती है दिल में
उनकी गाली का क्या कीजे
सूखी की सूखी है चोली
ऐसी होली का क्या कीजे
कह तो दें हम, मासूम हैं वो
इस खून-अ-जिगर का क्या कीजे
पहलू में किसी के वो बैठे
इस बुरी खबर का क्या कीजे
मुस्काना तो चाहा था
बह निकले आँसू क्या कीजे
माशूक़ सभी के पहलू में
कोई जख़्म हमारे भी सी दे
पैरहन टँगा है खूँटी पर
पर उनके सब्र का क्या कीजे
जान के जाने पर जानी
मेरी जान गई तो क्या कीजे
उम्मीद पे इक जी सकते हैं
इस अगर-मगर का क्या कीजे
उनके दीदार को बैठे हैं
इस अपनी ग़रज़ का क्या कीजे।


0 झूठ -कुछ कविताएं


(1)मिज़ाज़्

है झूठ का अपना एक मिज़ाज़
यदि करनी पर आ जाए
तो ये करता नहीं लिहाज़
चाहे तो आलसी-सा
सदियों सोता रहे
पारे सा या फिर
झटपट पोल खोल दे!

(2)सबूत

तुम झूठे हो
मैं सच्ची
तुम सच्चे हो
मैं झूठी
क्या जीवन बीतेगा
यूं ही
सबूत इकट्ठा करते
अग्निपरीक्षा देते
संबंधों को स्थगित करते ?

(3)झूठ के भागीदार

झूठ और सच
एक ही सिक्के के
दो पासे हैं
मुंह खुलते ही
पचास प्रतिशत झूठ के
भागीदार तो हम
हो ही जाते हैं।

(4)अकेलापन

सोचती हूँ
सच बोलना छोड़ दूँ
कम से कम
अकेलापन तो जाएगा भर ।
अंतर में सुलगती रहे
चाहे अँगीठी
आत्मा की जली कुटी
सुनने से
कहीं बेहतर होंगी
दुनिया की बातें
मीठी मीठी।

(5)सज़ा

एक दो ज़ख्मों से सज़ा पूरी नही हो जाती
एक दो आंसुओं से
पीड़ा धुल नहीं पाती
झूठ अजर है, अमर है
झूठ को मौत नही आती!

(6)सती हो गया सच

तुम्हारे छोटे, मँझले
और बड़े झूठ
उबलते रहते थे मन में
दूध पर मलाई-सा
मैं जीवन भर
ढकती रही उन्हें
पर आज उफन के
गिरते तुम्हारे झूठ
मेरे सच को
दरकिनार कर गये
तुम मेरी ओट लिये
साधु बने खड़े रहे
और झूठ की चिता पर
सती हो गया सच।

(7) समझौता

एक अदृष्ट
समझौता है
परिवार के बीच
यदि मैंने ज़ुबान खोली
तो वे समवेत स्वर में
मुझे झुठला देंगे
तुम्हारे झूठ की
ओढ़नी में लिपटी
मैं खुद से भी
रहती हूँ छिपी।
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शिक्षा : एमए (अंग्रेजी) के अतिरिक्त दिल्ली एवं ग्लास्गो से पत्रकारिता में डिप्लोमा। आइ टी आई दिल्ली में सेक्रेटेरियल प्रैक्टिस में डिप्लोमा एवं चिकित्सा आशुलिपि का स्वतंत्र अध्ययन।कार्यक्षेत्र : रॉयल सोसायटी आफ आर्टस की फेलो दिव्या का नेत्रहीनता से सम्बंधित कई संस्थाओं में योगदान रहा हैं। वे यू के हिंदी समिति की उपाध्यक्ष कथा यू के की पूर्व अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन की सांस्कृतिक अध्यक्ष भी रही हैं। आपकी कहानियां और कविताएं भिन्न भाषाओं के संकलनों में शामिल की गई हैं। रेडियो एवं दूरदर्शन पर प्रसारण के अतिरिक्त इनकी कविताओं कहानियों व नाटकों का मंचन प्रसारण व ब्रेल लिपि में प्रकाशन हो चुका है। दिव्या जी को पदमानंद साहित्य एवं संस्कृति सेवा सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है। लंदन में कहानियों के मंचन की शुरूआत का सेहरा भी आपके सिर जाता है।प्रकाशित रचनाएं : ‘अंत:सलिला’ ‘रेत का लिखा’ ‘ख्याल तेरा’ ‘आक्रोश’ ‘सपनों की राख तले’ एवं ‘जीवन ही मृत्यु’.

संप्रति : नेहरू केन्द्र (लंदन में भारतीय उच्चायोग का सांस्कृतिक विभाग) में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी.

संपर्क : 3-A Deacon Road,London NW2 5NNE-mail : divyamathur@aol.com

4 टिप्‍पणियां:

तेजेन्द्र शर्मा ने कहा…

रूप भाई

दिव्या मेरी प्रिय साहित्यकार हैं। उनके साहित्य में सादगी, अपनापन, गहराई और ज्ञान का अद्भुत मिश्रण है। एक ही विषय को केन्द्र में रख कर दिव्या पूरा कविता संग्रह रचने की क्षमता रखती हैं। उनके कहानी संग्रह आक्रोश के लिये कथा यू.के. ने उन्हें पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया था। उनकी रचनात्मक यात्रा यूं ही चलती रहे, हमारी कामना है।

तेजेन्द्र शर्मा (लन्दन)

Amit K. Sagar ने कहा…

हर कविता प्रभावशाली. बहुत बढ़िया. आगे भी उम्मीद.
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यहाँ भी पधारे;
उल्टा तीर

योगेन्द्र कृष्णा ने कहा…

चंदेल जी, बहुत अच्छी कविताएं हैं दिव्या जी की। इसके पहले भी आपने बहुत ही अच्छी और सहज सादगी से भरी लेकिन अत्यंत प्रभावपूर्ण कविताएं पढवाई थीं इला प्रसाद जी की। दोनों ही कवयित्रियों को मेरी हार्दिक बधाई, और प्रस्तुति के लिए आपका आभार।

Mamta Swaroop Sharan ने कहा…

All poems by Divya Ji are masterpieces.

thoroughly enjoyed...