गुरुवार, 21 मई 2026
कहानी - बेटू
बेटू
उन्हें लगा जैसे दरवाजे के साथ रखी प्रैम उन्हें बुला रही है. “उठो, सोच क्या
रहे हो. बेटू को मुझ पर बैठाते क्यों नहीं! कब से मैं इंतजार कर रही हूं.”
‘बेटू---तुमने तो उसे जाते देखा था. शायद तुम ध्यान नहीं दे पायी थीं. पार्क में
घूमते हुए थक गयी होगी और सो गयी होगी. उस दिन बेटू को घुमाकर मैं जब लौटा तब के
बाद की घटनाओं की ओर भी तुम ध्यान नहीं दे पायी होगी. निश्चित ही तुम थक गयी थी.’
वह बुदबुदाए, “उसके अगले दिन बेटू मुझसे पांच सौ किलोमीटर दूर चला गया ---अपनी मां
के साथ. मैं समझ रहा हूं कि तुम्हें भी मेरी ही तरह बेटू से प्यार है. पिछले चार
महीने से मैं तुम पर उसे घुमा जो रहा था. छोटे बच्चों से किसी को भी, भले ही वह तुम
जैसी निर्जीव वस्तु ही क्यों न हो, प्यार हो ही जाता है.” वह फिर बुदबुदाए और
विचारों में खो गए. वह जब भी घूमने जाते, बेटू को उस प्रैम में साथ लेकर जाते.
घूमने के बाद कुछ देर बेंच पर बैठकर उससे बातें करते. दस महीने का बेटू कुछ-कुछ
बातें करने की कोशिश करता. सुबह धूप पार्क की हरी घास पर जब अपनी चादर बिछा देती,
वह प्रैम को एक ओर खड़ी करके बेटू को घास में बकइन चलने के लिए छोड़ देते. बेटू को
उनकी चप्पलों से बहुत प्यार है. वह घुटनों चलता हुआ चप्पलों की ओर लपकता. वह हंसते
हुए चप्पलें हटाकर दूसरी ओर रख देते. बेटू हंसता हुआ उधर भागता. वह फिर चप्पलों को
पहले स्थान पर रखते. बेटू फिर हंसता हुआ उधर दौड़ता. दादा-पोते का यह खेल देर तक
चलता रहता. वह सोचते कि दस महीने का बेटू यह समझता है कि वह उसे केवल उलझा रहे हैं.
जब बेटू इधर-उधर दौड़ता हुआ थक जाता, वह उसे गोद में लेकर प्यार करने लगते. लेकिन
बच्चे इतनी जल्दी थकते कहां हैं! पांच मिनट में ही बेटू गोद से मचलकर उतरता और
घुटनों के बल बैठकर प्रैम को धक्के देकर दूर तक ले जाता या दूर कबूतरों के झुंड को
देखकर घुटनों के बल दौड़ लेता. वह कुछ देर तक उसे कबूतरों की ओर दौड़ता देखते रहते,
फिर उठाकर उसे गोद में लेकर प्यार करते और प्रैम में लेकर लौट लेते. नवम्बर महीने
से हर दिन ऎसा हो रहा था. उस दिन भी बेटू के नाश्ता कर लेने के बाद वह उसे लेकर
पार्क में गए. धूप में गरमी थी, लेकिन इतनी भी नहीं कि टहला न जा सकता या कुछ देर
बैठकर दादा-पोता विटामिन डी न ले सकते. हर दिन की तरह चप्पलों के खेल और लॉन में
बेटू की दौड़ के बाद वह लगभग ग्यारह बजे घर लौटे. फ्लैट का दरवाजा खुला हुआ था.
दरवाजा खोलते ही उन्हें चीख-चिल्लाहट सुनाई दी. पुत्रवधू गायत्री शेरनी बनी बेटे
सरल पर चीख रही थी. बेटा भी चीख रहा था. प्रैम खड़ी कर उन्होंने लपककर दरवाजा बंद
किया, जिससे उन दोनों के चीखने की आवाजें दरवाजा लांघकर सामने के फ्लैट में प्रवेश
न करे. उन्होंने बेटू को प्रैम से उठाया, गोद में लिया और माजरा समझने के लिए
ड्राइंग रूम में हत्प्रभ से खड़े रहे. “मैंने आपको पहले ही कहा था कि मैं वैष्णों
देवी नहीं जाऊंगा. इसके बावजूद उन्होंने मेरा आरक्षण क्यों करवा दिया!” सरल कह रहा
था. “मत जाइए. लेकिन मैं जाऊंगी.” “आप जाइए, लेकिन बेटू नहीं जाएगा!” “वह मेरे साथ
जाएगा.” “बहू, बेटू बहुत छोटा है, पहाड़ों में गज़ब की ठंड पड़ रही है. कहीं कुछ---.”
“आप बीच में न बोलें. यह मेरे और मेरे हसबैंड के बीच की बात है.” गायत्री उतने ही
ऊंचे स्वर में बोली जितने ऊंचे स्वर में वह सरल से चीख रही थी. चीखने और सिर झिटकने
से उसके बाल बिखरे हुए थे. चेहरा विकृत हो रहा था. गायत्री के उत्तर से उन्हें
बिजली के हजारों वॉट के करंट-सा झटका लगा. उसने ऎसा दूसरी बार किया था. पहली बार भी
उसने ऎसा ही किया था. उन दिनों वह अपने मायके में थी. पिछले वर्ष की बात थी. इसका
मायका उस शहर में है जहां उनकी बहन रहती थी. बहन की मृत्यु पन्द्रह जनवरी को सुबह
चार बजे हुई. उन्हें सात बजे भांजे का फोन आया. उस समय वह फ्लैट्स के बाहर गैलरी
में टहल रहे थे. चारों ओर घना कोहरा और कड़ाके की ठंड थी. दरअसल वह हर मौसम में सुबह
साढ़े चार बजे जाग जाते हैं. ठंड में वह बाहर टहलने नहीं जा पाते, लेकिन कमरे में
बंद रहना भी नहीं चाहते इसलिए फ्लैट्स के बाहर गैलरी में ढाई-तीन हजार कदम चल लिया
करते हैं. भांजे ने बताया कि अंत्येष्टि दोपहर बारह बजे होगी. “बेटा घना कोहरा है.
सरल भी सो रहा है. उसे जगकर तैयार होने में एक घण्टा लग जाएगा. यदि हम आठ बजे भी
निकलेंगे तब भी अंत्येष्टि तक पांच सौ किलोमीटर की यात्रा तय कर पाना संभव नहीं
होगा.” “मामाजी, मैं जानता हूं. आप परेशान न हों. आपको सूचित करना आवश्यक था.”
“मुझे तेरहवीं के बारे में सूचना देना.” “जी मामाजी!” तेरहवीं की सूचना यथा समय
मिलने पर वह बेटे सरल के साथ एक दिन पहले अपनी गाड़ी से गए. गायत्री मायके में थी.
सरल ने गायत्री को सूचित कर दिया था कि हम आ रहे हैं. लौटते समय वह हमारे साथ लौट
आएगी. हमने यह भी तय किया कि हम सरल की ससुराल में ही ठहरेंगे और अगले दिन सुबह दस
बजे बहन के यहां जाएंगे. गायत्री और उसके पिता को हमारे आने का कारण मालूम था. हम
तीन बजे उनके यहां पहुंचे. भोजन के बाद हम आराम करने के बारे में सोच ही रहे थे कि
गायत्री सरल से बोली, “कल बारह बजे हमने सत्यनारायण की कथा का कार्यक्रम तय किया
है---आपको मेरे साथ बैठना होगा.” “आपको बताया था कि हम बुआ की तेरहवीं में आ रहे
हैं. कल वहां जाना है. मैं छोटा था तब फूफा से मिला था. यहां आकर भी उनसे नहीं
मिलूंगा तब---आपने बताया होता कि आपने ऎसा कोई कार्यक्रम निश्चित किया हुआ है---मैं
आपको मना करता.” “डैडी जी को जाने दीजिए. वहां घर के एक आदमी की उपस्थिति बहुत
होगी. आपको तो मेरे साथ बैठना ही होगा.” “सॉरी गायत्री. मैं डैडी के साथ जाऊंगा.
दुख की इस घड़ी में फूफाजी से नहीं मिला तो---.” कुछ रुककर सरल बोला, “आप इस
कार्यक्रम को निरस्त कर दें.” “बेटा, शादी के बाद सत्यनारायण की कथा बहुत जरूरी
होती है. आपने अपने घर नहीं सुनी, कोई बात नहीं. अब आप यहां हैं तो इसे न टालें. यह
नव-विवाहितों के लिए बहुत आवश्यक है.” गायत्री के पिता मिनमिनाते हुए बोले तो वह
चुप नहीं रह सके, “भाई साहब, सरल को न रोकें. आपकी और हमारी रिश्तेदारी दो साल पहले
हुई है. मेरी और मेरे बहनोई की रिश्तेदारी चालीस साल पुरानी है.” “अरे, आप भी कैसी
बातें करते हैं पंकज जी!” गायत्री के पिता फिर मिनमिनाए, “इतना शुभ कार्य सोचकर कभी
टाला जाता है.” उनकी इस बात पर गायत्री ने उसी प्रकार हंगामा किया जिस प्रकार वह अब
सुन रहे थे. उस दिन वह लगातार उसे समझाने का प्रयास करते रहे थे, लेकिन वह बोलती
रही थी, “आप नहीं चाहते कि हमारा दाम्पत्य जीवन सुखी रहे.” रोते हुए चीखकर उसने कहा
था. “हमने पंडित जी और अपने परिचितों को कह दिया है.” उसके पिता की मिनमिनाहट
उन्हें सुनाई दी. “उसका एक उपाय है कि आप और गायत्री की माता जी कथा सुन लें.
मां-पिता बच्चों के हितार्थ शुभ कार्य करते हैं.” “लेकिन यह तो गायत्री और सरल को
ही करना है.” “भाई साहब, क्षमा करेंगे! हम जिस लिए यहां आए हैं हमारे लिए वह आवश्यक
है न कि अचानक थोपा गया आपका यह आयोजन---.” और वह उठ खड़े हुए थे. सरल भी उठ खड़ा हुआ
था. गायत्री की मां दरवाजे की ओट लिए खड़ी थी और बुदबुदा रही थी, “मेरी बेटी की
किस्मत फूट गयी ऎसे लोगों के घर ब्याह करके जो धरम-करम में विश्वास नहीं करते.”
गायत्री के पिता के घर से निकलकर उन्होंने सरल से कहा, “तुम गूगल करके किसी होटल की
जानकारी लो, जहां गाड़ी पार्किंग की समस्या न हो.” सरल ने गूगल किया. होटल लैंड
मार्क में कमरा मिल गया. वे दो दिन उस होटल में रुके. अगले दिन सरल ने गायत्री को
फोन करके जानना चाहा कि वह क्या साथ जाना चाहेगी, लेकिन न उसने फोन उठाया और न उसके
पिता ने. उस घटना के एक माह बाद गायत्री आयी. उन्होंने उसके पिता के घर उसके द्वारा
अपने अपमान को ‘क्षमा बड़न को चाहिए—’ सोचकर भुला दिया था. कई दिनों तक उनके साथ
ऎंठी रस्सी की भांति गायत्री तनी रही. उन्होंने ही संवाद प्रारंभ किया. उसके बाद
वैभव (बेटू) पैदा हुआ और सब सामान्य रहा. लेकिन आज---. “मैं यहां नहीं रह सकती.”
गायत्री लगातार कह रही थी. खीजकर सरल बोला, “ठीक है, मैं आरक्षण करवा देता हूं. चली
जाइए.” उसने कोई उत्तर नहीं दिया. उनकी गोद से उसने बेटू को लिया और घर से बाहर
निकल गयी. पांच मिनट बाद वापस भी लौट आयी. जिस समय वह दरवाजे पर थी, उसके पिता का
फोन उन्हें आया, “पंकज जी, आपने गायत्री को घर से निकाल दिया है.” “क्या बात कर रहे
हैं! वह घर में है.” गायत्री तब तक घर के अंदर आ चुकी थी. “अभी-अभी उसका फोन आया था
कि आप लोगों ने उसे और वैभव को धक्के मारकर घर से निकाल दिया है.” “जनाब, वह आपको
केवल झूठा फोन करने के लिए बाहर गयी थी. इस समय घर में है. कहें तो बात करवा दूं.”
“मुझे बात नहीं करनी. आप लोग लगातार उसके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं.” कुछ देर
रुककर उसके पिता बोले, “मैं कल छोटे बेटे को भेजूंगा, गायत्री को ले जाने के लिए.”
वह चुप रहे थे. जब गायत्री पांच मिनट के लिए बाहर गयी थी, उस समय उन्होंने सरल से
झगड़े का कारण पूछा था. “इसकी एक चचेरी बहन अमेरिका में रहती है. वह भारत आयी हुई
है. गायत्री ने एक महीना पहले पूछा था कि वे लोग वैष्णों देवी जाना चाहते हैं और वे
चाहते हैं कि गायत्री और वह भी उनके साथ चले. लेकिन ऑफिस में इतना काम है डैड कि
मैंने इसे कहा था कि मैं नहीं जा पाऊंगा. वह जाना चाहे तो चली जाए. वैभव को साथ ले
जाना सही नहीं होगा. आज उनका फोन आया कि उन्होंने मेरा भी आरक्षण करवा लिया है.”
“बिना पूछे!” “यही मैंने कहा और यह झगड़ने लगी. मैंने इसे पहले ही कहा था कि मौसम
सही होने पर हम चलेंगे लेकिन---.” पिता को फोन करने जाने के लिए गायत्री ने बेटू को
जो उनकी गोद से लिया तो अगले दिन छोटे भाई के साथ जाने तक उसने उसे न उन्हें हाथ
लगाने दिया और न सरल को. उसका भाई स्टेशन से ऊबर लेकर आया था. फ्लैट से नीचे खड़ा
रहा. गायत्री अटैचियां पहले ही नीचे छोड़ आयी थी. जब वह बेटू को लेकर जा रही थी, सरल
बेटू को प्यार करने के लिए विचिलित ड्राइंग रूम में टहल रहा था. वह स्तब्ध किसी
प्रस्तर मूर्ति की भांति सोफे पर बैठे बेटू को मां की गोद में जाता निहारते रहे थे.
बेटू मुड़-मुड़कर उन्हें और अपने पिता को देख रहा था. जब गायत्री गेट से बाहर निकलकर
लिफ्ट आने का इंतज़ार कर रही थी, वह लपककर दरवाजे से बाहर निकले थे और आंखों में
आंसू थामे बेटू को बाय किया था. लेकिन अबोध बालक केवल उनकी ओर देखता रहा था. शायद
समझने का प्रयास कर रहा था कि मां उसे लेकर कहां जा रही है! उस दिन के बाद से वह
खाली प्रैम को देखते हैं और लंबी आह भरकर रह जाते हैं. वह सोफे पर बैठे बेटू की
यादों में खोए रहे. काफी देर बाद उठे, बेटू के टेडी बियर पर उनकी नज़र जा टिखी जो
उसके जाने के बाद से सैटी पर वैसे ही रखा हुआ था जैसा उसके रहते रखा रहता था.
उन्होंने उसे उठाया, प्रैम में उसे रखा और प्रैम लेकर टहलने के लिए निकल गए.
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बुधवार, 20 मई 2026
कहानी -पिता
पिता
पन्द्रह दिनों तक शीतलहर चलती रही. आसमान में दिन भर धुंध छायी रही. सूरज किसी
कन्दरा में छुपा इतने दिनों से सुख की नींद ले रहा था. उनका जीवन कमरे से आंगन और
वॉशरूम तक सीमित होकर रह गया था. सुमन ने जब से बिस्तर पकड़ा, उन्होंने उसके लिए एक
नर्स की व्यवस्था कर ली थी. मेड साफ-सफाई का काम करती और सुबह नाश्ते के साथ ही
दोपहर का भोजन भी पका जाती. शाम वह हर दिन दलिया या खिचड़ी पका लिया करते. तीन साल
पहले तक उन दोनों का जीवन बहुत सुचारु था. नौकरी से मिलने वाली पेंशन से गुजारा हो
जाता. सुमन को गठिया की शिकायत पिछले दस वर्षों से थी, लेकिन इतनी नहीं कि वह चल
नहीं सकती थी. दोनों अस्सी पार हो चुके थे, फिर भी सुबह दो किलोमीटर घूम आते और शाम
को हर दिन बाजार या सब्जी मण्डी जाने के बहाने एक किलोमीटर जाते-आते. बेशक कुछ न
लेना होता तब भी---. दिनभर घर में घुसे रहने की बोरियत आधा घण्टा घूमने से दूर हो
जाती. पड़ोसी रामलाल, जो उनकी ही तरह अस्सी पार के हो चुके थे, जब-तब छेड़ते, “निगम
साहब, आप दोनों ऎसे नियम के साथ हर दिन शाम बाहर निकलते हैं जैसे कोई नव-विवाहित
जोड़ा!” “आप मुझे बूढ़ा कब से समझने लगे रामलाल!” रामलाल हो हो करके हंसते, “अपने
दांत गिन लो---.” “पूरे बत्तीस हैं और सुमन के भी.” “नकली दांतों को असली बता रहे
हैं---.” रामलाल फिर हो हो करके हंसते. रामलाल की बत्तीसी दस साल पहले ही निकल गयी
थी. नकली दांत लगवा रखे थे, जिन्हें वह केवल भोजन के समय ही लगाते. शेष समय उन्हें
एक डिब्बे में संभाल रखते. हंसते तब लाल-बदरंग मसूढ़े दिखाई देते. “रामलाल जी जब-तब
एक बात ही क्यों बोलते रहते हैं?” सुमन ने एक दिन बाजार जाते हुए पूछा. “बीवी के
मरने के बाद अकेलापन महसूस करते होंगे---.” “अकेले भी घूमने जा सकते हैं. कम से कम
पार्क तक तो जा ही सकते हैं. दिनभर घर के बाहर बैठे लोगों को घूरते रहते हैं.”
“बेटे काम पर निकल जाते हैं और बहुएं अपने काम में व्यस्त---बच्चे स्कूल और लौटकर
होमवर्क या खेल में व्यस्त. रामलाल के लिए किसी के पास वक्त नहीं है. वह इस लायक
नहीं कि घर के काम में हाथ बंटा सकें.” कुछ रुककर एक जगह भीड़ से हटकर वह खड़े हो गए
और बोले, “सुमन, रामलाल फिर भी भाग्यशाली हैं कि उनके बेटे-बहू उनका खयाल रखते हैं.
साथ रह रहे हैं. हमारी तरह नहीं--.” दीर्घ निश्वास छोड़ी उन्होंने और चलने के लिए
कदम बढ़ाए. सुमन ने भी दीर्घ निश्वास छोड़ी. कुछ देर चुप चलने के बाद सुमन बोली,
“अपना-अपना भाग्य! मैं तो ईश्वर का लाख शुक्र अदा करती हूं कि हम दोनों इस उम्र में
भी स्वस्थ हैं. इतनी सैर कर लेते हैं. अपने काम स्वयं कर लेते हैं.” उसने फिर लंबी
सांस खींची और बोली, “जरूर हमने कुछ बुरे कर्म किए होंगे.” “सभी यही कहकर मन को
तसल्ली दे लेते हैं. एक क्षण रुककर बगल में चल रही सुमन से वह बोले, “छोड़ो इस बात
को. जिस पर अपना ज़ोर नहीं उस बारे में क्या सोचना.” यह बात उस दिन से आठ वर्ष पहले
की थी. तब वह बहत्तर और सुमन सत्तर की थी. बड़ा बेटा केन्द्र सरकार की नौकरी में
ब.ए. करने के बाद आ गया था और उन दिनों च्न्नई में पदस्थ था. छोटा शहर में था. उसने
एम.बी.ए. किया. शादी के कुछ वर्षों बाद तक कनॉट प्लेस के एक निजी संस्थान में नौकरी
की, लेकिन नौकरी उसे रास नहीं आ रही थी. एक दिन उसने नौकरी छोड़ दी और उनसे पांच लाख
रुपयों की मांग की. बैंक से रिटायर हुए उन्हें दस वर्ष हो चुके थे. कभी पैसे जोड़
नहीं पाए थे. जोड़ते तब दोनों बेटों को पढ़ा नहीं सकते. दिल्ली के पटपड़गंज जैसी जगह
पर अपना मकान नहीं बना सकते थे. मकान बनवाने के लिए उन्होंने बैंक से लोन लिया था
और जब अवकाश ग्रहण किया, उनके फण्ड और ग्रैचुएटी का बड़ा भाग लोन अदायगी में जा चुका
था. छोटे बेटे रमन का विवाह अवकाश ग्रहण के बाद किया था. उन्होंने न बड़े बेटे के
विवाह में दहेज लिया और न ही रमन के विवाह में. लेकिन लड़की वाले खर्च करवाने में
पीछे नहीं रहे थे. छोटी पुत्रवधू के लिए कुछ कर्ज़ लेकर सोने-चांदी के आभूषण बनवाने
पड़े थे. उन्होंने वह कर्ज़ किसी प्रकार पेंशन से बचत करके और सुमन के जोड़े पैसों से
अदा कर दिया था. रमन व्यवसाय करना चाहता था. उसका कहना था कि नौकरी उसके मनोनुकूल
नहीं है और उस नौकरी के बल पर वह कभी ढंग की ज़िन्दगी नहीं जी सकेगा. उसे कश्मीरी
गेट में एक छोटी-सी दुकान पगड़ी में मिल रही थी. उसके साले की वहां ऑटो पार्ट्स की
दुकान थी. दुकानदार कर्ज़दार था और पांच लाख रुपयों में दुकान छोड़ने को तैयार था.
सलाह रमन के साले की थी. उनके बैंक में केवल एक लाख रुपए थे. उन्होंने वह रमन को
दिए दिए. रमन को यह विश्वास नहीं था कि उनके पास पैसे नहीं थे. उसने मकान का ऊपर का
हिस्सा बेंचने के लिए उन पर दबाव बनाया, जिसके लिए उन्होंने मना कर दिया. इस पर रमन
की पत्नी शर्मिला सुमन से लड़ी. “आप लोग अपने बेटे की प्रगति नहीं देख सकते. मकान
बांधकर ऊपर ले जाएंगे. बिजनेस चल गया तो ऎसे दस मकान रमन खड़ा कर देंगे.” सुमन ने
कोई उत्तर नहीं दिया. रमन ने पाण्डव नगर में दो कमरों का फ्लैट किराए पर लिया और
वहां शिफ्ट हो गया. दुकान वह नहीं खरीद पाया, लेकिन उसने एक लाख रुपए भी नहीं
लौटाए. उस दिन वह रमन को शिफ्ट करते हुए टुकुर-टुकुर देखते रहे थे, लेकिन उसे जाने
से रोका नहीं था. कुछ दिनों की बेकारी के बाद रमन ने गुड़गांव में दूसरी कंपनी
ज्वॉइन कर ली और वहां शिफ्ट हो गया. आठ साल हो गए---न वह उनसे मिलने आया और न उनसे
संपर्क किया. रमन की सहायता न करने से बड़ा बेटा भी उनसे नाराज था. दो साल से उनसे
मिलने नहीं आया था. “मेरी कोई गलती नहीं रमन के पापा. हमने उन्हें पाल-पोसकर इस
लायक बनाया---.” सुमन जब भी उन्हें यह कहती, वह उसे रोक देते, “सुमन, हमने अपना
कर्तव्य निभाया---हर मां-पिता का कर्तव्य होता है कि वह बच्चों का खयाल रखे. हम कोई
पहले मां-पिता नहीं जिनके बच्चे उन्हें छोड़ चुके हैं. दुनिया में लाखों लोग हैं.
ईश्वर का धन्यवाद करो कि हम स्वस्थ हैं.” लेकिन कहां स्वस्थ रह सकी सुमन. छब्बीस
जनवरी का दिन था. ऎसा ही ठंड भरा दिन. सुबह का समय वह पूजा करके हर दिन सूरज को जल
अर्पण करने छत पर जाती थी. शीतलहर और कोहरे के कारण सूरज के दर्शन एक सप्ताह से
नहीं हुए थे, लेकिन वह पूरब की ओर हाथ उठाकर जल अर्पण करके मन को संतोष दे लेती. उस
दिन लौटी तब कांप रही थी. “मैंने कितनी बार कहा कि ऎसे मौसम में ऊपर नहीं जाया करो.
हवा लग गयी न!” ब्लोअर ऑन करते हुए वह बोले. लेकिन सुमन ने कोई उत्तर नहीं दिया.
बेहोश होकर वह बिस्तर पर ढह गयी. उसके दांत भिंच गए थे. चेहरा ऎंठ रहा था. उन्होंने
उसे झकझोरा, लेकिन सुमन को होश नहीं आया. उन्होंने उस पर रजाई डाली और ऊपर रहने
वाले किराएदार को आवाज दी. वह अपनी दुकान जाने के लिए तैयार हो रहा था. उसकी गाड़ी
में वह सुमन को मैक्स ले गए. उसे दाहिनी ओर लकवा मार गया था. सुमन दस दिनों तक
अस्पताल में रही. लाभ इतना ही हुआ कि वह भोजन ले सकने लगी, लेकिन चलना संभव नहीं
रहा. उन्होंने बड़े बेटे को सूचना दी. रमन की ससुराल में संदेश छोड़ा लेकिन न ही बड़ा
बेटा आया और न ही रमन. सुमन के कुछ जेवर बची हुई थी. उसे बेंचकर उन्होंने मैक्स के
बिल का भुगतान किया था. उन्होंने खाली पड़े दो कमरे भी किराए पर उठा दिए थे.
किराएदारों से मिलने वाले किराए और पेंशन से सुमन का इलाज, नर्स और आया के खर्चे और
शेष जरूरतों को वह पूरा कर लेते थे. बैंक की ओर से स्वास्थ्य सेवा का लाभ भी ले रहे
थे. सुमन सही प्रकार बोल नहीं पाती थी, लेकिन टूटे वाक्यों में वह रमन और बड़े बेटे
को लेकर अपनी चिन्ता अवश्य प्रकट करती. बड़े बेटे के दो बेटे थे. दो साल पहले दो
दिनों के लिए आए थे. सुमन उन्हें दोबारा देखना चाहती थी. “मैंने प्रणव को फोन पर
बताया था. उसने आने के लिए कहा था, लेकिन आना तो दूर, उसने फोन करके तुम्हारे हाल
तक नहीं जाना!” “फंस गया होगा काम में---सरकारी काम ठहरा. बनिए की दुकान तो है नहीं
कि जब चाहा खोला और जब जी नहीं चाहा, बंद रखा. “लड़खड़ाती जुबान से सुमन बोली, “एक
बार और फोन करके कह दो कि मैं उन सबसे मिलना चाहती हूं. रमन तो निर्मोही है. उसे अब
दोबारा ख़बर नहीं देना.” वह चुप रहे थे. लेकिन उनकी आत्मा ने स्वीकार नहीं किया कि
वह दोबारा बेटों को सूचना देते. उन्होंने नहीं दिया. तीन साल बीत गए. तीन सालों से
उनका सारा रूटीन गड़बड़ हो गया था. सुमन के साथ बिना घूमने जाना भी लगभग बंद हो चुका
था. पन्द्रह दिनों से शीतलहर ने हालात ऎसे कर दिए कि वह इस कमरे से सुमन के कमरे या
वॉशरूम से किचन तक ही सीमित होकर रह गए थे. उस समय वह अपने लिए चाय बना रहे थे जब
डोर बेल बजी. चाय चढ़ी छोड़कर उन्होंने दरवाजा खोला. दरवाजा गैलरी में खुलता था.
खुलते ही लगा कि हवा का रेला अंदर घुस आया था. उन्होंने ओवरकोट पहना हुआ था. आने
वाला दरवाजे पर खड़ा था. “किराएदार ऊपर रहते हैं.” उन्हें लगा कि शायद युवक ने गलती
से उनकी घण्टी बजा दी थी. “आप किशोर कुमार निगम हैं न!” आगन्तुक बोला. “जी, कहें.”
“मैं आपके छोटे बेटा रमन का मित्र हूं. रमन को आज रात हार्ट अटैक पड़ा है. वह
मेदान्ता में भर्ती हैं.” “ओह!” उन्हें लगा कि उनका दिमाग घूमने लगा है. “आप अन्दर
आ जाएं.” “नहीं अंकल! मुझे शर्मिला जी का रात ही फोन आया था. मैं अस्पताल जा रहा
हूं. मैं नोएडा रहता हूं. शर्मिला जी ने आपको बताने के लिए कहा था. रमन के पास उनके
अलावा कोई नहीं.” एक क्षण रुककर वह बोला, “सॉरी अंकल, मैं निकलता हूं. आप परेशान न
हों. मैं पहुंचकर आपको फोन करूंगा. आप अपना मोबाइल नंबर मुझे बता दें.” “मेदांता
गुड़गांव में न! एमार्जेन्सी में होगा!” “जी अंकल.” युवक अपना मोबाइल निकालकर उनका
नंबर लिखने के लिए उनके चेहरे की ओर देख रहा था. उन्होंने नंबर बताया और कहना चाहा
कि यदि वह कुछ देर प्रतीक्षा करे तब वह उसके साथ चलना चाहेंगे, लेकिन तभी उन्हें
खयाल आया कि सुमन की नर्स अभी तक आयी नहीं. उसके आने के बाद ही कोई निर्णय सही
होगा. उनका मोबाइल नंबर लेकर युवक चला गया. वह दरवाजा बंद ही कर रहे थे कि नर्स आती
दिखी. मेड भी उसके पीछे आ रही थी. नर्स को एक ओर ले जाकर उन्होंने कहा, “भगवती,
मेरे छोटे बेटे रमन को हार्ट अटैक पड़ा है. मैं अभी गुड़गांव जा रहा हूं. आज तुम्हें
डबल ड्यूटी करनी पड़ सकती है. मैं अभी निकल जाना चाहता हूं. सुमन को कुछ नहीं बताना.
मैं फोन पर तुम्हें अपने लौटने के बारे में बताऊंगा.” कुछ देर सोचने के बाद नर्स
बोली, “अंकल, आप इत्मीनान के साथ जाएं. मैं रात में आण्टी के पास आ जाऊंगी. थोड़ी
देर के लिए घर जाऊंगी, अपनी बिटिया को आण्टी के पास बुला लूंगी. बल्कि रात हम दोनों
ही रह लेंगी.” “भगवती, मुझे तुम सबका ही सहारा है.” उनकी आंखें भर आयीं. “अंकल,
दुखी न हों. सब ठीक होगा. दो-चार दिन मैं आण्टी को संभाल लूंगी.” एक क्षण रुककर वह
आगे बोली, “लेकिन आण्टी आपके बारे में पूछेंगी तब क्या कहूंगी?” “मेरा छोटा भाई
फरीदाबाद में रहता है. मैं उसे कहूंगा कि वह बीमार है, उसे देखने जा रहा हूं. तुम
भी यही बताना.” “जी अंकल!” उन्होंने सुमन को फरीदाबाद जाने की कहानी गढ़कर बतायी,
“चिन्ता न करना सुमन, भगवती तुम्हारे पास रहेगी, जब तक मैं लौट नहीं आता.” “कोई
नहीं. आप जाओ और हां, पहुंचकर देवरजी के हाल भगवती को बताना. वह मुझे बता देगी. मन
को तसल्ली होगी.” उन्होंने एक थैले में गर्म कपड़े रखे और शीतलहर की परवाह न करते
हुए सड़क पर आ गए और मेट्रो स्टेशन जाने के लिए सड़क पर तेजी से दौड़ रहे ऑटो वालों को
हाथ देकर रोकने का प्रयास करने लगे. स्टेशन जाते हुए उनके दिमाग में रील तेजी से
दौड़नी लगी थी कि यदि जरूरत हुई तो रमन के इलाज के लिए वह मकान बेंच देंगे.
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