बुधवार, 20 मई 2026

कहानी

पिता पन्द्रह दिनों तक शीतलहर चलती रही. आसमान में दिन भर धुंध छायी रही. सूरज किसी कन्दरा में छुपा इतने दिनों से सुख की नींद ले रहा था. उनका जीवन कमरे से आंगन और वॉशरूम तक सीमित होकर रह गया था. सुमन ने जब से बिस्तर पकड़ा, उन्होंने उसके लिए एक नर्स की व्यवस्था कर ली थी. मेड साफ-सफाई का काम करती और सुबह नाश्ते के साथ ही दोपहर का भोजन भी पका जाती. शाम वह हर दिन दलिया या खिचड़ी पका लिया करते. तीन साल पहले तक उन दोनों का जीवन बहुत सुचारु था. नौकरी से मिलने वाली पेंशन से गुजारा हो जाता. सुमन को गठिया की शिकायत पिछले दस वर्षों से थी, लेकिन इतनी नहीं कि वह चल नहीं सकती थी. दोनों अस्सी पार हो चुके थे, फिर भी सुबह दो किलोमीटर घूम आते और शाम को हर दिन बाजार या सब्जी मण्डी जाने के बहाने एक किलोमीटर जाते-आते. बेशक कुछ न लेना होता तब भी---. दिनभर घर में घुसे रहने की बोरियत आधा घण्टा घूमने से दूर हो जाती. पड़ोसी रामलाल, जो उनकी ही तरह अस्सी पार के हो चुके थे, जब-तब छेड़ते, “निगम साहब, आप दोनों ऎसे नियम के साथ हर दिन शाम बाहर निकलते हैं जैसे कोई नव-विवाहित जोड़ा!” “आप मुझे बूढ़ा कब से समझने लगे रामलाल!” रामलाल हो हो करके हंसते, “अपने दांत गिन लो---.” “पूरे बत्तीस हैं और सुमन के भी.” “नकली दांतों को असली बता रहे हैं---.” रामलाल फिर हो हो करके हंसते. रामलाल की बत्तीसी दस साल पहले ही निकल गयी थी. नकली दांत लगवा रखे थे, जिन्हें वह केवल भोजन के समय ही लगाते. शेष समय उन्हें एक डिब्बे में संभाल रखते. हंसते तब लाल-बदरंग मसूढ़े दिखाई देते. “रामलाल जी जब-तब एक बात ही क्यों बोलते रहते हैं?” सुमन ने एक दिन बाजार जाते हुए पूछा. “बीवी के मरने के बाद अकेलापन महसूस करते होंगे---.” “अकेले भी घूमने जा सकते हैं. कम से कम पार्क तक तो जा ही सकते हैं. दिनभर घर के बाहर बैठे लोगों को घूरते रहते हैं.” “बेटे काम पर निकल जाते हैं और बहुएं अपने काम में व्यस्त---बच्चे स्कूल और लौटकर होमवर्क या खेल में व्यस्त. रामलाल के लिए किसी के पास वक्त नहीं है. वह इस लायक नहीं कि घर के काम में हाथ बंटा सकें.” कुछ रुककर एक जगह भीड़ से हटकर वह खड़े हो गए और बोले, “सुमन, रामलाल फिर भी भाग्यशाली हैं कि उनके बेटे-बहू उनका खयाल रखते हैं. साथ रह रहे हैं. हमारी तरह नहीं--.” दीर्घ निश्वास छोड़ी उन्होंने और चलने के लिए कदम बढ़ाए. सुमन ने भी दीर्घ निश्वास छोड़ी. कुछ देर चुप चलने के बाद सुमन बोली, “अपना-अपना भाग्य! मैं तो ईश्वर का लाख शुक्र अदा करती हूं कि हम दोनों इस उम्र में भी स्वस्थ हैं. इतनी सैर कर लेते हैं. अपने काम स्वयं कर लेते हैं.” उसने फिर लंबी सांस खींची और बोली, “जरूर हमने कुछ बुरे कर्म किए होंगे.” “सभी यही कहकर मन को तसल्ली दे लेते हैं. एक क्षण रुककर बगल में चल रही सुमन से वह बोले, “छोड़ो इस बात को. जिस पर अपना ज़ोर नहीं उस बारे में क्या सोचना.” यह बात उस दिन से आठ वर्ष पहले की थी. तब वह बहत्तर और सुमन सत्तर की थी. बड़ा बेटा केन्द्र सरकार की नौकरी में ब.ए. करने के बाद आ गया था और उन दिनों च्न्नई में पदस्थ था. छोटा शहर में था. उसने एम.बी.ए. किया. शादी के कुछ वर्षों बाद तक कनॉट प्लेस के एक निजी संस्थान में नौकरी की, लेकिन नौकरी उसे रास नहीं आ रही थी. एक दिन उसने नौकरी छोड़ दी और उनसे पांच लाख रुपयों की मांग की. बैंक से रिटायर हुए उन्हें दस वर्ष हो चुके थे. कभी पैसे जोड़ नहीं पाए थे. जोड़ते तब दोनों बेटों को पढ़ा नहीं सकते. दिल्ली के पटपड़गंज जैसी जगह पर अपना मकान नहीं बना सकते थे. मकान बनवाने के लिए उन्होंने बैंक से लोन लिया था और जब अवकाश ग्रहण किया, उनके फण्ड और ग्रैचुएटी का बड़ा भाग लोन अदायगी में जा चुका था. छोटे बेटे रमन का विवाह अवकाश ग्रहण के बाद किया था. उन्होंने न बड़े बेटे के विवाह में दहेज लिया और न ही रमन के विवाह में. लेकिन लड़की वाले खर्च करवाने में पीछे नहीं रहे थे. छोटी पुत्रवधू के लिए कुछ कर्ज़ लेकर सोने-चांदी के आभूषण बनवाने पड़े थे. उन्होंने वह कर्ज़ किसी प्रकार पेंशन से बचत करके और सुमन के जोड़े पैसों से अदा कर दिया था. रमन व्यवसाय करना चाहता था. उसका कहना था कि नौकरी उसके मनोनुकूल नहीं है और उस नौकरी के बल पर वह कभी ढंग की ज़िन्दगी नहीं जी सकेगा. उसे कश्मीरी गेट में एक छोटी-सी दुकान पगड़ी में मिल रही थी. उसके साले की वहां ऑटो पार्ट्स की दुकान थी. दुकानदार कर्ज़दार था और पांच लाख रुपयों में दुकान छोड़ने को तैयार था. सलाह रमन के साले की थी. उनके बैंक में केवल एक लाख रुपए थे. उन्होंने वह रमन को दिए दिए. रमन को यह विश्वास नहीं था कि उनके पास पैसे नहीं थे. उसने मकान का ऊपर का हिस्सा बेंचने के लिए उन पर दबाव बनाया, जिसके लिए उन्होंने मना कर दिया. इस पर रमन की पत्नी शर्मिला सुमन से लड़ी. “आप लोग अपने बेटे की प्रगति नहीं देख सकते. मकान बांधकर ऊपर ले जाएंगे. बिजनेस चल गया तो ऎसे दस मकान रमन खड़ा कर देंगे.” सुमन ने कोई उत्तर नहीं दिया. रमन ने पाण्डव नगर में दो कमरों का फ्लैट किराए पर लिया और वहां शिफ्ट हो गया. दुकान वह नहीं खरीद पाया, लेकिन उसने एक लाख रुपए भी नहीं लौटाए. उस दिन वह रमन को शिफ्ट करते हुए टुकुर-टुकुर देखते रहे थे, लेकिन उसे जाने से रोका नहीं था. कुछ दिनों की बेकारी के बाद रमन ने गुड़गांव में दूसरी कंपनी ज्वॉइन कर ली और वहां शिफ्ट हो गया. आठ साल हो गए---न वह उनसे मिलने आया और न उनसे संपर्क किया. रमन की सहायता न करने से बड़ा बेटा भी उनसे नाराज था. दो साल से उनसे मिलने नहीं आया था. “मेरी कोई गलती नहीं रमन के पापा. हमने उन्हें पाल-पोसकर इस लायक बनाया---.” सुमन जब भी उन्हें यह कहती, वह उसे रोक देते, “सुमन, हमने अपना कर्तव्य निभाया---हर मां-पिता का कर्तव्य होता है कि वह बच्चों का खयाल रखे. हम कोई पहले मां-पिता नहीं जिनके बच्चे उन्हें छोड़ चुके हैं. दुनिया में लाखों लोग हैं. ईश्वर का धन्यवाद करो कि हम स्वस्थ हैं.” लेकिन कहां स्वस्थ रह सकी सुमन. छब्बीस जनवरी का दिन था. ऎसा ही ठंड भरा दिन. सुबह का समय वह पूजा करके हर दिन सूरज को जल अर्पण करने छत पर जाती थी. शीतलहर और कोहरे के कारण सूरज के दर्शन एक सप्ताह से नहीं हुए थे, लेकिन वह पूरब की ओर हाथ उठाकर जल अर्पण करके मन को संतोष दे लेती. उस दिन लौटी तब कांप रही थी. “मैंने कितनी बार कहा कि ऎसे मौसम में ऊपर नहीं जाया करो. हवा लग गयी न!” ब्लोअर ऑन करते हुए वह बोले. लेकिन सुमन ने कोई उत्तर नहीं दिया. बेहोश होकर वह बिस्तर पर ढह गयी. उसके दांत भिंच गए थे. चेहरा ऎंठ रहा था. उन्होंने उसे झकझोरा, लेकिन सुमन को होश नहीं आया. उन्होंने उस पर रजाई डाली और ऊपर रहने वाले किराएदार को आवाज दी. वह अपनी दुकान जाने के लिए तैयार हो रहा था. उसकी गाड़ी में वह सुमन को मैक्स ले गए. उसे दाहिनी ओर लकवा मार गया था. सुमन दस दिनों तक अस्पताल में रही. लाभ इतना ही हुआ कि वह भोजन ले सकने लगी, लेकिन चलना संभव नहीं रहा. उन्होंने बड़े बेटे को सूचना दी. रमन की ससुराल में संदेश छोड़ा लेकिन न ही बड़ा बेटा आया और न ही रमन. सुमन के कुछ जेवर बची हुई थी. उसे बेंचकर उन्होंने मैक्स के बिल का भुगतान किया था. उन्होंने खाली पड़े दो कमरे भी किराए पर उठा दिए थे. किराएदारों से मिलने वाले किराए और पेंशन से सुमन का इलाज, नर्स और आया के खर्चे और शेष जरूरतों को वह पूरा कर लेते थे. बैंक की ओर से स्वास्थ्य सेवा का लाभ भी ले रहे थे. सुमन सही प्रकार बोल नहीं पाती थी, लेकिन टूटे वाक्यों में वह रमन और बड़े बेटे को लेकर अपनी चिन्ता अवश्य प्रकट करती. बड़े बेटे के दो बेटे थे. दो साल पहले दो दिनों के लिए आए थे. सुमन उन्हें दोबारा देखना चाहती थी. “मैंने प्रणव को फोन पर बताया था. उसने आने के लिए कहा था, लेकिन आना तो दूर, उसने फोन करके तुम्हारे हाल तक नहीं जाना!” “फंस गया होगा काम में---सरकारी काम ठहरा. बनिए की दुकान तो है नहीं कि जब चाहा खोला और जब जी नहीं चाहा, बंद रखा. “लड़खड़ाती जुबान से सुमन बोली, “एक बार और फोन करके कह दो कि मैं उन सबसे मिलना चाहती हूं. रमन तो निर्मोही है. उसे अब दोबारा ख़बर नहीं देना.” वह चुप रहे थे. लेकिन उनकी आत्मा ने स्वीकार नहीं किया कि वह दोबारा बेटों को सूचना देते. उन्होंने नहीं दिया. तीन साल बीत गए. तीन सालों से उनका सारा रूटीन गड़बड़ हो गया था. सुमन के साथ बिना घूमने जाना भी लगभग बंद हो चुका था. पन्द्रह दिनों से शीतलहर ने हालात ऎसे कर दिए कि वह इस कमरे से सुमन के कमरे या वॉशरूम से किचन तक ही सीमित होकर रह गए थे. उस समय वह अपने लिए चाय बना रहे थे जब डोर बेल बजी. चाय चढ़ी छोड़कर उन्होंने दरवाजा खोला. दरवाजा गैलरी में खुलता था. खुलते ही लगा कि हवा का रेला अंदर घुस आया था. उन्होंने ओवरकोट पहना हुआ था. आने वाला दरवाजे पर खड़ा था. “किराएदार ऊपर रहते हैं.” उन्हें लगा कि शायद युवक ने गलती से उनकी घण्टी बजा दी थी. “आप किशोर कुमार निगम हैं न!” आगन्तुक बोला. “जी, कहें.” “मैं आपके छोटे बेटा रमन का मित्र हूं. रमन को आज रात हार्ट अटैक पड़ा है. वह मेदान्ता में भर्ती हैं.” “ओह!” उन्हें लगा कि उनका दिमाग घूमने लगा है. “आप अन्दर आ जाएं.” “नहीं अंकल! मुझे शर्मिला जी का रात ही फोन आया था. मैं अस्पताल जा रहा हूं. मैं नोएडा रहता हूं. शर्मिला जी ने आपको बताने के लिए कहा था. रमन के पास उनके अलावा कोई नहीं.” एक क्षण रुककर वह बोला, “सॉरी अंकल, मैं निकलता हूं. आप परेशान न हों. मैं पहुंचकर आपको फोन करूंगा. आप अपना मोबाइल नंबर मुझे बता दें.” “मेदांता गुड़गांव में न! एमार्जेन्सी में होगा!” “जी अंकल.” युवक अपना मोबाइल निकालकर उनका नंबर लिखने के लिए उनके चेहरे की ओर देख रहा था. उन्होंने नंबर बताया और कहना चाहा कि यदि वह कुछ देर प्रतीक्षा करे तब वह उसके साथ चलना चाहेंगे, लेकिन तभी उन्हें खयाल आया कि सुमन की नर्स अभी तक आयी नहीं. उसके आने के बाद ही कोई निर्णय सही होगा. उनका मोबाइल नंबर लेकर युवक चला गया. वह दरवाजा बंद ही कर रहे थे कि नर्स आती दिखी. मेड भी उसके पीछे आ रही थी. नर्स को एक ओर ले जाकर उन्होंने कहा, “भगवती, मेरे छोटे बेटे रमन को हार्ट अटैक पड़ा है. मैं अभी गुड़गांव जा रहा हूं. आज तुम्हें डबल ड्यूटी करनी पड़ सकती है. मैं अभी निकल जाना चाहता हूं. सुमन को कुछ नहीं बताना. मैं फोन पर तुम्हें अपने लौटने के बारे में बताऊंगा.” कुछ देर सोचने के बाद नर्स बोली, “अंकल, आप इत्मीनान के साथ जाएं. मैं रात में आण्टी के पास आ जाऊंगी. थोड़ी देर के लिए घर जाऊंगी, अपनी बिटिया को आण्टी के पास बुला लूंगी. बल्कि रात हम दोनों ही रह लेंगी.” “भगवती, मुझे तुम सबका ही सहारा है.” उनकी आंखें भर आयीं. “अंकल, दुखी न हों. सब ठीक होगा. दो-चार दिन मैं आण्टी को संभाल लूंगी.” एक क्षण रुककर वह आगे बोली, “लेकिन आण्टी आपके बारे में पूछेंगी तब क्या कहूंगी?” “मेरा छोटा भाई फरीदाबाद में रहता है. मैं उसे कहूंगा कि वह बीमार है, उसे देखने जा रहा हूं. तुम भी यही बताना.” “जी अंकल!” उन्होंने सुमन को फरीदाबाद जाने की कहानी गढ़कर बतायी, “चिन्ता न करना सुमन, भगवती तुम्हारे पास रहेगी, जब तक मैं लौट नहीं आता.” “कोई नहीं. आप जाओ और हां, पहुंचकर देवरजी के हाल भगवती को बताना. वह मुझे बता देगी. मन को तसल्ली होगी.” उन्होंने एक थैले में गर्म कपड़े रखे और शीतलहर की परवाह न करते हुए सड़क पर आ गए और मेट्रो स्टेशन जाने के लिए सड़क पर तेजी से दौड़ रहे ऑटो वालों को हाथ देकर रोकने का प्रयास करने लगे. स्टेशन जाते हुए उनके दिमाग में रील तेजी से दौड़नी लगी थी कि यदि जरूरत हुई तो रमन के इलाज के लिए वह मकान बेंच देंगे. -0-0-0-0-

सोमवार, 24 मार्च 2025

आलेख

आलेख

विवाह के प्रति उदासीन होते युवक

रूपसिंह चन्देल

 

28 फरवरी,2025 को कानपुर की समाज सेविका नीलम चतुर्वेदी के 41 वर्षीय पुत्र निशांत ने पत्नी से पीड़ित/प्रताड़ित होकर मुम्बई में आत्महत्या की थी. जिस लड़की से उसने विवाह किया था उसने अपने पहले विवाह की बात उससे छुपायी थी, जबकि बारह वर्ष पहले उसका पूर्व पति से तलाक हो चुका था. विवाह के बाद पूछने पर उसने कहा, “मैं निशांत को इतना प्यार करती हूं कि उसके बारे में बताकर निशांत को खोना नहीं चाहती थी.” निशांत मुम्बई में फिल्म डायरेक्टर था. शादी के बाद उसकी पत्नी की मांगे बढ़ती गयीं. वह लैविश जिन्दगी जीना चाहती थी. महंगी वस्तुएं खरीदना, घर में नहीं, अच्छे रेस्टॉरेंट में हर दिन भोजन---अपने करियर को लेकर संघर्ष कर रहे निशांत के लिए यह सब संभव नहीं था. वह तनाव में जीने लगा. अंततः उसने कानपुर कोर्ट में तलाक का पिटीशन फाइल किया. लड़की का परिवार निशांत को एलीमनी के नाम पर निचोड़ लेना चाहता था. इन स्थितियों से टूट चुके निशांत ने जीवन समाप्त करने का निर्णय किया. उसने अपने स्टूडियो की वेब साइट में I Died शीर्षक देकर पांच पत्र लिखे, जिसमें मां को अति-भावुक कर देने वाला पत्र है, जिसे पढ़कर कठोर हृदय व्यक्ति भी रो देगा, दूसरा पत्र बहन, दो अपने घनिष्ट मित्रो और अंतिम पत्र पत्नी के नाम लिखा. स्पष्ट शब्दों में उसने अपनी  आत्महत्या के लिए उसे जिम्मेदार ठहराया.

अखिल सुभाष की आत्महत्या से पत्नी और उसके परिवार वालों से परेशान युवकों की आत्महत्या की बहस फिर प्रारंभ हो गयी है.

मेरठ का सौरभ हत्याकांड लंबे समय तक चर्चा में रहा था और 17-22 मार्च,2025 वाले सप्ताह   सहारनपुर में एक युवक ने पत्नी की प्रताड़ना से परेशान होकर आत्महत्या का प्रयास किया. कुछ  दिन पहले आगरा में एक युवक ने पत्नी से प्रताड़ित होकर आत्महत्या की थी. उसने कुछ सेकंड के वीडियो में कहा था, "किसी को लड़कों के पक्ष में भी खड़ा होना चाहिए."   उससे पहले दिल्ली के मॉडल टाउन में एक व्यवसायी युवक ने पत्नी और उसके परिवार से पीड़ित होकर आत्महता की थी. बंगलुरू में एक बहुराष्ट्रीय आर्टिफिशियल इंटिलीजेंस कंपनी में इंजीनियर 34 वर्षीय अतुल सुभाष ने पत्नी निकिता और उसके परिवार से प्रताड़ित होकर 9 दिसम्बर,24 को आत्महत्या की थी. आत्महत्या से पूर्व उसने 1 घण्टा 21 मिनट का वीडियो बनाकर अपनी आत्महत्या का कारण बताया था. यही नहीं उसने 24 पृष्ठों का सुसाइड नोट भी लिखाजिसमें पत्नी,उसकी मां,ताऊ और उसके भाई पर गंभीर आरोप लगाए. उसने फेमिली कोर्टजौनपुर की प्रधान न्यायाधीश पर भी गंभीर आरोप लगाए. यह सब सोशल मीडियासमाचार पत्रों और टी.वी. चेनल्स पर कई दिनों तक चर्चा का विषय रहा. लेकिन चूंकि मामला एक युवक (अर्थात पुरुष का) था इसलिए तीन-चार दिनों बाद मामला शांत हो गया. अतुल सुभाष न पहला युवक था जिसने पत्नी और उसके परिवार से पीडित और प्रताड़ित होकर और न्यायालय द्वारा उचित न्याय  न मिलने के कारण आत्महत्या की थी और न ही अंतिम युवक. निशांत, आगरा और दिल्ली के मॉडल टाउन के युवकों की आत्महत्या इसी ओर इशारा करते हैं. और ऎसा भी नहीं कि अतुल से पहले पत्नियों और उनके परिवार से प्रताड़ित युवकों ने आत्महत्या नहीं की थी.

देश में पत्नियों और उनके परिवार वालों की प्रताड़ना से आत्महत्या करने के मामलों में पिछले 20 वर्षों में तेजी से वृद्धि हुई है. यह समस्या एक दिन की देन नहीं है. संविधान में धारा 498-A के जोड़े जाने के बाद ही उसका दुरुपयोग प्रारंभ हो गया था. लेकिन शुरू में मामले अधिक नहीं होते थे. ऎसा नहीं कि आठवें दशक  से पहले ऎसी घटनाएं नहीं घटित हो रही थीं. लेकिन 1983 में 498-A  के प्रभाव में आने के बाद सभी सामाजिक मूल्यॊं को दरकिनार करते हुए ऎसी घटनाओं में वृद्धि हुई और वे अधिक ही वीभत्स रूप में घटित होने लगीं.  तब लड़की और उसके परिवार द्वारा लड़के और उसके परिवार ही नहीं उसके रिश्तेदारों के विरुद्ध इस धारा के अंतर्गत एफ.आई.आर. दर्ज करवाते ही पुलिस हरकत में आ जाती थी और सभी को गिरफ्तार करके जेल  भेज दिया जाता था. आसानी से उनकी जमानत नहीं होती थी. होती तब वर्षों मुकदमा चलता. मुकदमें आज भी चलते हैं. केस झूठा पाए जाने के बाद भी लड़की या उसके परिवार के विरुद्ध कोई दण्डात्मक कार्यवाई नहीं की जाती थी. कार्यवाई आज भी नहीं की जातीयही कारण है कि इस धारा के अंतर्गत एफ.आई.आर की बाढ़-सी आई हुई है. इस ज्यादती के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई. लंबी प्रक्रिया के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस को निर्देश जारी किया कि बिना तहकीकात किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार न किया जाए और न्यायालयों को भी निर्देश जारी किए.


 

मैंने सर्वोच्च न्यायालयहैदराबादकोलकाता और दिल्ली उच्च न्यायलयों के उन फैसलों का अध्ययन किया जो तलाक के मामलों से जुड़े हुए थे. मैंने गूगल में उपलब्ध पत्नी प्रताड़ित पुरुषों के वीडियो सुने और उन वरिष्ठ अधिवक्ताओं से बातचीत की जिन्होंने ऎसे मामले लड़े थे या लड़ रहे थे. एक यू ट्यूब चेनल में मैंने  फ़ेमैली कोर्ट के एक वरिष्ठ  एडवोकेट का साक्षात्कार सुना. फ़मिली कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू करने से पहले वह एक महाविद्यालय में फिजिक्स के प्रोफेसर रहे थेसाक्षात्कार में उन्होंने चौंकाने वाले उदाहरण दिएउनका कहना था कि पिछले कुछ वर्षों से ऎसे मामले तेजी से बढ़े हैं.  साधारण परिवार अपनी पढ़ी-लिखी सुन्दर लड़की के लिए एक ऎसा आदर्शवादी परिवार खोजते हैं जो मोटा वेतन पाने वाले अपने बेटे के विवाह के लिए दहेज नहीं लेता. सन्तान होने तक सब ठीक चलता हैलेकिन संतान होते ही लड़की अपने परिवार वालों के कहने पर ससुराल में समस्याएं उत्पन्न करना प्रारंभ कर देती हैफिर वही होता है जो अतुल के साथ हुआ. लड़की बच्चे को लेकर मायके चली जाती है. फिर शुरू होता है ब्लैकमेल का खेल. एलीमनी के रूप में मोटी रकम मांगी जाती है. लड़के वाले घबड़ाकर समझौता कर लेते हैंनहीं करते तब 498-A सहित कितने ही मुकदमें लड़के वालों के खिलाफ दायर कर दिए जाते हैं.

उनके अनुसार साधारण परिवार बेटी के माध्यम से रात-रात में धनी हो जाना चाहते हैं. ऎसे भी उदाहरण हैं कि कुछ लड़कियों ने तीन विवाह किए और करोड़ों रुपए लेकर अपना भावी जीवन सुखी बनाने के सपने देखे. कितना सुखी हो पायी होंगी यह तो वही बता सकती हैं. मैंने एक महिला का वीडियो सुना जिसके तलाक को दस वर्ष हो चुके थे. छोटी-छोटी बातों में अपने परिवार वालों के भड़काने पर वह पति से लड़ती थी. एक दिन उसके भाई ने उसके पति को मारा और बहन को वापस ले गया. उसका पति उसे लेने गयालेकिन भाई के भड़काने के कारण वह उसके साथ नहीं गयी. अंततः तलाक हुआ. उसे जो एलीमनी मिली उसके भाई और परिवार के लोगों ने रख ली. उसके पति ने दूसरा विवाह कर लियाजिससे उसे दो संतानें थींलेकिन वह लडकी अविवाहित रहीक्योंकि भड़काने वाला भाई अपने विवाह के बाद उसे भूल गया था. वह युवती दस वर्षों से पश्चाताप की अग्नि में झुलस रही थी. औरों के साथ भी यह कहानी दोहरायी जाती होगी. लेकिन जब तक उन्हें होश आता है तब तक बहुत विलंब हो चुका होता है.  

 भारत  में एक समय सभी वर्गों की महिलाएं प्रताड़ित थीं. निम्न वर्ग और निम्न मध्यवर्ग में यह प्रताड़ना आज भी जारी है, पचास प्रतिशत मध्यवर्ग की महिलाएं भी प्रताड़ित हैं, लेकिन उच्च मध्य वर्ग और उच्च वर्ग की महिलाएं प्रताड़ित नहींपुरुषों को प्रताड़ित कर रही हैं. मध्यवर्ग की वे लडकियां जो पढ-लिखकर नौकरी करती हैं या नहीं भी करतीं वे भी इस दौड़ में शामिल हैं, बल्कि इसी वर्ग की लड़कियां अधिक ही पतियों को प्रताड़ित कर रही हैं.

लगभग दो वर्ष पहले जब एक लेखिका ने ’पुरुष विमर्श’ की कहानियों के सम्पादन के बारे में चर्चा करते हुए मुझसे पूछा, "सरआपके अनुसार आज कितने प्रतिशत पुरुष पत्नियों द्वारा प्रताड़ित होंगे?" मेरा उत्तर था, "पचीस-तीस प्रतिशत."

 "नहीं सरसाठ से सत्तर प्रतिशत." तब मैं उसके उत्तर से चौंका था. यकीन नहीं हुआ था. लेकिन बाद में मैंने पाया कि उसने सही कहा था. ऎसा कैसे हो रहा है. इसके लिए अलग-अलग लोगों के अपने तर्क हैं. लेकिन दो बातों में सभी सहमत हैं-- 1. नारीवादियों द्वारा चीजों को गलत प्रकार से प्रस्तुत करनाजिसमें परिवार विच्छिन्नता को दरकिनार करते हुए केवल आत्मसुख की बात उन्हें समझायी गयी. 2. पश्चिम की अर्थवादी मानसिकता. ऊपर बताए युवकों  के मामले इसका ज्वलंत उदाहरण हैं. अपने शोध में मुझे और भी ऎसे ही मामले सुनने/पढ़ने और जानने को मिले.

मई,2024 को सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति जेबीपारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्र की पीठ ने कहा कि 498-A के 95% मामले झूठे होते हैं. उन्होंने विधि मंत्रालय को लिखा था कि 1 जुलाई,24 से जारी होने वाले बी.एन.एस. कानून में इस कानून को और रिलैक्स किया जाएजिससे निर्दोष लोगों को परेशानी से बचाया जा सके. लेकिन तीन तलाक मामले के बाद चुनाव में मुस्लिम महिलाओं से मिले समर्थन के बाद सरकार ने महिलाओं के वोट बैंक’ की शक्ति को समझ लिया था और माननीय न्यायमूर्ति के सुझाव पर ध्यान नहीं दिया.

10 दिसम्बर,2024 को न्यायमूर्ति बीवीनागरत्ना और एनकोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि न्यायिक और सर्वविदित अनुभव है कि वैवाहिक कलह से उत्पन्न घरेलू विवाद में अक्सर पति और उसके परिवार के सभी सदस्यों को फंसाने की प्रवृत्ति बन गई है। ठोस साक्ष्यों या पुख्ता आरोपों के बगैर सामान्य या व्यापक आरोप आपराधिक मुकदमा चलाने का आधार नहीं बन सकते। ध्यान रहेतेलंगाना उच्च न्यायालय ने हाल ही में पूरे परिवार के खिलाफ दायर दहेज प्रताड़ना मामले को 498-ए के अंतर्गत चलाने की मंजूरी नहीं दी है। लेकिन निचली अदालतों पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों का कोई प्रभाव नहीं होता. परिणामस्वरूप वकील और पुलिस की मौज रहती है और सैकड़ों युवक प्रतिवर्ष पत्नियों और उनके परिवार वालों द्वारा सताए जाकर आत्महत्या करने के लिए विवश हो रहे हैं.

मेरे उपरोक्त कथन को पुरुषवादी सोच न समझा जाए. गलती पुरुष और उसका परिवार करता है तो उन्हें और यदि लड़की और उसके परिवार के लोग करते हैं तो उन्हें दण्डित किया जाना चाहिए. लड़की और उसके परिवार वालों के हौसले इसलिए बुलंद रहते हैं क्योंकि उनके  आरोप झूठे सिद्ध होने के बावजूद उन्हें कोई दण्ड नहीं दिया जाता.  लेकिन पुरुष और उसके परिवार को झूठे केस के कारण वर्षों अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं. अतुल और उसके परिवार के खिलाफ 9 मुकदमे थे. मामले को सेटल करने के लिए मोटी रकम की मांग की जा रही थी. जज साहिबा का कथन, “आपके पास इतने रुपए होंगे तभी न वह इतना मांग रही है”किसी भी युवक और उसके परिवार को तोड़ दे सकता है.  यहां 2019 से 2022 तक के पुरुषों और महिलाओं द्वारा की गई आत्महत्या के आंकड़ों से स्थिति की भयावहता को समझा जा सकता है. 2023 और 2024 के आंकड़े सरकार ने अभी तक जारी नहीं किए हैं.

 वर्ष                पुरुषों द्वारा आत्महत्या           महिलाओं द्वारा आत्महत्या

 2019             66815                                          25941

2020             73093                                           28005

2021             81063                                           28680

2022             83713                                           30771

 

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रतिवर्ष पुरुषों की आत्महत्या की संख्या बढ़ती गयी है.यह कहा जा सकता है कुछ आत्महत्याएं इतर कारणों से भी की गयी होंगी. लेकिन तब भी स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों की संख्या तीन गुना ही रही होगी और ऎसे पुरुषों की आत्महत्या का कारण लड़की और उसके परिवार वाले ही रहे होंगे. इस विषय पर न्यायपालिका,विधायिकाकार्यपालिकासमाज के जागरूक लोगोंसंस्थाओं को गंभीर चर्चा करना आवश्यक है. ऎसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आज बहुत से युवक विवाह के प्रति उदासीन हो रहे हैं, बल्कि  बचने लगे हैं. पश्चिम की देन लिव-इन बढ़ रहा है. इससे सामाजिक व्यवस्था के नष्ट होने का खतरा बढ़ रहा है.

क्षिण कोरिया और जापान में लड़कियां रूढ़िवादी कारणों से विवाह से बच रही हैंजबकि वहां ऎसा कुछ भी नहीं है. दक्षिण कोरिया इस बात से परेशान है कि यदि यही स्थिति रही तो एक समय के बाद वहां लोग नहीं बचेंगे. जबकि भारत में लड़के केवल अतुल और निशांत  जैसे युवकों की स्थिति देखकर विवाह नहीं करना चाह रहे. विषय गंभीर है.

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