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सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

पुस्तक चर्चा



डॉ. ज्योतिष जोशी की आलोचना पुस्तक उपन्यास की समकालीनता में मेरे  उपन्यास ’पाथर टीला’ के विषय में डॉ. जोशी के विचार.  

देखे, जिये और महसूस किये गये समय से साक्षात्कार

डॉ. ज्योतिष जोशी


इधर विषय के स्तर पर उपन्यास को अनेक स्तरों पर साधने की तत्परता जगी है. यह भी लक्ष्य किया जा सकता है कि नगरीय समस्याओं और अनेक दृष्टियों से आक्रान्त करने वाली मुश्किलें हिन्दी उपन्यासों के केन्द्र में रही हैं; पर भारतीय गॉंवों की बदहाली और उनकी लगातार बदशक्ल होती गयी तस्वीर को उठाने की कोशिशें कम देखी गयी हैं. यह हैरान करने वाली बात है कि बार-बार प्रेमचन्द की परम्परा और उनकी संवेदना के उत्तराधिकार का दम भरनेवाले लेखकों में अधिकांश ने प्रेमचन्द की चिन्ताओं की तो कौन कहे, उनकी परम्परा में भी कुछ जोड़ा हो; यह विश्वासपूर्वक कहना कठिन है. ऎसे में जब कोई लेखक गॉंव में आ रहे परिवर्तनों, उसकी मुश्किलों, साम्प्रदायिक तनावों और नारकीय यन्त्रणा भोग रहे ग्रामीणों को चित्रित करने की चेष्टा करता है, तो यह निश्चय ही प्रशंसनीय कार्य है; तब और भी जब गॉंव आज लेखन के हाशिये पर है और वह एक योजना के तहत ही कभी-कभी याद कर लिया जाता है और वह योजना होती है –यान्त्रिक ढंग से गॉंव को बदल डालने की, जिसका गॉंवों के सन्दर्भ में कोई वास्तविक महत्व नहीं है. 

रूपसिंह चन्देल अपने लेखन में उक्त दोनों तरह की प्रवृत्तियों से अलग हैं. उनकी कहानियां जीवन के गहरे कशमकश की उपज हैं तो उपन्यास देखे, जिये और महसूस किये गये समय से साक्षात्कार. उनके यहां वर्णित यथार्थ के स्वरूप से असहमति बिठायी जा सकती है, चरित्रों के प्रति उनके बर्ताव और उसके निहितार्थों से भी मतभेद की गुंजाइश हो सकती है, पर उनकी लेखकीय ईमानदारी पर संदेश करना अनुचित होगा. यथार्थ के जिन पक्षों पर बात करने का रिवाज इधर आम हुआ है, यह जरूरी नहीं है कि हर लेखक उसी तानेबाने में अपने को व्यक्त करे और स्वयं की देखीभाली तथा जी गयी वास्तविकता से आंखें चुरा ले. रूपसिंह चन्देल का कथाकार अपने पर भरोसा अधिक करता है, इसलिए उस पर वे लोग भरोसा कम कर सकते हैं जिन्हें अब भी मुगालता है कि रचना अनुभव से कम सामाजिक अध्ययनों से अधिक वास्तव रखे तो समाज में क्रान्तिकारी बदलाव आ सकता है.

’रुकेगा नहीं सवेरा’ और ’रमला बहू’  के बाद चन्देल ने जिस ’पाथरटीला’   उपन्यास को लिखा है उसमें उपर्युक्त उठाये गये प्रश्नों की छाप है और अनेक स्तरों पर लेखक के विन्यास को ग्रामीण यथार्थ के अधिक निकट मानने की मजबूरी भी पैदा होती है. ’पाथरटीला’ गांव तो एक उदाहरण है उस अंधेरे का जो उत्तर भारत के गांवों में पसरता जा रहा है. अनेक धड़ों, वर्गों और जातियों में बंटे ग्रामीण किसी अघोषित जमींदार के रैय्यत से अधिक अहमियत नहीं रखते और कई बार उस जालिम जमींदार के कहे पर ऎसे-ऎसे काम अंजाम देते हैं जो विश्वसनीय तो नहीं लगते, लेकिन उन पर सन्देह करना भी सम्भव नहीं होता. यह कम हैरानी की बात नहीं है कि प्रेमचन्द के बाद गांव रचनाओं से इस कदर बाहर हो गये कि दशकों तक गांव का जीवन परिदृश्य से बाहर रहा. बहुत बाद में जब कुछ लेखकों ने उपन्यासों में गांव को उठाने की कोशिश की, पर गांव इस बीच इतने बदल चुके थे कि लेखकीय संवेदना उन्हें पूरी तरह पकड़ने में सफल नहीं हुई. कहीं बाढ़ की विभीषिका से गांव का दारिद्र्य उभरा तो कहीं भोले सीमान्त किसानों का शोषण. कहीं सम्बन्धों में पैसे के कारण आ रहे खिंचाव प्रस्तुत हुए तो कहीं राजनीति के चलते अवरुद्ध हुई विकास-यात्रा की तस्वीरें उभरीं. पर सबके साथ मुश्किल यह लक्ष्य करनेवाली है कि असमान भूमि के वितरण और जाति केन्द्रित श्रेष्ठता के आधार पर जिस तरह सामाजिक ढांचा निर्मित होता गया है; उसे उसकी जटिलताओं में पकड़ने की चेष्टा कम हुई है. यही कारण है कि लगभग पैंसठ वर्षों के गुजर जाने के बाद भी गांवों की वही तस्वीर हिन्दी कथाकृतियों में दिखायी देती है जिसका आरम्भ प्रेमचन्द ने किया था, उसके आगे का विकास आरुद्ध रहा है और गांव एक पहेली होते गये हैं. ऎसे में ’पाथरटीला’ एक ऎसा उपन्यास अवश्य बन सका है जो हाल के वर्षों में आये गांव के बदलाव को रेखांकित करता है और बताता है कि दरअसल खोट कहां है. गजेन्द्र सिंह, जो गांव का नम्बरदार है और दबंग भूमिपति, वह इस उपन्यास का नायक है. इस बीच आयी अनेक समीक्षाओं में लोगों ने चन्देल पर गजेन्द्र सिंह को नायकत्व देने के प्रसंग में आपत्ति की है और एक नकारात्मक चरित्र को कथा के केन्द्र में रखने को अनुचित ठहराया है, पर यह आरोप बेबुनियाद है. गजेन्द्र सिंह प्रभुवर्ग का प्रतिनिधि है. उपन्यास की पूरी कथा चूंकि उसके इर्द-गिर्द बुनी गयी है, इसलिए केन्द्रीयता उसे हासिल हो जाती है. पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह उपन्यासकार की सहानुभूति पा गया है या वह कोई आदर्श चरित्र की छवि पा जाता है. यह एक तरह के प्रतीकात्मक प्रयोग के तौर पर भी देखे जाने को प्रस्तावित करता है; जब सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में सत्ता ऎसे ही बाहुबलियों के हाथों में सिमट आयी है. गजेन्द्र सिंह के नायकत्व पर आपत्ति करने वालों से यह पूछा जाना चाहिए कि गांव, पंचायत, कस्बा, नगर, प्रान्तीय और केन्द्रीय राजधानी में बैठे सत्तापुरुष क्या पवित्र या नैतिक दृष्टि से इस योग्य हैं कि उन्हें सत्ता का दायित्व दिया जा सके? वस्तुतः इस प्रसंग में विचारणीय यह है कि वे सत्ता छीन लेते हैं, देने की जरूरत नहीं रह जाती. अब प्रश्न यह उठता है कि जो जीवन में पाखण्ड और अय्याशी का प्रतिनिधि है, वही अगर रचना में दिखायी देता है तो असुविधा क्यों होनी चाहिए. गजेन्द्र सिंह को दायित्व मिलता नहीं, वह ले लेता है. उसका वह चरित्र है कि वह दूसरे के अधिकारों का उपभोग करता है और तनिक भी विचलित नहीं  होता. उपन्यास पाठक को प्रेरित करता है कि वह ऎसे नायकों का समूल नाश करे. ऎसे नायकों से उसे निजात पाना चाहिए न कि उसको आदर्श बनाना चाहिए.

’पाथर टीला’ का नायक लम्पट और क्रूर गजेन्द्र सिंह धन और शक्ति को बढ़ाने के प्रायः प्रत्येक खेल में माहिर है और लगातार ऎसे उद्यम करता रहता है. बरियार बाबा को अपना पूर्वज घोषित कर उनके नाम मन्दिर बनाने के अभियान से लेकर अपने विश्वस्त लोगों के दोहन करने तक गजेन्द्र सिंह एक आततायी के रूप में सामने आता है. वह हर स्तर पर असामाजिक कार्य करता जाता है. मन्दिर निर्माण के नाम पर चन्दे की उगाही, भैरोसिंह को मृत घोषित कर उनकी जायदाद को हथियाना, धर्मशाला की दखल-दहानी और धन की आय के लिए अपने ही घर में जुए और नशे का धन्धा करना गजेन्द्र सिंह की आदत है. उसके खिलाफ कोई चूं तक नहीं बोलता. गांव के कथित प्रधान हरिहर अवस्थी उसके इस्तेमाल की चीज बनकर रह गये हैं जिनकी कोई हैसियत नहीं बन पाती. गजेन्द्र सिंह की पत्नी सुनन्दा अक्सर उसे समझाने का यत्न करती है, पर सब व्यार्थ सिद्ध होता है. कमली गजेन्द्र सिंह की भतीजी है जो मां-बाप के गुजर जाने के बाद अनाथ है और अपने इस दैत्य चाचा के साथ रहने को विवश है. वह आये दिन उस पर अत्याचार करता है और चुपचाप सहने के सिवा कमली के पास कोई चारा नहीं रह जाता. डॉ. गोविन्द श्रीवास्तव गजेन्द्र सिंह के मददगार हैं तो स्थानीय पुलिस उसका संरक्षक. रामदीन, गनपत, रामरतन, शिवरतन, जग्गू आदि उसके साम्राज्य के गण हैं जो धीरे-धीरे गजेन्द्र का ग्रास बनते हैं और वह सबकी दुर्दशा का कारण बनता है.


उपन्यास में हरिहर अवस्थी, बलजीत सिंह, रघुवीर सिंह, विलायती खां, बुधवा, बलवीर, पुत्तन पांडे और अजय जैसे चरित्र भी हैं जो गजेन्द्र सिंह के अत्याचारों का समर्थन नहीं करते, पर उसके सीधे विरोध का साहस उनमें नहीं है. गजेन्द्र तो उल्टे अपने ही लोगों को एक-एक कर किसी न किसी बहाने पुलिस के सुपुर्द करता रहता है, पर हरिहर अवस्थी जैसे प्रधान सच्चाई जानने के बावजूद अपनी जुबान खोलने से डरते हैं. गजेन्द्र का अत्याचार बढ़ता जाता है और वह दुगने उत्साह से आंतक फैलाता है वह विलायती खां के मस्जिद बनाने के फैसले को चुनौती देता है और गांव में साम्प्रदायिक तनाव फैलाता है. गजेन्द्र सिंह के अनाचार का आलम यह है कि उसके सामने टिकने की हिम्मत किसी में नहीं है; पर वह अपने ही घर में पराजित होने लगता है. उसकी भतीजी बलजीत सिंह के बेटे अजय से प्रेम करने लगती है और कड़े शासन के बावजूद उससे मिलने में नहीं हिचकती. अजय शहर में पढ़ता है, उसमें प्रतिरोध की आग है, पर गांव में कोई साहस के साथ आगे नहीं आता कि वह इस दैत्य का सामना कर सके.

स्थितियां बदल जाती हैं. कमली विद्रोह करने को तैयार है, मस्जिद की नींव रख दी जाती है, मजदूर एक स्वर से गजेन्द्र सिंह के खेत में काम न करने का निर्णय लेते हैं, बलजीत सिंह और अजय को गजेन्द्र सबक नहीं दे पाते और अपने साथियों के डकैती में पकड़े जाने के साथ-साथ जुआ और नशाखोरी के धन्धे के खत्म हो जाने के कारण गजेन्द्र प्रकृति के न्याय का शिकार होता है. वह पागल हो जाता है और मृत्यु के मुंह में चला जाता है.

’पाथरटीला’ में गजेन्द्र सिंह के साम्राज्य के ध्वस्त होने की कथा अविश्वसनीय नहीं लगती. उपन्यासकार ने सामाजिक विद्रोह के मुकाबले प्रकृति के न्याय का अवलम्ब लेकर जिस तरह गजेन्द्र सिंह की मृत्यु को दिखाया है, वह इस स्तर पर भी श्लाघ्य है कि व्यक्ति भले ही अपने दायित्व भुला बैठे, प्रकृति अपना दायित्व नहीं भूलती और वह समय पर अपना निर्णय अवश्य सुनाती है. लोगों को लग सकता है कि यदि जनता विद्रोह कर उसे सजा देती तो उपन्यास अधिक सकारात्मक होता; पर यह तब कृत्रिम विधान होता; क्योंकि पूरे उपन्यास में सारी असहमतियों के बावजूद इस विद्रोह की पृष्ठभूमि दिखायी ही नहीं देती, इसलिए उपन्यासकार का निर्णय अनुचित नहीं लगता. प्रश्न यह अवश्य उठता है कि आजादी के ५० वर्षों बाद भी क्या गांवों तक उसकी छाया भी पहुंच पायी है? क्या इन स्थितियों को जानने की जरूरत भी किसी ने महसूस की है या गांवों की दशा सुधारने की कोई कोशिश भी किसी ने की है?

आजादी के वर्षों बाद यह एक भारतीय गांव की तस्वीर है. यह उन गांवों की भी तस्वीर है जिन्हें विकास का मॉडल बनाया जा रहा है और जिसे लेकर तरह-तरह की योजनाएं बनायी जाती हैं.

’पाथरटीला’ में गांव की जो शक्ल-सूरत है, वह कहीं से भी अविश्वसनीय नहीं है. निरक्षर, जड़, दकियानूस, दब्बू और संघर्ष से भागनेवाले लोग यदि नहीं हुए होते तो गजेन्द्र सिंह जैसे प्रभुओं की कैसे चल पाती. आततायी पुलिस ऎसे ही प्रभुओं को संरक्षण देती है और सत्ता में बैठे ओहदेदार भी. उपन्यास में शोषित और शोषक के बीच के फर्क की कोई शास्त्रीय व्याख्या नहीं है और न विभाजन. इधर निम्न और मझोली जातियों में आयी सामाजिक जागृति की छाया से भी उपन्यास दूर है. अगर ऎसा होता तो उपन्यास में गजेन्द्र सिंह के समानान्तर हरिहर अवस्थी, बलजीत सिंह या विलायती खां नहीं होते, वहां तब जग्गू, गनपत और शिवरतन होते. गजेन्द्र का अनाचार केवल मजदूरों के काम न करने के निर्णय से प्रभावित नहीं हो सकता. उसके लिए सामाजिक परिवर्तन और संघर्ष भी आवश्यक है. गजेन्द्र सिंह के मन्दिर निर्माण की योजना के बाद ही विलायती खां को मस्जिद कि सुधि क्यों आती है; यह प्रसंग भी उपन्यास में थोड़ा अटपटे ढंग से आता है और स्थितियों को उनके उत्कर्ष तक पहुंचने से रोक देता है. पर उपन्यास में एक व्यक्ति के आतंक और उसके भय से आक्रान्त ग्राम्य-जीवन के स्तरों, विडम्बनाओं और उसकी छवि देखनी हो तो ’पाथरटीला’ हाल के वर्षों में लिखे गये उपन्यासों में अवश्य ही उल्लेख्य माना जाएगा.

इस उपन्यास में एक ही साथ तीन कथाएं अनुस्यूत हैं –पहली और मुख्य कथा है गजेन्द्र सिंह की, दूसरी है बलजीत सिंह की और तीसरी रामलुभाया श्रीवास्तव की, जिनके पुत्र डॉ. गोविन्द श्रीवास्तव हैं और वे भी गजेन्द्र सिंह की सत्ता में सहायक बनते हैं. उपन्यास में आयीं तीनों कथाएं परस्पर सम्बद्ध हैं और उनमें एकाध स्थलों को छोड़कर कहीं कोई गतिरोध नजर नहीं आता. पर जैसा कि ऎसे महत्वाकांक्षी उपन्यासों की नियति होती है –उपन्यास में इतने चरित्र हैं कि उनका विकास ही नहीं दिखता. विलायती खां, बलजीत सिंह और सुनन्दा में बहुत-सी सम्भावनाएं थीं जिसे चन्देल ने अनदेखा किया है. अजय भी उपन्यास में भविष्य का संवाहक बनते-बनते रह गया है और बोलने से आगे कुछ नहीं कर पाता. अगर चन्देल उसे आगे आकर सीधे विद्रोह करने और कमली से अपने प्रेम को सार्वजनिक कर उसे एक निश्चित दिशा देने में अपनी भूमिका निभाने का अवसर देते तो शायद उपन्यास में एक आवेग आता. ’पाथर टीला’ की एक मुश्किल यह भी है कि इसके चरित्र अकेले में कुछ सोचते-विचारते नहीं लगते. उनमें अपने कर्म नहीं खटकते. इसका जीवन्त उदाहरण स्वयं गजेन्द्र सिंह है जो कभी भी चिन्तित नहीं दिखायी देता. वह कभी सोचता भी नहीं कि वह क्या कर रहा है और किन परिस्थितियों में घिरता जा रहा है. यह रूपसिंह चन्देल की एक बड़ी कमजोरी मानी जाएगी.

पर समग्रता से देखें तो कुछ कठिनाइयों के बावजूद ’पाथरटीला’ को आज के गांवों के परिप्रेक्ष्य में अनुभव, भाषा, विन्यास और संरचना के स्तर पर अच्छा उपन्यास अवश्य कहना होगा; क्योंकि गांव की विकृतियों के बहाने चन्देल ने सामाजिक जीवन की एक बड़ी जवाबदेही को इस उपन्यास में रेखांकित किया है, जिसके महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता.
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’उपन्यास की समकालीनता’
लेखक – डॉ. ज्योतिष जोशी
भारतीय ज्ञानपीठ,
१८, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड,
नयी दिल्ली-११० ००३
पृ.२४०, मूल्य: २००/-


पाथर टीला – रूपसिंह चन्देल
प्रथम संस्करण (१९९८-सामयिक प्रकाशन)
संस्करण – २०१० (भावना प्रकाशन, १०९-A,
                         पटपड़गंज, दिल्ली-११० ०९१)
पृष्ठ – ३१६, मूल्य – ४५०/-
आवरण : राजकमल

फोन : भावना प्रकाशन – ०९३१२८६९९४७/ ०११-२२७५४६६३



रविवार, 19 दिसंबर 2010

पुस्तक चर्चा

छाया - बलराम अग्रवाल

भूमिका

अबाधित पठनीयता

रूपसिंह चन्देल

‘विष्णुगुप्त चाणक्य’ जैसे कालजयी उपन्यास के प्रणेता वरिष्ठ रचनाकार वीरेन्द्रकुमार गुप्त की कृतियों में न केवल जीवन की वैविध्यता परिलक्षित है प्रत्युत उनका विशिष्ट जीवन-दर्शन भी उद्भासित है । उनके उपन्यास ‘प्रियदर्शी’ और ‘विजेता’ बौद्धदर्शन की एकदम नवीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं तो पस्तुत उपन्यास ‘जीवन के सात रंग’ में वह प्रेम के सात रूपों को सहज और सरल रूप में चित्रित करने में सफल रहे हैं । न केवल उनके पूर्व प्रकाशित उपन्यासों बल्कि प्रस्तुत उपन्यास से भी यह सिद्ध होता है कि वह कथाकार मात्र नहीं , चिन्तक , विचारक और विश्लेशक भी हैं और ये विशेषताएं उन्हें अन्य समकालीन रचनाकारों से अलगाती हैं ।

आजीवन साहित्य और शिक्षा , अध्ययन और अध्यापन के लिए समर्पित वीरेन्द्र जी सदैव भीड़ से अलग रहकर एक साधक की भांति कर्मलीन रहे, आत्म-प्रक्षेपण की कला वे न सीख सके और शायद यही कारण रहा कि उनके साहित्यिक अवदान का प्राप्य उन्हें नहीं मिल सका । उन्होंने जैनेन्द्र जी का अभूतपूर्व साक्षात्कार किया , जो ‘समय और हम’ शीर्षक से जैनेन्द्र जी के नाम से प्रकाशित हुआ । यह विश्व में एक साहित्यकार का एक साहित्यकार द्वारा किया गया सबसे वृहद् साक्षात्कार है , जिसमें साक्षात्कर्ता अर्थात वीरेन्द्र जी को पृष्ठभूमि में डाल दिया गया।

वीरेन्द्र जी परिवेश , वातावरण और पात्रानूकूल भाषा का निर्वाह कर कृति को प्रवाहमय और सरस बना देते हैं । शिल्प के प्रति न वह लापरवाह हैं और न ही दुराग्रही । पात्रों और घटनाओं को वे उनके अपने अंतर्वेग से बहने देते हैं, उन पर छाते नहीं । पाठक भी उनकी दृष्टि से कभी ओझल नहीं होता ।

‘जीवन के सात रंग’ का केन्द्रीय विषय प्रेम है । ‘प्रेम’ शब्द कहने-सुनने में जितना सामान्य प्रतीत होता है उतना ही यह गूढ़ है । दो खण्डों में विभक्त इस उपन्यास में वर्तमान से लेकर पूर्वजन्म के प्रेम से पाठक का साक्षात होता है । मंजु और कमल का प्रेम उनमें से एक है जिसमें नारी का एक ऐसा स्वरूप प्रकट होता है जो अपने पूर्व प्रेमी अर्थात् कमल से घृणा करने के बावजूद उसे अंत तक अंतर्तम से प्रेम करती रहती है । प्रेम के भिन्न-भिन्न रूपों को चित्रित करते इस उपन्यास में आद्यंत औत्सुक्य और अबाधित पठनीयता विद्यमान है ।

01.03.2010

बी-3/230 , सादतपुर विस्तार ,
दिल्ली - 110 094
मो. 09810830957
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जीवन के सात रंग - वीरेन्द्र कुमार गुप्त
भावना प्रकाशन, A-109, पटपड़गंज,
दिल्ली - ११० ०९१
पृष्ठ -२२५, मूल्य - २५०/-

बुधवार, 24 नवंबर 2010

पुस्तक चर्चा

चित्र : एस. राजशेखर
स्व. कन्हैयालाल नन्दन की आत्मकथा का एक अंश

कवि-पत्रकार स्व. कन्हैयालाल नन्दन की आत्मकथा के दो खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं. पहला खण्ड – ’गुजरा कहां कहां से ’ ’राजपाल एण्ड संस, मदरसारोड,कश्मीरी गेट, दिल्ली – ११० ००६से प्रकाशित हुआ, नदंन जी के अनुसार (दूसरे खंड की भूमिका), जिसे पाठकों का अपार प्यार मिला. उससे उत्साहित होकर उन्होंने दूसरा खण्ड लिखा जिसे –’कहना जरूरी था’ शीर्षक से सामयिक प्रकाशन , दरिया गंज , नई दिल्ली – ११० ००२ ने २०१० में प्रकाशित किया. प्रस्तुत है इसी खण्ड से एक महत्वपूर्ण अंश.

कोरा कागज कोरा ही रह गया

वह कोशिश भी मैंने तब की जब मैंने भारतीजी के मन में यह पूरी तरह स्थापित कर दिया कि कानूनी तौर पर मेरी गलतियां निकालकर और मुझे दोषी करार देकर वे मुझे ’टाइम्स ऑफ इंडिया’ से नहीं निकाल सकते. मेरे इस विश्वास के पीछे बहुत बड़ा हाथ था – इस्टैब्लिशमेंट डिपार्टमेंट के पहले उपप्रमुख और बाद में प्रमुख बने श्री कनैयालाल लालचंदानी का, जो मेरी संवेदनशीलता, मानसिक त्रास, मेरी सज्जनता और मेरी सहृदयता , सभी के गहरे प्रशंसक थे. मेरी कर्मनिष्ठा से वे ’धर्मयुग’ में एक-एक कदम से परिचित थे और भारतीजी के भेजे शिकायत-पत्रों के भी वे श्रेष्ठतम गवाह थे. उन्होंने तो मुझे यहां तक कह रखा था कि कोई भी बात मुझे इतनी गंभीरता से नहीं लेनी चाहिए कि वह मेरे स्वास्थ्य पर असर डाले. जहां तक नौकरी का सवाल है, उनके शब्द थे – ’मेरे रहते भारतीजी आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे, ऎसा मैं आपको वचन देता हूं.”

मैंने उनसे जिरह की कि भारतीजी जब जान जाएंगे कि आप मेरे प्रति सहृदय हैं, तो वे मेरे खिलाफ किसी इंक्वायरी में आपको नहीं रहने देंगे. इस पर उनका कहना था कि “नंदन जी, ऎसी स्थिति तभी आएगी, जब ’टाइम्स ऑफ इंडिया’ मुझे नौकरी से निकाल देगा और यदि ऎसी स्थिति भी आई, तो मैं उनके नौकरी छोड़ने तक की स्थिति पैदा कर दूंगा.”

बहरहाल, इस सीमा तक की आश्वस्ति ने मुझे और मेरे जीवन को काफी सहज बना दिया था, लेकिन मैं आश्वस्ति की अभिव्यक्ति भी अपने व्यवहार से नहीं होने देना चाहता था. शायद भारतीजी भी बहुत कुछ इस बात को समझ गए थे कि कंपनी के कायदे-कानून ऎसे हैं कि वे मुझे तो क्या, अब एक मामूली क्लर्क आर.डी. शाह तक को नहीं निकाल सकते. भले कोई खुद ही हारकर नौकरी छोड़ जाए तो बात दूसरी है.

कुछ इन्हीं स्थितियों में मैंने एक दिन अपने मन को टटोला और जब उस दिन का सारा काम समाप्त हो अया, तो मैंने भारतीजी से इंटरकाम पर उनसे कुछ विचार-विमर्श करने की अनुमति मांगी. उन्होंने केबिन में आने को कहा, तो मैं एक कोरा कागज लेकर उनके पास पहुंचा और बोला, “डॉ. साहब, मैं आपसे एक बात करना चाहता हूं कि आप मुझे रोज-रोज जलील होने की स्थितियों में डाल देते हैं, मैं इसके योय व्यक्ति नहीं हूं. आप मुझे नहीं रखना चाहते, निकालना चाहते हैं, तो प्रेम से निकालिए, जलील करके नहीं. इसलिए आप मुझे निकालिए तो प्रेमपूर्वक. यह कोरा कागज मैं दस्तखत करके आपको सौंपता हूं, आप इस पर जो चाहें लिख लें.”

भारतीजी उस समय पेंसिल-रबड़ हाथ में लेकर अपने डमियों के शिड्यूल की उठापटक कर रहे थे. चौथे पेज को चौदहवें पर और चौदहवें को चौंतीसवें पेज पर. ’धर्मयुग’ के स्वरूप को सुष्ठ बनाने के लिए वे अक्सर ऎसा करते ही रहते थे. उनके एक हाथ में रबड़ थी और एक हाथ में पेंसिल. मेरी बात सुनते ही वे इस कदर नाराज हुए कि हाथ की रबड़ डमी पर जोर से पटककर मारी और बोले, “गेटआउट फ्राम हीयर, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है.” उन्होंने रबड़ इतने जोर से पटकी थी कि वह मेज से उछलकर केबिन के एक कोने में जाकर पड़ी.

मैंने सहमकर रबड़ उठाई, क्योंकि मैंने जानबूझकर ’ आ बैल मुझे मार’ किया था, और चुपचाप उनकी मेज पर रखकर केबिन से गेटआउट हो गया. मेरा कोरा कागज मेरे हाथ में मुझे उस शाम लगातार चिढ़ाता रहा और भारतीजी का सख्त नाराज होकर रबड़ पटकना एवं उस गुस्से की अभिव्यक्ति रबड़ की उछाल में करते हुए मुझे गेटआउट कहना, रह-रहकर मेरे दिमाग में घूमता रहा. भारतीजी ने इतनी जोर से शायद ही कभी किसी को ’गेट-आउट’ कहा हो.
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--- कहना जरूरी था – कन्हैयालाल नंदन
सामयिक प्रकाशन
३३२०-२१, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग,
दरियागंज, नई दिल्ली – ११० ००२

पृष्ठ : १७६, मूल्य : २५०

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पत्रिका

’समीक्षा’ पत्रिका अपने नए कलेवर में

४३ वर्ष पहले हिन्दी के वरिष्ठ और चर्चित आलोचक डॉ. गोपाल राय ने ’समीक्षा’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था. पुस्तक समीक्षा केन्द्रित इस पत्रिका ने कम समय में ही इतनी चर्चा प्राप्त की कि यह डॉ. राय के नाम का पर्याय बन गई. विश्वविद्यालय से अवकाश ग्रहण करने के बाद डॉ. राय जब दिल्ली आ गए तब पत्रिका का उनके साथ दिल्ली आना स्वाभाविक था. लेकिन दिल्ली आने के बाद पत्रिका उस प्रकार चर्चा में नहीं रही, जिसप्रकार वह पटना काल में रही थी. कारण जो भी रहे हों, लेकिन पत्रिका का प्रकाशन नियमित होता रहा. लंबे समय तक इसके प्रकाशन का दायित्व ’अभिरुचि प्रकाशन’ के श्री श्रीकृष्ण जी निभाते रहे और इस कार्य में डॉ. हरदयाल की अहम भूमिका रही. श्रीकृष्ण की अस्वस्थता के कारण ’अभिरुचि प्रकाशन’ के बंद हो जाने के बाद पत्रिका का प्रकाशन अन्यत्र से होने लगा … जो संतोषजनक नहीं था.

हाल में सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली के महेश भारद्वाज के इस पत्रिका से जुड़ने के बाद पत्रिका के स्वरूप में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ---- एक प्रकार से कायापलट कहना होगा. न केवल सामग्री के स्तर पर बल्कि कलेवर के स्तर पर भी. भारद्वाज की भूमिका इस पत्रिका में प्रबन्ध सम्पादक की है . सामग्री का चयन और सम्पादन सत्यकाम (डॉ. राय के पुत्र) करते हैं और उसका प्रकाशन और वितरण महेश भारद्वाज. महेश एक सुरुचि सम्पन्न युवा प्रकाशक हैं और प्रकाशन के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करना उन्हें पसंद है…… ’समीक्षा’ में यह प्रतिभाषित है.

महेश भारद्वाज के प्रबंध सम्पादकत्व में ’समीक्षा’ का दूसरा अंक हाल में प्रकाशित हुआ है, जिसमें सुरेन्द्र चौधरी को याद करते हुए डॉ. गोपाल राय का आलेख ’सांच कहौं--- ’, डॉ. नामवर सिंह की आलोचना पुस्तक –”हिन्दी का गद्यपर्व’ पर रवि श्रीवास्तव की समीक्षा, परमानन्द श्रीवास्तव की आलोचना पुस्तक ’ रचना और आलोचना के बदलते तेवर’ पर पूनम सिन्हा की समीक्षा, सहित कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक आदि विधाओं की लगभग १७ अन्य पुस्तकों की पुस्तकों की समीक्षा को इस अंक में स्थान दिया गया है.

’समीक्षा’ – (जुलाई-सितम्बर २०१०)
सम्पादक – सत्यकाम
प्रबंध सम्पादक – महेश भारद्वाज

प्रबंध कार्यालय
सामयिक प्रकाशन
३३२०-२१ जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग,
दरियागंज, नई दिल्ली-११००२

फोन नं ०११-२३२८२७३३

सम्पादकीय कार्यालय
एच-२, यमुना, इग्नू, मैदानगढ़ी,
नई दिल्ली – ११००६८

फोन : ०११-२९५३३५३४

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

पुस्तक चर्चा





समीक्षा से पहले कुछ बातें:

’पाथर टीला’ पर वरिष्ठ कवि-कथाकार अशोक आन्द्रे ने संचेतना के
लिए समीक्षा लिखी थी. समीक्षा प्रकाशित होने के पश्चात उपन्यास पर
राजनीति करने वाले कथाकारों में से एक ने (जिसका उपन्यास उन्हीं दिनों एक
नामी प्रकाशक के यहां से प्रकाशित हुआ था) प्रकाशक को फोन करके अपनी भड़ास
निकाली. उसके बाद उस लेखक ने छद्म नामों से मेरे पास फोन करना प्रारंभ
किया. कभी वह स्वयं आवाज बदलकर करता तो कभी अपने किसी मित्र से करवाता.
एक दिन फोन करने वाले व्यक्ति ने कहा कि वह जी.टी.वी. से बोल रहा है और
वह ’पाथर टीला’ पर जी.टी.वी. के लिए फिल्म बनाना चाहता है, क्योंकि यह
उपन्यास प्रेमचन्द्र की याद दिलाता है. प्रकाशक से अपनी भड़ास निकालते समय
भी कथाकार महोदय ने यह बात कही थी. जी.टी.वी. के नाम पर फोन करने वाले
व्यक्ति की बात से मैंने अनुमान लगा लिया कि इसे उन कथाकार महोदय ने वैसा
कहने के लिए कहा होगा. मैंने उससे कहा कि वह आकर मुझसे मिल ले. मिलने से
उसने इंकार करते हुए कहा कि मैं केवल मौखिक अनुमति मात्र दे दूं.

"मेरी जानकारी के अनुसार जी.टी.वी. किसी उपन्यास पर फिल्म नहीं
बनाता---फिर मेरे उपन्यास पर क्यों ?" मैंने पूछा.

"क्योंकि आपका उपन्यास पाठकों को प्रेमचन्द की याद दिलानेवाला एक
महत्वपूर्ण उपन्यास है."

"ओ.के.----" मैंने कुछ देर तक सोचने का नाटक किया फिर बोला, "आप
जी.टी.वी. के लेटर पैड पर अनुमति के लिए किसी वरिष्ठ अधिकारी से लिखवाकर
मुझे पत्र लिख भेजें .मैं उसका उत्तर दे दूंगा."

"उसकी आवश्यकता नहीं है. आपको मेरी बात का यकीन करना चाहिए."

"मेरी अनुमति तभी मिलेगी."

उसने फोन काट दिया.

इस घटना के कुछ दिनों बाद ही किन्हीं बरनवाल के नाम से फोन आया. आवाज
बदलकर वह फोन लेखक महोदय ही कर रहे थे. उसने कहा, "मैं आपके उपन्यास
’पाथर टीला’ पर जे.एन.यू. से एम.फिल. करना चाहता हूं. यह एक महत्वपूर्ण
उपन्यास है. प्रेमचन्द की परम्परा को आगे बढ़ाता है. आपसे अनुमति चाहिए."

"एम.फिल. या पी-एच.डी. करने के लिए किसी शोधार्थी को लेखक से अनुमति लेने
की आवश्यकता नहीं होती. मैं यह अवश्य जानना चाहता हूं कि आपका निर्देशक
कौन है ?"

"निर्देशक का नाम तय नहीं हुआ.. मैं आपसे फोन पर उसके बारे में कुछ
डिस्कस करना चाहता हूं."

"मिलकर बात करना बेहतर होगा. या तो आप मेरे कार्यालय आ जाएं या कॉफी होम
में मिलें और उससे बेहतर होगा कि मेरे घर पधारें."

"मिलने की क्या आवश्यकता---- आप फोन पर ही बता दें." उसने कहा.

"आप ’पाथर टीला’ पर कभी शोध नहीं कर पाएगें." मैंने फोन काट दिया था.

यह बात मैंने प्रकाशक स्व. जगदीश भारद्वाज जी (महेश भारद्वाज के पिता) को
बताई. उन्होंने उस कथाकार का नाम लेते हुए कहा, "चन्देल जी आप क्यों
परेशान हैं इस बात से --- परेशान तो वह है --- उसे रहने दें. आपके
उपन्यास की चर्चा ने उसकी दिन-रात की नींद उड़ा दी है. आप मस्त रहें---
अपना ध्यान लिखने में केन्द्रित करें और उन्हें इन सब मामलों में उलझे
रहने दें."

और मैंने जगदीश जी की बात मानकर उस विषय में सोचना बंद कर दिया था.

यहां यह उद्घाटित कर दूं कि यह वही कथाकार था जिसपर पिछले दिनों करोड़ों
रुपए के सरकारी घोटाले का आरोप लगा था.

प्रस्तुत है अशोक आन्द्रे की वह समीक्षा .

समीक्षा :

प्रेमचन्द की याद दिलाता है ’पाथर टीला’

* अशोक आन्द्रे

हिन्दी कथा साहित्य में गांव की बात आते ही अनायास प्रेमचन्द की याद ताजा
हो उठती है. प्रेमचन्द की रचनाओं में गांव की जिन समस्याओं को अभिव्यक्त
किया गया था, क्या आज के गांव उन समस्याओं से निजात पा चुके हैं ? यह
प्रश्न हिन्दी पाठक के मन को कुरेदता है और गांव से निकट से परिचित और
गांव से असंबद्ध ; किन्तु विभिन्न माध्यमों से गांव की आज की वास्तविकता
का परिचय पाते रहने वाले पाठक जानते हैं कि आजादी से पूर्व अर्थात
प्रेमचन्द काल में गांव जहां था, उसकी जो समस्याएं थीं, जितना अंधविशासों
में वह डूबा हुआ था, स्वतंत्रता के इतने वर्षों पश्चात भी वह वहीं है----
बल्कि तब से कहीं अधिक दारुण स्थिति में जी रहा है, आज का ग्रामवासी.

कथाकार रूपसिंह चन्देल का उपन्यास ’पाथर टीला’ आज के गांव की वास्तविक
छवि प्रस्तुत करता है. ’पाथर टीला’ एक गांव है, जिस पर उपन्यासकार ने
उपन्यास का शीर्षक दिया है, लेकिन यह केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश का ही
गांव नहीं है, बल्कि यह समस्याओं, राजनीतिक उठा-पटक, धार्मिक उन्मादों और
जीवन की विसंगतियों, विषमताओं आदि के कारण अपनी समग्रता में किसी भी
भारतीय गांव की यथार्थपरक छवि प्रस्तुत करता है.

’पाथर टीला’ एक खलनायक प्रधान उपन्यास है अर्थात उपन्यास का मुख्य पात्र
गजेन्द्र सिंह (जिसके काले कारनामें गांव को श्मसान में परिवर्तित कर
देना चाहते हैं ) उपन्यास का नायक है. हिन्दी में खलनायक प्रधान
उपन्यासों की परम्परा नहीं दिखती. इस दृष्टि से ’पाथर टीला’ के लेखक ने
जोखिम उठाते हुए जो कथा प्रस्तुत की है वह महत्वपूर्ण है. अंग्रेजी
साहित्य में ’गॉड फादर’ जैसे खलनायक प्रधान उपन्यासों की उल्लेखनीय
परम्परा हमें प्राप्त होती है. इस दृष्टि से ’पाथर टीला’ को हिन्दी में
उस परम्परा का प्रथम उपन्यास यदि कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी.

विवेच्य उपन्यास में उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद के गांव को कथानक का
आधार बनाया गया है. गांव की भाषा, खेत, खलिहान, तीज-त्यौहार, मेला,
व्यवसाय, रीति-रिवाज, संस्कार आदि विशेषताएं उपन्यास को आंचलिक उपन्यासों
की श्रेणी में भी ला खड़ा करती हैं, लेकिन फिर भी हम उसे एक अंचल विशेष
में सीमित नहीं कर सकते. जो कुछ हम ’पाथर टीला’ में पाते हैं वही सब
बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, या मध्य प्रदेश के किसी भी गांव में
देखा जा सकता है. हर गांव में आज एक गजेन्द्र सिंह उपस्थित है, जो
नव-पूंजीवादी -सामन्ती व्यवस्था का प्रतिरूप बन गांव का शोषण इस हद तक
करने के लिए तत्पर है कि गांव के लोग गोविन्द श्रीवास्तव या नत्थू की
भांति पलायन करने के लिए अभिशप्त हैं, या जमींदार के अत्याचारों को सहते
हुए गांव में ही घुटते रहते हैं.

’पाथर टीला’ का प्रारंभ गांव के बाहर एक ऊंचे टीले पर स्थापित बरियार
बाबा के चबूतरा के सामने मैंदान में लगने वाले मेला से होता है. गजेन्द्र
सिंह उस मेला का आयोजन करता है. बरियार बाबा एक किवदंती पुरुष हैं, जिनके
विषय में बुजुर्ग गोधन माली तक को अधिक कुछ पता नहीं. गोधन ने अपने
पूर्वजों से और उन्होंने अपने पूर्वजों से जो सुना था वह यही कि बरियार
सिंह उसी गांव के थे और गांव में एक मात्र पढ़े -लिखे धार्मिक पुरुष थे,
अविवाहित रहे थे जीवन भर. नीति-नियम के पक्के और लोगों का उन पर अटूट
विश्वास था कि वे किसी भी विपत्ति में गांव के लोगों की रक्षा करने में
सक्षम हैं. वृद्धावस्था में वे गांव के बाहर उस टीले पर आकर रहने लगे थे.
वे कितने वर्ष पहले थे यह कोई न जानता था, लेकिन गोधन का अनुमान था कि वे
ढाई-तीन सौ वर्ष पहले रहे होंगे. लेकिन गजेन्द्र सिंह का शातिर दिमाग
गांव के लिए देवत्व प्राप्त बरियार सिंह का भी यह कहकर इस्तेमाल करता है
कि वे उसके खानदानी थे. वह वहां प्रतिवर्ष मेला लगवाने की घोषणा करता है,
जिससे मूर्ति पर चढ़ावे के रूप में आए धन से वहां मंदिर बनवा सके. वह
मंदिर के लिए एक समिति गठित करता है, चंदा उगाहता है और सारी राशि शहर के
अपने बैंक खाते में जमा कर देता है. चंदे के रूप में डाक्टर गोविन्द की
दी हुई ईंट और सीमेण्ट से वह अपने घर का कुछ भाग बनवा लेता है. वह नत्थू
पहलवान का गलत कामों के लिए इस्तेमाल करना चाहता है, लेकिन उसके विरोध
करने पर उसे गांव छोड़ने के लिए विवश कर देता है. पुलिस के साथ किसी भी
आधुनिक माफिया की भांति उसका गहरा संबन्ध है.बाद में वह नत्थू के भाई को
पुलिस हिरासत में भेजवा देता है और छुड़ाने के लिए मध्यस्थता के बहाने
पैसा खाता है.

उसकी चौपाल के कई स्थाई सदस्य हैं जिनका इस्तेमाल अलग-अलग कामों के लिए
वह करता है. उसका जानवरों का घेर जुआ का अड्डा है और वहीं से वह अफीम और
चरस जैसे मादक पदार्थों का धंधा करता है. जुआ की लत गांव के अनेक लोगों
को डालकर वह उनकी सम्पत्ति हड़पता है तो मादक पदार्थों से अनेक परिवारों
को तबाह करता है. शहर से गांव में आ बसे बाबू बलजीत सिंह को एक शहरी
जुआरी के कत्ल के जुर्म में झूठे ही फंसा देता है. बलजीत सिंह का मित्र
बुधवा अहीर उसके पास जेवर रेहन रख पुलिस को रेश्वत दे बलजीत सिंह को
छुड़वाता है. रिश्वत में गजेन्द्र सिंह का हिस्सा निश्चित है. वह अपने घेर
में मादक द्रव्यों के धंधे के लिए भी पुलिस को निश्चित रिश्वत देता है.
पुलिस उसके हर अनुचित कार्य को जानते हुए भी ग्राम प्रधान हरिहर अवस्थी,
जो एक सरल हृदय व्यक्ति हैं, के दरवाजे न उतरकर उसी के दरवाजे उतरती है.
वास्तव में गजेन्द्र सिंह का गांव में इतना दबदबा है कि अवस्थी भी उससे
डरते हैं. शहरी के हत्यारे रामदीन से गजेन्द्र गांव के गरीब चरवाहे
सिड़िया के घेर में सेंध लगवाता है, लेकिन अनायास ही रामदीन सिड़िया की
हत्या कर देता है. सिड़िया के यहां रामदीन को कुछ नहीं मिलता; फिर भी
पुलिस का भय दिखाकर गजेन्द्र सिंह रामदीन से धन ऎंठना चाहता है, और
आतंकित रामदीन आत्महत्या कर लेता है.

गजेन्द्र सिंह अपनी मातृ-पितृ विहीना भतीजी कमली तक को नहीं छोड़ता. धन की
लिप्सावश वह कमली को दूर गांव में ब्याह देना चाहता है, जिससे वह अपने
पिता के सम्पत्ति की मांग न कर सके. विरोध करने पर वह उसे मारता-पीटता
है, उसके पढ़ने पर रोक लगाता है, लेकिन बाबू बलजीत सिंह के बेटे अजय और
उनकी बेटी अनीता से प्रेरित कमली पढ़ने की जिद करती है और बाहर शेर बना
रहने वाला गजेन्द्र सिंह घर में हारने लगता है. वह गांव के मजदूरों से भी
हारता है. जब वे उसके अत्याचार और कम मजदूरी के विरोध में फसल बुआई के
सही वक्त पर काम पर जाना बंद कर देते हैं. वह विवश होकर उनसे समझौता करता
है . वह गांव में साम्प्रदायिक सद्भाव को नष्ट करने का प्रयास करता है.
मुसलमानों की मस्जिद न बनने देने के षड़यंत्र करता है, लेकिन उसका मंदिर
तो नहीं बन पाता, मस्जिद की नीव हरिहर अवस्थी और बाबू बलजीत सिंह जैसे
प्रतिष्ठ्त ग्रामीणों द्वारा रखी जाती है. वह डाक्टर गोविन्द के घर डकैती
डलवाता है और उसे शहर पलायन के लिए विवश करता है. यही नहीं रेलवे स्टेशन
के सामने पचासों वर्षों से खाली पड़ी धर्मशाला में वह कब्जा करता है और
मिडिल स्कूल खोलता है, लेकिन उसके काले कारनामों से परिचित न तो ’पाथर
टीला’ का कोई व्यक्ति वहां अपना बच्चा भेजता है, न दूसरे गांव वाले. इसे
भी वह अपनी पराजय मानता है. वह तब और अधिक तड़फड़ाता है जब उसकी अवहेलना
करती कमली दलितों के बच्चों को एकत्र कर बुधवा के घर में अनीता के साथ
स्कूल चलाने लगती है. उसके पाले हुए बिल्ले, रंगा, कुक्कू जैसे लोग उसकी
अनुमति के बिना जब दूसरे गांव में डकैती डालते पकड़े जाते हैं, तब वह
बौखला जाता है और यहीं से उसमें विक्षिप्तता के लक्षण स्पष्ट होने लगते
हैं. अंत में वह विक्षिप्त हो पाण्डु नदी में डूब मरता है.

चन्देल एक कुशल शिल्पी की भांति विवेच्य उपन्यास में कथा कहते दिखते
हैं.अनेक उप-कथाएं उपन्यास को बल प्रदान करती हैं और लेखक की किस्सागोई
शैली (जिसका आज हिन्दी कथा साहित्य में प्रायः लोप होने लगा है) चन्देल
को प्रेमचन्द की परम्परा से जोड़ती है. लेकिन उपन्यासकार कई प्रश्न भी
छोड़ता है. पहला प्रश्न तो यही कि गजेन्द्र सिंह का मरना आवश्यक क्यों था
? क्या ऎसे पात्र मरते हैं ? यदि वह न मरता तो क्या उपन्यास का प्रभाव कम
होता ? दूसरा - कमली, हरिहर अवस्थी, अजय जैसे पात्र जब और विकास की दरकार
कर रहे थे तब उपन्यास का सिमट जाना अखरता है. गोविन्द और रमा के प्रसंग
को किंचित सीमित करके भी चित्रित किया जा सकता था. यदि इन जैसी कुछ
बातों को छोड़ दें तो कहना उचित होगा कि ’पाथर टीला’ बीसवीं सदी के अंतिम
दशक का एक उल्लेखनीय और अवस्मरणीय उपन्यास है.

****
अशोक आन्द्रे
१८८, एस.एफ.एस. फ्लैट्स,
जी.एच.-4/जी-17,
निकट मीरा बाग,
पश्चिम विहार,नई दिल्ली

मोबाइल : 09818967632

’पाथर टीला’ - रूपसिंह चन्देल
(संस्करण अक्टूबर,२०१०)
भावना प्रकाशन, 109-A, पटपड़गंज,
दिल्ली - 110 091

पृष्ठ - 327, मूल्य : 400/-

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

पुस्तक चर्चा



हाल में अप्रवासी चर्चित हिन्दी कथाकार और कवयित्री इला प्रसाद का कहानी संग्रह - ’उस स्त्री का नाम’ भावना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है. संग्रह की भूमिका मैंने लिखी, जो अविकल रूप से रचना समय के पाठकों के लिए प्रस्तुत है :
****
गहन जीवनानुभव की कहानियां

रूपसिंह चन्देल

अपनी रचनात्मक वैविध्यता के कारण प्रवासी हिन्दी साहित्यकारों में इला
प्रसाद की अपनी एक अलग पहचान है। वह न केवल एक सक्रिय और सशक्त कहानीकार
हैं बल्कि एक कवयित्री के रूप में भी उन्होंने अपनी रचनात्मकता को
सार्थकता प्रदान किया है। उनकी कहानियां जीवनानुभवों की सहज और स्वाभाविक
अभिव्यक्ति हैं जिनमें उनकी सूक्ष्म पर्यवेक्षक दृष्टि परिलक्षित है ।
छोटे वाक्य विन्यास और काव्यात्मक भाषा उन्हें आकर्षक बनाते हैं । संग्रह

की एक मार्मिक कहानी ‘एक अधूरी प्रेम कथा’ जिसमें बिना विवाह जन्मी
निमी की पीड़ा को इला ने गहनता से व्याख्यायित किया है, से एक छोटा
उदाहरण दृष्टव्य है ..‘‘वह सहसा उठकर बैठ गई । दीवार से पीठ टिका ली ।
तकिया गोद में । आंखें झुकीं । मुंह से पहली बार बोल फूटे -------
थैं क्यू दीदी ।’’

मैंने सदैव अनुभव किया कि जो कथाकार प्रकृति से कवि होते हैं उनकी
-रचना में काव्यात्मक स्पर्श अनायास ही संभव होता है और अनायास
काव्य-स्पर्शित रचना में प्रभावोत्पादकता अवश्यंभावीरूप से प्रादुर्भूत
हो उठती है । रचना में एक चुंबकीय पठनीयता होती हैए पाठक जिससे आद्यंत
गुजरे बिना मुक्त नहीं हो पाता । इला प्रसाद की कहानियों की यह विशेषता
है । उनकी कहानियों की विशेषता यह भी है कि वे ऐसे विषयों को भी अपने
कथानक का हिस्सा बना देती हैं ,जिनकी ओर सामान्यतया लेखकों का ध्यान
आकर्षित नहीं हो पाता । संग्रह की ‘हीरो’ या ‘मेज’ ऐसी ही कहानियां हैं ।

‘हीरो’ में गार्बेज डिस्पोजर खराब होने से प्रारंभ हुई कहानी प्लंबर जिम
के बहाने अमेरिकी जीवन को सहजता से रेखांकित करती है ,जहां ,‘‘हर जगह
पैसा। हर रिश्ते को ये पैसों से क्यों तौलते हैं ? सारी संवेदनाएं मर गई
हैं जैसे !’’

अमेरिका में रिश्ते किस प्रकार बेमानी हो चुके हैं ,इसका दिल दहला देने
वाला वृत्तांत है ‘उस स्त्री का नाम ’ । यह एक ऐसी भारतीय स्त्री की
कहानी है जो पति की मृत्यु के पश्चात दिल्ली की अपनी नौकरी छोड़कर अमरिका
में बेटे के रियल एस्टेट के व्यवसाय में सहायता करने के लिए अमेरिका जा
बसती है । रहस्य और रोमांच से आवेष्टित इस कहानी में लेखिका अंत में यह
उद्घाटित करती हैं कि जिस बेटे के लिए वह मां दिल्ली की अपनी नौकरी और
बिन ब्याही पैंतालीस वर्षीया बेटी को छोड़ आयी वह अमेरिकी जीवन.”शैली
जीता अपने व्यवसाय और अपने परिवार में डूबा वृद्धा मां को ‘ओल्ड एज लोगों
के रिटायरमेण्ट होम में रहने के लिए छोड़ देता है । संग्रह की अधिकांश
कहानियां अमेरिकी पृष्ठभूमि पर आधारित हैं जो प्रवासी भारतीयों के
जीवनचर्या को आधार बनाकर लिखी गई हैं । ‘मेज’ ,‘होली’ ,‘चुनाव’ ,
‘हीरो’ ,‘मिट्टी का दीया’ ,‘कुंठा’ आदि ।

इला प्रसाद की कहानियों में हमें मानवीय संवेदनाओ का सूक्ष्म विवेचन
प्राप्त होता है । ‘एक अधूरी प्रेम कथा’ए ‘मेज’ ए ‘उस स्त्री का नाम ’
आदि कहानियां इसका ज्वलंत उदाहरण हैं । प्रवासी भारतीयों की मनः स्थिति
को पकड़ पाने में लेखिका सफल रही हैं । इनमें जीवन गहनता से चित्रित हुआ
है । अमेरिका की अनेक संस्थाएं भारत के गांवों में अस्पताल /विद्यालय और
आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए धन संग्रह कर भारत भेजती हैं । लेकिन
कितना विकास होता है यहां और कितने विद्यालय/अस्पताल खुलते हैं या खुलकर
अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं ! ‘मिट्टी का दीया’ में इला प्रसाद की
दुश्चिंता स्पष्ट है .. ‘‘उसे इन संस्थाओं से जुड़े लोगों की नीयत पर
भरोसा न हो यह बात नहीं । पैसा भारत पहुंचता होगा ,लेकिन क्या सही लोगों
तक भी पहुंच जाता होगा घ् सारा का सारा ? क्या जानकीवल्लभ शास्त्री की
पंक्तियां .. ‘ऊपर.ऊपर पी जाते हैं जो पीनेवाले हैं ,कहते ऐसे ही जीते
हैं जो जीने वाले हैं ए या दुष्यंत कुमार . ‘यहां तक आते.आते सूख जाती
हैं नदियां ए मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा ।’------
गैर.सरकारी संस्थाओं में उस मनोवृत्ति के लोग नहीं होते होगें क्या ?’’
इसी कहानी में तन्वी पड़ोसी के बारह वर्ष के बेटे को अपनी ओर घूरते देख
कह उठती है . ‘‘यहां बच्चे कितनी जल्दी बड़े हो जाते हैं ।’’ और वह देख
रही थी .. ‘‘ वे कच्ची कलियां तोड़ रहे हैं । लगातार तोड़ते जा रहे हैं
..... आत्मविश्वास से भरे हुए हैं । वे केवल कच्ची कलियां ही नहीं
तोड़ेंगे ,एक दिन पूरा बगीचा ही उठा ले जाएंगे वे । आने वाला कल उन्हीं
का है ।"

उसे घर पर सो रही अपनी नन्ही कली का खयाल आया । सिन्धु !’’

इला प्रसाद ने अपनी कहानियों के माध्यम से जहां अमेरिकी संस्कृति ;या
अपसंस्कृतिद्ध से दो.चार होते और उसका हिस्सा बनते प्रवासी भारतीयों के
सामाजिक ,आर्थिक और धार्मिक जीवन का वास्तविक चित्रण किया है वहीं
भारतीय परिवेश की उनकी कहानियों में जीवन की विसंगतियां ,विद्रूपताएं और
विश्रृंखलताएं अपनी सम्पूर्णता में उद्घाटित हुई हैं । उनका ”शिल्प
प्रभुविष्णु और भाषा सहज है और यह उनकी कहानियों की शक्ति है । उनकी
कहानियों में एक सम्मोहक पठनीयता है ।

दिल्ली . 110 094
31 मार्च ए 2010
*****
उस स्त्री का नाम - इला प्रसाद
भावना प्रकाशन
109-A, पटपड़गंज, दिल्ली - ११००९१

मूल्य : १५०/- , पृष्ठ : १२८

सोमवार, 21 जून 2010

पुस्तक चर्चा



हिन्दी की चर्चिता पत्रिका ’पाखी’ के जून अंक में वरिष्ठ कथाकार बलराम अग्रवाल द्वारा मेरे नवीनतम उपन्यास ’गुलाम बादशाह’ पर लिखी समीक्षा प्रकाशित हुई . समीक्षा यथावत यहां प्रस्तुत है. इसे ’पाखी’ के वेबसाइट : www.pakhi.in पर भी पढ़ा जा सकता है.

ब्यूरोक्रेसी का विद्रूप चेहरा

बलराम अग्रवाल

पुस्तक: गुलाम बादशाह(उपन्यास) उपन्यासकार:रूपसिंह चंदेल
प्रकाशक:आकाश गंगा प्रकाशन, नई दिल्ली-110002 मूल्य: 300 रुपए पृष्ठ संख्या: 216

‘रमला बहू’, ‘पाथरटीला’, ‘नटसार’ और ‘शहर गवाह है’ सरीखे अतिचर्चित उपन्यासों के रचयिता रूपसिंह चंदेल का सातवाँ उपन्यास ‘गुलाम बादशाह’ एकदम नई कथा और भावभूमि के साथ उपस्थित है।

उपन्यास का प्रारम्भ यद्यपि एक प्रतीकात्मक कथा से होता है जिससे यह आभास तो मिल ही जाता है कि आगे की कहानी ‘कलुवा’ जैसे शक्ति एवं प्रभुतासंपन्न लोगों पर केन्द्रित होने जा रही है। वह है भी, लेकिन उपन्यास के ‘प्रभुतासंपन्न लोगों’ की सीमा में येन-केन-प्रकारेण बहुत बार घसीटे जा चुके ‘राजनीतिज्ञों’ का कहीं जिक्र तक नहीं है। यही इस उपन्यास की कथा की नवीनता भी है और विशेषता भी। ‘गुलाम बादशाह’ को भारतीय ब्यूरोक्रेसी की कार्य एवं विचारपद्धति के एक पक्ष-विशेष को आम पाठक के सम्मुख रखने वाला अनुपम और विशिष्ट उपन्यास कहा जा सकता है। इस उपन्यास का विवेचन ‘गुलाम’ यानी कार्यालय और परिवार दोनों की जिम्मेदारियों तले दबे क्लर्क और उससे निचले स्तर के सभी कर्मचारी तथा ‘बादशाह’ यानी ब्यूरोक्रेट्स और उनकी चिरौरी को ही अपना जीवन-दर्शन बना लेने वाले चमनलाल हाँडा व नागपाल जैसे उनके सहायक के रूप में भी किया जा सकता है और इस रूप में भी कि सरकारी योजनाओं व नीतियों से जनता को लाभान्वित करने की दृष्टि से सरकार द्वारा अपने नुमाइंदे के रूप में नियुक्त ब्यूरोक्रेट्स अपने-आप को किस प्रकार बादशाह और जनता को गुलाम बना बैठता है। नैरेटर के शब्दों में—‘अंग्रेज चले गए थे लेकिन उनकी बादशाहत को देसी अफसर भोग रहे थे। भले ही नेता-मंत्री अपने को बादशाह मानते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि वे ब्यूरोक्रेसी के सामने बौने बादशाह हैं। और कर्मचारी… अपने कर्मचारियों को ये बादशाह गुलामों से अधिक आँकने को तैयार नहीं।’(पृष्ठ 32)

भारतीय ब्यूरोक्रेट्स की कार्य एवं विचारपद्धति कितनी क्रूर, मानवीय-संवेदना से हीन पूरी तरह अमानवीय, निरंकुश तथा अनुशासनहीन है—इस यथार्थ को उपन्यासकार रूपसिंह चंदेल ने बड़ी शालीनता के साथ प्रस्तुत किया है। यह शालीनता भी, कि अतिशय दलन और दमन के विरुद्ध किसी भी पात्र से उन्होंने जनवादी-किस्म के नारे नहीं उगलवाए हैं, इस उपन्यास की विशेषता है, सुन्दरता है। थोपे हुए नारे पाठक के भीतर प्रतिरोध की कोई चिंगारी पैदा न करके उसकी तीव्रता का हनन ही अधिक करते हैं।

‘गुलाम बादशाह’ की कथा में यों तो पचास से ऊपर पात्रों का पदार्पण वृत्तांतानुरूप सहज रूप से होता है, लेकिन इसका मुख्य पात्र सुशांत है जो कथा कहने के लिए गढ़े गए भारत सरकार के एक काल्पनिक प्रर विभाग के मेरठ स्थित कार्यालय की ऑडिट शाखा में बतौर एलडीसी भर्ती हुआ है और विभागीय स्थापना कारणों से स्थानान्तरित होकर इन दिनों दिल्ली स्थित कार्यालय में कार्यरत है। केन्द्र सरकार के विभागों में ब्यूरोक्रेट्स की चेन को मोटे तौर पर बताने की दृष्टि से नैरेटर कहता है—‘…सुन्दरम उस विभाग का पाँचवाँ पाया था। पहला पाया मंत्री था, दूसरा सचिव, तीसरा मंत्रालय का वित्तीय सलाहकार, चौथा महानिदेशक और पाँचवाँ सुन्दरम।’ सुन्दरम यानी निदेशक।

देश के ब्यूरोक्रेट्स और उच्च पदस्थ उनके अधीनस्थ राजभक्ति का लबादा अपने चेहरे ही नहीं मनोमस्तिष्क पर लादे उठते-बैठते-घूमते हैं, सोते तो वे जैसे कभी हैं ही नहीं। उनकी इस वृत्ति के चलते सुशांत जैसे निम्नस्तरीय अधीनस्थों का पारिवारिक जीवन त्रास के अकथनीय दौर से गुजरता है। इस त्रास को सुशांत के मेरठ कार्यालय में कार्यरत संजना गुप्ता भी अनेक प्रकार से झेलती है। चंडीगढ़ कार्यालय में स्थानान्तरण पाने की उसकी आवश्यकता को मोहरा बनाकर यूनियन नेता प्यारेलाल शर्मा से लेकर संयुक्त निदेशक अनिल त्रेहन तक प्रभुताप्राप्त कोई पुरुष ऐसा नहीं है जो उसके शारीरिक व आर्थिक शोषण के लिए प्रयासरत न हो। त्रेहन के माध्यम से उपन्यासकार ने पुरुष ब्यूरोक्रेट्स के एक चरित्र-विशेष का खुलासा यों किया है—‘बोलता किसी से कुछ भी नहीं, लेकिन उसका उद्देश्य कर्मचारियों में भय उत्पन्न करना होता है और होता है महिला कर्मचारियों की टोह लेना।’(पृष्ठ 31) इनके चलते संजना जैसी कामकाजी महिलाओं की सामाजिक व पारिवारिक स्थिति इतनी दयनीय हो उठती है कि सहकर्मियों व मकान-मालकिन से लेकर स्वयं उसका पति तक उसके चरित्र पर संदेह करने लगता है। संजना के मुख से उसके दमन की कोशिशों के किस्से सुनकर क्रुद्ध सुशांत कह उठता है—‘इन सालों को सरे आम चौराहों पर खड़ा करके गोली मार देनी चाहिए। देश को खोखला कर रहे हैं ये ब्यूरोक्रेट्स। नेताओं और व्यापारियों के साथ इनकी साँठ-गाँठ ने देश को तबाही के गर्त में झोंक दिया है।’(पृष्ठ 60) इन गिद्धों के जालिम पंजों में न फँसने वाली संजना जैसी महिलाकर्मियों का क्या हश्र होता है? इच्छित एवं आवेदित चंडीगढ़ कार्यालय के स्थान पर उसे देहरादून स्थानान्तरित कर परेशान किया जाता है। इस स्थानान्तरण आदेश को निरस्त कर चंडीगढ़ देने के ‘उसके प्रार्थना-पत्रों को रद्दी की टोकरी में फेंकते हुए (प्रशासन ने) उसे धमकाते हुए लिखा था कि यदि उसने देहरादून ज्वाइन नहीं किया तो उसके विरुद्ध सख्त प्रशासनिक कार्यवाई की जाएगी। दो वर्ष तक संघर्ष करने के बाद संजना हार गई थी। उसने त्यागपत्र दे दिया था। हारना ऐसे लोगों की नियति होती है।’(पृष्ठ 81)

उपन्यास में ब्यूरोक्रेसी के एक नहीं अनेक घिनौने चेहरे देखने को मिलते हैं। अपने सहायक चमनलाल हाँडा के माध्यम से दबाव डलवाकर अनिल त्रेहन कार्यालय के क्लास फोर कर्मचारी नन्दलाल की अठारह वर्षीया बेटी कुसुम से अपने घर में नौकरानी का काम कराने लगता है और एक दिन मौका पाकर उसका बलात्कार भी कर देता है। इस मामले का पटाक्षेप पुलिस प्रशासन के अधिका्रियों का त्रेहन के पक्ष में बिक जाने, संघर्षशील यूनियन पदाधिकारियों को स्थानान्तरण आदेश पकड़ा दिये जाने और तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त कर तुरन्त ही देहरादून, रुड़की, अम्बाला, दिल्ली आदि स्थानों से बुलाए गए कर्मचारियों को उनके स्थान पर ज्वाइन कराकर उनका मनोबल तोड़ने के प्रयास से होता है। यही नहीं, त्रेहन को पदोन्नत करके मेरठ से बंगलौर भेज दिया गया। मेरठ के एक कार्यालय को जम्मू कार्यालय के साथ जोड़ दिया गया और दूसरे को पूना कार्यालय के साथ। ‘बाबुओं की भाषा में प्रशासन ने मेरठ कार्यालयों का ओवरहॉल कर दिया था।’(पृष्ठ 128) तथा ‘अभिप्राय यह कि रासुल विभाग का केवल एक कार्यालय ही मेरठ में रहना था और उसे भी पूरी तरह यूनियन की गतिविधियों से मुक्त रहना था।’(पृष्ठ 129)

विभाग के एक सौ पचासवें स्थापना दिवस को मनाने की संस्तुति हेतु मंत्री को पत्र लिखा जाता है। मंत्री द्वारा तत्संबंधी कार्यक्रमों पर खर्च होने वाली रकम के बारे में पूछे जाने पर कहा जाता है कि—‘एक करोड़ रुपए की व्यवस्था सरकार द्वारा विभाग के बाह्य खर्चों के लिए स्वीकृत धन से कुछ खर्चों की कटौती करते हुए किया जाएगा। मंत्रालय पर धन का बोझ नहीं डाला जाएगा। महानिदेशक ने ऐसा लिखकर अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया था…’(पृष्ठ 144) ब्यूरोक्रेसी का यह एक और घिनौना चेहरा है। उसे पता है कि किसी भी प्रकार का खतरा उठाए बिना धन को कैसे और कहाँ-कहाँ से खींचा जा सकता है। इस गंगा में बहुतों के पाप धुल जाते हैं। नाम भी मिलता है और दाम भी; लेकिन निम्न श्रेणी कर्मचारियों का यहाँ भी भरपूर दलन, दमन और तिरस्कार होता है। वे न सिर्फ तिरस्कृत रहते है बल्कि त्रस्त और अपमानित भी होते हैं। इस तिरस्कार, त्रास और अपमान को न झेल पाने के कारण प्रशासन अनुभाग-एक का सेक्शन ऑफीसर सतीशचन्द्र आत्महत्या कर लेता है। ‘उसकी जेब से पुलिस को सुसाइट नोट नहीं बल्कि उसका सस्पेंशन ऑर्डर मिला, जिसमें कुमार राणावत के हस्ताक्षर थे।’(पृष्ठ 161)

उपन्यास क्योंकि जीवन के खण्ड-विशेष की विस्तृत झाँकी प्रस्तुत करने वाली कथा-विधा है इसलिए ‘गुलाम बादशाह’ में नागरिक एवं पारिवारिक जीवन के भी अनेक प्रहसन हैं और वे सब अलग से चस्पाँ न होकर कथा के मूल प्रवाह का हिस्सा बनकर सामान्य रूप में ही सामने आते हैं। समापन कथा के तौर पर संयुक्त निदेशक दिलबाग सिंह के विलासी चरित्र, उसकी मृत्यु, मृत्योपरांत उसकी विधवा को अनुकंपा नियुक्ति दिलाने-देने की नौकरशाही चिन्ताएँ, भाग-दौड़, दलन और दमन की नीति के अन्तर्गत सुशांत जैसे कर्मठ कर्मचारी के गुवाहाटी स्थानान्तरण तथा मधुसूदन सहाय के त्यागपत्र को रखा गया है। उपन्यास का समापन एक वर्ष बाद ही सुशांत के गुवाहाटी से लेह स्थानान्तरण, सतीशचन्द्र की विधवा को अनुकंपा-नियुक्ति आवेदन को अग्रसारित न करके दिलबाग की विधवा को वरीयता देना, रिश्वतखोरी के मामले में अमेरिकी पुलिस द्वारा अनिल त्रेहन की गिरफ्तारी, दायें भाग में…मुँह से लेकर पैर तक उसके लकवाग्रस्त हो जाने और व्हील-चेयर में ही पेशाब निकल जाने जैसी घिनौनी शारीरिक स्थिति में पहुँच जाने जैसी कुछ सूचनाओं के साथ होता है जिनसे ब्यूरोक्रेसी के कपटपूर्ण और संवेदनहीन चरित्र का तो खुलासा होता ही है, यह भी स्थापित होता है कि—जो जस करहि सो तस फल चाखा।

समीक्षक:बलराम अग्रवाल,एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
मोबाइल:9968094431

रविवार, 6 जून 2010

पुस्तक चर्चा


डॉ० सुधा ओम ढींगरा की सद्यः प्रकाशित काव्य पुस्तक

धूप से रूठी चॉंदनी से पांच कविताएं

हाल में कवि-कथाकार और पत्रकार डॉ० सुधा ओम ढींगरा की कविता पुस्तक ’धूप से रूठी चांदनी’ शिवना प्रकाशन, सीहोर (मध्य प्रदेश) से प्रकाशित हुई है. रचनाएं ही नहीं पुस्तक भी अपने रूपाकार में आकर्षक है. प्रस्तुत हैं पुस्तक से पांच कविताएं :

१)आँगन

भीतर का आँगन
जब गन्दला गया,
तो एक झाड़ू बनाया
जिसके तीलें हैं सोच के
बंधा है विवेक के धागों से.

बुहार दी उससे ....
अतृप्त इच्छायों की धूल,
कुंठाओं की मिट्टी,
वेदनाओं का कूड़ा,
जलन की कर्कट.

झाड़ दीं उससे...
विद्रूपताओं और
वर्जनाओं से सनी
मन की खिड़कियाँ,
निखर आया है अब
मेरा आँगन.

खिड़कियों से
झाँकती धूप और
सरकती चाँदनी
का अलौकिक सुख,
कभी भीतर कदम रखना.

२)नींद चली आती है.....

बाँट में,
अपने हिस्से का सब छोड़,
कोने में पड़ी
सूत से बुनी वह
मंजी अपने साथ ले आई,
जो पुरानी, फालतू समझ
फैंकने के इरादे से
वहाँ रखी थी.

बेरंग चारपाई को उठाते
बेवकूफ लगी थी मैं,
आँगन में पड़ी
बचपन और जवानी का
पालना थी वह.

नेत्रहीन मौसी ने
कितने प्यार से
सूत काता, अटेरा औ'
चौखटे को बुना था,
टोह- टोह कर रंगदार सूत
नमूनों में डाला था.

चौखटे को कस कर जब
चारपाई बनी
तो हम बच्चे सब से
पहले उस पर कूदे थे.

उसी चारपाई पर मौसी संग
सट कर सोते थे,
सोने से पहले कहानियाँ सुनते
और तारों भरे आकाश में,
मौसी के इशारे पर
सप्त ऋषि और आकाश गंगा ढूँढते थे.

और फिर अन्दर धंसी
मौसी की बंद आँखों में देखते--
मौसी को दिखता है----
तभी तो तारों की पहचान है.

हमारी मासूमियत पर वे हँस देतीं
और करवट बदल कर सो जातीं,
चन्दन की खुश्बू वाले उसके बदन
पर टाँगें रखते ही
हम नींद की आगोश में लुढ़क जाते.

चारपाई के फीके पड़े रंग
समय के धोबी पट्कों से
मौसी के चेहरे पर आईं
झुरियाँ सी लगते हैं.

जीवन की आपाधापी से
भाग जब भी उस
चारपाई पर लेटती हूँ,
तो मौसी का
बदन बन वह
मनुहार और दुलार देती है .

हाँ चन्दन के साथ अब
बारिश, धूप में पड़े रहने
और त्यागने के दर्द की गंध
भी आती है,
पर उस बदन पर टांगे
फैलाते ही नींद चली आती है.....

३)अच्छा लगता है ......

बचपन में,
गर्मियों की रातों में,
खुली छत पर
सफेद चादरों से
ढकी चारपाइयों पर
लेटकर किस्से- कहानियाँ सुनना
और तारों भरे आकाश में
सप्तऋषि, आकाशगंगा और
ध्रुव तारा ढूँढना
अच्छा लगता था......

चंद्रमा में छिपी आकृति
आकार लेती नज़र आती,
कभी उसकी माँ
सूत कातती लगती
तो कभी हमारी दादी दिखती.

मरणोपरांत लोग तारे हो जाते हैं,
बड़े- बूढ़ों की बात को सच मान,
तारों में अपने बजुर्गों को ढूँढना,
दादा, दादी और वो रही नानी,
ऐसा कह कर
उनको देखते रहना...
अच्छा लगता था......

विज्ञान,
बौद्धिक विकास
और भौतिक संवाद ने
बचपन की छोटी-छोटी
खुशियाँ छीन लीं,
शैशव का विश्वास
परिपक्वता का अविश्वास बन...
अच्छा नहीं लगता है....

हर इन्सान में
एक बच्चा बसता है,
अपनी होंद का एहसास दिला
कभी -कभी वह
बचपन में लौट जाने,
बचपन दोहराने को
मजबूर है करता ,
वो मासूमियत,
वो भोलापन,
ओढ़ लेने को जी चाहता है,
तारों भरे आकाश में
बिछुड़ गए अपनों को फिर से
ढूँढना अच्छा लगता है.....

मेरे शहर में तारे
कभी -कभी झलक दिखलाते हैं,
खुले आकाश में फैले तारों को
हम तरस -तरस जाते हैं,
जब कभी निकलते हैं तो
फीकी सी मुस्कान दे इठलाते हैं,
पराये-पराये से लगते हैं
फिर भी उनमें अपनों को
खोजना अच्छा लगता है.......

४) आवाज़ देता है कोई उस पार......

सुन सोहणी उसे,
उठा माटी का घड़ा,
तैर जाती है
चनाव के पानियों में,
मिलने अपने महिवाल को
खड़ा है जो नदी के उस पार.....

सस्सी भटकती है थलों में
सूनी काली रातों में,
छोड़ गया था पुन्नू
सोती हुई सस्सी को,
पुन्नू-पुन्नू है पुकारती
शायद सुन ले उसकी आवाज़
खड़ा है जो मरू के उस पार.....
फ़रहाद ने तोड़ा पहाड़
नदी दूध की निकालने,
शर्त प्यार की पूरी करने,
तड़प रहा है मिलने शीरीं से
पहुँच न पाया उस तक
खड़ी है जो पहाड़ों के उस पार......
साहिबा ने छोड़ा घर- बार
छोड़े भाई और परिवार,
भाग निकली मिर्ज़ा संग
गीत में हेक जब लगाई उसने
खड़ा है जो झाड़ियों के उस पार......
हीर पाजेब अपनी दबा
ओढ़नी से मुँह छुपा,
चुपके से मिलने निकल पड़ी
मधुर स्वर राँझे का जब उभरा
खड़ा है दूर जो घरों के उस पार.........

५)नियति

द्रौपदी सी वह
झूठ,
धोखा,
बेईमानी,
ईर्ष्या,
बेवफाई
से पाण्डवों द्वारा
प्रेम की बिसात पर
रोज़ दांव पर लगती है....

प्रणय में छली जाती है,
प्रीत रुपी दुर्योधन
वादों के दुष्शासन से
चीर हरण करवाता है ...

निवस्त्र पीड़िता को
कोई कृष्ण बचाने नहीं आता. ..

क्या औरत की नियति
हर युग में लुटना ही है....

*****



धूप से रूठी चॉंदनी
शिवना प्रकाशन
पी.सी.लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैंड, सीहोर-४६६००१ (म.प्र.), भारत
मूल्य : रु.३००/- , पृ. ११२

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

पुस्तक चर्चा




‘दक्षिण भारत के पर्यटन स्थल’ पर एक पाठक के पत्र के बहाने
रचनाकार को पाठकों पर ही भरोसा करना चाहिए
मैंने अनेक वरिष्ठ और समकालीन साहित्यकारों से आलोचना और समीक्षा को लेकर जब चर्चा की तब सभी ने इनकी दयनीय स्थिति और व्याप्त राजनीति पर चिन्ता व्यक्त की । स्व॰ कमलेश्वर जी ने उत्तेजित स्वर में कहा था - ‘‘आज आलोचना है ही कहां ?’’ उन्होंने यह भी कहा था कि पाठकों से बड़ा कोई आलोचक नहीं होता । महान रूसी लेख लियो तोल्स्तोय ने भी अपने एक मित्र से चर्चा के समय कहा था कि किसी भी लेखक को आलोचको की परवाह न करते हुए उसे अपने पाठकों पर ही भरोसा करना चाहिए ।
उपरोक्त विद्वानों की बातों को जब मैं अपनी पुस्तकों के संदर्भ में देखता हूं तब पाता हूं कि पाठक की ईमानदार प्रतिक्रिया पर शक की कोई गुजांइश नहीं होती । 12 मार्च 1999 को मेरे उपन्यास ‘ पाथरटीला ’ पर प्रकाशक की ओर से संगोष्ठी का आयोजन किया गया । अध्यक्ष वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव और मुख्य अतिथि वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पाण्डेय थे । वक्ताओं में पंकज बिष्ट ,डा॰ कुमुद शर्मा , डा॰ ज्योतिश जोशी , महेश दर्पण , रमेश उपाध्याय , रामशरण जोशी , मैत्रेयी पुष्पा और हीरालाल नागर थे ।
प्रथम वक्ता के रूप में कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहना प्रारंभ किया , ‘‘ मैंने राजेन्द्र जी से पूछा कि आपने कहा था कि पाथरटीला में गांव है ..... कहां है गांव........? मुझे तो उसमें कहीं गांव नजर ही नहीं आया ......... ’’ अपने लंबे वक्तव्य में मैत्रेयी जी यही सिद्ध करने का प्रयास करती रहीं कि ‘पाथरटीला ’ में गांव नामकी की कोई चीज नहीं है अर्थात उनके अनुसार उसमें ग्राम्य जीवन चित्रित ही नहीं हुआ । यहां यह बता देना अनुचित न होगा कि मैंने उसके बाद भी कई बार मैत्रेयी पुष्पा को वक्तव्य देते सुना और हर बार उनके वक्तव्य का प्रारंभ राजेन्द्र यादव जी का उल्लेख करते हुए ही हुआ । शायद राजेन्द्र जी का नामोल्लेख उन्हें बल देता होगा । मनोविज्ञान की भाषा में इसे शायद एक साहित्यकार के अंदर जमी असुरक्षा का भाव ही कहेगें । ‘पाथरटीला’ की वास्तविकता यह है कि उसमें गांव के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । बाद के वक्ताओं ने इसे सिद्ध भी किया । मैत्रेयी जी की पीड़ा मैं समझ रहा था । ‘अहम सर्वोपरि ’ से ऐसे कुतर्कों का जन्म होता है । गांव क्या होता है इसे मेरी तरह गांव से जुड़कर ही जाना जा सकता है वर्ना वातानुकूलित घर में बैठकर लोग नकली गांव की ही सर्जना कर रहे हैं और अपने जोड़-जुगाड़ से चर्चा भी बटोर रहे हैं । मैत्रेयी जी ने जो कुछ कहा वह वही था जिसे हिन्दी की सड़ी राजनीति के रूप में हम जानते हैं । मेरे उपन्यास से केवल वही परेशान थीं ऐसा नहीं था । वे भी थे जिनके लिए मैंने दूसरों से बुराई ली थी और वे भी थे जो अपने पहले उपन्यास से अपने को हिन्दी का रांगेय राघव मानने लगे थे । उनमें से एक युवा उपन्यासकार भी थे जिनका पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ था । यद्यपि उनका उपन्यास कम चर्चित नहीं रहा था लेकिन मेरे और उपन्यास के खिलाफ उन्होंने असफल कुत्सित षडयंत्र किए । मेरे प्रकाशक श्री जगदीश भारद्वाज ने कहा , ‘‘ आपको परेशान नहीं होना चाहिए । यह उसकी परेशानी है क्योंकि उसे अपने शब्दों पर विश्वास नहीं है । आपको प्रसन्न होना चाहिए क्योंकि आपके उपन्यास ने उसकी नींद हराम कर रखी है ......।’’

इस सबके बावजूद पाठकों ने ‘पाथरटीला’ को इस प्रकार सिर-माथे लिया कि यह उपन्यास मेरे नाम का पर्याय बन गया ।

उपरोक्त बातें मेरी पुस्तक ‘ दक्षिण भारत के पर्यटन स्थल ’ पर प्राप्त एक पाठकीय पत्र ने लिखने के लिए मुझे विवश किया । इस पुस्तक के विषय में यह बताना उचित लग रहा है कि इसका प्रथम संस्करण 2000 में और चौथा 2009 में प्रकाशित हुआ । यह मेरी एक ऐसी पुस्तक है जिसे प्रकाशनोपरांत कभी किसी पत्र-पत्रिका में समीक्षार्थ प्रस्तुत नहीं किया गया । यह यात्रा संस्मरणों की पुस्तक है जिसका शीर्कष मैंने - ‘ सागर के आसपास ’ रखा था लेकिन प्रकाशक ने विशेष अनुरोध के बाद व्यावसायिक कारणों से इसका शीर्षक बदल लिया । निश्चित ही उसे इसका लाभ भी मिला और मुझे अप्रत्याशित पाठक मिले । इसे पढ़कर अयोध्या से बद्रीनाथ उपाध्याय ने मुझे जो पत्र लिखा उसे मैं रचना समय के मित्रों को पढ़वाने के उद्देश्य से ज्यों का त्यों यहां प्रस्तुत कर रहा हूं ।

प्रसंगतः यहां ऐसी ही एक घटना का उल्लेख अनुचित न होगा । यह बात 2000 की है । विवरण लंबा है । केवल इतना ही कि जालना (महाराष्ट्र ) के एक महाविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापक कमलेश ठाकुर ( अब डाक्टर ) ने हैदराबाद में ,जहां के वह मूलतः निवासी हैं , मेरा कहानी संग्रह ‘आखिरी खत’ पढ़ा और निर्णय किया कि वह मेरे साहित्य पर पी-एच.डी. करेंगें और उन्होंने वह किया । ये उदाहरण तोल्स्तोय और कमलेश्वर की बातों को सही सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं और ऎसी घटनाओं ने सदैव अपने पाठकों के प्रति मेरे विश्वास को मजबूत किया है ।

प्रस्तुत है बद्रीनाथ उपाध्याय का पत्र जो कल ही मुझे प्राप्त हुआ है । पत्र में लेखक तिथि का उल्लेख करना भूल गये हैं ।

’दक्षिण भारत के पर्यटन स्थल’
नीलकंठ प्रकाशन
१/१०७९ ई महरौली; नई दिल्ली-११००३०
मूल्य : २००/- पृष्ठ - १८७

आदरणीय परम श्रध्येय रूप सिंह जी चन्देल ,

सादर प्रणाम ।
सर्वप्रथम मैं आपको अपनी तरफ से ‘‘ दक्षिण भारत के दर्शनीय (पर्यटन ) स्थल ’’ ऐसी अद्वितीय पुस्तक लिखने के लिये कोटिशः धन्यवाद देता हूं तथा विद्यादायिनी मां सरस्वती से यह प्रार्थना करता हूं कि वह आपकी लेखनी को और जन कल्याण की ओर लिखने में सहायता प्रदान करे ।

मैंने आपकी यह पुस्तक जिला पुस्तकालय से लाकर पढ़ी है । हजारों पुस्तकों के बीच में से मैंने आपकी यह पुस्तक पढ़ने को चुनी । उस समय मैंने यह सोचा था कि इस पुस्तक में दक्षिण भारत के मंदिरों के बारे में जिक्र होगा । परन्तु जब मैंने पुस्तक पढ़नी शुरू की तो आपके द्वारा अपने परिवार की मनःस्थिति एवं व्यक्तियों के विचारों को शब्दरूप में लिखने की शैली को देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया । आपने शुरूआत के दो-तीन खण्डों में जिस प्रकार रेलवे में व्याप्त अव्यवस्था का जिक्र किया उसकी तारीफ मैं शब्दों से नहीं कर सकता । मैं तो शुरू में समझ ही नहीं पाया कि आप दक्षिण भारत के बारे में लिखने जा रहे हैं या ट्रेन की यात्रा के सम्बद्ध में ।

परन्तु धीरे-धीरे मैं जैसे-जैसे आपकी यात्रा के बारे में आगे पढ़ने लगा तो जैसे मैं उसमें डूब गया । मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं भी अपरोक्ष रूप से आपके परिवार के साथ दक्षिण भारत की यात्रा कर रहा हूं । मुझे भी देशाटन का बहुत शौक है । प्रकृति के बीच में अपने आप को पाकर मुझे बहुत खुशी होती है । आपकी यह पुस्तक पढ़कर मुझे केरल जाने की बहुत इच्छा है । देखिये प्रभु मेरी यह इच्छा कब पूरी करता है ।

मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं , एक साफ्टवेयर इंजीनियर भी हूं । साथ ही साथ उत्तर प्रदेश सरकार के अंतर्गत राजस्व विभाग में कार्य कर रहा हूं । मुझे पुस्तकों के पढ़ने का शौक हैं । नयी चुनौतियों को स्वीकार करने में मुझे खुशी होती है । यह मेरा स्वयं का परिचय है ।

आपने पुस्तक में इतना सब कुछ लिख दिया है कि एक आम आदमी अब दक्षिण भारत के उन स्थलों की आसानी से बिना गाइड के ही यात्रा कर सकता है । आपने जितने सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है उसे देखकर एक बार आपसे मिलने की प्रबल इच्छा हो रही है । मैं चाहता हूं कि एक बार आप भगवान राम की नगरी अयोध्या में जरूर आयें और यहां के बारे में भी लिखकर आम आदमी को भगवान राम की पवित्र नगरी के बारे में अवश्य बतायें । आपके शब्दों का जादू श्रद्धालुओं को काफी सहयोग प्रदान करेगा एवं उनके अन्दर अयोध्या आने की प्रेरणा देगा । मैं अयोध्या का रहने वाला हूं । आपको अपने स्तर से सभी सुविधा देने का प्रयास करूंगा । आप सपरिवार अयोध्या पधारने की कृपा करें । यहां मैं आपका स्वागत करूंगा ।

बस मुझे आपकी किताब में केवल केरल के एक बीच को बताते समय कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग मिला जिसको यदि आप नहीं करते तो मेरे अपने अनुसार शायद और उचित होता ।
अंत में , मैं आपको इतनी अच्छी यात्रा वृत्तांत लिखने के लिये धन्यवाद देता हूं । आपकी अन्य किताबें मैं खोजकर अवश्य पढ़ूंगा । मैं कोई साहित्य का आदमी नहीं हूं । यह मेरी टूटे-फूटे शब्दों में भावना मात्र है । आशा है आप मेरी गल्तियों को अपनी महानता का परिचय देकर माफ कर देगें ।
धन्यवाद ।
भवदीय
ह॰/-
बद्रीनाथ उपाध्याय रानोपाली (पुलिस चौकी के पास)अयोध्या फैजाबाद (उ0प्र0 ) - 224123मे0 09450775146

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

पुस्तक चर्चा

वरिष्ठ कथाकार हृदयेश के सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘संगत’ मे दो उपन्यास शामिल हैं - ‘सांड़’ और ‘दंडनायक’ । सांड़ उपन्यास के केन्द्र में हमारी शिक्षा व्यवस्था है । प्रस्तुत उपन्यास विस्तृत फलक पर शिक्षण जगत की अराजक और आतंकी गतिविधियों का लेखा-जोखा है । उपन्यास में यह भी चित्रित किया गया है कि बेहद सामान्य से दीखने वाले उत्पीडि़त लोगों में से कुछ ऐसे जन भी निकल आते हैं जो इस स्थिति का सक्रिय प्रतिवाद करने को उठ खड़े होते हैं । शुरू में वे अपने प्रतिरोध में अकेले होते हैं , सुबह की धूप के छितरे हुए टुकड़ों की मानिंद , लेकिन जल्द ही वे सब मिलकर गर्म धूप का सैलाब बन जाते हैं और उस सैलाब के दबाव के आगे भ्रष्ट-तंत्र व नौकरशाही को झुकना पड़ता है ।


दंडनायक उपन्यास में स्वतंत्र भारत की मानव-विरोधी व्यवस्था की चक्की में पिस गए एक ऐसे व्यक्ति की व्यथा-कथा चित्रित है जो अपने देश की आजादी के लिए फांसी पर चढ़े एक क्रांतिकारी ( शहीद रोशन सिंह) की तीसरी पीढ़ी में पैदा हुआ था । यह उपन्यास उन अनेक प्रश्नों को उठाता है जो वर्तमान जन-मानस को बराबर परेशान किए हुए हैं । क्या आज के हिन्दुस्तान की तस्वीर वही है जो क्रान्तिकारियों के दिलो-दिमाग में थी और जिसके लिए उन्होंने भरी जवानी में फांसी के फंदे को चूमा था ?


दोनों ही उपन्यासों में अलग-अलग विषय-वस्तु होकर भी मानव-विरोधी व्यवस्था से भिड़ने -जूझने का संकल्प और साथ ही उस दिशा में भरसक प्रयास किया है ।


‘संगत’ - हृदयेश
पृष्ठ - 414 मूल्य : 450/-

भावना प्रकाशन109 ए ,

पटपड़गंज , दिल्ली - 110091

वरिष्ठ कथाकार बलराम हिन्दी के उन लब्धप्रतिष्ठ कथाकारों में हैं जिहोंने पत्रकारिता के साथ अपनी सृजन क्षमता को अक्ष्क्षुण रखा है । ‘कलम हुए हाथ’ और ‘मालिक के मित्र’ जैसी महत्वपूर्ण कहानियां लिखने वाले बलराम का सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह है - ‘गोवा में तुम’ , जिसमें शीर्षक कहानी के अतिरिक्त सोलह अन्य कहानियां सम्मिलित हैं । संग्रह की यद्यपि सभी कहानियां पठनीय हैं , लेकिन गोवा में तुम , शुभ दिन , मालिक के मित्र , सामना , इतना खटराग , समर्पण गाथा , उनके फतवे कहानियां लेखक की चमत्कारिक भाषा , शिल्प और कथानक का उललेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करती हैं
प्रकाशक - वही

पृष्ठ- 135 , मूल्य - 150/-

सोमवार, 21 जुलाई 2008

पुस्तक चर्चा



चित्र : अशोक गुप्ता

सम्बन्धों की लाशों पर गिद्धों का उत्सव

रमेश कपूर

उत्सव अभी शेष है(उपन्यास)
*अशोक गुप्ता,
शिल्पायन, १०२९५, लेन नं० १, वैस्ट गोरखपार्क,
शाहदरा -११००३२
पृष्ठ संख्या : २१४, मूल्य : २२५/-


संबन्ध अपनी सामाजिकता को ओढ़कर समय को क्रूर (कहां क्रूरतम माना जाए) चक्र के मध्य ही अपने आप को स्थापित करते हैं और वैयक्तिक आवश्यकताओं के साथ अपनी महत्ता सिद्ध करते हैं। इन मायनों में वे स्वयंसिद्ध होते हैं। किन्तु इस स्वयंसिद्ध होने में कितनी जद्दोजहद और कितना संघर्ष शामिल रहता है, यही देखना महत्वपूर्ण है। क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए इसी जद्दोजहद---इसी संघर्ष और इसी महत्ता को जानना अथवा समझ पाना संभव नही हो पाता। तब तो और भी कठिन हो जाता है, जब वे वैयक्तिक स्तर पर एक-दूसरे की भावनाओं के साथ पूरी अंतरंगता से जुड़े हों… पूरी वचनबद्धता में जकड़े हों और संबन्धों को एक नए धरातल पर अपने-आपको परखने की प्रक्रिया में हों।

शायद ऐसे ही सम्बन्ध नीलकंठ और उसकी पत्नी रोहिणी के बीच हैं, जो वरिष्ठ कथाकार अशोक गुप्ता के सद्यः प्रकाशित प्रथम उपन्यास 'उत्सव अभी शेष है' में एक नया अर्थ खोजने का प्रयत्न करते हैं। हालांकि पति-पत्नी का यह संबन्ध अपने-आप में पूरी तरह सफल और आलोढ़ित दिखाई नहीं देता। ऐसा दिखाने की लेखक की कोई चेष्टा भी नहीं रही है। क्योंकि यही शायद लेखक का अभीष्ट भी है। लेकिन जैसी विस्फोटक स्थितियों का सामना उपन्यास के आरंभ में रोहिणी करती या जिनसे पाठक की पहली भिड़तं होती है, वे विस्मित कर देने वाली स्थितियां हैं ---- वीणा के पूरी तरह कस दिए गए तारों की तरह -- टूटने की कगार पर।

मदिरा--और शायद धन भी ---- और शायद अवसर भी पाने के नशे में आकंठ डूबे नीलकंठ को, बाजारू और शातिर औरतों के शरीर को भरपूर भोगने, लेकिन फिर भी उनमें वांछित आनन्द न ढूंढ़ पाने वाले अपने मित्र राठौर के समक्ष 'कापुरुष' की तरह अपनी पत्नी रोहिणी को परोस देने की मजबूरी झेलने में जो मक्कार साझेदारी निभानी पड़ती है, वह रोहिणी को भी हत्प्रभ कर देती है। इस तरह आरंभ होता है नैतिकता और अनैतिकता का वह अध्याय, जिसका प्रभाव (---- और तनाव- उपन्यास में देर तक ---(और दूर तक) दिखाई पड़ता है। इस तनाव को 'हैंडल' कर पाने की क्षमता और उसके प्रभाव पर हम आगे चर्चा करेंगे। फिलहाल प्रश्न नैतिकता-अनैतिकता का है। यह सच है कि एक इन्सान के अपने लिए जो चीज नैतिक है, वही दूसरे के संबन्ध में अनैतिक हो जाती है। यह फर्क वह दृष्टि लाती है, जो चीजों को देखती है। शायद इसीलिए ही पात्रों में किसी भी प्रकार का अवरोधबोध जागृत नहीं होता। सबके पास अपने हक में दिए जाने वाले तर्क (या कुतर्क) उपस्थित हैं। चाहे वह नीलकंठ हो, जो अपनी पत्नी को एक वस्तु समझकर राठौर के समक्ष प्रस्तुत करता है। और बड़े ही नाटकीय और धूर्त अपराधबोध से ग्रस्त होने का भ्रम पैदा करता है। इसके साथ ही वह पुनः वहीं , उसी बिन्दु पर लौट आना चाहता है, जहां से उसने अपने कायराना इरादों को अन्जाम दिया था। किन्तु लौटना उसके लिए इतना आसान नहीं सिद्ध होता। क्योंकि वापस लौटने की स्थितियां उतनी अनुकूल नहीं रह पातीं।

--यही स्थिति चन्द्रा की भी है, जो अपने पति की अनुपस्थिति में अपनी दैहिक जरूरतों को नीलकंठ से पूरी करती है। वह भी नैतिकता-अनैतिकता के द्वंद्व से पर है। न वह अपने पति के प्रति अपराधबोध से ग्रस्त है, न ही रोहिणी के प्रति।

--याफिर राठौर, जो नीलकंठ की पत्नी को 'किसान स्क्वैश' के एक उत्पाद की तरह 'इट इज डिफरेंट' कहकर उसे चटकारे लेकर चखता है और नीलकंठ को अपनी पत्नी को पुनः शीशे में उतार लेने कामशविरा देताहै।

लगता है कि उपन्यास के सारे संबन्ध बाजारवाद से ही संचालित होते हैं। एक 'बिकाऊ' चीज की तरह। यह हमारे वर्तमान समाज का बदला हुआ चेहरा है। न कहीं कोई लगाव---- न कहीं कोई भावना--- न कोई सामाजिक मूल्य… मात्र एक उत्पाद। शानदर 'पैकेजिंग' में लिपटा। चमचमाता---आकर्षित करता--- निमंत्रण देता। --- समाज और सामाजिक बन्धनों की संरचना में जिस तरह का बदलाव--- और जिस तरह का अवमूल्यन हमारे आसपास दिखाई पड़ता है, उसी की पड़ताल करता है यह उपन्यास। अवमूल्यन की ज्ञान पगडंडी से रोहिणी अपने लिए एक नया मार्ग तलाशने का प्रयास करती है और उसकी तलाश राजबीर तक जाकर रुक जाती है, जो हमेशा खामोश रहकर रोहिणी को हालात से लड़ते---- और लड़खड़ाते देखता है और उसकी असह्यता की स्थिति में आगे बढ़ कर उसका हाथ थाम लेता है।

इस नई शुरूआत में स्त्री के स्वावलम्बन और स्वतंत्रता का प्रश्न भी खड़ा होता है, जो इस उपन्यास की आधारशिला बनता है। यहां फिर वही प्रश्न है कि आखिर स्त्री अपनी स्वतंत्रता चाहती किससे है ? अपने समाज से, जो उसे गर्त में धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ता ? या अपने उस संबन्ध से, जो पहले ही बिस्तर पर कुचल दिया गया था?-- या फिर अपने-आपसे, जो वह चाहकर भी नहीं कर पाती? -- या फिर अपनी देह से, जिसके कारण ही वह इतनी बड़ी त्रासदी झेलती है-- और जिसका अधिकार वह किन्हीं कमजोर-कंपकंपाते क्षणों में --- बेहद मासूम चुप्पियों के बीच राजबीर को सौंप देती है? यहीं वह महत्वपूर्ण बिन्दु है, जो उपन्यास का प्रस्थान बिन्दु बनते-बनते रह जाता है। क्योंकि रोहिणी के लिए सम्बन्धों के होने--- उनके टूटने-बिखरने --- और पुनः उठ खड़े होने के बीच एक नया रास्ता तलाश करने का निर्णय उसका अपना नहीं है। क्योंकि सम्बन्धों को तोड़ने का निर्णय भी उसका अपना नहीं है। क्योंकि इस निर्णय के पीछे उसका अपना कोई चुनाव--- या विचार नहीं है। ऐसा भी इसलिए है क्योंकि अपने साथ होने वाली किसी भी ज्यादती --- या त्रासदी--- या धोखाधड़ी के लिए उसके अन्तस्तल में किसी भी प्रकार का कोई प्रतिरोध नहीं है । प्रतिरोध होता तो संभव है प्रतिशोध भी होता, जो परिस्थितियों से लड़-झगड़ कर अपने अस्थित्व --- अपने 'होने' को सिद्ध करता। कम से कम तब वह स्वयं को एक 'वस्तु' मात्र में परिवर्तित नहीं होने देता।

नैतिकता-अनैतिकता की ज्ञान विस्फोटक उदासीनता का प्रभाव यह कि तमाम सम्बन्ध उस संवेदनशील स्थिति पर आकर ठहर जाते हैं, जहां अपराधबोध जैसी किसी सम्भावना की गुंजाइश ही नहीं रह जाती। इन परिस्थियों में यह पता ही नहीं चल पाता कि तमाम पात्र सम्बन्धों को किस धरातल पर स्थापित करना चाहते हैं। प्रेम में देह को ढूंढना चाहते हैं या देह में प्रेम को ? क्योंकि प्रेम को प्रेम के स्तर पर --- और देह को देह के स्तर पर जानने का प्रयास तो कहीं है ही नहीं। यहां तक कि राजबीर-रोहिणी का प्रेम-प्रसंग (यदि इसे वास्तव में एक प्रेम-प्रसंग माना जाए तो) भी इससे अछूता नहीं है। क्योंकि वह भी एक समझौते के फलस्वरूप ही पनपा है। किसी मजबूरी की तरह जो एक विकल्पहीन स्थिति में मात्र ओढ़ने-बिछाने -- ढोते जाने की प्रक्रिया बन जाता है। ऐसे में, यदि हर व्यक्ति की कमियों-खूबियों को एक तरफ रख दें, तो वे किसी 'फ्रायडीय' अवधारणा से ग्रस्त महसूस होने लगते हैं। जिनका प्रत्येक क्रिया-कलाप --- या प्रत्येक हरकत-- प्रत्येक सोच यौनिक क्रियाओं या प्रतिक्रियाओं से संचालित होती है।

और यह मानने में हमें बिल्कुल भी संकोच नहीं करना चाहिए कि उनका यह आचरण मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। यहीं लेखक उनके (पात्रों के) मनोविज्ञान को पकड़ने में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक कर गया है। यहां महादेवी वर्मा का यह उदाहरण देना भी आवश्यक जान पड़ता है कि -"महत्वपूर्ण सिर्फ यह नहीं कि क्या लिखा गया है बल्कि यह अधिक महत्वपूर्ण है कि कैसे लिखा गया है।"

शायद इसी चूक के कारण पात्रों में पूर्ण तथ्यपरकता नहीं आ पाई जिसकी यहां बहुत आवश्यकता थी। लेखक स्वयं 'भीतर की बात' उभारने में बहुत सक्षम है, जिसकी साक्षी हैं उनकी कहानियां, जो मनोवैज्ञानिक कसौटी पर अपनी उपादेयता सिद्ध करती हैं। किन्तु यहां पात्रों का मनोविज्ञान--- या उनका व्यवहार --- या उनकी सोच स्वय उनके ही अनुकूल नहीं बैठती। वरना क्या कारण है कि चन्द्रा जैसी शातिर औरत, जो अपनी बात कह गुजरने में माहिर है--- जो बात से घायल को फुसलाने-बहलाने की कला जानती है--- जो अपनी इसी काबलियत के दम पर नीलकंठ को बांधती और भोगती है किन्तु रोहिणी की त्रासदी जानकर किसी संवेदनशील भारतीय नारी की तरह व्यथित होकर रो उठती है--- और उसे अपनी ही देह से घिन आने लगती है। उसकी यह मनःस्थिति भी उसके शातिराना व्यवहार की तरह नाटकीय है।

और क्या कारण है कि रोहिणी चन्द्रा के साथ अपने पति के अवैध सम्बन्धों को भली-भांति जानते हुए भी चन्द्रा के साथ अत्यन्त सहजता के साथ उसकी 'सहेली' बनकर रहती है। और अपने सुख-दुःख को उसके साथ बांटती नजर आती है। अनैतिकता को यह सीधा-सीधा उसका मौन समर्थन नहीं तो फिर क्या है? इससे क्या वह किसी भी प्रकार की शिकायत किसी से भी करने से अपना अधिकार नहीं खो बैठती? स्त्री-विमर्श की राह में यही क्या सबसे बड़ी बाधा नहीं है? उदासीनता का यह प्रकटीकरण क्या यथार्थ-परकता को संदेहास्पद नहीं बना देता?

और क्या कारण है कि रोहिणी की दस वर्षीय बेटी सरस्वती किसी विद्वान व्यक्ति की तरह धाराप्रवाह प्रवचन देने से चूकती नहीं और चाहती है --"मेरी एक बात सुन लो पहले। इतने दिन से नहीं कहा मैंने, आज बताती हूं। पापा, ताई की नीयत हमें खेत , मकान और नकदी कुछ भी देने की नहीं है। वह बार-बार कहती है कि मेरे जीते जी इसमें से सूत भी किसी को नहीं मिलेगा। सब सुनते हैं इस बात को । बुआ भी सुनती हैं। मेरा वहां रहना खटकता था ताई की आंख में। उन्हें लगता था कि मैं किसी भी समय उनके इस इरादे को समझ कर आपको बुला सकती हूं--- वह डरती थीं कि मैं उनके इरादे उन्हें बताकर तुम्हारे हक में आवाज न बटोर लूं।"(पृष्ठ - 195)

उपन्यास में पात्रों की पारिवारिक पृष्ठभूमि या शैक्षणिक परिवेश को देखते हुए आम बोलचाल में जम कर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग आश्चर्य पैदा करता है। यहां तक कि रोहिणी भी अंग्रेजी भाषा की ज्ञाता होने का भ्रम पैदा करते हुए कहती है कि "साथ सोने से बड़ा सुख साथ रोने में होता है--- शायद इसीलिए अंग्रेजी में 'स्लीप' का नाद 'वीप' से जुड़ता है। रोज - ब-रोज की जिन्दगी में रोना अपने सही माने में कहां जीता है आदमी---- सिर्फ 'क्राई' करता है। (पृष्ठ - 193)

शब्दों का ऐसा विश्लेषण वास्तव में कोई विलक्षण व्यक्ति ही कर सकता है। इसके कारणों की पृष्ठभूमि की चर्चा करने से पहले मैं उपेन्द्रनाथ अश्क के दो खण्डों में प्रकाशित श्रेष्ठ कृतित्व 'अश्क 75 - दूसरा खण्ड' में स्वयं अश्क जी का मानना है कि 'लेखक के जीने का उसके लेखन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। वह जैसे जीता है, जिस दृष्टि से जीता है, जिन्दगी से उसकी जो आकांक्षा है, उसी के अनुसार उसका लेखन ढलता है। --- और 'जिन्दगी को लिखने के लिए जिन्दगी का सीधा सम्पर्क जरूरी है।

यह प्रसंग कृतित्व में समाज के सीधे प्रभाव और चित्रण में आता है, जो सीधे-सीधे भाषा के साथ जुड़ता है और औपन्यासिक परिवेश व पात्रों को गढ़ता है। जबकि 'उत्सव----' में लेखकीय निष्कर्षों ने तो परिवेश को क्षति पहुंचाई ही है, भाषा भी सभी पात्र वही बोलते हैं, जो लेखक की अपनी भाषा है। यह प्रत्यक्ष रूप से पत्रों के जीवन में हस्तक्षेप है, जिससे सब लेखकों को बचना चाहिए ताकि कृति में यथार्थपरकता को बनाए रखा जा सके। यदि ऐसा होता तो यह संभव ही नहीं था कि चन्द्रा , राठौर , नीलकंठ के परिवार, राजबीर-रोहिणी, सरस्वती-आशीष , जिनमें आततायी और पीड़ित सभी सम्मिलित हैं , एक साथ किसी उत्सव का आयोजन करते, जो अन्ततः सम्बन्धों की लाश पर किन्ही गिद्धों के उत्सव से अधिक कुछ नहीं है---- और जिसके सम्बन्ध में पूरे विश्वास के साथ यह कहा जा सके कि 'इट इज डिफरेन्ट'।


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29 जनवरी 1947 को देहरादून में जन्म। इंजीनियरिंग और मैनेजमेण्ट की पढ़ाई। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढाई के दौरान ही साहित्य से जुड़ाव ।

अब तक सौ से अधिक कहानियां, अनेकों कविताएं, दर्जन भर के लगभग समीक्षाएं, दो कहानी संग्रह, एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। एक उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य। बेनजीर भुट्टो की आत्मकथा Daughter of the East का हिन्दी में अनुवाद।

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