गुरुवार, 21 मई 2026

कहानी - बेटू

बेटू उन्हें लगा जैसे दरवाजे के साथ रखी प्रैम उन्हें बुला रही है. “उठो, सोच क्या रहे हो. बेटू को मुझ पर बैठाते क्यों नहीं! कब से मैं इंतजार कर रही हूं.” ‘बेटू---तुमने तो उसे जाते देखा था. शायद तुम ध्यान नहीं दे पायी थीं. पार्क में घूमते हुए थक गयी होगी और सो गयी होगी. उस दिन बेटू को घुमाकर मैं जब लौटा तब के बाद की घटनाओं की ओर भी तुम ध्यान नहीं दे पायी होगी. निश्चित ही तुम थक गयी थी.’ वह बुदबुदाए, “उसके अगले दिन बेटू मुझसे पांच सौ किलोमीटर दूर चला गया ---अपनी मां के साथ. मैं समझ रहा हूं कि तुम्हें भी मेरी ही तरह बेटू से प्यार है. पिछले चार महीने से मैं तुम पर उसे घुमा जो रहा था. छोटे बच्चों से किसी को भी, भले ही वह तुम जैसी निर्जीव वस्तु ही क्यों न हो, प्यार हो ही जाता है.” वह फिर बुदबुदाए और विचारों में खो गए. वह जब भी घूमने जाते, बेटू को उस प्रैम में साथ लेकर जाते. घूमने के बाद कुछ देर बेंच पर बैठकर उससे बातें करते. दस महीने का बेटू कुछ-कुछ बातें करने की कोशिश करता. सुबह धूप पार्क की हरी घास पर जब अपनी चादर बिछा देती, वह प्रैम को एक ओर खड़ी करके बेटू को घास में बकइन चलने के लिए छोड़ देते. बेटू को उनकी चप्पलों से बहुत प्यार है. वह घुटनों चलता हुआ चप्पलों की ओर लपकता. वह हंसते हुए चप्पलें हटाकर दूसरी ओर रख देते. बेटू हंसता हुआ उधर भागता. वह फिर चप्पलों को पहले स्थान पर रखते. बेटू फिर हंसता हुआ उधर दौड़ता. दादा-पोते का यह खेल देर तक चलता रहता. वह सोचते कि दस महीने का बेटू यह समझता है कि वह उसे केवल उलझा रहे हैं. जब बेटू इधर-उधर दौड़ता हुआ थक जाता, वह उसे गोद में लेकर प्यार करने लगते. लेकिन बच्चे इतनी जल्दी थकते कहां हैं! पांच मिनट में ही बेटू गोद से मचलकर उतरता और घुटनों के बल बैठकर प्रैम को धक्के देकर दूर तक ले जाता या दूर कबूतरों के झुंड को देखकर घुटनों के बल दौड़ लेता. वह कुछ देर तक उसे कबूतरों की ओर दौड़ता देखते रहते, फिर उठाकर उसे गोद में लेकर प्यार करते और प्रैम में लेकर लौट लेते. नवम्बर महीने से हर दिन ऎसा हो रहा था. उस दिन भी बेटू के नाश्ता कर लेने के बाद वह उसे लेकर पार्क में गए. धूप में गरमी थी, लेकिन इतनी भी नहीं कि टहला न जा सकता या कुछ देर बैठकर दादा-पोता विटामिन डी न ले सकते. हर दिन की तरह चप्पलों के खेल और लॉन में बेटू की दौड़ के बाद वह लगभग ग्यारह बजे घर लौटे. फ्लैट का दरवाजा खुला हुआ था. दरवाजा खोलते ही उन्हें चीख-चिल्लाहट सुनाई दी. पुत्रवधू गायत्री शेरनी बनी बेटे सरल पर चीख रही थी. बेटा भी चीख रहा था. प्रैम खड़ी कर उन्होंने लपककर दरवाजा बंद किया, जिससे उन दोनों के चीखने की आवाजें दरवाजा लांघकर सामने के फ्लैट में प्रवेश न करे. उन्होंने बेटू को प्रैम से उठाया, गोद में लिया और माजरा समझने के लिए ड्राइंग रूम में हत्प्रभ से खड़े रहे. “मैंने आपको पहले ही कहा था कि मैं वैष्णों देवी नहीं जाऊंगा. इसके बावजूद उन्होंने मेरा आरक्षण क्यों करवा दिया!” सरल कह रहा था. “मत जाइए. लेकिन मैं जाऊंगी.” “आप जाइए, लेकिन बेटू नहीं जाएगा!” “वह मेरे साथ जाएगा.” “बहू, बेटू बहुत छोटा है, पहाड़ों में गज़ब की ठंड पड़ रही है. कहीं कुछ---.” “आप बीच में न बोलें. यह मेरे और मेरे हसबैंड के बीच की बात है.” गायत्री उतने ही ऊंचे स्वर में बोली जितने ऊंचे स्वर में वह सरल से चीख रही थी. चीखने और सिर झिटकने से उसके बाल बिखरे हुए थे. चेहरा विकृत हो रहा था. गायत्री के उत्तर से उन्हें बिजली के हजारों वॉट के करंट-सा झटका लगा. उसने ऎसा दूसरी बार किया था. पहली बार भी उसने ऎसा ही किया था. उन दिनों वह अपने मायके में थी. पिछले वर्ष की बात थी. इसका मायका उस शहर में है जहां उनकी बहन रहती थी. बहन की मृत्यु पन्द्रह जनवरी को सुबह चार बजे हुई. उन्हें सात बजे भांजे का फोन आया. उस समय वह फ्लैट्स के बाहर गैलरी में टहल रहे थे. चारों ओर घना कोहरा और कड़ाके की ठंड थी. दरअसल वह हर मौसम में सुबह साढ़े चार बजे जाग जाते हैं. ठंड में वह बाहर टहलने नहीं जा पाते, लेकिन कमरे में बंद रहना भी नहीं चाहते इसलिए फ्लैट्स के बाहर गैलरी में ढाई-तीन हजार कदम चल लिया करते हैं. भांजे ने बताया कि अंत्येष्टि दोपहर बारह बजे होगी. “बेटा घना कोहरा है. सरल भी सो रहा है. उसे जगकर तैयार होने में एक घण्टा लग जाएगा. यदि हम आठ बजे भी निकलेंगे तब भी अंत्येष्टि तक पांच सौ किलोमीटर की यात्रा तय कर पाना संभव नहीं होगा.” “मामाजी, मैं जानता हूं. आप परेशान न हों. आपको सूचित करना आवश्यक था.” “मुझे तेरहवीं के बारे में सूचना देना.” “जी मामाजी!” तेरहवीं की सूचना यथा समय मिलने पर वह बेटे सरल के साथ एक दिन पहले अपनी गाड़ी से गए. गायत्री मायके में थी. सरल ने गायत्री को सूचित कर दिया था कि हम आ रहे हैं. लौटते समय वह हमारे साथ लौट आएगी. हमने यह भी तय किया कि हम सरल की ससुराल में ही ठहरेंगे और अगले दिन सुबह दस बजे बहन के यहां जाएंगे. गायत्री और उसके पिता को हमारे आने का कारण मालूम था. हम तीन बजे उनके यहां पहुंचे. भोजन के बाद हम आराम करने के बारे में सोच ही रहे थे कि गायत्री सरल से बोली, “कल बारह बजे हमने सत्यनारायण की कथा का कार्यक्रम तय किया है---आपको मेरे साथ बैठना होगा.” “आपको बताया था कि हम बुआ की तेरहवीं में आ रहे हैं. कल वहां जाना है. मैं छोटा था तब फूफा से मिला था. यहां आकर भी उनसे नहीं मिलूंगा तब---आपने बताया होता कि आपने ऎसा कोई कार्यक्रम निश्चित किया हुआ है---मैं आपको मना करता.” “डैडी जी को जाने दीजिए. वहां घर के एक आदमी की उपस्थिति बहुत होगी. आपको तो मेरे साथ बैठना ही होगा.” “सॉरी गायत्री. मैं डैडी के साथ जाऊंगा. दुख की इस घड़ी में फूफाजी से नहीं मिला तो---.” कुछ रुककर सरल बोला, “आप इस कार्यक्रम को निरस्त कर दें.” “बेटा, शादी के बाद सत्यनारायण की कथा बहुत जरूरी होती है. आपने अपने घर नहीं सुनी, कोई बात नहीं. अब आप यहां हैं तो इसे न टालें. यह नव-विवाहितों के लिए बहुत आवश्यक है.” गायत्री के पिता मिनमिनाते हुए बोले तो वह चुप नहीं रह सके, “भाई साहब, सरल को न रोकें. आपकी और हमारी रिश्तेदारी दो साल पहले हुई है. मेरी और मेरे बहनोई की रिश्तेदारी चालीस साल पुरानी है.” “अरे, आप भी कैसी बातें करते हैं पंकज जी!” गायत्री के पिता फिर मिनमिनाए, “इतना शुभ कार्य सोचकर कभी टाला जाता है.” उनकी इस बात पर गायत्री ने उसी प्रकार हंगामा किया जिस प्रकार वह अब सुन रहे थे. उस दिन वह लगातार उसे समझाने का प्रयास करते रहे थे, लेकिन वह बोलती रही थी, “आप नहीं चाहते कि हमारा दाम्पत्य जीवन सुखी रहे.” रोते हुए चीखकर उसने कहा था. “हमने पंडित जी और अपने परिचितों को कह दिया है.” उसके पिता की मिनमिनाहट उन्हें सुनाई दी. “उसका एक उपाय है कि आप और गायत्री की माता जी कथा सुन लें. मां-पिता बच्चों के हितार्थ शुभ कार्य करते हैं.” “लेकिन यह तो गायत्री और सरल को ही करना है.” “भाई साहब, क्षमा करेंगे! हम जिस लिए यहां आए हैं हमारे लिए वह आवश्यक है न कि अचानक थोपा गया आपका यह आयोजन---.” और वह उठ खड़े हुए थे. सरल भी उठ खड़ा हुआ था. गायत्री की मां दरवाजे की ओट लिए खड़ी थी और बुदबुदा रही थी, “मेरी बेटी की किस्मत फूट गयी ऎसे लोगों के घर ब्याह करके जो धरम-करम में विश्वास नहीं करते.” गायत्री के पिता के घर से निकलकर उन्होंने सरल से कहा, “तुम गूगल करके किसी होटल की जानकारी लो, जहां गाड़ी पार्किंग की समस्या न हो.” सरल ने गूगल किया. होटल लैंड मार्क में कमरा मिल गया. वे दो दिन उस होटल में रुके. अगले दिन सरल ने गायत्री को फोन करके जानना चाहा कि वह क्या साथ जाना चाहेगी, लेकिन न उसने फोन उठाया और न उसके पिता ने. उस घटना के एक माह बाद गायत्री आयी. उन्होंने उसके पिता के घर उसके द्वारा अपने अपमान को ‘क्षमा बड़न को चाहिए—’ सोचकर भुला दिया था. कई दिनों तक उनके साथ ऎंठी रस्सी की भांति गायत्री तनी रही. उन्होंने ही संवाद प्रारंभ किया. उसके बाद वैभव (बेटू) पैदा हुआ और सब सामान्य रहा. लेकिन आज---. “मैं यहां नहीं रह सकती.” गायत्री लगातार कह रही थी. खीजकर सरल बोला, “ठीक है, मैं आरक्षण करवा देता हूं. चली जाइए.” उसने कोई उत्तर नहीं दिया. उनकी गोद से उसने बेटू को लिया और घर से बाहर निकल गयी. पांच मिनट बाद वापस भी लौट आयी. जिस समय वह दरवाजे पर थी, उसके पिता का फोन उन्हें आया, “पंकज जी, आपने गायत्री को घर से निकाल दिया है.” “क्या बात कर रहे हैं! वह घर में है.” गायत्री तब तक घर के अंदर आ चुकी थी. “अभी-अभी उसका फोन आया था कि आप लोगों ने उसे और वैभव को धक्के मारकर घर से निकाल दिया है.” “जनाब, वह आपको केवल झूठा फोन करने के लिए बाहर गयी थी. इस समय घर में है. कहें तो बात करवा दूं.” “मुझे बात नहीं करनी. आप लोग लगातार उसके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं.” कुछ देर रुककर उसके पिता बोले, “मैं कल छोटे बेटे को भेजूंगा, गायत्री को ले जाने के लिए.” वह चुप रहे थे. जब गायत्री पांच मिनट के लिए बाहर गयी थी, उस समय उन्होंने सरल से झगड़े का कारण पूछा था. “इसकी एक चचेरी बहन अमेरिका में रहती है. वह भारत आयी हुई है. गायत्री ने एक महीना पहले पूछा था कि वे लोग वैष्णों देवी जाना चाहते हैं और वे चाहते हैं कि गायत्री और वह भी उनके साथ चले. लेकिन ऑफिस में इतना काम है डैड कि मैंने इसे कहा था कि मैं नहीं जा पाऊंगा. वह जाना चाहे तो चली जाए. वैभव को साथ ले जाना सही नहीं होगा. आज उनका फोन आया कि उन्होंने मेरा भी आरक्षण करवा लिया है.” “बिना पूछे!” “यही मैंने कहा और यह झगड़ने लगी. मैंने इसे पहले ही कहा था कि मौसम सही होने पर हम चलेंगे लेकिन---.” पिता को फोन करने जाने के लिए गायत्री ने बेटू को जो उनकी गोद से लिया तो अगले दिन छोटे भाई के साथ जाने तक उसने उसे न उन्हें हाथ लगाने दिया और न सरल को. उसका भाई स्टेशन से ऊबर लेकर आया था. फ्लैट से नीचे खड़ा रहा. गायत्री अटैचियां पहले ही नीचे छोड़ आयी थी. जब वह बेटू को लेकर जा रही थी, सरल बेटू को प्यार करने के लिए विचिलित ड्राइंग रूम में टहल रहा था. वह स्तब्ध किसी प्रस्तर मूर्ति की भांति सोफे पर बैठे बेटू को मां की गोद में जाता निहारते रहे थे. बेटू मुड़-मुड़कर उन्हें और अपने पिता को देख रहा था. जब गायत्री गेट से बाहर निकलकर लिफ्ट आने का इंतज़ार कर रही थी, वह लपककर दरवाजे से बाहर निकले थे और आंखों में आंसू थामे बेटू को बाय किया था. लेकिन अबोध बालक केवल उनकी ओर देखता रहा था. शायद समझने का प्रयास कर रहा था कि मां उसे लेकर कहां जा रही है! उस दिन के बाद से वह खाली प्रैम को देखते हैं और लंबी आह भरकर रह जाते हैं. वह सोफे पर बैठे बेटू की यादों में खोए रहे. काफी देर बाद उठे, बेटू के टेडी बियर पर उनकी नज़र जा टिखी जो उसके जाने के बाद से सैटी पर वैसे ही रखा हुआ था जैसा उसके रहते रखा रहता था. उन्होंने उसे उठाया, प्रैम में उसे रखा और प्रैम लेकर टहलने के लिए निकल गए. -0-0-0-0-

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