शुक्रवार, 17 जून 2011

नवाकुंर



तस्वीर


भानु प्रिया

आदमी मात्र नाटक भर है
जिसे अपने द्वारा अभिनीत कार्य ही
सुख दे पाते हैं चाहे क्षण भर के लिए ही सही
और संतुष्टी दे जाते हैं मृत्युपर्यंत
उसको लगता है कि इस तरह वह
दूसरों के लिए जाला बुनते हुए ,
उनके दिलों- दिमाग पर छा जाएगा .
उसके सपनों में गरीबी से जुड़े दर्शन जैसी बातें तो होती हैं.
तथा उसी दर्शन से वह,
अपने अन्दर संतुष्टी के महल खड़े करता रहता है
सोचता है कि इस तरह उसने कितने उपकार किये हैं मानव कल्याण हेतु .

जबकि उसका अहम् उसके अंतस में मात्र सडांध के कुछ नही होता
उसकी जिन्दगी भी इसीलिये कोई विशेष महत्त्व नही रख पाती है
तभी तो अगले ही क्षण वह एक तस्वीर बन जाता है
ठीक उसके स्वयं के बनाए सपनों जैसा.
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जन्म : २८ मार्च, १९९३ को सुल्तानपुर (उ.प्र.) मे.

वरिष्ठ कवि/कथाकार ताऊ अशोक आंद्रे से कविता की प्रेरणा मिली. घर में साहित्य का माहौल होने के कारण कई बार मन में कुछ तस्वीरें उभरने लगती हैं
शायद इसी कारण इस कविता का जन्म हो .सका
फिलहाल Company Secretary के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.कॉम प्रथम वर्ष की तैयारी .

3 टिप्‍पणियां:

बलराम अग्रवाल ने कहा…

पहली कविता रचने पर मेरी ओर से शुभाषीश प्रिय भानु। लगातार रचती रहो, इसी स्नेह के साथ तुम्हारा एक और ताऊ।

बेनामी ने कहा…

aadarniy shree baram uncle jee jis tarah se aapne mera housla badaya hai uske liye mai aapka dhanywad karti hoon or bhavishya men bhee poori koshish krungee ki kuchh or achchhi rachnayn likh kar aapke vishvaas ko banae rakhun
bhanu priya

सहज साहित्य ने कहा…

अच्छी शुरुआत की है बेटी भानु प्रिया । यह कविता आशान्वित करती है कि भविष्य में आपकी और रचनाएँ भी सामने आएँगी।