मंगलवार, 10 जनवरी 2012

धारावाहिक उपन्यास

’हाज़ी मुराद’
लियो तोलस्तोय
अनुवाद : रूपसिंह चन्देल
चैप्टर - ६ और ७

(१९०८ की गर्मियों में यास्नाया पोल्याना
में अपनी स्टडी में)






छः

वोरोन्त्सोव इस बात से बहुत प्रसन्न था कि शमील के बाद रूस के सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली शत्रु को प्रलोभित करने में, कोई अन्य नहीं, बल्कि वह सफल रहा था। केवल एक ही रोड़ा था। वह था वोजविजेन्स्क में फौजी कमाण्डर, जनरल मिलर जकोमेल्स्की, और सच कहा जाये तो पूरा मामला उसके ही माध्यम से संचालित होना चाहिए था। वोरोन्त्सोव उसे बिना सूचित किये शुरू से अंत तक कार्यवाई करता रहा था, और इस बात की अप्रिय प्रतिक्रिया संभव थी। इस विचार से वोरोन्त्सोव की प्रसन्नता कुछ देर के लिए मेघाच्छन्न हुई।
जब वोरोन्त्सोव घर पहुंचा, उसने हाजी मुराद के अगंरक्षकों को क्षेत्रीय कमाण्डर के सुपुर्द किया और हाजी मुराद को अपने आवास में ले गया।
प्रिन्सेज मेरी वसीलीव्ना ने हाजी मुराद का ड्राइंग-रूम में स्वागत किया। उसने सुरुचिपूर्ण ढंग से कपड़े पहन रखे थे और मुस्करा रही थी और उसका छः वर्षीय खूबसूरत पुत्र उसके साथ था। हाजी मुराद ने अपने हाथों से अपनी छाती दबायी और दुभाषिये के माध्यम से शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए कहा, कि वह अपने को प्रिन्स का मित्र मानता है। चूंकि उन्होंने अपने घर में उसका स्वागत किया है, इसलिए मित्र का परिवार उसके लिए उतना ही क़ाबिले अदब ( पूज्य ) है जितना कि स्वयं मित्र। मेरी वसीलीव्ना को हाजी मुराद की उपस्थिति और उसका व्यवहार पसंद आया। वास्तविकता यह थी कि उसने उसके प्रति अधिक अनुग्रह दिखाते हुए पहले से ही प्रवृत्त अपना लंबा गोरा हाथ जब उसकी ओर बढ़ाया था तब हाजी मुराद खांसने लगा था और लज्जारुण हो उठा था। मेरी वसीलीव्ना ने उससे बैठने का आग्रह किया और पूछा कि क्या वह कॉफी पियेगा, और उसे कॉफी सर्व किये जाने का आदेश दिया। लेकिन हाजी मुराद ने इंकार कर दिया। वह बहुत मामूली-सी रशियन समझ लेता था, लेकिन उसे बोल नहीं सकता था, और जब वह उसे समझ नहीं पाता था, मुस्करा देता था। उसकी मुस्कान ने मेरी वसीलीव्ना को मुग्ध कर दिया था, जैसा कि पोल्तोरत्स्की ने किया था। मेरी वसीलीव्ना का घुंघराले बालों और तेज आँखों वाला पुत्र, जिसे वह बुल्का बुलाती थी, माँ के बगल में खड़ा, निर्निमेष हाजी मुराद की ओर दे।

हाजी मुराद को अपनी पत्नी के पास छोड़कर वोरोन्त्सोव हाजी मुराद के आत्म-समर्पण की रपट तैयार करके मुख्यालय भेजने की व्यवस्था करने के लिए कार्यालय चला गया। उसने एक रपट ग्रोज्नी में ‘लेफ्ट फ्लैंक‘ के कमाण्डर जनरल कोज्लोवस्की को लिखी, और एक पत्र अपने पिता को लिखा, और इस बात से चिन्तित होता हुआ वह जल्दी ही घर लौट आया कि उसकी पत्नी इस बात से नाराज हो रही होगी कि वह एक अनजान और खतरनाक व्यक्ति को उसके पास छोड़ गया था, जिसका एक ओर नाराज होने का अवसर दिये बिना आतिथ्य करना था तथा दूसरी ओर अतिरिक्त मित्रता भी प्रदर्शित करनी थी। लेकिन उसका भय आधारहीन था। हाजी मुराद वोरोनत्सोव के सौतेले पुत्र बुल्का को घुटने पर बैठाये एक कुर्सी पर बैठा हुआ मेरी वसीलीव्ना की किसी हास्य टिप्पणी के दुभाषिये द्वारा किये गये अनुवाद को सुनकर एकाग्रतापूर्वक सिर झुका रहा था। मेरी वसीलीव्ना कह रही थी कि यदि उसने अपने मित्रों को वह सब दे दिया जिसकी वे प्रशंसा करते थे तो उसे शीघ्र ही अदम की भाँति रहना होगा।
प्रिन्स के प्रवेश करते ही हाजी मुराद ने बुल्का को नीचे उतार दिया, जो उसके घुटने से उतरकर चकित था और रुष्ट होकर खड़ा हो गया था। उसके चेहरे का प्रसन्न भाव तुरंत कठोरता और गंभीरता में बदल गया था। हाजी मुराद तभी बैठा जब वोरोन्त्सोव ने सीट ग्रहण कर ली। बातचीत जारी रखते उसने मेरी वसीलीव्ना की टिप्पणी का उत्तर देते हुए कहा कि यह उसके दस्तूर में है कि एक मित्र जो कुछ भी पसंद करे वह उसे अवश्य दे दी जाये।
“आपका पुत्र मेरा मित्र है,” उसने बुल्का के बालों को सहलाते हुए रशियन में कहा। बुल्का पुनः उसके घुटने पर बैठ गया था।
“आपका बटमार मोहक है।” मेरी वसीलीव्ना ने पति से फ्रेंच में कहा। बुल्का ने उसकी कटार की प्रशंसा करनी प्रारंभ की तो उसने वह उसे दे दी ।
बुल्का ने कटार सौतेले पिता को दिखाई।
“यह बहुत कीमती है।” मेरी वसीलीव्ना ने कहा।
“उसे कुछ उपहार देने के लिए हमें कोई उपाय खोजना आवश्यक है।” वोरोन्त्सोव ने कहा।
हाज़ी मुराद आँखें नीची किए बैठा रहा और बुल्का के घुंघराले बालों पर लगातार हाथ फेरता रहा।
“बहादुर बालक, बहादुर बालक।”



“कितनी प्यारी कटार है!’’ वोरोन्त्सोव ने अच्छे आधारवाले स्टील के बीच में खांचेदार धारवाली कटार को बाहर निकालते हुए कहा। “बहुत धन्यवाद ।”
“उससे पूछो, हम उसके लिए क्या कर सकते हैं,” वोरोन्त्सोव ने दुभाषिये से कहा।
दुभाषिये ने अनुवाद किया और हाजी मुराद ने तुरंत उत्तर दिया कि वह कुछ नहीं चाहता, लेकिन वह एक ऐसे स्थान में जाना चाहेगा जहाँ वह नमाज अदा कर सके। वोरोन्त्सोव ने एक नौकर को बुलाया और कहा कि वह हाजी मुराद की इच्छा को पूरा करे।
जैसे ही हाजी मुराद अकेला हुआ, उसका चेहरा बदल गया। उसके चेहरे पर प्रसन्नता, चाहत और गर्व के मिश्रित भाव तिरोहित हो गये और एक प्रकार की चिन्ता ने उनका स्थान ले लिया।
वोरोन्त्सोव द्वारा उसका स्वागत उसकी अपेक्षा से कहीं अधिक अच्छा था। लेकिन जितना अच्छा स्वागत था उतना ही कम हाजी मुराद को वोरोन्त्सोव और उसके अधिकारियों पर भरोसा था। वह हर चीज से भयभीत था। वह सोचता रहा कि शायद उसे कैद कर लिया गया था। बेडि़यों में जकड़कर उसे साइबेरिया भेज दिया जायेगा या तत्काल मार दिया जायेगा, और इसीलिए वह अपनी सुरक्षा के प्रति चैकन्ना था।
एल्दार अंदर आया और उसने उससे पूछा कि उसके अंगरक्षकों को कहाँ ठहराया गया था और घोड़े कहाँ थे और क्या उन लोगों ने उनसे अपने हथियार ले लिये थे ?
एल्दार ने बाताया कि घोड़े प्रिन्स के अस्तबल में थे। आदमियों को ‘आउट हाउस’ में ठहराया गया था। उन लोगों ने अपने हथियार सौंप दिये थे और दुभाषिया उन्हें भोजन और चाय दे रहा था।
हाजी मुराद ने सिर हिलाकर हैरानी व्यक्त की, कपड़े उतारे और घुटनों के बल झुककर नमाज अदा करने लगा। जब उसने नमाज समाप्त कर ली उसने अपनी चांदी की कटार अपने पास लाने का आदेश दिया। उसने पुनः कपड़े पहने और कोच पर पैर रखकर बैठ गया और प्रतीक्षा करने लगा कि देखें अब क्या होगा।
ठीक चार बजे के बाद उसे प्रिन्स के पास भोजन के लिए बुलाया गया।
भोजन में उसने पुलाव के अतिरिक्त कुछ नहीं लिया, जिसे उसने उसी स्थान से स्वयं परोसा जहाँ से मेरी वसीलीव्ना ने परोसा था।


“उसे भय है कि हम उसे जहर दे सकते हैं,” मेरी वसीलीव्ना ने पति से कहा। उसने स्वयं उसी स्थान से परोसा जहाँ से मैनें।” उसने दुभाषिये के माध्यम से तुरंत हाजी मुराद को संबोधित करते हुए पूछा कि वह अपनी प्रार्थना पुनः कब करेगा ? हाजी मुराद ने पाँचों उंगलियाँ उठायीं और सूर्य की ओर इशारा किया।
“ तब, शीघ्र ही,” वोरोन्त्सोव ने टनटनाने वाली घड़ी निकाली, एक स्प्रिंग दबाई, और घड़ी ने टनटनाकर सवा चार बजे का समय बताया। हाजी मुराद स्पष्ट रूप से उस आवाज से अचम्भित हुआ था, और उसने उसे पुनः टनटनाने के लिए कहा और घड़ी देखने का आग्रह किया।
”इस बार आप करके देखें। घड़ी उसे दे दीजिये,” मेरी वसीलीव्ना ने पति से कहा।
वोरोन्त्सोव ने घड़ी तुरंत हाजी मुराद की ओर बढ़ा दी। हाजी मुराद ने अपनी छाती पर अपना हाथ रखा और घड़ी ले ली। उसने अनेक बार स्प्रिंग दबायी, सुना और प्रशंसा में सिर हिलाता रहा।
भोजनोपरांत मिलर जकोमेल्स्की के परिसहायक (ए डी सी ) के प्रिंस से मिलन की सूचना दी गयी।
परिसहायक ने प्रिन्स को बताया कि जब जनरल ने हाजी मुराद के आत्म समर्पण के विषय में सुना, वह इस बात से बहुत खीझे कि उन्हें इस विषय में सूचित नहीं किया गया, और मांग की कि हाजी मुराद को तुरन्त उसके पास लाया जाये। वोरोन्त्सोव ने कहा कि वह आज्ञा का पालन करेगा। अपने दुभाषिये के माध्यम से उसने जनरल का आदेश हाजी मुराद को बताया और अपने साथ मिलर के पास चलने के लिए उसे कहा।
जब मेरी वसीलीव्ना को ज्ञात हुआ कि परि-सहायक क्यों आया था, उसने तुरन्त स्पष्ट अनुभव किया कि उसके पति और जनरल के मध्य अवश्य एक तमाशा होगा। पति के रोकने के हर संभव प्रयास के बावजूद उसने उसके और हाजी मुराद के साथ जनरल से मिलने के लिए प्रस्थान करने का निर्णय किया।
“बेहतर होगा कि तुम यहीं रुको। यह मेरा मामला है तुम्हारा नहीं।”
“तुम मुझे जनरल की पत्नी से मिलने जाने से नहीं रोक सकते।”
“तुम जाने का कोई दूसरा समय चुन सकती हो।”
“लेकिन, मैं अभी जाना चाहती हूँ।”
“उसके लिए ऐसा कुछ नहीं है।” वोरोन्त्सोव सहमत हो गया, और तीनों चल पड़े।

जब वे पंहुचे, मिलर फीकी विनम्रता के साथ मेरी वसीलीव्ना को पत्नी के पास ले गया, और सहायक को कहा कि वह हाजी मुराद को स्वागत कक्ष में ले जाये और जब तक उसे उसका आदेश न मिले, उसे कहीं बाहर जाने की अनुमति न दे।
“अंदर आइये” अपनी स्टडी का दरवाजा खोलते हुए उसने वोरोन्त्सोव से कहा और अपने आगे प्रिन्स को अंदर प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त किया।
अन्दर एक बार वह प्रिन्स के सामने रुक गया और उसे बैठने के लिए कहे बिना बोला।
”मैं यहाँ का ‘मिलिटरी कमाण्डर’ हूँ, इसलिए शत्रु से कोई भी वार्ता मेरे माध्यम से ही होनी चाहिए थी। हाजी मुराद के आत्म-समर्पण की सूचना आपने मुझे क्यों नहीं दी?”
“एक एजेण्ट मेरे पास आया था और मेरे समक्ष हाजी मुराद के आत्म-समर्पण करने की उसकी इच्छा व्यक्त की थी,” वोरोन्त्सोव ने उत्तर दिया। उत्तेजना से उसका चेहरा विवर्ण हो उठा था क्योंकि उसे क्रुद्ध जनरल से कठोर प्रतिक्रिया की ही अपेक्षा थी। उस समय वह स्वयं क्रोध से प्रभावित था।
“मैं आपसे पूछ रहा हूँ, कि आपने मुझे सूचना क्यों नहीं दी थी ?”
“बैरन, मैं ऐसा करना चाहता था, लेकिन…।”
‘‘बैरन नहीं, बल्कि आपके लिए महामहिम…”
यहाँ बैरन का दबा क्षोभ अचानक फूट पड़ा था। उसने वर्षों से अपने अंदर उबल रही भावनाओं को निकल जाने दिया।
“मैंनें सत्ताइस वर्षों तक सम्राट की सेवा केवल इसलिए नहीं की कि कल को नियुक्त हुआ कोई व्यक्ति अपने पारिवारिक सम्पर्कों का दुरुपयोग कर मेरी नाक के नीचे ऐसे मामले तय करे जिनसे उसका कोई संबन्ध नहीं।”
“महामहिम, मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि अनुचित बात न बोलें।” वोरोन्त्सोव ने उसे बाधित किया।
“मैं सत्य कह रहा हूँ और अनुमति न दूंगा …” जनरल ने और अधिक क्रोधित होते हुए कहना शुरू किया।
इसी समय स्कर्ट की सरसराहट हुई और मेरी वसीलीव्ना ने प्रवेश किया। उसके पीछे अकल्पनीयरूप से नाटे कद की एक महिला थी, जो मिलर जकोमेल्स्की की पत्नी थी।

“बैरन इतना पर्याप्त है। साइमन परेशान नहीं होना चाहता था।” मेरी वसीलीव्ना भड़क उठी।
“प्रिन्सेज, नुक्ता यह नहीं है…”
“अच्छा, इसे भूल जाएं। एक खराब बहस, एक अच्छे झगड़े से बेहतर होती है, आप जानते हैं… मैं क्या कह रही हूँ ?” ठहाका लगाकर वह हँस पड़ी।
क्रुद्ध जनरल उस खूबसूरत युवती की मोहक मुस्कान से कुछ ढीला पड़ा। उसकी मूंछों के नीचे हल्की मुस्कान तैर गयी।
“मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं गलती पर था,” वारोन्त्सोव ने कहा, ”लेकिन…।”
“ठीक है, मुझे हल्का-सा गुस्सा आ गया था।” मिलर ने कहा और प्रिन्स की ओर हाथ बढ़ाया।
शांति स्थापित हुई, और तय यह हुआ कि हाजी मुराद को कुछ समय के लिए मिलर के पास छोड़ दिया जाये, और उसके बाद उसे ‘लेफ्ट फ्लैंक’ के कमाण्डर के पास भेज दिया जाये।
हाजी मुराद बगल के कमरे में बैठा था, और यद्यपि वह यह नहीं समझ पाया कि उन्होंने क्या कहा था, उसने महत्वपूर्ण बात समझ ली थी कि वे उसके विषय में ही झगड़ रहे थे। उसके द्वारा शमील को छोड़ देना रूसियों के लिए अत्यधिक महत्व का विषय था और इसलिए, यदि वे उसे निर्वासित नहीं करते अथवा मारते नहीं तो वह उनसे बहुत कुछ निवेदन कर सकता है। इसके अतिरिक्त, उसने अनुभव किया कि, यद्यपि मिलर जकोमेल्स्की प्रधान था, वह उसके अधीनस्थ वोरोन्त्सोव जितना महत्वपूर्ण नहीं था। वोरोन्त्सोव काउण्ट था जबकि मिलर जकोमेल्स्की काउण्ट नहीं था। इसलिए जब मिलर जकोमेल्स्की ने हाजी मुराद को बुलाया और उससे पूछताछ प्रारंभ की, हाजी मुराद ने उद्धत और तटस्थ रहते हुए कहा कि उसने गोरे जार की सेवा करने के लिए पहाड़ों को छोड़ा था और वह अपने सरदार, कहना चाहिए कि, कमाण्डर-इन-चीफ, प्रिन्स वोरोन्त्सोव के समक्ष तिफ्लिस में ही सब कुछ बयान करेगा।
॥ सात ॥
घायल आवदेयेव को छावनी के निकासी द्वार के निकट के अस्पताल में, जो लकड़ी के एक छोटे-से मकान में था, ले जाया गया और जनरल वार्ड के एक खाली बेड पर लिटा दिया गया। वार्ड में चार मरीज थे। एक सन्निपात-ग्रस्त टायफायड का केस था, और दूसरा निस्तेज, ज्वरग्रस्त, धंसी हुई आँखें, सदैव मरोड़ उठने की आशंका से ग्रस्त और लगातार जम्हुआई लेनेवाला मरीज था । दो और थे जो तीन सप्ताह पहले हुए हमले में घायल हुए थे। एक, जो खड़ा हुआ था, हाथ में और दूसरा; जो बिस्तर पर बैठा हुआ था, कंधे में घायल था। टायफायड वाले मरीज को छोडकर शेष ने नवागन्तुक को घेर लिया और उसे लेकर आने वालों से प्रश्न करने लगे।
'' वे लोग कभी-कभी धुंआधार गोलीबारी करते हैं, लेकिन इस बार उन्होंनें केवल आधा दर्जन बार ही फायर की थी,''- लेकर आने वालों में से एक ने उन्हें बताया ।
''भाग्य की बात है।''
''ओह।'' आवदेयेव दर्द को रोकने का प्रयास करता हुआ कराहा, जब वे उसे बिस्तर पर लेटा रहे थे। जब उन्होनें उसे लेटा दिया, उसने त्योरियाँ चढ़ाई और कराहना बंद कर दिया, लेकिन पैर के कारण बेचैनी अनुभव करता रहा। उसने घाव को अपने हाथों से पकड़ लिया और एकटक अपने सामने की ओर देखने लगा। डाक्टर आया और उन्हें आदेश दिया कि उसे औंधा पलट दें यह देखने के लिए कि क्या गोली पीछे से बाहर निकल गयी थी।
''यह क्या है ?'' डाक्टर ने पीठ और नितम्बों पर बने क्रास के लंबे सफेद निशान की ओर संकेत करते हुए पूछा।
''सर, पुराने घाव का निशान है !'' कराहते हुए आवदेयेव बुदबुदाया।
उसने धन का अपव्यव किया था। उसके लिए उसे जो दण्ड दिया गया था, यह उसीका निशान था।
उन्होंने उसे पुन: पलट दिया, और डाक्टर ने सलाई से उसके पेट में गहराई तक टटोला और गोली तक पहुँच गया, लेकिन उसे निकाल नहीं सका। उसने घाव की ड्रेसिंग की और चिपकनेवाला प्लास्टर चढ़ाया, फिर चला गया। पूरे परीक्षण और घाव की ड्रेसिंग के समय आवदेयेव दांत भींचे और आँखें बंद किये लेटा रहा था। जब डाक्टर चला गया उसने आँखें खोलीं और विस्मय से चारों ओर देखा। उसकी आँखें मरीजों और अर्दली की ओर घूमीं, फिर भी उसे लगा कि वह उन्हें नहीं देख रहा है, बल्कि विस्मित कर देने वाला कुछ और ही देख रहा है।
आवदेयेव के साथी पानोव और सेरेगिन आए हुए थे। वह अचम्भित-सा उन्हें टकटकी लगाकर देखता हुआ, उसी प्रकार लेटा रहा। देर तक वह अपने मित्रों को पहचान नहीं पाया, हालांकि उसकी आँखें सीधे उन्हें ही देख रही थीं।
''पीट, क्या तुम घर से कुछ मंगाना चाहते हो ?'' पानोव ने पूछा।
आवदेयेव ने कोई उत्तर नहीं दिया, हालांकि वह पानोव के चेहरे की ओर ही देख रहा था।
'' मै पूंछ रहा हूँ, तुम घर से कुछ मंगाना चाहते हो ?'' उसके ठण्डे हाथ को स्पर्श करते हुए पानोव पुन: बोला।
आवदेयेव को चेतना वापस लौटती हुई-सी प्रतीत हुई।
''हैलो, अन्तोनिच।''
''हाँ, मैं आ गया। तुम घर से कुछ मंगाना चाहते हो ? सेरेगिन लिख देगा।''
''सेरेगिन,'' कठिनाई से अपनी आँखें सेरेगिन की ओर घुमाते हुए आवदेयेव बोला, ''क्या तुम लिख दोगे ? तब उन्हें यह लिखो - आपका बेटा पीटर मर गया । मुझे अपने भाई से ईर्ष्या थी - यही बात पिछली रात मैं कह रहा था … लेकिन अब मैं प्रसन्न हूँ। ईश्वर उसे सौभाग्यशाली करे। मैं उसकी खुशकिस्मती की कामना करता हूँ। मैं प्रसन्न हूँ। ऐसा ही कुछ लिख दो।”
जब वह यह सब कह चुका, उसने पानोव पर एकटक दृष्टि गड़ायी और लंबी चुप्पी साध ली।
पानोव ने कोई उत्तर नहीं दिया।
''तुम्हारा पाईप, तुम्हारा पाईप, मैं कहता हँ, वह तुम्हें मिल गया ?'' आवदेयेव ने पूछा।
''वह मेरे सामान में था।''
''अच्छा, अच्छा। अब मुझे एक मोमबत्ती दो। मैं मरने वाला हूँ।'' आवदेयेव बोला।
उसी समय पोल्तोरत्स्की उसे देखने आया।
''तुम कैसा अनुभव कर रहे हो … खराब ?'' वह बोला।
आवदेयेव ने आँखें बंद कर लीं और सिर हिलाया। उसका दुबला चेहरा निष्प्रभ और कठोर था। उसने उत्तर नहीं दिया, लेकिन पानोव से पुन: बोला:
''मुझे मोमबत्ती दो, मैं मरने वाला हूँ।''
उन्होने एक मोमबत्ती उसके हाथ में रख दी, लेकिन यह सोचकर कि उसकी उंगलियाँ उसे पकड़ नहीं पायेगीं, उन्होंने मोमबत्ती उसकी उंगलियों के बीच में रखा और उसे थामे रहे। पोल्तोरत्स्की कमरे से बाहर चला गया और उसके जाने के पाँच मिनट बाद अर्दली ने आवदेयेव के हृदय के पास कान लगाया और कहा कि वह मर गया।
तिफ्लिस को जो रिपोर्ट भेजी गई उसमें आवदेयेव की मृत्यु का विवरण इस प्रकार दिया गया था- ''23 नवम्बर को कुरियन बटालियन की दो कम्पनियाँ जंगल साफ करने के लिए छावनी से गयी थीं। वृक्ष काटने वालों पर आक्रमण कर दिया। अग्रिम चौकी पर तैनात दलों ने वापस लौटना प्रारंभ कर दिया, जब कि दूसरी कम्पनी ने संगीनों से धावा बोल दिया और कबीलाइयों को खदेड़ दिया। युद्ध के दौरान हमारे दो सिपाही सामान्य रूप से घायल हुए थे और एक की मृत्यु हो गयी थी। कबीलाइयों के लगभग सौ लोग हताहत हुए थे।''

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