शनिवार, 26 अप्रैल 2008

पुस्तक चर्चा

शहर गवाह है(उपन्यास)
लेखक : रूपसिंह चन्देल
प्रकाशक : भावना प्रकाशन, 109-ए,
पटपड़गंज, दिल्ली-110091

मूल्य : 450 रुपये
पृष्ठ : 384





नर्क होता शहर और गर्क होते संबंध
रमेश कपूर

यह कहना बहुत मुश्किल है कि किसी शहर की पहचान उसमें बसने वाले लोगों से होती है या लोगों की पहचान किसी शहर से। यही प्रश्न कथाकार रूपसिंह चन्देल के नवीनतम उपन्यास ‘शहर गवाह है‘ को पढ़ते हुए बार-बार मन में उठता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग दो दशक पूर्व के पारम्परिक गांवों से आरंभ होकर ‘शहर गवाह है’ की कहानी उत्तर प्रदेश के रायबरेली से कानपुर तक फैली हुई है। इन शहरों, विशेषकर कानपुर शहर का भीतरी फैलाव देश की तत्कालीन कई पीढ़ियों के फैलाव का प्रतिनिधित्व करता है। अपने जीवन-वृत्तांत को अपने यहां रहने वाले लोगों के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाते इन शहरों में जीवन की तेज रफ्तार इन्हें एक पहचान तो देती है, किन्तु ‘नर्क‘ होते इन शहरों में होते परिवर्तन बहुत तक़लीफदेह हैं। दरअसल एक नए शहर की कोख में एक और नए शहर के बस जाने की व्यथा बहुत उद्वेलित करती है।
शहर का यह उद्वेलन उसमें रहने वाले लोगों के जीवन को प्रभावित न करे, यह संभव ही नहीं है। वास्तव में जिस व्यथा का जिक्र मैं कर रहा हूँ, वह तीन पीढि़यों के माध्यम से व्यक्त होती है। जिस तरह एक इंसान अपना जीवन जीते हुए अपने वर्तमान, अतीत और अपने भविष्य में एक साथ जीता है, वही हाल किसी गांव-शहर का भी है। कानपुर इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। उसकी व्यथा यदि सामाजिक मूल्यों, व्यक्तिगत ईमानदारियों, भारत-पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासतों, हिन्दू-मुसलमान की व्यापारिक हिस्सेदारियों और देश की स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने को तत्पर क्रान्तिकारियों की छटपटाहट और संघर्ष से तौली जाए तो कह सकते हैं कि कुएं के एक छोर से कुएं के दूसरे छोर तक अंधेरे के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। ये अंधेरे न केवल जीवन-मूल्यों को ह्रास की स्थिति में ले जाते हैं, बल्कि पारस्परिक संबंधों को भी बुरी तरह प्रभावित करते हैं। संबंधों के इस फैलाव में एक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व दिलीपसिंह और समर बहादुर सिंह करते हैं तो उनसे अगली पीढ़ी की कमान राधिकारमण सिंह के हाथों में है, जो कानपुर के डी.ए.बी. कॉलेज में पढ़ते हुए चन्द्रशेखर आजाद और हलधर बाजपेई जैसे क्रान्तिकारियों के सान्निध्य में आते हैं। उनके पूरे जीवन पर इन क्रान्तिकारियों का प्रभाव बना रहता है। शायद यही कारण है कि राधिका रमण अधिक खुले विचारों के व्यक्ति हैं। किसी की भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में वह बाधा नहीं बनना चाहते। यहां तक कि अपनी सुपुत्री शैलजा के इस निर्णय पर भी वह कोई आपत्ति नहीं करते कि वह एक छोटे शहर से दिल्ली जैसे महानगर की भीड़ में नितांत अकेली रहकर नौकरी करे।
किन्तु आश्चर्य है कि उनकी यह ‘प्रोग्रेसिव’ सोच उनकी अगली पीढ़ी तक एक परंपरा के रूप में स्थापित नहीं हो पाती। भविष्य की यह पीढ़ी उनके सुपुत्र धर्मेंद्र और सुपुत्री शैलजा के तेज़-तर्रार क़दमों के साथ-साथ चलती है। इस पीढ़ी तक आते-आते संबंध अपनी महत्ता खोने लगते हैं। उनमें एक नामालूम-सा खोखलापन घर करने लगता है। संबंधों का यह खोखलापन जिस मुकाम पर आकर ठहरता है, जिस पड़ाव पर आकर रुकता है, वहां इंसान वापस लौटने को मजबूर हो जाता है। यहीं से वह आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया प्रारंभ करता है। और आत्मावलोकन के पश्चात् वह पाता है कि वह अपनी उन जड़ों से कट चुका है, जो धरती से जल लेकर उसे सींचने का काम करती हैं। तभी तो न दिलीप सिंह अपने गांव वापस जा पाते हैं, न ही राधिकारमण। इस बात का उन्हें दुख तो है ही। अपनी जड़ों से कट जाने का दुख हमेशा उन्हें सालता रहता है। शायद यही कारण है कि दिलीपसिंह हमेशा अपने को कानपुर में स्थापित करने की प्रक्रिया में लगे रहते हैं। वह कभी कपड़ों के व्यापार से जुड़ते हैं तो कभी कोयले के व्यापार से। जीवन में इतनी जद्दोजहद के बाद भी पहचान का संकट उनके साथ बना ही रहता है। संतुष्टि और स्थायित्व आसानी से मिल नहीं पाता।
इसके बावजूद एक पीढ़ी ऐसी भी है, जो अपनी जड़ों से कटने को तैयार नहीं है। बेशक उन्हें टूटना स्वीकार है। यह पीढ़ी है दिलीप सिंह के पिता भूरे सिंह और दिलीप के मित्र इकरामुर्रहमान के पिता खलीलुर्रहमान की। अपना गांव…अपनी गलियां…अपनी धरती उनकी सांसों में इस कदर रची-बसी हैं कि उसे छोड़कर कहीं अन्यत्र जाना उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। दिलीप के पिता तो स्पष्टत: नकारते हुए कहते हैं कि ‘‘दिलीप , मेरी ज़िंदगी गांव में कटी है्…यहीं मरूंगा।” ( पृ.135) –– और उधर खलीलुर्रहमान भी इसी सोच से घिरे हैं। उनकी पत्नी स्पष्ट तौर पर उनसे कहती हैं कि ‘‘इस शहर में हमारा है ही क्या ?… अगर आप भी अपना काम समेटकर लाहौर चलें… ।”( पृ. 152) लेकिन यह प्रस्ताव उन्हें पसंद नहीं। फिर भी वह उदास मन से कहते हैं कि ‘‘ … मेरा मन भी यहां से उखड़ गया है। लेकिन लाहौर जाकर गांव से पूरी तरह से कट जाऊंगा।” (पृ. 152)। कानपुर के उस दंगे के पश्चात् जिसमें गणेश शंकर विद्यार्थी शहीद हुए और आतताइयों द्वारा इकरामुर्रहमान की दुकान जला दी गई, खलीलुर्रहमान लाहौर निवासी अपने साले और इकराम के ससुराल वालों की सलाह पर इकराम को लौहार भेजने का निर्णय कर लेते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए भारतवासियों के संघर्ष से पूरे देश में आग लगी हुई है। भारत का कोई शहर इससे अछूता नहीं। कानपुर भी नहीं। शायद अपने भविष्य की सोच कर ही खलील बड़ी जद्दोजहद के पश्चात् स्वयं भी लाहौर चले जाते हैं।
इकराम और खलील के लाहौर प्रस्थान को लेखक ने हालांकि अधिक महत्व नहीं दिया है, फिर भी इसे भविष्य के लिए संकेत के रूप देखना उचित होगा। क्या मुसलमान लोगों का लाहौर या लाहौर से कानपुर-दिल्ली में हिन्दुओं का पलायन महज एक छोटी-सी घटना थी ? वह भी 1947 से पहले –– लेकिन यह अप्रत्याशित नहीं लगता। संभवत: इसके पीछे एक बड़ा कारण सामाजिक सुरक्षा का था। पलायन की यह प्रक्रिया एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। एक ऐसी लंबी प्रक्रिया, जिसके पीछे सांस्कृतिक कारण भी रहे हैं और राजनैतिक भी। अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य को बनाए रखने के लिए समाज की विभिन्न जातियों और संप्रदायों को आपस में लड़ाने और समाज को टुकड़ों में विभाजित करने की कुचेष्टा की थी। इसी के चलते विभिन्न वर्गों की मानसिकता में बदलाव आना स्वाभाविक था।
उपन्यास में आजादी से पूर्व कुछ हिन्दू-मुसलमान परिवारों के अपनी बिरादरी-बहुल शहरों की ओर पलायन पर अधिक प्रकाश डालने का प्रयास लेखक ने नहीं किया। इसके इतर उसने एक शहर की सोच और पात्रों की व्यक्तिगत सोच को उभारने में अपना विशेष ध्यान केन्द्रित किया है, जो अचंभित करता है। यही कारण है कि पात्रों और शहर की चिन्ताएं भी एक समान ही हैं। दोनों अपने भीतर होने वाले परिवर्तनों से आहत हैं। समाज के परिवर्तित होते चेहरे को… उसके मूल्यों को जहां दिलीप सिंह अपनी मेहनत, अपनी लगन से सींचते हैं, वहीं राधिकारमण अपनी ‘प्रोग्रेसिव‘ सोच को अपने उसूलों की पकी ज़मीन पर आजमाने की कोशिश करते हैं। किन्तु इस सोच को उनकी अगली पीढ़ी सदैव नकार देती है। ‘प्रोगेसिव’ सोच अगली पीढ़ी तक पहुँचकर ‘एग्रेसिव’ हो जाती है। इससे हैरान-परेशान राधिका इतिहास रचने की दहलीज पर आकर ठिठक जाते हैं– वहीं रुक जाते हैं। या कहें कि रोक दिए जाते हैं। संबंधों का ठंडापन उन्हें ऐसा करने से रोकता है।
यहीं से उनके भीतर कुछ टूटने लगता है। एक ऐसी टूटन, जिसकी आवाज़ उन्हें सुनाई नहीं देती। बस, हल्का-सा आभास मात्र ही होता है। और यहीं से आरंभ होता है दहलीज के इस ओर खड़े राधिका रमण –– और दहलीज के उस ओर खड़े उनके बच्चों के बीच वैचारिक अंतराल और एक शीत-युद्ध। इसे यदि ‘शहर गवाह है’ का प्रस्थान बिन्दु न भी माना जाए तो ऐसा बिन्दु तो अवश्य ही मान सकते हैं जहां से पारिवारिक, सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तनों की टोह ली जा सकती है। और गांव से कस्बे और कस्बे से शहर होने की परिवर्तनशील प्रक्रिया को बड़ी ही शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
इस परिवर्तनशील (और पतनशील) प्रक्रिया को लेखक ने एक बहुत बड़ा फलक देने का प्रयास किया है। और इसके प्रथम गवाह के रूप में स्वतंत्रतापूर्व के भारतीय जीवन और उसके द्वंद्व को क्रांतिकरियों के संघर्ष व शहादत से उकेरने की कोशिश की है। भगत सिंह, चंन्द्र्शेखर आजा़द से लेकर हलधर बाजपेई व अन्य क्षेत्रीय क्रांतिकारियों का स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष जहां कानपुर जैसे शहर को अपने लहू से सींचता है, वहीं क्रांतिकारियों की इस चिन्ता को भी बहुत तीखेपन से उभारता है कि ‘‘छुटभैया सत्ता में हिस्सेदारी के लिए बेताब हैं। यही नहीं, कल तक दबे-छुपे अंग्रेजों का साथ देने वाले राजे-महाराजे, जमींदार, जागीरदार –– आज कांग्रेस में घुस कर अपनी जगह मजबूत बनने की कोशिश में हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि नेहरू जैसे कुछ बड़े नेताओं को छोड़कर स्वार्थी लोगों की बड़ी संख्या है राजनीति में, जो केवल और केवल अपने लिए जीना चाहते हैं। मुझे देश का भविष्य बहुत उज्जवल नहीं दिख रहा। इनके शासन का ढंग अंग्रेजों से भिन्न नहीं होगा। क्या पता ये भी उनका अनुकरण करें… अभी न सही, बाद में - यानी जीतीय संघर्ष को बढ़ावा दो, बांटों और शासन करो… इसीलिए मुझे लगता है कि यह आजादी अधूरी है। पूरी आजादी के लिए हमें एक बार पुन: संघर्ष करना होगा।… और अब अपनों से…”(पृ. 187) । कानपुर के जुझारू क्रांतिकारी हलधर बाजपेई का राधिका रमण से कथन (पृ. 183) उल्लेखनीय है।
यह ‘वास्तवकि आजादी’ वास्तव में थी क्या ? दरअसल क्रांतिकारियों की इस सोच के पीछे भगतसिंह के विचारों का बहुत अधिक प्रभाव रहा है जिसके चलते उन पर यह आरोप भी लगता रहा कि वह अपने विचारों को दूसरों पर लादने का प्रयास करते रहे हैं। –– इस वास्तविक आजादी को भगतसिंह ने अपने लेख में स्पष्ट भी किया है कि –– ‘‘क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश को क्रांति से ही स्वतंत्रता मिलेगी। वे जिस क्रांति के लिए प्रयत्नशील हैं, और जिस क्रांति का स्वरूप उनके सामने स्पष्ट है, उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों और उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का केवल सशस्त्र संघर्ष हो, बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएं। - क्रांति से सबसे बड़ी बात – तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामाजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाये बैठे हैं।” ( संदर्भ : ‘बम का दर्शन’-, लेखक : भगत सिंह )
किन्तु यह स्वप्न न राजनैतिक रूप में साकार हो पाता है और न ही सामाजिक रूप में। उपन्यास के एक महत्वपूर्ण पात्र समर बहादुर सिंह की यह चिंता भी कोई रूप नहीं ले पाती कि ‘‘यहां के मजदूरों की स्थिति बहुत खराब है। जब तक देश आजाद नहीं हो जाता, उनकी हालत शायद ही बदले। –– बाद में बदलेगी, कैसे कहा जा सकता है। आज एक-एक जमींदार के पास हजारों बीघे खेत हैं जबकि मजदूरों के पास एक टुकड़ा भी नहीं है ज़मीन का। सरकार को चाहिए कि उनकी ज़मीनें छीनकर इनमें बांट दे। जो खेतों में श्रम करे, खेत उसके होने चाहिए।”(पृ. 181)
स्वप्नों के खंडित होने और पतनशीलता की यह प्रक्रिया समाज में इस कदर पैठ बना चुकी है कि इसका प्रभाव पारिवारिक संबंधों पर भी परिलक्षित होने लगता है। देश की भावी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती शैलजा इसका स्पष्ट उदाहरण है, जो अपनी कच्ची उम्र में भी उसके प्रेमी होने का दंभ भरने वाले देवेन्द्र आहूजा से फ्लर्ट करती रहती है। वह न तो अपनी नानी की सेवा करने को तैयार है, न ही किसी भी प्रकार का कोई घरेलू कार्य। इसके लिए उसके पास न तो समय है, न इच्छा। रिश्ते-नाते उसके लिए बस एक माध्यम हैं, जो उसे उसके ध्येय तक पहुँचने में सहायक हों। उसका एक ही ध्येय है - पद और पैसा। पैसे की भूख उसमें इतनी है कि वह सही और गलत की पहचान भी नहीं करना चाहती। तभी वह एक स्वाभिमानी और ईमानदार पिता की संतान होकर भी उनकी सोच- संस्कारों को अपना नहीं पाती। कानपुर जैसा शहर उसकी महत्वाकांक्षाओं के लिए छोटा पड़ने लगता है और वह दिल्ली महानगर में ‘शिफ्ट’ कर जाती है। हमेशा के लिए तमाम संबंधों, तमाम मूल्यों, तमाम सच्चाइयों, तमाम पारिवारिक प्रतिबद्धताओं को तिलांजलि देकर। दिल्ली में वह पुन: अपने शातिराना सोच को सक्रिय कर एक ऐसे शख़्स से प्रेम विवाह कर लेती है, जो शादी से पूर्व ही अनेक लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध स्थापित कर चुका था। लेकिन महत्वाकांक्षाएं विचार-कुविचार और पात्र-अपात्र में अंतर नहीं कर पातीं। बेशक इसके लिए शैलजा को अपने पिता की सारी जायदाद धोखे से अपने नाम ही क्यों न लिखवानी पड़े। बेशक अपनी बेसहारा बहन को विक्षिप्तावस्था में धकेलकर सड़कों पर भटकने के लिए विवश क्यों न करना पड़े। लेकिन महत्वाकांक्षाएं हर हाल में जीवित रहनी चाहिएं … अपनों की लाश पर पैर रखकर आगे बढ़ने के लिए। यह है नई पीढ़ी का यथार्थ। यह है उसके समक्ष संबंधों की महत्ता।
लेकिन इस समूचे सफर के दौरान इतना कहने की मैं इजाज़त अवश्य चाहता हूँ कि लेखक ने पूरी सामाजिकता को उपन्यास के अंत तक आते-आते उसे अत्यंत व्यक्तिगत लड़ाई में परिवर्तित कर दिया है। हालांकि उपन्यास का अंत बहुत उद्वेलित करता है और संबंधों की एक नई परिभाषा गढ़ता है –– अपने वर्तमान को साथ लिए हुए। इसमें घटनाओं की तीव्रता भी अहम भूमिका निभाती है और पाठकों को सकते की स्थिति में ला खड़ा करती हैं।
उपन्यास में लेखक ने अपनी किस्सागोई शैली का बखूबी प्रयोग किया है। यह विशेषता उनके अन्य उपन्यासों – ‘रमला बहू’ , ‘पाथरटीला’ और ‘नटसार’ में भी स्पष्ट थी। हां, इस विशेषता के चलते वह उपन्यास –– और उसके परिवेश को उभारने में शिल्प को अवश्य अनदेखा कर जाते हैं, जो उपन्यास के वातावरण को क्षतिग्रस्त करता है। फिर भी, इतना तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि कथ्य के स्तर पर यह उपन्यास लेखक की परिपक्वता को सिद्ध करता है। उपन्यास की पठनीयता अबाध्य है।
कुछ बातें खटकती हैं। यथा – क्रांतिकारियों से संबंधित प्रसंगों को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया और ऐसा प्रतीत होता है कि कुछेक पात्रों के प्रति लेखक का दृष्टिकोण सहानुभूतिपूर्ण रहा है। मेरा अपना मानना है कि लेखक को रचना में एक पर्यवेक्षक की भूमिका में रहना चाहिए। फिर भी समग्रत: कथ्य और संवेदना के स्तर पर और लेखकीय विकासक्रम के स्तर पर भी यह उपन्यास अद्भुत एवं सुखद अनुभूति देता है।


रमेश कपूर
जन्म: 14 नवम्बर 1957, दिल्ली
शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य स्नातक
लेखन: विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में कहानियां, समीक्षाएं व ग़ज़लें
प्रकाशित।
संप्रति: व्यवसाय के साथ-साथ स्वतंत्र लेखन भी। इसके अतिरिक्त शीघ्र प्रकाश्य हिन्दी साहित्यिक प​त्रिका ‘कथाशिखर’ ( त्रैमासिकी ) का सम्पादन।
सम्पर्क:ए–4/14, सैक्टर–18,
रोहिणी, दिल्ली–110089।
फोन : 011–2785 2324, मोबाइल : 09891252314, 09899641921 ,
ईमेल : kathashikhar414@yahoo.com

गुरुवार, 17 अप्रैल 2008

पुस्तक चर्चा

बहुमुखी प्रतिभा के धनी कथाकार महेश दर्पण का समकालीन हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है. हाल में उनका कहानी संग्रह ’वर्तमान में भविष्य’ प्रकाशित हुआ. प्रस्तुत है उक्त कहानी संग्रह पर युवा कथाकार अरविन्द कुमार सिंह की समीक्षा:



गहरी संवेदना की कहानियां
अरविन्द कुमार सिंह

महेश दर्पण सनसनी पैदा करने के लिए कहानियां नहीं लिखते. कोई छोटी-सी घटना भी जीवन में कैसा अवसाद भर देती है यह उनके ताजा कहानी संग्रह ’वर्तमान में भविष्य’ को पढ़ने के बाद ही जाना जा सकता है. महेश दर्पण में एक गहरी संवेदना मौजूद है. अपने आस-पास के जीवन पर उनकी पैनी नजर होती है. कथा के सूत्र भी अकसर वह वहीं से हासिल कर लेते हैं. बहुत सधे और कम शब्दों में अपनी बात कह जाना दर्पण की कहानियों का वैष्टिय है .
’वर्तमान में भविष्य’ रहस्य, रोमांच और रोचकता से भरपूर दार्शनिक अंदाज में लिखी गई संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है. हालांकि यह दर्शन किसी रहस्य लोक में नहीं भटकाता बल्कि जीवन के लक्ष्य से रू-ब-रू कराता है. कहानी के केन्द्र में फकीर-सा दिखता एक बूढा़ बाबा, कथानायक मैं तथा उसकी पत्नी और बेटी हैं. पत्नी की हथेली पर लिखे भविष्य को पढ़ने के बहाने उस बूढे़ का कथन कि ’आज-कल ज्यादातर लोगों को वर्तमान से कहीं ज्यादा फिक्र भविष्य की लगी रहती है जबकि सच यह है कि वर्तमान को सही तरीके से जीने पर ही भविष्य संवर जाता है’ एक प्रकार से कहानी कादेन्द्रीय कथन है.
’चौबीस बरस’ पढ़कर लगता है कि अतीत की स्मृतियां मोहक होती हैं, लेकिन कहानी में अतीत में गुजरना भर ही नहीं होता, वह त्रासदी भी यहां गै जो महानगार की उपज है. धीरे-धीरे गांव-जवार से रिश्ता ही नहीं टूटता, अपने करीबी लोग भी एक दिन छूट जाते हैं, बची होती हैं सिर्फ स्मृतियां, वे सहारा और पीडा़ दोनों बनती हैं.
’कस्तूरी छाया’ एक आदिवासी हकीम के द्वारा एक निम्न मध्य-वर्गीय परिवार से बीमारी और दवा के नाम पररुपये ऎंठने की चालाकी है. मूलतः यह कहानी बाजार के चरित्र को उद्घाटित करती है. जहां एक आदिवासी जिसे भोला और शरीफ समझा जाता है, बाजार के हथकंडे सीख चुका है.
’डर’आदमी का सुख और सुकून छीन लेता या वास्तविक, यदि वह जुन्द्गी का हिस्सा बन जाए तो जीना कितना दूभर हो जाता है. ’मेरी जगह’ कर्ज रूपी रंग-रेशों से बुनी हुई कहानी है, जिससे पता चलता है कि मजबूरियों से गुजरा हुआ व्यक्ति ही किसी की मजबूरी को समझ सकता है.
’अंजुमन’ यानी महफिल की दुनिया धीरे-धीरे उजड़ती जा रही है. मुहल्ले की पारिवारिकता गायब होती जा जही है. कहानी के मुख्य पात्र सलीम नामक नाई की ऎसी ही पीडा़ में गहरी टीस है.
’अपने साथ में’ कथानायक खालीपन एक दिन अपने करीब की उस जिन्दगी से रूबरू होता है, जहां व्यस्तता के चलते वह बहुत गहराई तक नहीं उतर सकी थी. बादल, बारिश और छत से गिरते पानी की धारें उसके खलीपन को बहुत दूर तक ले जाती हैं. भाषा-शिल्प और कथ्य की दृष्टि से यह एका महत्वपूर्ण रचना है.
’हमारे समय की खबर’ मीडिया पर व्यंग्य है. कहानी का मुख्य पात्र तेज-तर्रार और सजग पत्रकार भी पद, पैसा और कैरियर की खातिर अपनी जिम्मेदारी तक भूल जाता है. ’मुक्ति’ मृत्यु-शैय्या पर पड़ी बसंती दीदी का दुख एक त्रासदी बन कर रह गई है. मृत्यु की तरफ बढ़ते हर क्षण पर लेखक की दृष्टि है.
घर-परिवार में छोटी-सी घटना कभी-कभी कितनी रोचक होती है, ’जीरे का डिब्बा’ इसका एक उदाहरण है. ’जख्म’ साम्प्रदायिक्ता से उपजे घाव को उधेड़ती है तो ’एहसास’ और ’घरनी’ भी इस संग्रह की महत्वपूर्ण कहानियां हैं.
महेश दर्पण गहरी संवेदना के रचनाकार हैं, इसलिए कहानी की तलाश में उन्हें भटकना नहीं होता. चुनौतियों के इस कठिन दौर में भी उनकी सक्रियता का ही नतीजा है यह कहानी संग्रह, जिसकी कहानियों को पढ़कर ही जाना जा सकता है.

वर्तमान में भविष्य
(कहानी संग्रह)
महेश दर्पण
सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली-११०००२
पृष्ठ - १४४, मूल्य - १५०/-


शुक्रवार, 11 अप्रैल 2008

संस्मरण


भावहीन चेहरा
रूपसिंह चन्देल
लगभग पन्द्रह वर्ष पुरानी बात है.
मेरे एक रिश्तेदार के पांच दामाद थे. कुछ दिन पूर्व सबसे बड़े दामाद की मृत्यु हो गयी और उससे दो वर्ष पूर्व मेरे रिश्तेदार की. लेकिन जिस घटना का मैं उल्लेख करने जा रहा हूं वह उनके दूसरे नम्बर के दामाद से सम्बन्धित है. उनके दूसरे दामाद उत्तर प्रदेश के एक शहर में उन दिनों इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे. उनसे मेरी कभी मुलाकात न हुई थी और मैं मिलना चाहता भी नहीं था. उनके विषय में जो सुना था वह हतोत्साहित करने के लिए पर्याप्त था. सुना था कि जहां आम आदमी की सुबह एक लोटा जल या एक कप चाय से होती है वहीं उनकी सुबह कम से कम तीन पेग शराब से. यही नहीं यह भी बताया गया कि वह महिलाओं के पीछे भागनेवाले व्यक्ति भी थे. यही कारण था कि उनके शहर जाने पर भी उनसे मिलने की चाह उत्पन्न नहीं हुई.
लेकिन मैं कब तक उनसे बचता. आखिर वह मेरे एक खास रिश्तेदार के दामाद थे और उसी अधिकार से वह एक दिन अतिथि-सत्कार का सौभाग्य प्रदान करने के लिए मेरे घर आ पहुंचे थे. कारण था अपने ’बचुआ’ के लिए कहीं नौकरी का जुगाड़ फिट करना. ’बचुआ’ भी साथ थे. दिल्ली जैसे क्रूर शहर में रहते हुए अभी तक जिन कुछ प्रतिशत लोगों के भारतीय संस्कार बचे हुए हैं उनमें मैं भी अपने को गिनता हूं. संस्कार बताते हैं कि अतिथि कैसा भी हो उसका सत्कार होना ही चाहिए. लेकिन जैसे सत्कार की वह अपेक्षा कर रहे थे उसके लिए मैं बिल्कुल ही तैयार नहीं था, हालांकि मन में आशंका थी कि यह प्रश्न उठेगा अवश्य.
रात्रि भोजन के समय रिश्तेदार के दामाद साहब ने, जिन्हे मास्टर साहब कहना अधिक सहज है, बोतल की मांग रख दी. शराब से दूर रहने वाले मुझ जैसे व्यक्ति के लिए यह संकट की बात थी. मैं यह भी नहीं जानता था कि ठेके कहां-कहां थे. बस से आते-जाते मालरोड के पास एक ठेके की दुकान अवश्य देखा करता था. उन दिनों अपने कुछ पत्रकार मित्रों के विषय में सुनता था कि वे ’मजनूं का टीला’ जाते थे. लेकिन यह कहां है ,मैं तब नहीं जानता था . मालरोड के पास के उस ठेके को ही ’मजनूं का टीला’ का ठेका मान बैठा था. उन दिनों ठेके भी शायद साढे़ सात बजे बंद हो जाते थे. आज की सरकार की भांति ठेकों से धन बटोरने की चाह या सोच शायद तब की सरकार में न उपजी थी वर्ना कभी की दिल्ली की बड़ी आबादी शराब में डूब चुकी होती.
मास्टर साहब बिना पिये भोजन को तैयार न थे. मेरा अतिथि सत्कार बाधित था. आठ बज चुके थे. मैंने स्कूटर निकाला, उन्हे लादा और अपनी जानकारी के एक मात्र ठेके में जा पहुंचा. ठेके का आधा शटर गिरा हुआ था. मास्टर साहब स्कूटर से कूदकर ठेके की ओर लपके. उनके कूदने से मैं गिरते बचा. स्कूटर खडा़कर मैं भी पास जा पहुंचा.
"भाई साहब एक अद्धा चाहिए" मास्टर बोले.
"ठेका बंद हो चुका है" अंदर से कोई बोला.
"भैया आप पौवा ही दे दें"
"ठेका बंद हो गया है. दिखता नहीं?" अंदर से एक कड़क आवाज और उसीके साथ शटर और नीचे गिर गया इतना कि जमीन से केवल एक फुट ऊपर तक ही उठा रहा.
मास्टर साहब जमीन पर लेट गये और शटर के अंदर मुंह डालकर गिड़गिडा़ए, "भैया मेहरबानी, केवल पौवा ही दे दें".
शटर के अंदर से किसी ने पैर से मास्टर साहब के सिर को धिकायाया और शटर पूरी तरह बंद कर दिया.
मास्टर साहब खड़े हुए, धूल झाड़ी और मुझसे किसी दूसरे ठेके चलने का आग्रह किया. उनके चेहरे पर अफसोस का कोई निशान नहीं था. चेहरा पूरी तरह भावहीन था, जबकि मैं ........मैंने स्पष्ट इंकार कर दिया. यह घटना शायद वह भी न भूले होंगे, क्योंकि उनके जीवन में बिना पिये रात्रि भोजन करने के जो चंद अवसर आए होंगे (यदि कभी आए होंगे) उनमें एक मेरे यहां का था.

सोमवार, 24 मार्च 2008

पुस्तक चर्चा

आख़िरी पड़ाव का दु:ख (कहानी संग्रह)
लेखक : सुभाष नीरव
प्रकाशक : भावना प्रकाशन, 109-ए,
पटपड़गंज, दिल्ली–110091
पृष्ठ संख्या : 112
मूल्य : 150 रुपये।
स्वाभिमान और संवेदना से भरपूर कहानियाँ
अलका सिन्हा

‘आख़िरी पड़ाव का दु:ख’ कथाकार सुभाष नीरव का तीसरा कहानी-संग्रह है। इससे पूर्व वर्ष 2003 में ‘औरत होने का गुनाह’ और पहला संग्रह वर्ष 1990 में ‘दैत्य तथा अन्य कहानियाँ’ प्रकाशित हो चुके हैं। सुभाष नीरव उन कहानीकारों में नहीं हैं जिन्हें किताब निकालने की हड़बड़ी रहती है। कारण, कि उनकी रचनात्मकता कई स्तरों पर संतुष्ट होती रहती है। अनुवाद को माध्यम बनाकर कई पंजाबी रचनाओं को उन्होंने हिंदी पाठकों के लिए पुनसृ‍र्जित किया और एक सफल अनुवादक के रूप में भी अपनी एक अलग पहचान बनाई। हाल के कुछ समय से इंटरनेट पर अपनी ‘ब्लॉग पत्रिकाओं’ के माध्यम से भी वे हिंदी साहित्य तथा अनुवाद के माध्यम से पाठकों को स्तरीय सामग्री उपलब्ध कराने में लगे हुए हैं। बहरहाल, इन सबके बीच उनके भीतर का रचनाकार एक सूक्ष्म दृष्टि से अपने आस-पास की दुनिया का अवलोकन करता रहा है।
नवीनतम कहानी संग्रह की चौदह कहानियों को पढ़कर ये कहा जा सकता है कि यह संग्रह लाचारी, मजबूरी और उपेक्षा से संघर्ष करते ‘स्वाभिमान’ की कहानियाँ हैं। बेरोजगारी की समस्या को केन्द्र में रखकर लिखी गई कहानी “दैत्य” एक महत्वपूर्ण कहानी है। ऐसे कई युवक मिल जाएंगे जो रोजगार पाने के लिए किसी न किसी रूप में समझौता कर बैठते हैं, लेकिन उनके विरुद्ध सुशील अपने स्वाभिमान को बिकने नहीं देता। सुशील की भूखी अंतडि़याँ जब राधेश्याम को पूरियाँ खाते देखती हैं तब वह जीप छोड़कर बस स्टैंड की तरफ बढ़ जाता है और उसे माँ के दिए रुपये काफी लगते हैं। ये रुपये दरअसल उसके वे संस्कार हैं जो उसे राधेश्याम जैसे किसी ‘दैत्य’ के सामने झुकने से बचा लेने के लिए काफी हैं।
इसी तरह “सांप” कहानी इस संग्रह को मूल्यवान बनाती है। आंचलिकता से भरा इस कहानी का परिवेश, गिद्धे-टप्पों के बीच, बड़ी बारीकी के साथ कथानक को बुनता है। ‘सांप’ की उपस्थिति समानांतर रूप से चलती है और एक द्वंद की स्थिति में ऐंटी-क्लाइमेक्स पर जा ठहरती है। “लौटना” कहानी भी एक अलग तरह की शैली को लेकर चलती है, गोया कोई कहानी नहीं, उपन्यास रचा जा रहा हो। कई उपशीर्षकों के साथ समय परिवर्तन, स्थिति परिवर्तन तथा बदलते दृष्टिकोण के तीखे मोड़ भी सावधानी के कट गए हैं। आज के बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद पर “मकड़ी” का मेटाफर लेकर बहुत सशक्त प्रस्तुति की गई है। यह छोटी-सी कहानी आज की क्रेडिट कार्ड शापिंग और उनके उपजने वाले खतरों के प्रति आगाह कराती है।
“इतने बुरे दिन”, “अंतत:” और “सफ़र में आदमी” जैसी कहानियाँ पाठक को किसी लाचारी के उस चरम बिन्दु तक ले जाती हैं जो व्यक्ति का टर्निंग-प्वाइंट होता है, वह उसे किसी गुंडे, मवाली की ओर उन्मुख करता है तो यही क्षण उसकी अस्मिता और स्वाभिमान को प्रमाणित भी करता है।
जहाँ एक ओर “आवाज़” कहानी किसी नवयुवती के सपनों में मेंहदी के रंग भरती है, वहीं हकीकत से उसकी मुठभेड़ होने पर एक दर्दनाक आवाज़ उभारती है, जो देर तक पाठकों के भीतर गूंजती रहती है।
“आख़िरी पड़ाव का दु:ख” संग्रह की कहानियाँ अपनी तरह से विविधता लिए हैं, फिर भी, यह संग्रह उम्र के अंतिम पड़ाव में भोगे जाने वाली उपेक्षा और तिरस्कार को लेकर अधिक संवेदनशील है। “आख़िरी पड़ाव का दु:ख” कहानी वृद्धावस्था और एकाकीपन को भोगते हुए मोहभंग की स्थिति पर ठहरती है तो “जीवन का ताप” कहानी उसी वृद्धावस्था को संवेदनाओं की ऊष्मा से जागृत रखती है और अहसास कराती है कि कोमल भावनाओं की प्रतीति हर उम्र में समान रूप से की जा सकती है।
संग्रह के अंतिम दो पन्ने बेहद कीमती हैं। “चटखे घड़े” कहानी की निम्न संवादात्मक पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं–
“सुनो जी, बाऊजी से कहो, लैट्रिन में पानी अच्छी तरह डाला करें।"
“बाऊजी, आप नहाते समय कितना पानी बर्बाद करते हैं।"
“बाऊजी, यह क्या उठा लाए सड़ी-गली सब्ज़ी!”
ऐसे कई तीखे दिल को भेदने वाले संवाद और बर्दाश्त के लिए बस एक शब्द – “गुडु़प !” ध्वनि-संवाद के रूप में एमदम नवीन प्रयोग! अलग अभिव्यंजना के साथ संग्रह की अंतिम कहानी तक पहुँचकर पाठक कई तरह की मनस्थितियों से गुजरता है, कई तरह के आंचलिक और शहरी परिवेश में गोते लगाता है और आशान्वित होता है कि सुभाष नीरव का पड़ाव अभी दूर है, अभी तो उनकी कहानियों का ग्राफ ऊपर और ऊपर की ओर बढ़ रहा है।
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रविवार, 16 मार्च 2008

पुस्तक-चर्चा


‘छांग्या रुक्ख'
बलबीर माधोपुरी

अनुवाद – सुभाष नीरव
वाणी प्रकाशन, 21–ए, दरियागंज,
नयी दिल्ली –110 002
पृष्ठ 232, मूल्य – 300 रुपये।
छांग्या रुक्ख – दलित जीवन का वास्तविक दस्तावेज
-रूपसिंह चन्देल

भारतीय दलित-साहित्य में पहली दलित आत्मकथा किस भाषा में लिखी गई यह बता पाना मेरे लिए कठिन है लेकिन पंजाबी भाषा की पहली दलित आत्मकथा लिखने का गौरव पंजाबी के कवि-पत्रकार बलबीर मधोपुरी को अवश्य प्राप्त है। हाल ही में उनकी आत्मकथा “छांग्या रुक्ख” का अनुवाद (अनुवादक–सुभाष नीरव) हिन्दी में प्रकाशित हुआ और आश्चर्यजनक रूप से अत्यल्प समय में चर्चा के चरम शीर्ष पर जा पहुँचा। पंजाबी में इसके पांच संस्करणों का प्रकाशन और अन्य भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रजी में इसके अनुवाद इसकी प्रतिष्ठा को प्रमाणित करते हैं।
आखिर ऐसा क्या है इस दो सौ बत्तीस पृष्ठीय पुस्तक में जिसे एक बार प्रारंभ करने के पश्चात् छोड़ना कठिन है। कठिन इसलिए कि इसमें जीवन-जगत को बेहद ईमानदारी के साथ काव्यात्मक गद्य में प्रस्तुत किया गया है। अब तक की समस्त भारतीय भाषाओं की दलित आत्मकथाओं में अप्राप्य लोकजीवन का सार्थक प्रयोग भी ‘छांग्या रुक्ख‘ की बहुचर्चा का कारण है, जिसमें हिन्दी दलित आत्मकथाओं की भांति छद्म त्रासदियों को चित्रित नहीं किया गया है। वे उसी रूप में वहां उपस्थित हैं जैसी रही होगीं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि बलबीर के पास तराशी हुई निमज्जित भाषा और समृद्ध शिल्प है, जो गहन अध्ययन, चिन्तन और मनन के बाद ही अर्जित की जा सकती है। साहित्य ‘दलित‘ और ‘सवर्ण‘ खांचे में बांटा जा सकता है अर्थात् रचनाकारों के अनुसार उसका वर्गीकरण किया जा सकता है, जो कि है ही, लेकिन भाषा-शिल्प का वर्गीकरण इस आधार पर नहीं किया जा सकता। अच्छी भाषा और आकर्षक शिल्प परम्परा और विश्व-साहित्य के अध्ययन से ही अर्जित किया जा सकता है। ‘छांग्या रुक्ख’ का लेखक अपने जीवन विकास पर प्रकाश डालते हुए यह स्पष्ट करता है कि वह कब और किन आन्दोलनों से जुड़ा और भारतीय भाषाओं सहित विश्व के किन महान रचनाकारों को उसने पढ़ा।
‘छांग्या रुक्ख’ को यदि एक काव्यात्मक उपन्यास कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। इसे पढ़ते समय मुझे अनेक बार स्व0 भीष्म साहनी का उपन्यास ‘मैय्यादास की माड़ी’ याद आया। यदि उसे पंजाबी जीवन और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज कहा जाता है तो ‘छांग्या रुक्ख‘ अपनी बुनावट और विवरणों के कारण उसके समकक्ष ही स्थापित होता है बावजूद इसके कि वह एक उपन्यास है और यह एक लेखक के जीवन की त्रासद वास्तविकता। विवेच्य पुस्तक के विशय में स्व0 कमलेश्वर के उद्गारों का उल्लेख करने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ। कमलेश्वर के अनुसार - ‘‘ यह आत्मकथा – आत्मश्लाघा और बड़बोलेपन की सरहदों से बहुत दूर खड़ी दिखाई देती है। लेखक ने अपनी स्थितियों और परिस्थितियों के भौतिक और मानसिक यथार्थ को सादगी से व्यक्त किया है। आत्मकथा का पूरा कलेवर (भाषा, शिल्प, रचना-दृष्टि और काल) अपने समकालीन साहित्य की चुनौतियों को पूरी ईमानदारी के साथ रखता है। … सामाजिक समाधान में इसकी भूमिका उस गवाह की तरह है, जो जांति-पांति और छुआ-छूत व सामाजिक असमानता के ठेकेदारों को कटघरे में खड़ा करके अपना हलफिया बयान दर्ज कराता है। इतना ही नहीं, लेखक ने ‘छांग्या रुक्ख’ में अपने शोषित और पीड़ित जीवन को पूरे साहित्यिक मानदंडों के साथ व्यक्त कर, सांस्कृतिक धरातल पर उस भाव-बोध का भी अहसास कराया है, जिसे कबीर और नानक ने अपनी साखियों और पदों के जरिये सबसे दुखी इंसान की आत्मा के रूप में दर्शन किये थे। ‘‘ (भूमिका – ‘यातना का दस्तावेज’) बलबीर स्थितियों पर सटीक टिप्पणी करते हैं रुदन नहीं। ‘‘ मुझे लगा कि वीरान- बंजर ज़मीनों जैसी जिन्दगियों में हरियाली के लिए सबको मिलकर निरंतर और अधिक प्रयास करना है। इसलिए कि हमारी व्यथा-दर- व्यथा युगों पुरानी है जिसे न किसी ने कभी सुना है और न ही महसूस किया है।" (पृष्ठ 124) . लेखक दलित जातियों की आपसी फूट पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहता हैं – ‘‘इस घटना के बाद मैनें महसूस किया कि समूची ‘कमीन’ बिरादरियों की मानसिकता के पीछे सदियों का अमानवीय दृष्टिकोण है। जिन अनुसूचित जातियों और पिछड़ा जातियों को हम परस्पर एक साथ देखना चाहते हैं, मानसिक स्तर पर उनकी फूट उन्हें एक दूसरे के नजदीक नहीं आने देती।" बलबीर माधोपुरी की उक्त टिप्पणी आज हिन्दी दलित लेखन पर भी उतनी ही सटीक है।
बलबीर एक जाट परिवार की आत्मीयता को जिस भाषा में स्मरण करते हैं वह स्पृहणीय है – ‘‘अब जब मेरे रोमों में रचे इस जट्ट परिवार के मोह-प्यार का खयाल आता है तो मुझे लगता है कि जैसे वह हमारी ज़िन्दगी के रेगिस्तान में बहा दरिया हो, जिसके कारण थोड़ी-थोड़ी हरियाली दिखाई देने लगी हो।"
लेखक की चमत्कारिक भाषा के सैकड़ों उदाहरण पुस्तक में उपस्थित हैं, जिसमें सजी लोकगीतों की लड़ियाँ उसे और आकर्षक बनाती हैं। इस पुस्तक पर इतना कुछ कहा जा सकता है कि वह इतनी ही बड़ी पुस्तक का रूप ले ले, क्योंकि यह पंजाबी की जहां पहली दलित आत्मकथा है, वहीं यह भारतीय भाषाओं में अब तक प्रकाशित दलित आत्मकथाओं में श्रेष्ठतम है , जिसका हिन्दी में खूबसूरत अनुवाद हिन्दी के कवि-कथाकार सुभाष नीरव ने किया है।
कहना अत्युक्ति न होगा कि ‘छांग्या रुक्ख’ देश की सीमाएं लांघ विश्व आत्मकथा–साहित्य में अपना स्थान सुरक्षित करने में सक्षम है।

शनिवार, 8 मार्च 2008

उच्च शिक्षा

उच्च शिक्षा के अवरोधी
रूपसिंह चन्देल
मार्च,८ को महिला दिवस के रूप में मनाया गया. अमेरिका की विदेश मंत्री कोण्डालिसा राइस ने कहा कि भारत के विकास में वहां की महिलाओं का विशेष योगदान है. योगदान तो निश्चित है, लेकिन योगदान करने वाली महिलाओं का प्रतिशत कितना है! क्या कारण है कि महामहिम राष्ट्रपति को यह कहना पड़ता है कि हमारे यहां विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या बहुत कम है. केवल विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं, प्रबन्धन आदि अनेक क्षेत्रों में यह कमी विचारणीय है. आई.आई.एम. में छात्राओं की संख्या दस प्रतिशत के आंकड़े पार नहीं कर पाते. आई.आई..टी आदि संस्थानों की स्थिति भी ऎसी ही है. कारण बहुत स्पष्ट हैं. समाज में अस्सी प्रतिशत लोगों की सोच लड़कियों को लेकर अठारहवीं शताब्दी वाली ही है. किसी प्रकार अधिक से अधिक स्नातक तक शिक्षा दिलाकर विवाह कर देने तक. इसमें एक पहलू विवाह को लेकर उत्पन्न होने वाली स्थितियों से भी जुड़ता है. अधिक शिक्षिता लड़की के लिए कम से कम उतना शिक्षित वर चाहिए ही और शिक्षित लड़कों की कीमत चुका पाने की क्षमता सामान्य आदमी में नहीं होती. अर्थात दहेज-दानव का निरंतर फैलता जबडा़ लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलाने की आकांक्षा रखने वाले अभिभावकों को हतोत्साहित करता है और समाज (जो कि सदैव दकियानूस ही रहा है) की चिन्ता करने वाले लोग अपनी लड़कियों के स्वैच्छिक चयन को बमुश्किल ही स्वीकार कर पाते हैं. हलांकि इस दिशा में स्थितियां बदल रहीं हैं, लेकिन संख्या नगण्य ही है. लड़कियों के उच्च शिक्षित होने के लिए समाज की सोच को बदलने की आवश्यकता है.
हमारे समाज में हजारों इंदिरा नूयी और कल्पना चावला हैं, लेकिन उन्हें अवसर नहीं मिल पा रहे. इसके लिए अभिभावक जितना दोषी हैं, सरकार- व्यवस्था उससे अधिक दोषी हैं. जब उच्च-शिक्षा की बात आती है, राजनीति और अफसरशाही अपने वास्तविक रूप में दिखाए देते हैं. इसका एक ज्वलंत उदाहरण प्रबंधन संस्थानों में होने वाले सरकारी हस्तक्षेप के रूप में सामने आया. दूसरा रूप देखने को तब मिला जब विदेशी विश्वविद्यालयों ने उच्च शिक्षा के लिए भारत में अपने कैंपस स्थापित करने के प्रस्ताव किए, लेकिन राजनीतिक विरोध के कारण सरकार को उनके प्रस्ताव ठुकराने पड़े. आश्चर्यजनक रूप से विरोध करने वाले वे राजनैतिक लोग थे जो प्रगतिशीलता का दावा करते हैं , लेकिन प्रगति पथ पर अवरोध उपस्थित करने में वे ही सबसे आगे थे. यदि विदेशी विश्वविद्यालय अपने कैंपस यहां स्थापित करने में सफल होते तो जिस शिक्षा को प्राप्त करने के लिए हमारे छात्रों को अमेरिका, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन आदि देशों में जाना पड़ता है वह उन्हें कम शुल्क में अपने ही देश में उपलब्ध हो जाती. कितने अभिभावक हैं जो अपने प्रतिभाशाली बच्चों को विदेश भेज पते हैं ! अर्थाभाव के कारण लाखों प्रतिभाओं को अपनी उच्च शिक्षा की आकांक्षा को दबाना पड़ता है. हार्वर्ड और येल जैसे विश्वविद्यालयों के कैंपस खुलने से न केवल लड़कों को लाभ मिलने वाला था बल्कि लड़कियों की दिशा-दशा में भी परिवर्तन होता. आज हमारे देश के अस्सी हजार छात्र अमेरिका और लगभग इतने ही आस्ट्रलिया में पढ़ रहे हैं. कारण जो भी हों, लेकिन विगत कुछ दिनों से वहां हमारे छात्रों को हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.
इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि हमारे यहां उच्च-शिक्षण सस्थानों की संख्या उच्च-शिक्षा पाने के आकांक्षी युवाओं के अनुपात में बहुत कम है. ऎसी स्थिति में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैम्पस स्थापित करने से उस कमी की पूर्ति किसी हद तक संभव थी. लेकिन रतनैतिक विरोध और अफसरशाही के चलते वह संभव नहीं हो पाया. एक तथ्य यह भी है कि विरोध करनेवालों के अपने बच्चे उच्च -शिक्षा के लिए अमेरिका आदि देशों में जाते हैं, क्योंकि वे लाखों खर्च करने की क्षमता रखते हैं . विरोध करने वाले क्या इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि वे आम आदमी के प्रतिभाशाली बच्चों को, जो अर्थाभाव के कारण में विदेशों पढ़ने नहीं जा सकते, आगे आने से रोकना चाहते हैं और अपने बच्चों के लिए स्थान सुरक्षित रखना चाहते हैं. वास्तविकता यह भी है कि महिला सशक्तिकरण, महिला विकास और उच्च-शिक्षा के नारे अधिक लगाए जाते हैं, कार्यान्वयन कम किया जाता है.
उच्च-शिक्षा के प्रति व्यवस्था की उदासीनता का एक उदाहरण और है. वर्षों से अमेरिका का सी.एफ.ए. इन्स्टीट्यूट (Chartered Financial Analyst Institute) भारते में अपनी परीक्षा आयोजित करता आ रहा था. लगभग सात हजार छात्र प्रतिवर्ष इस परीक्षा में बैठते हैं. यह एक अंतराष्ट्रीय स्तर का कोर्स है. लेकिन अवरोधकों ने इसके भारत में आयोजित होने का विरोध किया. यहां के एक विश्विद्यालय ने सी.एफ.ए. के विरुद्ध मुकदमा डाल दिया. मुकदमा कोर्ट में और विद्यार्थियों को परीक्षा के लिए श्रीलंका, नेपाल, सिगांपुर आदि पड़ोसी देशों में परीक्षा देने के लिए भागना पड़ रहा है.
विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में कैंपस स्थापित करने का विरोध करने वालों को जानकारी अवश्य होगी कि चीन और मध्य-पूर्व एशिया के देशों ने बिना किसी हिचक के उन्हें अपने देश में कैंपस स्थापित करने की अनुमति दे दी है जबकि चीन को अपना रोल मॉडल मानने वाले अर्थात हर बात के लिए उनकी ओर देखने वाले हमारे राजनेता विरोध कर रहे हैं. वास्तविकता यह है कि चीन आदि ने विश्व-विकास की स्थिति को भलीभांति समझ लिया है, जबकि हमारे यहां के रजनीतिक और अफसर महज षडयंत्रों में जीने के आदी हो गये प्रतीत होते हैं. अतः जब उच्च-शिक्षा के लिए ही अवरोध उत्पन्न किये जा रहे हों तब लड़कियों की उच-शिक्षा के विषय में सोचा जा सकता है.

सोमवार, 3 मार्च 2008

साहित्य समय

आहत मन की अभिव्यक्ति

वरिष्ठ चित्रकार हरिपाल त्यागी का एक चित्र

हरिपाल त्यागी न केवल लब्ध-प्रतिष्ठ चित्रकार हैं प्रत्युत हिन्दी गद्य साहित्य के उल्लेखनीय हस्ताक्षर भी हैं. अब तक उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें ’आदमी से आदमी तक’ तथा ’महापुरुष’ बहुचर्चित हैं. ’महापुरुष’ में उनके नौ महान लेखकों (लेखक के शब्दों में) के परिचयात्मक व्यंग्य-चित्र प्रकाशित हैं. यह पुस्तक हाल में ’राजपाल एण्ड संस’ से प्रकाशित हुई है.
महापुरुष में कमलेश्वर, त्रिलोचन, राजेन्द्र यादव, विद्यानिवास मिश्र, अशोक बाजपेयी, नामवर सिंह, निर्मल वर्मा , रवीन्द्रनाथ त्यागी तथा स्वयं लेखक द्वारा अपने विषय में लिखे गए व्यंग्य-चित्र संग्रहीत हैं. व्यंग्यात्मकता के बावजूद ये आलेख आत्मीयता का उत्कृष्ट उदाहरण हैं. ये लेखक की सूक्ष्म पर्यवेक्षक दृष्टि और आकर्षक भाषा-शिल्प को प्रमाणित करते हैं. हाल में इस पुस्तक का लोकार्पण डॉ. नामवर सिंह ने प्रेस-क्लब (दिल्ली) में किया था. नवीन संरचनात्मक स्वरूप के कारण निश्चित ही इस पुस्तक का हिन्दी जगत में स्वागत होगा.








’महापुरुष’ का लोकार्पण करते हुए हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष डॉ. नामवर सिंह तथा साथ में पुस्तक लेखक हरिपाल त्यागी.