बुधवार, 20 मई 2009

कविता


विजय कुमार सत्पथी की पांच कविताएं

(१) सिलवटों की सिहरन
अक्सर तेरा साया
एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है …..
मेरे हाथ , मेरे दिल की तरह
कांपते है , जब मैं
उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ …..
तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छु जाता है
जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था ,
मैं सिहर सिहर जाती हूँ ,कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
और मेरी खामोशी को आग लगा जाते हो …
तेरे जिस्म का एहसास मेरे चादरों में धीमे धीमे उतरता है
मैं चादरें तो धो लेती हूँ पर मन को कैसे धो लूँ
कई जनम जी लेती हूँ तुझे भुलाने में ,
पर तेरी मुस्कराहट ,
जाने कैसे बहती चली आती है ,
न जाने, मुझ पर कैसी बेहोशी सी बिछा जाती है …..
कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
या तो तू यहाँ आजा ,
या मुझे वहां बुला ले......
मैंने अपने घर के दरवाजे खुले रख छोडे है ........

(२) मौनता

मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
जिसे सब समझ सके , ऐसी परिभाषा देना ;
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना.
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि ,मैं अपने शब्दों को एकत्रित कर सकूँ
अपने मौन आक्रोश को निशांत दे सकूँ,
मेरी कविता स्वीकार कर मुझमे प्राण फूँक देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि मैं अपनी अभिव्यक्ति को जता सकूँ
इस जग को अपनी उपस्तिथि के बारे में बता सकूँ
मेरी इस अन्तिम उद्ध्ङ्तां को क्षमा कर देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि ,मैं अपना प्रणय निवेदन कर सकूँ
अपनी प्रिये को समर्पित , अपना अंतर्मन कर सकूँ
मेरे नीरस जीवन में आशा का संचार कर देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि ,मैं मुझमे जीवन की अनुभूति कर सकूँ
स्वंय को अन्तिम दिशा में चलने पर बाध्य कर सकूँ
मेरे गूंगे स्वरों को एक मौन राग दे देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि मुझमे मौजूद हाहाकार को शान्ति दे सकूँ
मेरी नपुसंकता को पौरुषता का वर दे सकूँ
मेरी कायरता को स्वीकृति प्रदान कर देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि मैं अपने निकट के एकांत को दूर कर सकूँ
अपने खामोश अस्तित्व में कोलाहल भर सकूँ
बस, जीवन से मेरा परिचय करवा देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि , मैं स्वंय से चलते संघर्ष को विजय दे सकूँ
अपने करीब मौजूद अन्धकार को एकाधिकार दे सकूँ
मृत्यु से मेरा अन्तिम आलिंगन करवा देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
जिसे सब समझ सके , ऐसी परिभाषा देना ;
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना….

(३) आंसू

उस दिन जब मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा ,
तो तुमने कहा..... नही..
और चंद आंसू जो तुम्हारी आँखों से गिरे..
उन्होंने भी कुछ नही कहा... न तो नही ... न तो हाँ ..
अगर आंसुओं कि जुबान होती तो ..
सच झूठ का पता चल जाता ..
जिंदगी बड़ी है .. या प्यार ..
इसका फैसला हो जाता...

(४) दर्द

जो दर्द तुमने मुझे दिए ,
वो अब तक संभाले हुए है !!
कुछ तेरी खुशियाँ बन गई है
कुछ मेरे गम बन गए है
कुछ तेरी जिंदगी बन गई है
कुछ मेरी मौत बन गई है
जो दर्द तुमने मुझे दिए ,
वो अब तक संभाले हुए है !!

(५) तू

मैं अक्सर सोचती हूँ
कि,
खुदा ने मेरे सपनो को छोटा क्यों बनाया
करवट बदलती हूँ तो
तेरी मुस्कारती हुई आँखे नज़र आती है
तेरी होटों की शरारत याद आती है
तेरे बाजुओ की पनाह पुकारती है
तेरी नाख़तम बातों की गूँज सुनाई देती है
तेरी क़समें ,तेरे वादें ,तेरे सपने ,तेरी हकीक़त ..
तेरे जिस्म की खुशबु ,तेरा आना , तेरा जाना ..
एक करवट बदली तो ,
तू यहाँ नही था..
तू कहाँ चला गया..
खुदाया !!!!
ये आज कौन पराया मेरे पास लेटा है...
****


I am working as Sr.GM-Marketing in Hyderabad. My hobbies are poetry, painting, books, music, photography, spirituality etc. I am an engineer with a MBA in marketing. Presently I am living in Hyderabad [AP].
My contact details:
FLAT NO.402, FIFTH FLOOR, PRAMILA RESIDENCY;
HOUSE NO. 36-110/402,
DEFENCE COLONY,
SAINIKPURI POST, SECUNDERABAD- 500 094 [A.P.]
My Mobile no : +91 9849746500

शनिवार, 9 मई 2009

कविता


वरिष्ठ कथाकार अशोक गुप्ता की दो कविताएं
(१) अंगारे का नाम
उस अंगारे को मेरा नाम नहीं मालूम
जो
मेरा पीछा कर रहा है ,
उसे बस इतना पता है
कि उसका काम
मुझे भस्म कर देना है.

उस अंगारे को
उसका नाम भी कहाँ पता है
जिसने दौड़ाया है अंगारे को
मेरी मृत्यु बना कर.

मैं चल रहा हूँ आगे आगे
पीछे पीछे अंगारा है
मैं रुकता हूँ कहीं
तो अंगारा भी रुकता है
न मैं सोता हूँ
न अंगारा
यह घटनाचक्र न जाने कब से जारी है.

अंगारा क्यों ठहर जाता है
मेरे ठहरने पर
तभी क्यों नहीं वह
चीते कि तरह झपट कर मुझे दबोच लेता
यह एक प्रश्न है.

अंगारा जानता है
कि
मेरी मुठ्ठी में आग है,
कविता है मेरी मुठ्ठी में
जिसकी फुहार
शांत कर सकती है कोई भी अग्निकांड
चाहे वह शहर में हो
या
आबादी के चित्त में...

अंगारा जानता है
कि
खाली है अंगारे की मुठ्ठी नितांत
उसे खाली करा लिया है उस नपुंसक वटवृक्ष ने
जिसने अंगारे को
मेरे पीछे दौड़ाया है.

आग
अंगारे के भी चित्त में है
लेकिन उसका नाम
शहर की आबादी से काटा जा चुका है
आबादी से कट जाने के बाद
आग में ताप भला कहाँ बचता है ?
अंगारा उस हालत में तो
चिंगारी भी नहीं होता.

अंगारा दरअसल
आबादी से जुड़ने का रास्ता खोज रहा है
जहाँ उसे उसका नाम
फिर से मिल जाय.


(२) नदी
नदी के लिए
कोई भी समय बुरा नहीं होता
नदी का बोध
काल से ऊपर होता है.

नदी
पहले ऊंचाई दे कर पाती है वेग
फिर
वेग दे कर विस्तार
और अंततः अस्तित्व दे कर
अथाह हो जाती है.
अस्तित्व दे कर अथाह होना
नदी होना होता है

नदी के लिए कोई भी समय
बुरा नहीं होता
****

नाम वही, यानी अशोक गुप्ता, जन्मा देहरादून में 29 जनवरी 1947 को, कविताओं को लेकर अब तक बस कच्ची पक्की हाजिरी, भले कवितायें मन ही मन हमेशा पकती रहीं.

मेरा कवि निश्चित रूप से मेरे कथाकार से पहले जन्मा लेकिन कथाकार पता नहीं कैसे दौड़ कर आगे पहुँच गया. एक बार कथाकार होने का नाम पहन कर बहुतों ने कवि को आगे नहीं आने दिया, उनमें शायद मैं खुद भी रहा, लेकिन हैरत है कि कवि मरा नहीं बल्कि कभी कहानियों में घुस कर आगे आता रहा तो कभी स्वतंत्र रूप से.. .
पहल, आउटलुक हिंदी, समकालीन भारतीय साहित्य, गगनांचल, जनसत्ता और परिकथा सहित बहुत सी लघु पत्रिकाओं में कविताएँ छपीं है, रेडियो ने भी कई कई बार प्रसारित किया है, फिर भी मुझे यही लगता रहा है कि मैं अपने कवि के साथ अन्याय कर रहा हूँ. यहाँ मेरी कोशिश इसी आग्रह की पुकार को सुनना है, लेकिन इस कोशिश में मैं पाठकों के साथ अन्याय कर जाऊँ, यह मुझे मंजूर नहीं होगा. इस लिए यहाँ मेरा परिचय एक नवागंतुक भर पाएं और मेरी कविताओं के बारे में बेबाक कहें.


बुधवार, 8 अप्रैल 2009

लघुकथाएं



बलराम अग्रवाल की पांच लघुकथाएं

अपनी-अपनी जमीन

“बुरा तो मानोगे…मुझे भी बुरा लग रहा है, लेकिन…कई दिनों तक देख-भाल लेने के बाद हिम्मत कर रही हूँ बताने की…सुनकर नाराज न हो जाना एकदम-से…।” नीता ने अखबार के पन्ने उलट रहे नवीन के आगे चाय का प्याला रखते हुए कहा और खुद भी उसके पास वाली कुर्सी पर बैठ गई।
“कहो।” अखबार पढ़ते-पढ़ते ही नवीन बोला।
“पिछले कुछ दिनों से काफी बदले-बदले लग रहे हैं पिताजी…” वह चाय सिप करती हुई बोली, “शुरू-शुरू में तो नॉर्मल ही रहते थे—सुबह-सवेरे घूमने को निकल जाना, लौटने के बाद नहा-धोकर मन्दिर को निकल जाना और फिर खाना खाने के बाद दो-चार पराँठे बँधवाकर दिल्ली की सैर को निकल जाना। लेकिन…”
“लेकिन क्या?” नवीन ने पूछा।
“अब वह कहीं जाते ही नहीं हैं!…जाते भी हैं तो बहुत कम देर के लिए।” वह बोली।
“इसमें अजीब क्या है?” अखबार को एक ओर रखकर नवीन ने इस बार चाय के प्याले को उठाया और लम्बा-सा सिप लेकर बोला, “दिल्ली में गिनती की जगहें हैं घूमने के लिए…और पिताजी-जैसे ग्रामीण घुमक्कड़ को उन्हें देखने के लिए वर्षों की तो जरूरत है नहीं…वैसे भी, लीडो या अशोका देखने को तो पिताजी जाने से रहे…मन्दिर…या ज्यादा से ज्यादा पुरानी इमारतें,बस। सो देख ही डाली होंगी उन्होंने।”
“सो बात नहीं।” नीता उसकी ओर तनिक झुककर किंचित संकोच के साथ बोली,“मैंने महसूस किया है…कि…अपनी जगह पर बैठे-बैठे उनकी नजरें…मेरा…पीछा करती हैं…जिधर भी मैं जाऊँ!”
“क्या बकती हो!”
“मैंने पहले ही कहा था—नाराज न होना।” वह तुरन्त बोली,“आज और कल, दो दिन तुम्हारी छुट्टी है…खुद ही देख लो, जैसा भी महसूस करो।”
यों भी, छुट्टी के दिनों में नवीन कहीं जाता-आता नहीं था। स्टडी-रूम, किताबें और वह्। पिछले कई महीनों से पिताजी उसके पास ही रह रहे हैं। गाँव में सुनील है, जो नौकरी भी करता है और खेती भी। माँ के बाद पिताजी कुछ अनमने-से रहने लगे थे, सो सुनील की चिट्ठी मिलते ही नीता और वह गाँव से उन्हें दिल्ली ले आये थे। यहाँ आकर पिताजी ने अपनी ग्रामीण दिनचर्या जारी रखी, सो नीता को या उसको भला क्या एतराज होता। जैसा पिताजी चाहते, वे करते। लेकिन अब! नीता जो कुछ कह रही है…वह बेहद अजीब है। अविश्वसनीय। वह पिताजी को अच्छी तरह जानता है।
आदमी कितना भी चतुर क्यों न हो, मन में छिपे सन्देह उसके शरीर से फूटने लगते हैं। इन दोनों ही दिन नीता ने अन्य दिनों की अपेक्षा पिताजी के आगे-पीछे कुछ ज्यादा ही चक्कर लगाए; लेकिन कुछ नहीं। उसके हाव-भाव से ही वह शायद उसके सन्देहों को भाँप गए थे। अपने स्थान पर उन्होंने आँखें मूँदकर बैठे या लेटे रहना शुरू कर दिया।…लेकिन इस सबसे उत्पन्न मानसिक तनाव के कारण रविवार की रात को ही उन्हें तेज बुखार चढ़ आया। सन्निपात की हालत में उसी समय उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना जरूरी हो गया। डॉक्टरों और नर्सों ने तेजी-से उनका उपचार किया—इंजेक्शन्स दिये, ग्लूकोज़ चढ़ाया और नवीन को उनके माथे पर ठण्डी पट्टियाँ रखते रहने की सलाह दी…तब तक, जब तक कि टेम्प्रेचर नॉर्मल न आ जाए।
करीब-करीब सारी रात नवीन उनके माथे पर बर्फीले पानी की पट्टियाँ रखता-उठाता रहा। सवेरे के करीब पाँच बजे उन्होंने आँखें खोलीं। सबसे पहले उन्होंने नवीन को देखा, फिर शेष साजो-सामान और माहौल को। सब-कुछ समझकर उन्होंने पुन: आँखें मूँद लीं। फिर धीमे-से बुदबुदाये,“कहीं कुछ खनकता है…तो लगता है कि…पकी बालियों के भीतर गेहूँ खिलखिला रहे हैं…वैसी आवाज सुनकर अपना गाँव, अपने खेत याद आ जाते हैं बेटे…।”
यानी कि नीता की पाजेबों में लगे घुँघरुओं की छनकार ने पिताजी के मन को यहाँ से उखाड़ दिया! उनकी बात सुनकर नवीन का गला भर आया।
“आप ठीक हो जाइए पिताजी…” वह बोला,“फिर मैं आपको सुनील के पास ही छोड़ आऊँगा…गेहूँ की बालें आपको बुला रही हैं न…मैं खुद आपको गाँव में छोड़कर आऊँगा…आपकी खुशी, आपकी जिन्दगी की खातिर मैं यह आरोप भी सह लूँगा कि…छह महीने भी आपको अपने साथ न रख सका…।” कहते-कहते एक के बाद एक मोटे-मोटे कई जोड़ी आँसू उसकी आँखों से गिरकर पिताजी के बिस्तर में समा गए।
पिताजी आँखें मूँदे लेटे रहे। कुछ न बोले।
“सत-श्री अकाल!” निश्चिंत होकर उसने दहशतजदा सवारियों के स्वर में धीरे-से अपना स्वर मिलाया। सवारियों में से तो कोई-भी अब पीछे घूमकर देख ही नहीं रहा था।
अन्तिम संस्कार

पिता को दम तोड़ते, तड़पते देखते रहने की उसमें हिम्मत नहीं थी; लेकिन इन दिनों, वह भी खाली हाथ, उन्हें किसी डॉक्टर को दिखा देने का बूता भी उसके अन्दर नहीं था। अजीब कशमकश के बीच झूलते उसने धीरे-से, सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की को खोला। दू…ऽ…र—चौराहे पर गश्त और गपशप में मशगूल पुलिस के जवानों के बीच-से गुजरती उसकी निगाहें डॉक्टर की आलीशान कोठी पर जा टिकीं।
“सुनिए…” पत्नी ने अपने अन्दर से आ रही रुलाई को रोकने की कोशिश करते हुए भर्राई आवाज में पीछे से पुकारा,“पिताजी शायद…”
उसकी गरदन एकाएक निश्चल पड़ चुके पिता की ओर घूम गई। इस डर से कि इसे पुलिसवाले दंगाइयों के हमले से उत्पन्न चीख-पुकार समझकर कहीं घर में ही न घुस आएँ, वह खुलकर रो नहीं पाया।
“ऐसे में…इनका अन्तिम-संस्कार कैसे होगा?” हृदय से उठ रही हूक को दबाती पत्नी की इस बात को सुनकर वह पुन: खिड़की के पार, सड़क पर तैनात जवानों को देखने लगा। अचानक, बगलवाले मकान की खिड़की से कोई चीज टप् से सड़क पर आ गिरी। कुछ ही दूरी पर तैनात पुलिस के जवान थोड़ी-थोड़ी देर बाद सड़क पर आ पड़ने वाली इस चीज और ‘टप्’ की आवाज से चौंके बिना गश्त लगाने में मशगूल रहे। अखबार में लपेटकर किसी ने अपना मैला बाहर फेंका था। वह स्वयं भी कर्फ्यू जारी होने वाले दिन से ही अखबार बिछा, पिता को उस पर टट्टी-पेशाब करा, पुड़िया बना सड़क पर फेंकता आ रहा था; लेकिन आज! ‘टप्’ की इस आवाज ने एकाएक उसके दिमाग की दूसरी खिड़कियाँ खोल दीं—लाश का पेट फाड़कर सड़क पर फेंक दिया जाए तो…।
मृत पिता की ओर देखते हुए उसने धीरे-से खिड़की बन्द की। दंगा-फसाद के दौरान गुण्डों से अपनी रक्षा के लिए चोरी-छिपे घर में रखे खंजर को बाहर निकाला। चटनी-मसाला पीसने के काम आने वाले पत्थर पर पानी डालकर दो-चार बार उसको इधर-उधर से रगड़ा; और अपने सिरहाने उसे रखकर भरी हुई आँखें लिए रात के गहराने के इन्तजार में खाट पर पड़ रहा।

उम्मीद

रिक्शेवाले को पैसे चुकाकर मैंने ससुराल की देहरी पर पाँव रखा ही था कि रमा की मम्मी और बाबूजी मेरी अगवानी के लिए सामनेवाले कमरे से निकलकर आँगन तक आ पहुँचे।
“नमस्ते माँजी, नमस्ते बाबूजी!” मैंने अभिवादन किया।
“जीते रहो।” बाबूजी ने मेरे अभिवादन पर अपना हाथ उठाकर मुझे आशीर्वाद दिया। माँजी ने झपटकर मेरे हाथ से ब्रीफकेस ले लिया और उसी सामनेवाले कमरे के किसी कोने में उसे रख आईं।
“मैं कहूँ थी न—पन्द्रह पैसे की एक चिट्ठी पर ही दौड़े चले आवेंगे!” ड्राइंग-रूम बना रखे उस दूसरे कमरे में हम पहुँचे ही थे कि वह बाबूजी के सामने आकर बोलीं,“दुश्मन को भी भगवान ऐसा दामाद दे।”
“भले ही उसको कोई बेटी न दे।” बाबूजी ने स्वभावानुसार ही चुटकी ली तो मैं भी मुस्कराए बिना न रह सका।
“तुम्हें पाकर हम निपूते नहीं रहे बेटा।” उनकी चुटकी से अप्रभावित वह भावुकतापूर्वक मेरी ओर घूमीं,“चिट्ठी पाते ही चले आकर तुमने हमारी उम्मीद कायम रखने का उपकार किया है।”
चिट्ठी पाते ही चले आने के उनके पुनर्कथन ने मुझे झकझोर-सा दिया। घर से मेरे चलने तक तो इनकी कोई चिट्ठी वहाँ पहुँची नहीं थी! मिट्टी के तेल की बिक्री का परमिट प्राप्त करने के लिए कुछ रकम मुझे सरकारी खजाने में बन्धक जमा करानी थी। समय की कमी के कारण रमा ने राय दी थी कि फिलहाल ये रुपए मैं बाबूजी से उधार ले आऊँ। अब, ऐसे माहौल में, इनकी किसी चिट्ठी के न पहुँचने और रुपयों के लिए आने के अपने उद्देश्य को तो जाहिर नहीं ही किया जा सकता था।
“दरअसल, आप लोग कई दिनों से लगातार रमा के सपनों में आ रहे थे।” मैं बोला, “तभी से वह लगातार आप लोगों की खोज-खबर ले आने के लिए जिद कर रही थी। अब…।” कहते हुए मैं बाबूजी से मुखातिब हो गया,“…आप तो जानते ही हैं दुकानदारी का हाल। कल इत्तफाक से ऐसा हुआ कि मिट्टी…” अनायास ही जिह्वा पर आ रहे अपने आने के उद्देश्य को थूक के साथ निगलते हुए मैंने कहा,“सॉरी, चिट्ठी पहुँच गई आपकी। बस मैं चला आया।”

कसाईघाट

बहू ने हालाँकि अभी-अभी अपने कमरे की बत्ती बन्द की है; लेकिन खटखटाहट सुनकर दरवाजा खोलने के लिए रमा को ही जाना पड़ता है। दरावाजा खुलते ही बगल में प्रमाण-पत्रों की फाइल दबाए बाहर खड़ा छोटा दबे पाँव अन्दर दाखिल होकर सीधा मेरे पास आ बैठता है। मैं उठकर बैठ जाता हूँ। उसकी माँ रजाई के अन्दर से मुँह निकालकर हमारी ओर अपना ध्यान केन्द्रित कर देखने लगती है।
“क्या रहा?” मेरी निगाहें उससे मौन प्रश्न करती हैं।
“कुछ खास नहीं। दयाल कहता है कि इंटरव्यू से पहले पाँच हजार नगद…!”
छोटे का वाक्य खत्म होते न होते बगल के कमरे में बहू की खाट चरमराती है,“ए, सो गए क्या?” पति को झकझोरते हुए वह फुसफुसाती महसूस होती है,“नबाव साहब टूर से लौट आए हैं, रिपोर्ट सुन लो।”
एक और चरमराहट सुनकर मुझे लगता है कि वह जाग गया है। पत्नी के कहे अनुसार सुन भी रहा है, अँधेरे में यह दर्शाने के लिए उसने अपना सिर अवश्य ही उसकी खाट के पाये पर टिका दिया होगा। इधर की बातें गौर से सुनने के लिए शान्ति बनाए रखने हेतु दोनों अपने-अपने समीप सो रहे बच्चों को लगातार थपथपाते महसूस होते हैं।
“सुनो, मेरे गहनों और अपने पी एफ की ओर नजरें न दौड़ा बैठना, बताए देती हूँ।” पति के सिर के समीप मुँह रखे लेटी वह फुसफुसाती लगती है।
बड़ा बेटा पिता का अघोषित-उत्तराधिकारी होता है। परिवार की आर्थिक-दुर्दशा महसूस कर बहू इस जिम्मेदारी से उसे मुक्त कराने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रही है; लेकिन सामाजिक उपेक्षा के भय ने बड़े को जबरन इसी खूँटे से बाँधे रखा है।
“अभी तुम सो जाओ।” मेरे मुँह से फूटता है,“सवेरे सोचेंगे।”
फाइल को मेज पर रख, कपड़े उतारकर छोटा अपनी माँ के साथ लगे बिस्तर में जा घुसता है। दरवाजा बन्द करके कमरे में आ खड़ी रमा भी मेरा इशारा पाते ही बत्ती बन्द कर अपनी माँ के पास जा लेटती है। घर में अजीब-सा सन्नाटा बिखर गया है। रिश्वत के लिए रकम जुटा पाने की पहली कड़ी टूट जाने के उपरान्त कसाईघाट पर घिर चुकी गाय-सा असहाय मेरा मन अन्य स्रोतों की तलाश में यहाँ-वहाँ चकराने लगता है।
सब ओर अँधेरा है।

सेक्युलर

गाँव में पता नहीं किस बात पर दो परिवारों में लाठियाँ चल गयीं। खूब सिर फूटे, हड्डियाँ टूटीं। औरतों के कपड़े फटे और...।
पुलिस पहुँची। कुछ को अस्पताल में डाल आई, कुछ को हवालात में डाल दिया। दोनों ओर के बचे-खुचे लोग अपने-अपने आकाओं की ओर दौड़े। एक ने ‘इस’ राजनीतिक-दल का दामन थामा तो दूसरे ने ‘उस’ के तलवे चाटे।
“ओ पाट्टी किस जाती को बिलौंग करता है?” ‘इस’ के नेता ने कान को कुरेदते हुए पूछा।
“अपनी ही जाती का है ससुरा।”
“अपनी ही जाती का पाट्टी से किस ग्राउंड पर लड़ोगे?” नेता हताश स्वर में बुदबुदाया।
“मतलब?”
“मतलब ये...ऽ...कि सबरन रहा होता तो...अब किसके खिलाफ बोलेंगे?”
“बोलेंगे न सरकार…” उनकी हताशा पर वह तुरन्त बोला,“वे लोग ‘उस’ पार्टी की सपोर्ट पा रहे हैं...पुलिस पर दवाब बनाकर बाहर भी निकाल चुके हैं अपने कई आदमियों को...।”
“अइसा!” यह सुनते ही सांसद-सर की बाँछें खिल उठीं,“तब तो समझो बन गया बात...। ऊ साला कम्यूनल पाट्टी...असान्ती फैलाया इलाके में... गाँव-बिरादरी को लड़ाया आपस में...दलितों पर जानलेवा हमला कराया...पुलिस भी दलितों को ही परेशान कर रही है...। बहुत तगड़ा बेस बन गया...वाह ! ...अब देख, मैं कैसे उनकी माँ-बहन को नंगा करता हूँ भरे सदन में...। कुल दस हजार लूँगा...ला, पेशगी निकाल...।”
******
डॉ. बलराम अग्रवाल का जन्म २६ नवंबर, १९५२ को उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर में हुआ था. आपने हिन्दी साहित्य में एम.ए., अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, और ’समकालीन हिन्दी लघुकथा का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन’ विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की.

लेखन व सम्पादन : समकालीन हिन्दी लघुकथा के चर्चित हस्ताक्षर. सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, लघुकथा आदि प्रकाशित. अनेक रचनाएं विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनूदित व प्रशंसित . भारतेम्दु हरिश्चन्द्र , प्रेमचंद, प्रसाद, शरत, रवींद्रनाथ टैगोर, बालशौरि रेड्डी आदि वरिष्ठ कथाकारों की चर्चित/ज़ब्त कहानियों के संकलनों के अतिरिक्त कुछेक लघु-पत्रिकाओं व लघुकथा-विशेषांकों का संपादन. प्रेमचंद की लघुकथाओं के संकलन ’दरवाज़ा’ (२००५) का संपादन. ’अडमान-निकोबार की लोककथाएं’(२००१) का अंग्रेजी से अनुवाद व पुनर्लेखन.

हिन्दीतर भारतीय कथा-साहित्य की श्रृंखला में ’तेलुगु की सर्वश्रेष्ठ कहानियां’ (१९९७) तथा ’मलयालम की चर्चित लघुकथाएं’ (१९९७) के बाद संप्रति तेलुगु की लघुकथाओं पर कार्यरत. अनेक विदेशी लुघुकथाओं पर कार्यरत. अनेक विदेशी लघुकथाओं व कहानियों के अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित.

अनेक वर्षों तक रंगमंच से जुड़ाव. कुछ रंगमंचीय नाटकों हेतु गीत-लेखन भी. हिन्दी फीचर फिल्म ’कोख’ (१९९४) के संवाद-लेखन में सहयोग.

कथा-संग्रह ’सरसों के फूल’ (१९९४), ’दूसरा भीम’ (१९९६) और ’चन्ना चरनदास’ (२००४) प्रकाशित.
सम्प्रति : स्वतन्त्र लेखन .

हिन्दी
ब्लॉग : www.jangatha.blogspot.com
सम्पर्क : एम-७०, नवीन शाहदरा, दिल्ली -११००३२.
फोन . ०११-२२३२३२४९
मो. ०९९६८०९४४३१

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

लघुकथाएं

(चित्र : डॉ० अवधेश मिश्र)
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथाएं
(१)

धारणा
मैं इस शहर में बिल्कुल अनजान था । काफी भाग–दौड़ करके किसी तरह पासी मुहल्ले में एक मकान खोज सका था । परसों ही परिवार शिफ्ट किया था ।
बातों ही बातो में ऑफिस में पता चल गया कि मैं अपना परिवार पासी मुहल्ले में शिफ्ट कर चुका हूँ। बड़े साहब चौंके–’’ आप सपरिवार इस मुहल्ले में रह पाएँगे ?’’
‘‘क्या कुछ गड़बड़ हो गई सर ?’’ मैने हैरान होकर पूछा ।
‘‘बहुत गन्दा मुहल्ला है । यहॉं आए दिन कुछ न कुछ होता रहता है । सॅंभलकर रहना होगा ।’’ साहब के माथे पर चिन्ता की रेखाएँ उभरी–‘‘यह मुहल्ला गंदे मुहल्ले के नाम से बदनाम है । गुडागर्दी कुछ ज्यादा ही है ।’’
मैं अपनी सीट पर आकर बैठा ही था कि बड़े बाबू आ पहुचे–‘‘सर आपने मकान गंदे मुहल्ले में लिया है ?’’
‘‘लगता है मैने ठीक नही किया है ’’–मैं पछतावे के स्वर में बोला ।
‘‘हाँ सर,ठीक नहीं किया । यह मुहल्ला रहने लायक नहीं है । जितनी जल्दी हो सके, मकान बदल लीजिए उन्होंने अपनी अनुभवी आँखें मुझ पर टिका दीं ।
इस मुहल्ले में आने के कारण मैं चिन्तित हो उठा । घर के सामने पान–टॉफी बेचने वाले खोखे पर नजर गई । खोखे वाला काला–कलूटा मुछन्दर एक दम छॅंटा हुआ गुण्डा नजर आया । कचर–कचर पान चबाते हुए वह और भी वीभत्स लग रहा था ।
सचमुच मैं गलत जगह पर आ गया हूँ । मुझे रात भर ठीक से नींद नही आई । छत पर किसी के कूदने की आवाज आई। मेरे प्राण नखों में समा गए । मैं डरते–डरते उठा । दबे पॉंव बाहर आया । दिल जोरों से धड़क रहा था । मुँडेर पर नजर गई । वहॉं एक बिल्ली बैठी थी। आज दोपहर में बाजार से आकर लेटा ही था कि आँंख लग गई । कुछ ही देर बाद दरवाजे पर थपथपाहट हुई । दरवाजा खुला हुआ था। मैं हड़बड़ाकर उठा । सामने वही पान वाला मुछन्दर खड़ा मुस्करा रहा था । दोपहर का सन्नाटा । मुझे काटो तो खून नहीं ।
‘‘क्या–क्या बात है ?’’ मैंने पूछा ।
‘‘शायद आपका ही बच्चा होगा । टॉफी लेने के लिए आया था मेरे पास । उसने यह नोट मुझको दिया था’’–कहते हुए पान वाले ने सौ का नोट मेरी ओर बढ़ा दिया । मैं चौंका । वह सौ का नोट मेरी कमीज की जेब में था । देखा–जेब खाली थी लगता है सोनू ने मेरी जेब से चुपचाप यह नोट निकाल लिया था ।
‘‘टॉफी के कितने पैसे हुए ?’’
‘‘सिर्फ़ पचास पैसे । फिर कभी ले लेंगे’’– वह कचर–कचर पान चबाते हुए मुस्कराया । दूधिया मुस्कान से उसका चेहरा नहा उठा–‘‘अच्छा, बाबू साहब , प्रणाम ! कहकर वह लौट पड़ा ।
मैं स्वयं को इस समय बहुत हल्का महसूस कर रहा था ।
>>>>>>>>>>>>>>>>>
(२)
जुलूस

नेताजी का विजय–जुलूस निकल रहा था। ‘जिन्दाबाद’ और ‘जय हो, जय हो’ के नारे लगाती हुई भीड़ आगे बढ़ी। जुलूस के आगे–आगे चलने वाला युवक सड़क के बीचोंबीच पड़ी लाश को देखकर झपटा। उसने टाँग पकड़कर लाश को घसीटा और एक किनारे कर दिया।
‘‘इसे भी आज ही मरना था।’’
‘‘जीकर क्या करता?’’
‘‘अपने देश में भिखारियों की संख्या बढ़ती जा रही है।’’
पास से गुज़रता एक भिखारी ठिठक गया–‘‘अरे! ये तो जोद्धा है।’’
‘‘जोद्धा! किस लड़ाई का जोद्धा?’’ किसी ने व्यंग्यपूर्ण लहजे में पूछा।
‘‘आज़ादी की लड़ाई में गोलियाँ खाई थीं इसने साहब। हाथ–पैर छलनी हो गए थे। न किसी ने रोटी दी न काम दिया। भीख माँगकर पेट भरता था.....’’ भिखारी बोला।
उसने पास में मैली–कुचैली झोली उलट दी। कई बदरंग चिट्ठियाँ इधर–उधर बिखर गईं–जोद्धा को बड़े–बड़े नेताओं के हाथ की लिखी चिट्ठियाँ।
विजय–जुलूस आगे निकल चुका था।
>>>>>>>>>>>>>>>>>
(3)
संस्कार
साहब के बेटे और कुत्ते में विवाद हो गया। साहब का बेटा कहे जा रहा था–‘‘यहाँ बंगले में रहकर तुझे चोंचले सूझते हैं। और कहीं होते तो एक–एक टुकड़ा पाने के लिए घर–घर झाँकना पड़ता। यहाँ बैठे–बिठाए बढ़िया माल खा रहे हो। ज्यादा ही हुआ तो दिन में एकाध बार आने–जाने वालों पर गुर्रा लेते हो।’’
कुत्ता हँसा–‘‘तुम बेकार में क्रोध करते हो। अगर तुम भिखारी के घर पैदा हुए होते तो मुझसे और भी ईर्ष्या करते। जूठे पत्तल चाटने का मौका तक न मिल पाता। तुम यहीं रहो, खुश रहो, यही मेरी इच्छा है।’’
‘‘मैं तुम्हारी इच्छा से यहाँ रह रहा हूँ? हरामी कहीं के।’’ साहब का बेटा भभक उठा।
कुत्ता फिर हँसा–‘‘अपने–अपने संस्कार की बात है। मेरी देखभाल साहब और मेमसाहब दोनों करते हैं। मुझे कार में घुमाने ले जाते हैं। तुम्हारी देखभाल घर के नौकर–चाकर करते हैं। उन्हीं के साथ तुम बोलते–बतियाते हो। उनकी संगति का प्रभाव तुम्हारे ऊपर ज़रूर पड़ेगा। जैसी संगति में रहोगे, वैसे संस्कार बनेंगे।’’
साहब के बेटे का मुँह लटक गया। कुत्ता इस स्थिति को देखकर अफसर की तरह ठठाकर हँस पड़ा।
>>>>>>>>>>>>>>>>>.
(4)
मुखौटा
नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दूकान में गए। दूकानदार ने भालू, शेर, भेडिए,साधू–संन्यासी के मुखौटे उसके चेहरे पर लगाकर देखे। कोई भी मुखौटा फिट नहीं बैठा। दूकानदार और नेताजी दोनों ही परेशान।
दूकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अँधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनाव–क्षेत्र में चले गए।
परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतारकर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठे–वह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>
(5)
दूसरा सरोवर
एक गाँव था। उसी के पास में था स्वच्छ जल का एक सरोवर। गाँव वाले उसी सरोवर का पानी पीते थे। किसी को कोई कष्ट नहीं था। सब खुशहाल थे।
एक बार उजले–उजले कपड़े पहनकर एक आदमी गाँव में आया। उसने सब लोगों को मुखिया की चौपाल में इकट्ठा करके बहुत अच्छा भाषण दिया। उसने कहा–‘‘सरोवर आपके गाँव में एक मील की दूरी पर है। आप लोगों को पानी लाने के लिए बहुत दिक्कत होती है। मैं जादू के बल पर सरोवर को आपके गाँव के बीच में ला सकता हूँ। जिसे विश्वास न हो वह मेरी परीक्षा ले सकता है। मैं चमत्कार के बल पर अपना रूप–परिवर्तन कर सकता हूँ। गाँव के मुखिया मेरे साथ चलें। मेरा चमत्कारी डंडा इनके पास रहेगा। मैं सरोवर में उतरूँगा। ये मेरे चमत्कारी डण्डे को जैसे ही ज़मीन पर पटकेंगे मैं मगरमच्छ का रूप धारण कर लूँगा। उसके बाद फिर डण्डे को ज़मीन पर पटकेंगे, मैं फिर आदमी का रूप धारण कर लूँगा।’’
लोग उसकी बात मान गए। उजले कपड़े किनारे पर रखकर वह पानी में उतरा। मुखिया ने चमत्कारी डण्डा ज़मीन पर पटका। वह आदमी खौफनाक मगरमच्छ बनकर किनारे की ओर बढ़ा। डर से मुखिया के प्राण सूख गए। हिम्मत जुटाकर उसने फिर डण्डा ज़मीन पर पटका। मगरमच्छ पर इसका कोई असर नहीं हुआ। नुकीले जबड़े फैलाए कांटेदार पूछ फटकारते हुए मगरमच्छ, मुखिया की तरफ बढ़ा। मुखिया सिर पर पैर रखकर भागा। डण्डा भी उसके हाथ से गिर गया।
अब उस सरोवर पर कोई नहीं जाता। उजले कपड़े आज तक किनारे पर पड़े हैं। गाँव वाले चार मील दूर दूसरे सरोवर पर जाने लगे हैं।
आज वह मगरमच्छ जगह–जगह नंगा घूम रहा है।
>>>>>>>>>>>>>>>.
(6)
खुशबू
दोनों भाइयों को पढ़ाने–लिखाने में उसकी उम्र के खुशनुमा साल चुपचाप बीत गए। तीस वर्ष की हो गई शाहीन इस तरह से। दोनों भाई नौकरी पाकर अलग–अलग शहरों में जा बसे।
अब घर में बूढ़ी माँ है और जवानी के पड़ाव को पीछे छोड़ने को मजबूर वह।
खूबसूरत चेहरे पर सिलवटें पड़ने लगीं। कनपटी के पास कुछ सफेद बाल भी झलकने लगे। आईने में चेहरा देखते ही शाहीन के मन में एक हूक–सी उठी–कितनी अकेली हो गई है मेरे जि़न्दगी। किस बीहड़ में खो गए मिठास भरे सपने।
भाइयों की चिट्ठियाँ कभी–कभार ही आती हैं। दोनों अपनी गृहस्थी में ही डूबे रहते हैं। उदासी की हालत में वह पत्र–व्यवहार बंद कर चुकी है। सोचते–सोचते शाहीन उद्वेलित हो उठी। आँखों में आँसू भर आए। आज स्कूल जाने का भी मन नहीं था। घर में भी रहे तो माँ की हाय–तौबा कहाँ तक सुने?
उसने आँखें पोंछीं और रिक्शा से उतरकर अपने शरीर को ठेलते हुए गेट की तरफ कदम बढ़ाए। पहली घंटी बज चुकी थी। तभी दीदीजी–दीदीजी की आवाज़ से उसका ध्यान भंग हुआ।
‘‘दीदीजी, यह फूल मैं आपके लिए लाई हूँ।’’ दूसरी कक्षा की एक लड़की हाथ में गुलाब का फूल लिए उसी तरफ बढ़ी।
शाहीन की दृष्टि उसके चेहरे पर गई। वह मंद–मंद मुस्करा रही थी। उसने गुलाब का फूल शाहीन की तरफ बढ़ा दिया। शाहीन ने गुलाब का फूल उसके हाथ से लेकर उसके गाल थपथपा दिए।
गुलाब की खुशबू उसके नथुनों में समाती जा रही थी। वह स्वयं को इस समय बहुत हल्का महसूस कर रही थी। उसने रजिस्टर उठाया और उपस्थिति लेने के लिए गुनगुनाती हुई कक्षा की तरफ तेजी से बढ़ गई।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
(7)
अपने–अपने सन्दर्भ
इस भयंकर ठंड में भी वेद बाबू दूध वाले के यहाँ मुझसे पहले बैठे मिले। मंकी कैप से झाँकते उनके चेहरे पर हर दिन की तरह धूप–सी मुस्कान बिखरी थी।
लौटते समय वेदबाबू को सीने में दर्द महसूस होने लगा। वे मेरे कंधे, पर हाथ मारकर बोले–‘‘जानते हो, यह कैसा दर्द है?’’मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना मद्धिम स्वर में बोले–‘‘यह दर्दे–दिल है। यह दर्द या तो मुझ जैसे बूढ़ों को होता है या तुम जैसे जवानों को।’’
मैं मुस्करा दिया।
धीरे–धीरे उनका दर्द बढ़ने लगा।
‘‘मैं आपको घर तक पहुँचा देता हूँ।’’ मोड़ पर पहुँचकर मैंने आग्रह किया–‘‘आज आपकी तबियत ठीक नहीं लग रही है।’’
‘‘तुम क्यों तकलीफ करते हो? मैं चला जाऊँगा। मेरे साथ तुम कहाँ तक चलोगे? अपने वारण्ट पर चित्रगुप्त के साइन होने भर की देर है।’’ वेद बाबू ने हंसकर मुझको रोकना चाहा।
मेरा हाथ पकड़कर आते हुए वेदबाबू को देखकर उनकी पत्नी चौंकी–‘‘लगता है आपकी तबियत और अधिक बिगड़ गई है? मैंने दूध लाने के लिए रोका था न?’’
‘‘मुझे कुछ नहीं हुआ। यह वर्मा जिद कर बैठा कि बच्चों की तरह मेरा हाथ पकड़कर चलो। मैंने इनकी बात मान ली।’’ वे हँसे
उनकी पत्नी ने आगे बढ़कर उन्हें ईज़ी चेयर पर बिठा दिया। दवाई देते हुए आहत स्वर मे कहा–‘‘रात–रात–भर बेटों के बारे में सोचते रहते हो। जब कोई बेटा हमको पास ही नहीं रखना चाहता तो हम क्या करें। जान दे दें ऐसी औलाद के लिए। कहते हैं–मकान छोटा है। आप लोगों को दिक्कत होगी। दिल्ली में ढंग के मकान बिना मोटी रकम दिए किराए पर मिलते ही नहीं।’’
वेदबाबू ने चुप रहने का संकेत किया–‘‘उन्हें क्यों दोष देती हो भागवान! थोड़ी–सी साँसें रह गई हैं, किसी तरह पूरी हो ही जाएगी–’’ कहते–कहते हठात् दो आँसू उनकी बरौनियों में आकर उलझ गए।
*******
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
जन्म : 19 मार्च 1949, बेहट जिला सहारनपुर, भारत में।
शिक्षा : एम ए-हिन्दी (मेरठ विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में) , बी एड
प्रकाशित रचनाएँ : 'माटी, पानी और हवा', 'अंजुरी भर आसीस', 'कुकडूँ कूँ', 'हुआ सवेरा' (कविता संग्रह), 'धरती के आँसू', 'दीपा', 'दूसरा सवेरा' (लघु उपन्यास), 'असभ्य नगर' (लघुकथा ``संग्रह),खूँटी पर टँगी आत्मा( व्यंग्य –संग्रह) अनेक संकलनों में लघुकथाएँ संकलित तथा गुजराती, पंजाबी, उर्दू एवं नेपाली में अनूदित।
सम्पादन :आयोजन एवं
www.laghukatha.com (लघुकथा की एकमात्र वेबसाइट), http://patang-ki-udan.blogspot.com/ (बच्चों के लिए ब्लॉगर)
वेब साइट पर प्रकाशन:रचनाकार ,अनुभूति, अभिव्यक्ति,हिन्दी नेस्ट,साहित्य कुंज ,लेखनी,इर्द-गिर्द ,इन्द्र धनुष आदि ।
प्रसारण –आकाशवाणी गुवाहाटी ,रामपुर, नज़ीबाबाद ,अम्बिकापुर एवं जबलपुर से ।
निर्देशन: केन्द्रीय विद्यालय संगठन में हिन्दी कार्य शालाओं में विभिन्न स्तरों पर संसाधक(छह बार) ,निदेशक (छह बार) एवं : केन्द्रीय विद्यालय संगठन के ओरियण्टेशन के फ़ैकल्टी मेम्बर के रूप में कार्य
सेवा : 7 वर्षों तक उत्तरप्रदेश के विद्यालयों तथा 32 वर्षों तक केन्द्रीय विद्यालय संगठन में कार्य । साढ़े चौदह वषों तक प्राचार्य के रूप में कार्य । अब सेवा- निवृत्त ।
संपर्क:- 37, बी /2 रोहिणी सैक्टर -17
नई दिल्ली-110089
मोबाइल- 9313727493
दूरभाष-011-27581183

शनिवार, 7 मार्च 2009

कविता



सुरेश यादव की कुछ कविताएं

सवेरा

सवेरा
तोड़ देता रोज
एक खौफनाक सपना
जोड़ देता
खौफनाक सवाल !

सवेरा
खतरनाक पुल है
दिन-
इसी पर से
गुजरता है रोज।


अच्छा आदमी

तुमने मुझे अच्छा आदमी कहा
मैं, काँप गया
हिलती हुई पत्ती पर
थरथराती
ओस की बूँद-सा !

तुमने
मुझे 'अच्छा आदमी' कहा
मैं सिहर उठा
डाल से टूटे
कोट में टंक रहे उस फूल-सा,
जो किसी को अच्छा लगा था।

'अच्छा आदमी' फिर कहा,
तुमने मुझे
और मैं भयभीत हो गया हूँ
भेड़ियों के बीच मेमने-सा
जंगल में जैसे घिर गया हूँ।

'अच्छा आदमी' जब-जब कोई कहता है
बहुत डर लगता है।

बिछा रहा जब तक

घिरा रहा
शुभ-चिन्तकों से
बिछा रहा
जब तक सड़क सा!

खड़ा हुआ तनकर
एक दिन
अकेला रह गया
दरख्त-सा !

धार पा गए

गर्म दहकती भट्टी में
पड़े रहे तपते हुए
और- एक दिन
ढलने का अहसास पा गए

संभव और कुछ नहीं था
इस हालात में
गर्म थे
पिटे खूब
और - एक दिन
धार पा गए।


ज़िन्दगी अच्छी लगती है

मैं
हार भी जाता हूँ
कभी-कभी तो
मुझ से फिर
मेरी ज़िन्दगी लड़ती है

मुझे
इसीलिए ज़िन्दगी
बहुत अच्छी लगती है।

शहर नंगा हुआ

हज़ारों
साधु, सन्त, फकीरों के
लाखों प्रवचन हुए हैं

अजान की गूंजी हैं
दूर तक आवाजें
और मंदिर की घंटियाँ भी
बजती रही हैं रोज़

अभी तक
मन लोगों का
जाने कितना 'गंगा' हुआ है
सभ्यता के आवरण
जितने थे शहर के पास
फटते गए
और सारा शहर
एकदम नंगा हुआ है...

शहर में फिर दंगा हुआ है।

ताजमहल

पत्थर भी
अपना रंग बदलने लगते हैं
वक्त के साथ
गलने लगते हैं
मैं -
तुम्हारी याद में कभी
ताजमहल नहीं बनाऊँगा
वक्त के हाथों
बदरंग हो जाए जो पत्थर
मैं
तुम्हारी याद को
ऐसा पत्थर नहीं बनाऊँगा।

जल गई शाम

मुझसे लिपटी
वह कितनी खूबसूरत थी
शाम-ए-तन्हाई
प्रेमिका की तरह
और
पहाड़ी की ओट से
झांक भर पाई शाम
पत्नी की तरह
कि जलकर राख हो गई।
00
दिनांक 1 जनवरी 1955 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में जन्में सुरेश यादव की प्रारंभिक शिक्षा बेवर तथा शिकोहाबाद एवं उच्च शिक्षा- एम.ए.(राजनीति शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय, एम.ए.(हिन्दी), राजस्थान विश्वविद्यालय से प्राप्त की। अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान, अनुवाद सिध्दांत एवं व्यवहार, पोस्ट एम.ए. डिप्लोमा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, दिल्ली से प्राप्त किए। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया जिनमें 'संधान','सर्वहिताय' एवं 'सहजानन्द' प्रमुख हैं। प्रथम कविता संग्रह - 'उगते अंकुर' वर्ष 1981 में प्रकाशित हुआ। दूसरा कविता संग्रह -'दिन अभी डूबा नहीं' वर्ष 1986 में प्रकाशित हुआ और इस चर्चित कविता संग्रह पर 'हिन्दी अकादमी, दिल्ली' की ओर से वर्ष 1987 के लिए 'साहित्यिक कृति' सम्मान प्रदान किया गया। तीसरा काव्य संग्रह - 'ये शहर किसका है' शीध्र प्रकाश्य है।

सुरेश यादव की कविताओं का अंग्रेजी, बंगला एवं पंजाबी भाषाओं में अनुवाद विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है। अकाशवाणी, दिल्ली तथा दिल्ली दूरदर्शन पर कविताओं का निरन्तर प्रसारण।

हिन्दी अकादमी के 1987 के सम्मान के अतिरिक्त वर्ष 2004 के 'रांगेय राघव सम्मान' एवं अन्य सम्मान ।
सम्प्रति - वर्तमान में दिल्ली नगर निगम में अतिरिक्त उपायुक्त के पद पर कार्यरत हैं।

सम्पर्क : 2/3, एम सी डी फ्लैट्स, साउथ एक्स, पार्ट-॥,
नई दिल्ली-110049

दूरभाष : 011-26255131(निवास)
09818032913(मोबाइल)
ई मेल : sureshyadav55@yahoo.co.in

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

काव्य रचनाएं


पूर्णिमा वर्मन की पांच काव्य रचनाएं
गीत- कचनार के दिन
फिर मुँडेरों पर
सजे कचनार के दिन
बैंगनी से श्वेत तक
खिलती हुई मोहक अदाएँ
शाम लेकर उड़
चली रंगीन ध्वज सी ये छटाएँ
फूल गिन गिन
मुदित भिन-
भिन फिर हवाओं
में बजे कचनार के दिन
खिड़कियाँ, खपरैल, घर, छत
डाल, पत्ते आँख मीचे
आरती सी दीप्त पखुरी
उतरती है शांत
नीचे रूप
झिलमिल चाल
स्वप्निल फिर दिशाओं ने
भजे कचनार के दिन

गजल- दर्द में
दर्द में कुछ इस तरह आया करो
ठहरा-ठहरा चैन बरसाया करो
जब हवाओं में उमस होने लगे
खुशबुओं के फूल बन जाया करो
हर तरफ उड़ते हुए तूफ़ान हैं
एक तिनका ओट रख जाया करो
जब धुआँ तनहाइयों का घेर ले
याद की चादर में सो जाया करो
ज़िंदगी में दूर तक जाना तो है
छाँव में पल भर को सुस्ताया करो

फागुन के दोहे
ऐसी दौड़ी फगुनहट ढाणी चौक फलांग।
फागुन आया खेत गये पड़ोसी जान।।
आम बौराया आँगना कोयल चढ़ी अटार।
चंग द्वार दे दादरा मौसम हुआ बहार।।
दूब फूल की गुदगुदी बतरस चढ़ी मिठास।
मुलके दादी भामरी मौसम को है आस।।
वर गेहूँ बाली सजा खड़ी फ़स़ल बारात।
सुग्गा छेड़े पी कहाँ सरसों पीली गात।।
ऋतु के मोखे सब खड़े पाने को सौगात।
मानक बाँटे छाँट कर टेसू ढाक पलाश।।
ढीठ छोरियाँ तितलियाँ रोकें राह वसंत।
धरती सब क्यारी हुई अम्बर हुआ पतंग।।
मौसम के मतदान में हुआ अराजक काम।
पतझर में घायल हुए निरे पात पैगाम।।
दबा बनारस पान को पीक दयी यौं डार।
चैत गुनगुनी दोपहर गुलमोहर कचनार।।
सजे माँडने आँगने होली के त्योहार।
बुरी बलायें जल मरें शगुन सजाए द्वार।।
मन के आँगन रच गए कुंकुम अबिर गुलाल।
लाली फागुन माह की बढ़े साल दर साल।।
कविताएँ
वे भी होती हैं कविताएँ
जिन्हें कोई नहीं
पढ़ता गुलाब की पंखुरियों के
साथ सोती हुई नोटबुक में
कभी कभी
झाँकती पन्ने खुलने
पर घुल जातीं हैं रचनाकार के व्यक्तित्व
में वे जीने की वजह बनती हैं
संतोष के छप्पर रखते हुए हौले
वे रचनाकार को मिट्टी होने से बचाती हैं
उसकी मिट्टी को आकार देते हुए

पाँच हाइकु -

वसंत में

राग सुरंगी
छलके छल छल
झांझ चंग में
कोयल घोले
कुहुक कुहुक के
टोना वन में
हरषे होली
अबरक केसर
और रंग में
राधा मोहन
रसमय फागुन से
आँगन में
चलो सखी री
प्रियतम के घर
वृंदावन में
*******
जन्म : 27 जून 1955शिक्षा : संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, स्वातंत्र्योत्तर संस्कृत साहित्य पर शोध, पत्रकारिता और वेब डिज़ायनिंग में डिप्लोमा।कार्यक्षेत्र : पीलीभीत (उत्तर प्रदेश, भारत) की सुंदर घाटियों जन्मी पूर्णिमा वर्मन को प्रकृति प्रेम और कला के प्रति बचपन से अनुराग रहा। मिर्ज़ापुर और इलाहाबाद में निवास के दौरान इसमें साहित्य और संस्कृति का रंग आ मिला। पत्रकारिता जीवन का पहला लगाव था जो आजतक साथ है। खाली समय में जलरंगों, रंगमंच, संगीत और स्वाध्याय से दोस्ती।संप्रति : पिछले बीस-पचीस सालों में लेखन, संपादन, स्वतंत्र पत्रकारिता, अध्यापन, कलाकार, ग्राफ़िक डिज़ायनिंग और जाल प्रकाशन के अनेक रास्तों से गुज़रते हुए फिलहाल संयुक्त अरब इमारात के शारजाह नगर में साहित्यिक जाल पत्रिकाओं 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' के संपादन और कलाकर्म में व्यस्त।प्रकाशित कृतियाँ : कविता संग्रह : वक्त के साथ (वेब पर उपलब्ध)ई मेल: abhi_vyakti@hotmail.com

रविवार, 1 फ़रवरी 2009

कविता






(चित्र : डॉ. अवधेश मिश्र )






वरिष्ठ कवि तेजेन्दर शर्मा की पांच कवितायें

मेरा घर और तकनीकी क्रान्ति

मेरा घर
बन गया है माईक्रोकाज़्म
मेरे देश के तकनीकी विकास का।

लैपटाप, डेस्कटाप, और मोबाईल
कैमरा, या फिर म्यूज़िक सिस्टम
सभी हो गये हैं डिजिटल
ले आए हैं क्रान्ति
घर में मेरे!

मेरी बेटी और दामाद
भेजते हैं मुझे, मेरे ही
नाना बनने की ख़बर
एस.एम.एस के ज़रिये!
और फिर कर देते हैं बन्द
मोबाईल को अपने
कर लो मशीन से बात
यही है तकनीकी विकास!

मेरे पचपनवें जन्मदिन पर
मेरे अस्पताल के बिस्तर पर
भेजती है एस.एम.एस
मेरी ही पत्नी, और हो जाती है
इतिश्री उसके कर्तव्य की।
लांघ जाती है दूरी
हज़ारों मील की, पल भर में!

भूल जाते हैं मेरे पुत्र
कि अस्पताल के बिस्तर पर
लेटा उनका पिता
बना रहा है एक रिश्ता
अन्जान सा
अपने ही बिस्तर के
गन्धों के साये के साथ।
फिर वो भेजते हैं
एक एस.एम.एस
बिलेटिड हैपी बर्थडे का।
और अचानक बज उठती है
एक घन्टी
अस्पताल के कमरे में।

होता है परेशान
अस्पताल के कमरे में
ब्रेन ट्यूमर से लड़ता
मेरा हमसफ़र।
कहता है करदो बन्द
इस मोबाईल फ़ोन को।
इसने मुझे किया है बीमार
और ज़िन्दगी से बेज़ार।

मैं उसे कैसे समझाऊं
उसे कैसे बताऊं कि यह जो
मोबाईल है, यह प्रतीक है
मेरे राष्ठ्र की प्रगति का।
आज दुल्हन चर्च को करती है
एस.एम.एस. कि हां
मुझे मंज़ूर है दूल्हा।
और पति भी तीन बार बस
टाईप ही करता है
तलाक़, तलाक़, तलाक़
और भेज देता है एस.एम.एस.

मैं पहले करता हूं सलाम
अपने घर को
फिर अपने देश को
बिल गेट्स को
तकनीकी क्रान्ति को!




चांदनी से भर देगा....

मुफ़लिसों को वो थाम लेगा, नया दर देगा
जो भी होगा ज़रूरी, उनके लिये कर देगा।

आग से तप के वो निकला है बना कुंदन है
किसी को प्यार किसी को ज़मीनो ज़र देगा।

आसमां उसका इस क़दर है सितारों से भरा
वो अमावस को तेरी, चांदनी से भर देगा।

ऐसी बातें थे सुना करते उसके बारे में
मांग के देखो वो, बेख़ौफ़ अपना सर देगा।

मेरे हालात का न ज़िक्र उससे करना कभी
छोड़ना मुझको उसके दिल में दर्द भर देगा।


ख़ुद को अकेला पाते.....

वो जो हर रोज़ मुझे याद किया करते थे
आजकल मेरे बुलाने पे भी नहीं आते।

जब तलक काम था मैं धड़कनों में था उनकी
अब मेरे नाम से ही दिन ख़राब हो जाते।

साथ अपने मुझे पहलू में वो बिठाते थे
मेरी मौजूदगी से आज हैं वो घबराते।

मुझ को लाना औ छोड़ना कभी सुहाता था
अब तबीयत ख़राब रहती है वो फ़रमाते

भावनाओं से उनका कुछ नहीं लेना देना
पैसे वाले ही आज उनके दिल को हैं भाते।

न कोई दोस्त है न रिश्ता कोई है अपना
आज दुनिया में हैं वो ख़ुद को अकेला पाते।

ठोस सच्चाई ज़िन्दगी की जानते वो नहीं
सफ़र पे आख़री सब हाथ खाली ही जाते।


अकेलापन.....

नये बिम्ब नई अभिव्यक्ति
देश बदला, मिट्टी बदली
बदला कुल परिवेश
लगे कहीं से जो भी अपना
न चेहरा न वेश !

सुबह न कोई कोयल बोले
न चिड़िया चहचहाए
धुन्ध सुबह, धुन्धली हो शाम
खो गया हर वो नाम
जो कभी मिलने आता था
टेलिफ़ोन पर बतियाता था
कहीं भीतर तक दिल के
तारों को छू जाता था।

सुपर मार्किट की भीड़ में
सुबह की लोकल की भीड़ में
कार-बूट सेल की भीड़ में
फ़ुटबॉल प्रेमियों की भीड़ में
अपने आप को कहीं किसी
अकेले कोने में,
अकेला खड़ा पाता हूं।

किसी गहरी सोच में
डूब जाता हूं।
अपने इस अकेलेपन की अभिव्यक्ति
कहां कर पाता हूं शब्दों में ?
खो जाता हूं, डूब जाता हूं
शब्दों के मायाजाल में।

किन्तु शब्द ! न मिलते हैं !
न मेरे करीब आते हैं।
मुझे दौड़ाते हैं, थकाते हैं
और अकेला छोड़ जाते हैं।

रात को चांद
सितारों के हुजूम में चांद
अकेला चांद
फ़ैक्टरियों और कारों के
प्रदूषण से ग्रस्त चांद
पीला चान्द !
आंसुओं से गीला चांद !
मुझे देख कर मुस्कुराया
एक पीली कमज़ोर मुस्कान !

उससे, उसके अकेलेपन पर
करता हूं एक प्रश्न।
पीड़ा की एक वक्र रेखा
चीर कर निकल जाती है
उसका चेहरा ज़र्द ! !
शब्द अस्फुट से सुनाई
देते हैं फिर भी....
पहुंच जाते हैं मुझ तक।

अकेलेपन के लिये
नई शब्दावली ढूंढ रहे हो ?
पगला गये हो। क्यों व्यर्थ में
कुम्हला रहे हो ?

सबसे पहले अकेला था आकाश
फिर धरती अकेली थी
फिर अकेला था आदम।
उसके रहते, अकेली थी हव्वा

अकेलापन जीवन का सत्य है
शाश्वत है !
क्या उसके लिये नये बिम्ब चाहते हो ?
चाहते हो नई शब्दावली।
ढूंढो अपने ही युग में।
करो तलाश अपने आसपास।

विश्व युद्ध में पड़ा अकेला जर्मनी
गहन अकेला नाम, जिसे कहते थे सद्दाम
अकेला ही जला जो कभी था युगोस्लाविया
अफ़गानिस्तान भी दुखी अकेला
यही शब्द हैं, बिम्ब नये हैं
पूरे विश्व में नाम अकेले।
क्या ये बिम्ब अपनाओगे ?
अकेलापन दिखलाओगे ?

मैं एकाएक घबरा गया हूं
नेत्र गीले, स्वर भर्रा गया है
अकेला तो पहले भी था
अन्धेरा और हुआ सघन।
मुझसे छिन रहा है
मेरा अपना गगन।

……..मुसलमान हो गया।


अपने को हंसता देख मैं हैरान हो गया
तुझसे ही ज़िन्दगी मैं परेशान हो गया।

हैं कैसे कैसे लोग यहां आ के बस गये
बसता हुआ जो घर था, वो वीरान हो गया।

किसका करें भरोसा, ज़माने में आज हम
दिखता जो आदमी था वो शैतान हो गया।

इलज़ाम भी लगाने से वो बाज़ नहीं है
बन्दा था अक़्ल वाला वो नादान हो गया।

या रब दुआ है कीजियो उसपे करम सदा
वो दोस्त मेरा मुझ से ही अन्जान हो गया।

मैख़ाने में हमेशा निभाता था साथ वो
क़ाफ़िर था अच्छा खासा, मुसलमान हो गया।



तेजेन्द्र शर्मा (मित्रों के साथ IIC नई दिल्ली में)

-- Tejinder SharmaGeneral Secretary (Katha UK)London, UKMobile: 07868 738 403e-mail: tejendra.sharma@gmail.com