मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

पुस्तक चर्चा

वरिष्ठ कथाकार हृदयेश के सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘संगत’ मे दो उपन्यास शामिल हैं - ‘सांड़’ और ‘दंडनायक’ । सांड़ उपन्यास के केन्द्र में हमारी शिक्षा व्यवस्था है । प्रस्तुत उपन्यास विस्तृत फलक पर शिक्षण जगत की अराजक और आतंकी गतिविधियों का लेखा-जोखा है । उपन्यास में यह भी चित्रित किया गया है कि बेहद सामान्य से दीखने वाले उत्पीडि़त लोगों में से कुछ ऐसे जन भी निकल आते हैं जो इस स्थिति का सक्रिय प्रतिवाद करने को उठ खड़े होते हैं । शुरू में वे अपने प्रतिरोध में अकेले होते हैं , सुबह की धूप के छितरे हुए टुकड़ों की मानिंद , लेकिन जल्द ही वे सब मिलकर गर्म धूप का सैलाब बन जाते हैं और उस सैलाब के दबाव के आगे भ्रष्ट-तंत्र व नौकरशाही को झुकना पड़ता है ।


दंडनायक उपन्यास में स्वतंत्र भारत की मानव-विरोधी व्यवस्था की चक्की में पिस गए एक ऐसे व्यक्ति की व्यथा-कथा चित्रित है जो अपने देश की आजादी के लिए फांसी पर चढ़े एक क्रांतिकारी ( शहीद रोशन सिंह) की तीसरी पीढ़ी में पैदा हुआ था । यह उपन्यास उन अनेक प्रश्नों को उठाता है जो वर्तमान जन-मानस को बराबर परेशान किए हुए हैं । क्या आज के हिन्दुस्तान की तस्वीर वही है जो क्रान्तिकारियों के दिलो-दिमाग में थी और जिसके लिए उन्होंने भरी जवानी में फांसी के फंदे को चूमा था ?


दोनों ही उपन्यासों में अलग-अलग विषय-वस्तु होकर भी मानव-विरोधी व्यवस्था से भिड़ने -जूझने का संकल्प और साथ ही उस दिशा में भरसक प्रयास किया है ।


‘संगत’ - हृदयेश
पृष्ठ - 414 मूल्य : 450/-

भावना प्रकाशन109 ए ,

पटपड़गंज , दिल्ली - 110091

वरिष्ठ कथाकार बलराम हिन्दी के उन लब्धप्रतिष्ठ कथाकारों में हैं जिहोंने पत्रकारिता के साथ अपनी सृजन क्षमता को अक्ष्क्षुण रखा है । ‘कलम हुए हाथ’ और ‘मालिक के मित्र’ जैसी महत्वपूर्ण कहानियां लिखने वाले बलराम का सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह है - ‘गोवा में तुम’ , जिसमें शीर्षक कहानी के अतिरिक्त सोलह अन्य कहानियां सम्मिलित हैं । संग्रह की यद्यपि सभी कहानियां पठनीय हैं , लेकिन गोवा में तुम , शुभ दिन , मालिक के मित्र , सामना , इतना खटराग , समर्पण गाथा , उनके फतवे कहानियां लेखक की चमत्कारिक भाषा , शिल्प और कथानक का उललेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करती हैं ।
प्रकाशक - वही

पृष्ठ- 135 , मूल्य - 150/-

सोमवार, 4 जनवरी 2010

लघुकथाएं



फजल इमाम मल्लिक की तीन लघुकथाएं


पाबंदी


उस मोहल्ले में वह अकेली रह रहीं थीं। उनका इस तरह अकेले रहना लोगों को रास नहीं आ रहा था। खास कर जिस तरीके से वह रहती थीं। लोगों को उनके बेपरदा रहना...मर्दों के साथ घूमना-फिरना अच्छा नहीं लगता था। आखिर मजहब भी कोई चीज होती है और इस्लाम ने औरतों को परदे की हिदायत की है। मोहल्ले के लोगों ने इसकी शिकायत इमाम से की। लोगों का मानना था कि उनके रहन-सहन के तरीके से मोहल्ले की औरतों व लड़कियों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.......।


लोगों की शिकायत की वजह से उन्हें एक दिन इमाम की अदालत में पेश होना ही पड़ा। इमाम ने एक नजर उन पर डाली और फिर बताया कि लोगों को उनके रहन-सहन के तरीके पर एतराज है। इसके बाद इमाम साहब ने उन्हें इस्लाम में औरतों के परदे को लेकर एक लंबा भाषण दे डाला। वे सारी बातें धैर्य से सुनती रहीं। इमाम साहब अंत में जब उन्हें नसीहत देने लगे तो उन्होंने सवाल किया.....‘इस्लाम क्या सिर्फ औरतों को ही परदा के लिए कहता है....?’


इमाम साहब ने हां में जवाब दिया। उन्होंने इमाम साहब से फिर पूछा.....‘इस्लाम में महरम और नामहरम की बात भी कही गई है’।


इमाम साहब ने कहा...‘हां कही गई है’।


‘मैं आपके लिए महरम हूं या नामहरम’ इमाम साहब से उनका अगला सवाल था। इमाम साहब तिलमिला उठे पर धीरे से कहा....‘नामहरम’।


‘और यहां जो लोग खड़े हैं उनके लिए मैं महरम हूं या नामहरम .’ इमाम साहब ने उसी तरह तिलमिलाते हुए जवाब दिया....‘नामहरम’


‘जब मैं आपके लिए नामहरम हूं तो आपको और इन तमाम लोगों को मुझसे परदा करना चाहिए था। इस्लाम ने यह भी साफ कहा है कि मरदों को उन औरतों से परदा करना चाहिए जो महरम नहीं हैं। क्या आप और इन तमाम लोगों ने ऐसा किया। जिस मजहब की बुनियाद पर आप मुझे कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उसी मजहब ने मरदों को भी परदा करने की हिदायत दे रखी है। इसलिए मुझसे सवाल-जवाब करने से पहले खुद से और इन तमाम लोगों से सवाल करें तो बेहतर होगा।’ फिर वे अपनी जगह से उठीं और बिना किसी से कुछ कहे वहां से निकल पड़ीं। इमाम साहब खामोश थे और मजमा शर्मिंदा।


सवेरा


उस अंधेरे कमेरे में बंद ढेर सारे बच्चों के चेहरे पर दहशत की लिखी इबारत साफ पढ़ी जा सकती थी। अलग-अलग हिस्सों से पकड़ कर उन्हें लाया गया था और इस अंधेरे कमरे में बंद कर दिया गया था। कमरे का ताला बंद करते हुए वह सोच रहा था कि इस बार अच्छा-खासा मुनाफा होगा। बच्चों की तादाद ज्यादा है। एक बच्चे पर उसे कितना मिलेगा वह दिन भर यही हिसाब जोड़ता रहा। सालों से वह इस धंधा में लगा हुआ है। बच्चों को चुराना और फिर उन्हें बेच देना उसका धंधा था......बस आज की रात बीतनी थी.....कल सुबह ग्राहक आएगा और वह बच्चों को उनके हवाले कर फिर से शिकार पर निकल जाएगा........यह सब सोचते-सोचते उसे नींद आ गई। नींद बहुत ही गहरी थी। पता नहीं कितनी देर तक वह सोता रहा। नींद खुली तो रात हो चुकी थी। उसने कमरे की तरफ देखा। ताला उसी तरह लगा था। उसे भूख लग रही थी। वह उठा और बाजार की तरफ निकल पड़ा। लौटते हुए अचानक उसके कदम ठिठक कर रुक गए। कोई मजहबी जलसा था। लोगों की भीड़ लगी थी। कोई मौलाना तकरीर कर रहे थे। वह भी भीड़ में शामिल हो गया। यह पहला मौका था जब वह इस तरह के किसी जलसे में बेमन से ही सही शरूक हुआ था। ले देकर ईद-बकरीद की नमाज। बस मजहब के नाम पर काम पूरा। पता नहीं मौलाना के शब्दों में क्या था कि वह तकरीर खत्म होने तक वहीं खड़ा रहा। लौटते हुए उसके कानों में मौलाना के शब्द गूंज रहे थे- ‘पैगंबर हजरत मोहम्मद ने किसी से भेदभाव नहीं किया। लोगों को गुलाम बनाए जाने के वे खिलाफ थे। उन्होंने हजरत बलाल हब्शी को गुलामी से निजात दिलाई। वे इंसानी रिश्तों में मोहब्बत के कायल थे। सबसे बड़ी बात यह है कि हम जो जिंदगी जी रहे हैं वह झूठ है, सच सिर्फ और सिर्फ मौत है। मरने के बाद हमें अपने कर्मों का हिसाब देना है। यह तय आपको करना है कि आप अपने साथ वहां क्या ले जाएंगे।’


बार-बार उसके सामने मौलाना के शब्द गूंज रहे थे। उसे लगा मौत उसके सामने खड़ी है और उसका हाथ खाली है। खुदा के यहां वह क्या लेकर जाएगा। बस यही एक लम्हा था जब रोशनी उसके अंदर फूटी और वह रास्ते में ही बैठ कर जार-जार रोने लगा। दिल पर जमा बरसों का मैल धुलने लगा। पता नहीं कितनी देर तक वह उसी तरह रोता रहा। आंसू थमे तो सारा मैल धुल चुका था। रात बीत चुकी थी। तेज-तेज कदमों से चलता हुआ वह कमरे पर पहुंचा। बच्चों के कमरे का ताला खोल कर बत्ती जलाई। देखा बच्चे नींद में डूबे हैं। उनके चेहरे पर फैली मासूमियत को देख कर वह फिर रोने लगा। देर तक रोता रहा। फिर अपनी जगह से उठा। बच्चों के हाथ-पांव में बंधी रस्सियां खोलीं। उनकी जेबों में कुछ रुपए रखे। बच्चे अब भी नींद में मदहोश थे। फिर वह उन्हें उसी हाल में छोड़ कर कमरे से निकल गया.....। रात ढल रही थी और रोशनी की मद्धिम-सी किरण धीरे-धीरे धरती पर फैल रही थी। दूर मस्जिद से फजिर की नमाज की अजान गूंजने लगी.....आज पहली बार उसके कदम मस्जिद की तरफ उठ रहे थे.....अब उसके अंदर...बहुत अंदर एक सकून फैला था....।


पनाह


मौलाना साहब कभी भी उस गली से होकर नहीं गुजरते। आखिर शहर की सबसे बदनाम गली थी और उनके जैसा परहेजगार आदमी उस गली की तरफ मुंह करना भी पसंद नहीं करेगा। वे लंबा रास्ता तय कर घर से मस्जिद आते-जाते। हालांकि इस रास्ते का इस्तेमाल कर के वे समय भी बचा सकते थे। लेकिन उन्होंने इस छोटे रास्ते से होकर घर जाने की बजाय बड़े रास्ते को ही तरजीह दिया। कितनी ही जल्दी क्यों न हो उन्होंने उस छोटे रास्ते का इस्तेमाल कभी नहीं किया। बरसों से यह उनका मामूल था..... एक रात अशां की नमाज पढ़ा कर घर लौट रहे थे। उन दिनों शहर का माहौल ठीक नहीं था। बात-बात पर लोग एक-दूसरे का गला काटने पर आमादा हो जाते थे। रात ज्यादा हो गई थी। पर वे मामूल के मुताबिक धीरे-धीरे कदम धरते हुए घर की तरफ लौट रहे थे। छोटे से रास्ते को छोड़ कर ज्यों ही वे बड़े रास्ते की तरफ मुड़े गली से बदहवास-सी दौड़ती एक लड़की को आते देख कर उनके कदम ठिठक गए.......लड़की ने भी उन्हें देख लिया था। वह तीर की तरह उनकी तरफ आई.....’मुझे बचा लें....’ वे कुछ बोल भी नहीं पाए थे कि गली से चार-पांच लड़के निकले। वे उस लड़की के पीछे आए थे। उन्हें देख कर ही लग रहा था कि उनके तेवर ठीक नहीं हैं......पर मौलाना साहब को देख कर लड़के भी दूर ही रुक गए.......मौलाना ने उन लड़कों को पहचान लिया.....वे उनके मोहल्ले के ही लड़के थे.....। मौलाना को माजरा समझते देर नहीं लगी......मौलाना के साथ खड़ी लड़की को देख कर लड़के पसोपेश में थे.....एक ने हिम्मत कर कहा ‘इसे हमारे हवाले कर दें।’

‘क्यों.....’ मौलाना ने पूछा।

‘इसे हलाल कर डालना है’। उसने फिर कहा।

‘लेकिन इसका कसूर क्या है ?’ मौलाना ने पूछा।

‘इसका कसूर----- यह हिंदू है’ इस बार दूसरे लड़के ने कहा।

‘तो क्या हुआ’ मौलाना ने बहुत शांत स्वर में कहा।

‘और मजहब में काफिरों को मारने की इजाजत है’ तीसरे ने बात को आगे बढ़ाई।

‘मजहब को बीच में मत ला।’ अचानक मौलाना की आवाज तेज हो गई.....उन्हें इस तरह गुस्सा करते हुए वे लड़के पहली बार देख रहे थे। ‘किस मजहब की बात करते हो.....मजहब ने इजाजत दी है....’मौलाना गुस्से से कांप रहे थे। ‘मजहब ने कभी भी औरतों, बच्चों और बूढ़ों को मारने की इजाजत नहीं दी है और बेकसूरों को मारने की तो उसने कभी भी इजाजत नहीं दी है। यह लड़की मेरी पनाह में है और इसकी तरफ हाथ क्या नजर भी उठाने की कोशिश की तो मैं तुम लोगों की आंखें निकाल लूंगा’। फिर वे लड़की से मुखातिब हुए ‘चलो बेटी, तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ दूं।’


उसे साथ लेकर वे उस छोटे रास्ते से उस गली में दाखिल हो गए जहां अब तक उन्होंने पांव नहीं धरा था।

0000
जन्मः १९ जून, १९६४। बिहार के शेखपुरा जिले के चेवारा में।शिक्षाः बी.एस-सी, होटल मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा।
१९८६ में होटल प्रबंधन से किनारा कर पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश। दैनिक हिंदुस्तान में बतौर स्ट्रिंगर शुरुआत। फिलहाल जनसत्ता के दिल्ली संस्करण में वरिष्ठ उपसंपादक के पद पर कार्यरत। क़रीब दस साल तक खेल पत्रकारिता। दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल के लिए फुटबॉल, बास्केटबॉल, एथलेटिक्स, टेनिस सहित दूसरे खेलों के सीधे प्रसारण की कॉमेंट्री।
साहित्यिक पत्रिका 'शृंखला' व 'सनद' का संपादन। सनद अब त्रैमासिक पत्रिका के रूप में दिल्ली से प्रकाशित। कविता संग्रह 'नवपल्लव' और लघुकथा संग्रह 'मुखौटों से परे' का संपादन।
अखिल भारतीय स्तर पर लघुकथा प्रतियोगिता में कई लघुकथाएँ पुरस्कृत।कहानी-कविताएँ देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व आकाशवाणी-दुरदर्शन से प्रसारित।पत्रकारिता के लिए स्व. रणधीर वर्मा स्मृति सम्मान, कवि रमण सम्मान व लघुकथा गौरव सम्मान (रायपुर) छत्तीसगढ़, खगड़िया (बिहार) में रामोदित साहु स्वर्ण सम्मान।

ईमेल : fazalmallick@gmail.com
मोबाइल : 9868018472

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

समीक्षा

२ दिसम्बर २००९ के इंडिया टुडे में वरिष्ठ कथाकार सुभाष नीरव द्वारा की गई मेरे नवीनतम उपन्यास ’गुलाम बादशाह’ की समीक्षा प्रकाशित हुई थी. ’रचनासमय’ और ’वातायन’ के पाठकों के लिए उस समीक्षा को यहां अविकल प्रकाशित कर रहा हूं.
सरकारी विभागों का विद्रूप सच- 'गुलाम-बादशाह'
सुभाष नीरव
'गुलाम बादशाह' सुपरिचित लेखक रूपसिंह चन्देल की नई और सातवीं औपन्यासिक कृति है। पूरे उपन्यास का ताना बाना सरकार के एक विभाग को केन्द्र में रख कर बुना गया है। 'रासुल' नाम का यह विभाग केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार का कोई भी विभाग हो सकता है जहाँ ब्यूरोक्रेट्स को बादशाह और उसके मातहत काम करने वाले लोगों को गुलाम के रूप के चित्रित किया गया है। उच्च पदों पर आसीन अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अपनी बादशाहत के सम्मुख कुछ नहीं समझते और उनसे काम लेने का उनका तरीका ठीक वैसा ही होता है जैसा किसी गुलाम से लिए अपनाया जाता है। अनुभाग अधिकारी, पी.ए., बाबू (क्लर्क), चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अर्थात चपरासी, दफ्तरी और कैजुअल लेबर वर्ग के लोगों को गुलाम के रूप में दर्शाया गया हैं जो अपने उच्च अधिकारी के हर गलत-सही हुक्म का पालन करने के लिए विवश होते हैं। कहने को आठ घंटे की डयूटी होती है लेकिन वे चौबीस घंटों की गुलामी करते हैं। कोई अवकाश उनका अपना नहीं होता, कभी भी किसी भी समय उन्हें आवश्यक कार्य बताकर डयूटी पर हाज़िर होने को आदेश दिया जा सकता है। आम जनता में सरकारी बाबुओं को लेकर जो धारणा व्याप्त है, यह उपन्यास एक मायने में उसे तोड़ता भी है। ये गुलाम कहे जाने वाले लोग जिस भय, आतंक, सन्देह और निराशा के साये में रह कर ऐसे दफ्तरों में काम करते हैं, उसका अन्दाजा बाहर बैठे लोगों को शायद कम ही हो।
उपन्यास में त्रेहन, राणावत, कुमार जैसे धूर्त, भ्रष्ट, अवसरवादी, यौन लालुप अधिकारियों तथा हांडा और नागपाल जैसे उनके चापलूसों के चरित्रों को उनकी कारगुजारियाँ दर्शाते हुए बेनकाब करने का ही प्रयास नहीं किया गया है, अपितु शक्ति और सत्ता का दुरुपयोग ये अपने स्वार्थों के लिए किस प्रकार करते हैं, इसे भी रेखांकित किया गया है। भ्रष्टाचार में लिप्त ऐसे अधिकारियों के अधीनस्थ कार्यरत कर्मचारी न केवल एक मानसिक यंत्रणा में कार्य करने को अभिशप्त होते हैं, बल्कि उनके सिरों पर हर क्षण स्थानान्तरण की तलवार लटकती रहती है। मामूली सी गलती पर दूर दराज के इलाकों में स्थानान्तरण कर देना ऐसे विभागों में एक आम-सी बात है।
कहा जाता है कि भ्रष्टाचार की नदी ऊपर से नीचे की ओर बहती है। लेकिन यह नदी नीचे आते आते सूख जाती है। सारी मलाई उच्च अधिकारी खा जाते हैं या उनके चापलूस। टेंडर और ठेकों के जरिये होने वाली कमाई के हिस्से पर केवल इन्हीं बादशाहों और उनके चापलूसों का अधिकार होता है। निम्न अधिकारी और अधीनस्थ कर्मचारी भय, आतंक, सन्देह और घोर निराशा के माहौल में केवल मानसिक यंत्रणा भोगने और दिन रात अपना दैहिक शोषण करवाने के लिए विवश होते हैं, 'गुलाम-बादशाह' में इसी सच्चाई को लेखक ने पूरी दक्षता से उजागर किया है।
त्रेहन जैसा अधिकारी अपने सर्वेंट क्वाटर में रह रहे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नंदलाल पांडेय को अपने चापलूस मातहत अधिकारी हांडा की मदद से ऐसे जाल में फंसाता है कि वह अपनी बेटी को त्रेहन साहब के घर में सुबह-शाम काम करने के लिए भेजने को मजबूर हो जाता है। एक दिन अवसर पाकर त्रेहन नंदलाल की बेटी का बलात्कार करता है और रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद उसका कुछ नहीं बिगड़ता। यूनियन वाले हो-हल्ला मचाकर चुप हो जाते हैं और पुलिस केस को रफा दफा कर देती है। ऐसे कार्यालयों में स्थितियां इतनी भयावह होती हैं कि सत्ता और शक्ति के नशे में डूबे भ्रष्ट अधिकारियों के आतंक के चलते एक अनुभाग अधिकारी को इसलिए आत्महत्या करनी पड़ती है कि उसे टाइपिंग में हुई मामूली सी त्रुटि के चलते सस्पेंड कर दिया जाता है।
उपन्यास में यूनियन के लोगों के दोगले चरित्रों की तस्वीर पेश करते हुए यह स्पष्ट करने की कोशिश की गई है कि ये भी दूध के धुले नहीं होते और अफ़सरों की भांति ये भी स्वार्थी, लालुप और भ्रष्ट होते हैं। स्थानांतरण करवाने या रुकवाने के सिलसिले में बहुत सी महिला कर्मचारी इनके चंगुल में आकर आर्थिक, मानसिक और दैहिक शोषण का शिकार हो जाती हैं। उपन्यास में प्यारे लाल शर्मा और मुरारी लाल वर्मा यूनियन से जुड़े ऐसे ही दोगले पात्र हैं जिनकी हवस का शिकार अर्चना अवस्थी इसलिए होती है क्योंकि पति की मृत्यु के बाद वह दफ्तर में नौकरी पाना चाहती है। संजना गुप्ता अपने स्थानांतरण को लेकर अधिकारियों के साथ साथ यूनियन के लोगों की कामुक लिप्सा से खुद को बचाते-बचाते एक दिन हार कर नौकरी से इस्तीफा दे देती है।
उपन्यास में सुशान्त और सहाय जैसे पात्र हैं जो अधिकारियों की ज्यादतियों को चुपचाप झेलने को विवश हैं, कुछ करना चाहते हुए भी वे कुछ नहीं कर पाते और अन्त में सहाय नौकरी छोड़ कर वकालत करने की ठान लेता है और सुशान्त को स्थानान्तरण की सजा भोगनी पड़ती है। सुशान्त, सहाय और अमिता (सुशान्त की पत्नी) जैसे सकारात्मक पात्र इस भ्रष्ट व्यवस्था पर झीकते-झल्लाते तो नजर आते हैं, 'लेकिन सब यूं ही चलता है' से आगे नहीं बढ़ पाते। वे परिवर्तन की कामना रखते हुए भी यथास्थिति को ही स्वीकार करते हुए प्रतिरोध से बचते प्रतीत होते हैं। उपन्यास में 'कथा नायक' का अभाव है। कथा में आरंभ से लेकर अन्त मौजूद रहने वाला सुशान्त नामक पात्र कथा नायक का भ्रम तो देता है, पर वास्तव में वह कथा नायक है नहीं। न जाने क्यों लेखक ऐसे संवेदनशील, सकारात्मक केन्द्रीय पात्र के व्यक्तित्व के विकास के प्रति उदासीन दीखता है।
इधर उपन्यास लेखन में 'प्रयोग' को आधुनिकता का अहम हिस्सा माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि आधुनिक वही है जो प्रयोगधर्मी है। साहित्य में ऐसे प्रयोग भाषा, कथ्य, शिल्प या शैली के स्तर पर कई लेखकों ने किए भी हैं। लेकिन रूपसिंह चन्देल उन लेखकों में से हैं जो ऐसे प्रयोगों को रचना की पठनीयता और संप्रेषणीयता के लिए खतरा मानते हुए चली आ रही परम्परागत भाषा और शैली में अपनी बात कहने को अधिक सुविधाजनक मानते हैं। वह एक किस्सा-गो की भांति अपनी बात कहते हुए उपन्यास में पठनीयता का प्रवाह निरंतर बनाये रखने में सफल होते हैं। परन्तु उपन्यास में कई स्थल ऐसे आते है जहां लगता है कि सरकारी विभागों/दफ्तरों की जिन स्थितियों-परिस्थितियों को उपन्यास के पात्रों के माध्यम से उभर कर आना चाहिए था, उसे लेखक स्वयं नरेट करता है अर्थात वह पात्रों को कहने का अधिकार देता प्रतीत नहीं होता। एक छोटा सा दृष्टांत यहाँ उदाहरण के लिए पर्याप्त होगा- 'एक अघोषित नियम यह भी था कि गैलरी में अफसर को आता देख बाबू, सेक्शन अफसर या अन्य छोटे अधिकारियों के लिए आवश्यक था कि वे दीवार के साथ सरक कर चलें, अपनी गति धीमी कर लें और अपने को दीनहीन प्रदर्शित करें। यह वैसी ही स्थिति थी जैसी जमींदारी प्रथा के दौरान हुआ करती थी। जब किसी के सामने से जमींदार की सवारी गुजरती तब किसानों को सड़क छोड़ देनी होती थी। गलती से भी जो किसान ऐसा नहीं करते थे, उनकी पीठ पर जमींदर के सिपाहियों का कोड़ा पड़ता था जबकि रासुल विभाग के अफसर की कलम कोड़े से अधिक मारक थी।' सुशान्त, सहाय, संगीता गुप्ता, अमिता जैसे पात्रों का विकास इस उपन्यास में इसलिए अधिक उभर कर सामने नहीं आ पाता क्योंकि लेखक उनके हिस्से की बातों को स्वयं नरेट करता चलता है। इसलिए ये जीवन्त और सकारात्मक पात्र संभावनाओं के बावजूद अधिक कुछ करते/कहते नहीं दिखाई देते और व्यवस्था के कुचक्र में खुद को फंसा रहने देने में ही अपनी भलाई महसूस करते हैं।
अपने समय, समाज और उससे जुड़े ज्वलंत प्रश्नों के विमर्श को चन्देल अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों में जिस प्रकार उठाते रहे हैं, उसका अभाव इस आलोच्य उपन्यास में स्पष्टत: देखने को मिलता है। बावजूद इसके, यह उपन्यास सरकारी विभागों के एक विद्रूप सच को रेखांकित करने की ईमानदार कोशिश में संलग्न दीखता है और अपनी पठनीयता के चलते पाठको को बांधने की शक्ति रखता भी है।
समीक्षित कृति : गुलाम बादशाह(उपन्यास)
लेखक : रूपसिंह चन्देल
प्रकाशक : आकाश गंगा प्रकाशन
23, अंसारी रोड,
दरियागंज, नयी दिल्ली-2
पृष्ठ : 216, मूल्य : 300 रुपये।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

कविता


रश्मि प्रभा की कविता
माता का अपमान...

सतयुग बीता

हर नारी को सीता बनने की सीख मिली

जनकसुता,राम भार्या

सात फेरों के वचन लिए वन को निकली

होनी का फिर चक्र चला

सीता का अपहरण हुआ

हुई सत्य की जीत

जब रावन का संहार हुआ.


पर साथ साथ ही इसके शंका का समाधान

हुआ हुई सीता की अग्नि-परीक्षा

तब जाकर स्थान मिला !!!???

अनुगामिनी बन लौटी अयोध्या

धोबी न फिर घात

गर्भवती सीता का तब राम ने परित्याग किया .....

बढ़ी लेखिनी वाल्मीकि की

लव और कुश का हुआ

जनम सीता ने दी पूरी

शिक्षा क्षत्रिय कुल का मान किया.....

हुआ यज्ञ अश्वमेध का

लव-कुश ने व्यवधान दिया

सीता ने दे कर परिचय

युद्ध को एक विराम दिया.


पर फिर आई नयी

कसौटी किसके पुत्र हैं ये लव-कुश???

धरती माँ की गोद

समाकर दिया पवित्रता का परिचय.......

अब प्रश्न है ये उठता

क्या सीता ने यही किया?

या दुःख के घने साए में

खुदकुशी को आत्मसात किया???

जहाँ से आई थी सीता

वहीं गयी सब कर रीता!

सीता जैसी बने अगर सब

तो सब जग है बस रीता!

सत्य न देखा कभी किसी ने

सीता को हर पल दफनाया

किया नहीं सम्पूर्ण रामायण

माता का अपमान किया...
******

मैं रश्मि प्रभा , सौभाग्य मेरा कि मैं कवि पन्त की मानस पुत्री श्रीमती सरस्वती प्रसाद की बेटी हूँ और मेरा नामकरण स्वर्गीय सुमित्रा नंदन पन्त ने किया और मेरे नाम के साथ अपनी स्व रचित पंक्तियाँ मेरे नाम की..."सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर-सुन्दर जग-जीवन" , शब्दों की पांडुलिपि मुझे विरासत मे मिली है. अगर शब्दों की धनी मैं ना होती तो मेरा मन, मेरे विचार मेरे अन्दर दम तोड़ देते...मेरा मन जहाँ तक जाता है, मेरे शब्द उसके अभिव्यक्ति बन जाते हैं, यकीनन, ये शब्द ही मेरा सुकून हैं...
इन शब्दों की यात्रा तब से आरम्भ है, जब मन एक उड़ान लेता है और अचानक जीवन अपनी जटिलता , अनगिनत रहस्य लिए पंखों को तोड़ने लगती है.......

जी हाँ ऐसे में पन्त की रचना ही सार्थक होती है-
"वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान "
http://lifeteacheseverything.blogspot.com/

शनिवार, 14 नवंबर 2009

कविता



प्राण शर्मा की तीन कविताएं
(१)
पहले अपनी बोली बोलो
फिर चाहे तुम कुछ भी बोलो
इंग्लिश बोलो, रूसी बोलो
तुर्की बोलो, स्पैनिश बोलो
अरबी बोलो, चीनी बोलो
जर्मन बोलो, डेनिश बोलो
कुछ भी बोलो लेकिन पहले
अपनी माँ के बोली बोलो
अपने बोली माँ के बोली
मीठी- मीठी, प्यारी- प्यारी
अपनी बोली माँ की बोली
हर बोली से न्यारी- न्यारी
अपनी बोली माँ की बोली
अपनी बोली से नफ़रत क्यों
अपनी बोली माँ की बोली
दूजे की बोली में ख़त क्यों
अपनी बोली का सिक्का तुम
दुनिया वालों से मनवाओ
खुद भी मान करो तुम इसका
औरों से भी मान कराओ
माँ बोली के बेटे हो तुम
बेटे का कर्त्तव्य निभाओ
अपनी बोली माँ होती है
क्यों ना सर पर इसे बिठाओ
(२)
क्यों कर हो आज तुम उल्टे तमाम काम
अपने दिलों की तख्तियों पर लिख लो ये कलाम
तुम बोंओंगे बबूल तो होंगे कहाँ से आम
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

कहलाओगे जहान में तबतक फकीर तुम
बन पाओगे कभी नहीं जग में अमीर तुम
जब तक करोगे साफ़ न अपना ज़मीर तुम
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

ये प्रण करो कि खाओगे रिश्वत कभी नहीं
गिरवी रखोगे देश की किस्मत कभी नहीं
बेचोगे अपने देश की इज्ज़त कभी नहीं
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

देखो, तुम्हारे जीने का कुछ ऐसा ढंग हो
अपने वतन के वास्ते सच्ची उमंग हो
मकसद तुम्हारा सिर्फ बुराई से जंग हो
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

उनसे बचो सदा कि जो भटकाते हैं तुम्हे
जो उल्टी--सीधी चाल से फुसलाते हैं तुम्हे
नागिन की तरह चुपके से डस जाते हैं तुम्हे
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

जो क़ौमे एक देश की आपस में लड़ती हैं
कुछ स्वार्थों के वास्ते नित ही झगड़ती हैं
वे कौमें घास- फूस के जैसे ही सड़ती हैं
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

जग में गंवार कौन बना सकता है तुम्हे
बन्दर का नाच कौन नचा सकता है तुम्हें
तुम एक हो तो कौन मिटा सकता है तुम्हे
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

होने न पायें देश में भाषा - विवाद फिर
होने न पायें देश में बलवे - जिहाद फिर
होने न पायें देश में दंगे - फसाद फिर
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ


चलने न पायें देश में नफ़रत की गोलियां
फिरकापरस्ती की बनें हरगिज़ न टोलियाँ
सब शख्स बोलें प्यार की आपस में बोलियाँ
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

सोचो, जरा विचारो कि तुमसे ही देश है
हर गंदगी बुहारो कि तुमसे ही देश है
तुम देश को संवारो कि तुमसे ही देश है
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

मिलकर बजें तुम्हारी यूं हाथों की तालियाँ
जैसे कि झूमती हैं हवाओं में डालियाँ
जैसे कि लहलहाती हैं खेतों में बालियाँ
मेरे वतन के लोगो मुखातिम मैं तुमसे हूँ

(३)
कौवे ने कोयल से पूछा ,हम दोनो तन के काले हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है मुझसे नफ़रत क्यों करता है
कोयल बोली ,सुन ए कौवे ,बेहद शोर मचाता है तू
अपनी बेसुर कांय - कांय से कान सभी के खाता है तू
मैं मीठे सुर में गाती हूँ, हर इक का मन बहलाती हूँ
इसीलिये जग को भाती हूँ,जगवालों का यश पाती हूँ

शेर हिरन से बोला -प्यारे ,हम दोनो वन में रहते हैं
फिर जग तुझ पर क्यों मरता है ,मुझसे नफ़रत क्यों करता है
मृग बोला -ए वन के राजा , तू दहशत को फैलाता है
जो तेरे आगे आता है, तू झट उसको खा जाता है
मस्त कुलांचें मैं भरता हूँ , बच्चों को भी बहलाता हूँ
इसीलिये जग को भाता हूँ , जगवालों का यश पाता हूँ

चूहे ने कुत्ते से पूछा , हम इक घर में ही रहते हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है ,मुझसे नफ़रत क्यों करता है
कुत्ता बोला- सुन रे चूहे, तुझमें सद्व्यवहार नहीं है
हर इक चीज़ कुतरता है तू ,तुझमें शिष्टाचार नहीं है
मैं घर का पहरा देता हूँ ,चोरों से लोहा लेता हूँ
इसीलिये जग को भाता हूँ , जगवालों का यश पाता हूँ

मच्छर बोला परवाने से , हम दोनो भाई जैसे हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है मुझसे नफ़रत क्यों करता है
परवाना बोला मच्छर से , तू क्या जाने त्याग की बातें
रातों में तू सोये हुओं पर करता है छिप- छिप कर घातें
मैं बलिदान किया करता हूँ , जीवन यूँ ही जिया करता हूँ
इसीलिये जग को भाता हूँ, जगवालों का यश पाता हूँ

मगरमच्छ बोला सीपी से , हम दोनो सागर वासी हैं
फिर जग तुझ पर क्यों मरता है,मुझसे नफ़रत क्यों करता है
सीपी बोली- जल के राजा ,तुझमें कोई शर्म नहीं है
हर इक जीव निगलता है तू , तेरा कोई धर्म नहीं है
मैं जग को मोती देती हूँ, बदले में कब कुछ लेती हूँ
इसीलिये जग को भाती हूँ, जगवालों का यश पाती हूँ

आंधी ने पुरवा से पूछा , हम दोनो बहने जैसी हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है , मुझसे नफ़रत क्यों करता है
पुरवा बोली- सुन री आंधी , तू गुस्से में ही रहती है
कैसे हो नुक्सान सभी का , तू इस मंशा में बहती है
मैं मर्यादा में रहती हूँ ,हर इक को सुख पहुंचाती हूँ
इसी लिए जग को भाती हूँ,जगवालों का यश पाती हूँ

कांटे ने इक फूल से पूछा , हम इक डाली के वासी हैं
फिर जग तुझपर क्यों मरता है, मुझसे नफ़रत क्यों करता है
फूल बड़ी नरमी से बोला , तू नाहक ही इतराता है
खूब कसक पैदा करता है,जिसको भी तू चुभ जाता है
मैं हंसता हूँ , मुस्काता हूँ , गंध सभी में बिखराता हूँ
इसीलिये जग को भाता हूँ , जगवालों का यश पाता हूँ
*******
प्राण शर्मा का जन्म १३ जून १९३७ को वजीराबाद (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में. पंजाब विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी). १९५५ से लेखन . फिल्मी गीत गाते-गाते गीत , कविताएं और ग़ज़ले कहनी शुरू कीं.१९६५ से ब्रिटेन में.१९६१ में भाषा विभाग, पटियाला द्वारा आयोजित टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार. १९८२ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार. १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स, लेस्टर द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार.लेख - 'हिन्दी गज़ल बनाम उर्दू गज़ल" पुरवाई पत्रिका और अभिव्यक्ति वेबसाइट पर काफी सराहा गया. शीघ्र यह लेख पुस्तकाकार रूप में प्रकाश्य.२००६ में हिन्दी समिति, लन्दन द्वारा सम्मानित."गज़ल कहता हूं' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित.Coventry CVESEB, UK3, Crakston Close, Stoke Hill Estate,E-mail : pransharma@talktalk.net--

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

समीक्षा



समीक्षा से पहले निवेदन

एक दिन मेरे पास फोन आया कि मुझे जयपुर से श्री राजाराम भादू के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली द्वैमासिक पत्रिका ’संकृति मीमांसा ’ के लिए सम्बोधन पर समीक्षा लिखनी है. भाई कमर मेवाड़ी से बात हुई . उन्होंने भी बताया कि भादू जी मुझसे लिखवाना चाहते हैं. सम्बोधन का जुलाई -सितम्बर २००९ अंक मेरे पास नहीं पहुंचा था. कमर भाई से उसे भेज देने का अनुरोध किया. वैसे पिछ्ले बीस वर्षों से पत्रिका नियमित मुझे मिलती रही है . कभी ही कोई अंक डाक व्यवस्था के कारण नहीं मिला होगा . इस बार भी ऎसा ही हुआ. कमर भाई ने अंक भेज दिया. समीक्षा लिखी गई. भादू जी को भेजने के बाद उनके उत्तर की मैं प्रतीक्षा करने लगा. पर्याप्त समय बीत जाने के बाद मैंने उन्हें समीक्षा मिली या नहीं जानने के लिए फोन किया . ज्ञात हुआ कि समीक्षा तो मिल गई थी लेकिन वह वैसी नहीं लिखी गई जैसी कि वह चाहते थे. उन्होंने उसे पुनः लिख भेजने के लिए कहा जिसे मैंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया. मेरे लिए यह संभव नहीं था. मैंने भादू जी से अनुरोध किया कि वह समीक्षा को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दें और किसी अन्य से लिखवा लें जो पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं/रचनाकारॊं की अलोचना न करे.

रचना समय के पाठकों के लिए प्रस्तुत है वह समीक्षा .

*****

समीक्षा
सम्बोधन - इतिहास रचती पत्रिका
रूपसिंह चन्देल
हिन्दी में ‘सम्बोधन’ एक ऐसी पत्रिका है जो निरंतरता और स्तरीयता का निर्वहन करती हुई अपने जीवन का अर्द्ध शतक पूरा करने के निकट है . इसके संस्थापक - सम्पादक (अब सलाहकार सम्पादक) कमर मेवाड़ी के प्रयास श्लाघनीय और नमनीय हैं . पत्रिका के अनेकों विशेषाकों का गवाह रहा हिन्दी साहित्य समाज इस बात का भी साक्षी है कि पत्रिका ने कभी साहित्यिक राजनीति को प्रश्रय नहीं दिया . हिन्दी में इसे हम अपवाद कह सकते हैं . यह सर्वविदित है कि लघु-पत्रिकाएं हों या व्यावसायिक --- सभी के अपने गुप्त घोषणा-पत्र ओर प्रतिबद्धताएं हैं या रही हैं . लेकिन कमर मेवाड़ी एक मात्र ऐसे सम्पादक हैं जिनकी प्रतिबद्धता केवल रचना रही है . मेरा मानना है कि किसी पत्रिका का स्वरूप न केवल सम्पादक की वैचारिकता , उसके सामाजिक - राजनैतिक आदि सरोकारों को प्रकट करता है , बल्कि वह उसकी वैयक्तिकता को भी उद्घाटित करता है . कमर मेवाड़ी व्यक्ति और सम्पादक - दोनों ही रूपों में प्रशंसनीय हैं . लेकिन मेरा उद्देश्य सम्पादक के गुण-विशेषताओं के साथ ही पत्रिका के जुलाई-सितम्बर , 2009 अंक पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना भी है . इस अंक में विरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्गल का साक्षात्कार , कहानी , कविता , आलेख , गजलें ..... अर्थात् बहुविध सामग्री को प्रस्तुत किया गया है .
चित्रा मुद्गल से बातचीत से पहले कमलेश भट्ट कमल ने उनका संक्षिप्त परिचय दिया है , जिसकी आवश्यकता नहीं थी . बातचीत में चित्रा जी अपने स्वभावनुसार खुलकर बोली हैं . इसने मुझे कभी ‘पश्यंती’ में प्रकाशित उनके आलेख ‘हिन्दी साहित्य का दलाल स्ट्रीट ’ की याद ताजा कर दी . चित्रा जी के पास भाषा की आभिजात्यता है और है मंजा हुआ शिल्प . अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता संबन्धी प्रश्न में वह कहती हैं - ‘‘क्योंकि समाज-सरोकारी अभिव्यक्ति का समूचा संघर्ष , मनुष्यता का हनन करने वाली मनुष्य की ही पाशविक प्रवृत्तियों के विरुद्ध मोर्चा खड़ा करने और मनुष्य के मर्म की शल्य-क्रिया कर उसे जगाने का उपक्रम है . इधर सम-कालीन कथा-साहित्य में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो अनायास लेखकों की सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रति संशय उत्पन्न करता है -- - लेकिन तब क्या किया जाए जब क्रांतिधर्मा लेखक की समाजधर्मी प्रतिबद्धता सहसा देहधर्मी विमर्श में परिवर्तित हो , एकमात्र उसीके इर्द-गिर्द सिमट कर स्वयं को नितांत नई सोच के प्रवक्ता के रूप में साहित्य के इतिहास में दर्ज कराने के प्रलोभन के चलते साहित्य को कोकशास्त्र बनाने की छूट लेने पर उतर आए ? जाहिर है लेखकीय स्वतंत्रता का अर्थ सामाजिक प्रतिबद्धता से विमुख होना नहीं है .’’

इस बातचीत पर केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि चित्रा मुद्गल ने कुशलता और सार्थकता के साथ ऐसे उत्तर दिए हैं कि साक्षात्कर्ता के प्रश्नों की सामान्यता खटकती नहीं है .

पत्रिका की पहली रचनाकार हैं सुजाता जो पंजाबी की धरती से हिन्दी-साहितय को समृद्ध कर रही हैं . उनकी कविताओं की सहजता , जीवन से उनकी संबद्धता और प्रकृति के प्रति उनका आकर्षण उन्हें महत्वपूर्ण बनाता है . ‘दोस्ती’ , ‘एक उदास कुआ ’ , ‘ऐलान ’ , ‘सपने’ , और ‘कलेण्डर और तस्वीर’ के माध्यम से कवयित्री की रचनात्मकता को परखा जा सकता है . ‘प्रसंगवश’ स्तंभ के अंतर्गत डॉ० सूरज पालीवाल साहित्य के माध्यम से समाज , राजनीति आदि की पड़ताल करते हैं . साहित्य समीक्षा पर उनकी टिप्पणी ध्यानाकर्षित करती है . वह कहते हैं - ‘‘कथा समीक्षा की दयनीयता का रोना आम बात हो गई है --- यह हर युग में होता आया है कि अपने समय के रचनाकार अपने आलोचकों से प्रसन्न नहीं रहे . .......फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय का पानी थिर गया है , कुछ अच्छी चीजें सामने आ गई हैं लेकिन आज जो लिखा जा रहा है उसका मूल्यांकन होना बाकी है . समय अपने आप मूल्यांकन करेगा ...... पत्रिका के सम्पादकों को इस दिशा में और अधिक ध्यान से लिखाने और प्रेरित करने की आवश्यकता है .’’

डॉ० पालीवाल की बात सही हो सकती है , लेकिन उन्हें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि आज के समीक्षक - आलोचक कल जैसे नहीं रहे . आज के आलोचक- समीक्षक और सम्पादक सत्ता और सुविधा के पीछे भागने लगे हैं -- एक-दो को छोड़कर . बहुत-सा अच्छा साहित्य कबाड़ के नीचे दबा दिया जाता है . स्तरहीन रचनाओं की धुंआधार चर्चा की जाती है . चर्चा के लिए तंत्र-मंत्र और छद्म तरीकों का सहारा लिया जाता है . ( हाल में एक स्वनामधन्य लेखक ने ऎसा ही किया था .) सम्पादक अपने चहेते लेखक की एक पुस्तक की एक ही अंक में कई समीक्षाएं प्रकाशित करते हैं. जब अच्छी पुस्तकों पर चर्चा ही न होगी तब उसके मूल्यांकन की बात करना थोथे तर्क के अतिरिक्त कुछ नहीं है .

समीक्ष्य अंक में विष्णु प्रभाकर पर वेदव्यास का बड़े व्यक्तित्व पर छोटा आलेख है . आलेखों में मूलचंद सोनकर का आलेख - ‘क्या दलित विमर्श सामाजिक परिवर्तन की बात करता है ?’ एक उल्लेखनीय आलेख है . लेखक के तर्क ठोस और वियारणीय हैं . उनका यह कथन - ‘‘अपने तमाम वैचारिक प्रतिपादन , धारदार संघर्ष और दलितों की समस्या के समाधान के लिए (यद्यपि आंशिक ही सही ) संवैधानिक प्रावधान करने वाले डॉ० आम्बेडकर अंततोगत्वा बौद्धधर्म में दलितों का उद्धार क्यों देखने लगे ? मुझ जैसे धर्म-निरपेक्ष व्यक्ति को यह प्रश्न बहुत परेशान करता रहता है . लेकिन समस्याओं का अलौकिक समाधान हो ही नहीं सकता और न धर्म से तार्किक नैतिक साहस ही पैदा किया जा सकता है . - - - मुझे लगता है कि डॉ० आम्बेडकर द्वारा बौद्धधर्म अपनाना एक थके हुए योद्धा का विश्राम था .’’ महत्वपूर्ण है .

मिथलेश्वर का आत्मकथांश सम्बोधन के स्वस्थ शरीर में कोढ़ की भांति है . लेखक को विश्व-साहित्य की कुछ आत्मकथाएं अवश्य पढ़नी चाहिए थीं और यदि वह संभव न था तो डॉ० हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा ही पढ़ लेते . वैसे मैं यह मानने को तैयार नहीं कि उन्होंने उसे पढ़ा नहीं होगा . लेखक जब जिद के तहत लिखता है तब उससे अच्छे साहित्य की अपेक्षा नहीं की जा सकती , लेकिन उसे यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि वह पाठकों को दे क्या रहा है और साहित्य में वह कहां खड़ा होगा . पिछले दिनों भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनके उपन्यास ‘सुरंग में सुबह ’ ने यह सिद्ध कर दिया था कि लेखन के प्रति अब वह गंभीर नहीं रहे .

डॉ० श्री भगवान सिंह ने ‘स्त्री मुक्ति विमर्श और महादेवी वर्मा का गद्य साहित्य ’ विषय को सार्थकतापूर्वक प्रतिपादित किया है .

पत्रिका की अन्य उल्लखनीय रचनाओं में हुस्न तबस्सुम ‘निहां’ की कहानी ‘भीतर की बात है ’ है , जो ग्राम्य जीवन को खूबसूरती से उद्घाटित करती है . लेकिन नसरीन बानू की कहानी ‘छौंक की खुशबू ’ बड़े घटनाक्रम को छोटे कलेवर में समेटने में सक्षम नहीं हो पायी . लेखिका ने जिस विषय को विवेचित करना चाहा है वह न केवल मार्मिक है , बल्कि सामाजिक विद्रूपता और विषमता का नग्न स्वरूप प्रकट करता है , लेकिन उसकी व्यापकता लेखिका से एक उपन्यास की अपेक्षा करती है . संभव है यह कहानी लेखिका के आगामी उपन्यास की प्रस्तावना हो ! इसके अतिरिक्त प्रो० फूलचंद मानव , मनोज सोनकर , सुरेश उजाला , मधुसूदन पांण्ड्या और रामकुमार आत्रेय की कविताएं , डॉ० मनाजि़र आशिक हरगानवी , शकूर अनवर , और शेख अब्दुल हमीद की गजलें पठनीय हैं . त्रिलोकी सिंह ठकुरेला की लघुकथा ‘दोहरा चरित्र ’ भी ध्यानाकर्षित करती है .

कुल मिलाकर सम्बोधन’ का यह अंक एक - दो रचनाओं को अपवाद स्वरूप छोड़कर अपनी परम्परा का निर्वहण करता है और महत्वपूर्ण है , जिसके लिए कमर मेवाड़ी की प्रशंसा की जानी चाहिए .

‘सम्बोधन
’सलाहकार सम्पादक - कमर मेवाड़ी
कांकरोली- 313324
जिला - राजसमंद
राजस्थान

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

कविता



निशा भोंसले की कविताएं

भूख

भूख की आग से
तेज होती है
जंगल की आग

भूख की आग
जिन्दगी जलाती है

और

जंगल की आग
सभ्यता को।
****
घरौंदा
लड़की
बनाती है
घरौंदा रेत का
समुंदर के किनारे
बुनती है सपने
सपने सुनहरे भविष्य के

घरौंदे के साथ
चाहती है समेटना
रेत को
अपनी मुठ्ठियों में
बांधती है सपने को
घरौंदे के साथ

टूटता है बारबार
घरौंदा
अपने आकार से

लड़की सोचती है
रेत/घरौंदा और
सपनों के बारे में
टूटते है क्यूं ये सभी
बारबार जिन्दगी में।
****


गठरी में बंधी साडि़यों के अनेक रंग

वह औरत
कपड़ों का गठ्ठा लिये
रिक्शे में
घूमती है/शहर के
गली मोहल्ले में
देती है दस्तक
घरों के दरवाजे पर
मना करने के बावजूद
दिखाती है गठरी खोलकर
साडि़यां

कश्मीरी सिल्क, कोसा सिल्क,
बंगाल और साउथ इंडिया की

बैठ जाती है
घर की चैखट पर
बताती रहती है
साडि़यों के बारे में

कभी थक जाती है
धूप में चलकर
कभी उसके कपड़े
गीले हो जाते है पसीने से
कभी उसका गला
सूख जाता है प्यास से

वह फिर भी रुकती नहीं
निकल जाता है/रिक्शावाला
कहीं उससे आगे
वह फिर से तेज चलती है
देती है आवाज
गली मोहल्ले में

शाम को लौटती है/घर
थकी हारी
गठरी को लादकर

रात में
जब वह सोती है
झोपड़ी में
मिट्टी के फर्श पर निढाल

उसकी फटी साड़ी में
सिले होते हैं
अनेक साडि़यों के टुकड़े
जिसमें होते हैं
गठरी में बंधी साडि़यों के
अनेक रंग।
****
निशा भोसले


रायपुर (छत्तीसगढ़) में जन्मी निशा भोसले ने समाजशास्त्र में एम.ए. किया है.
*अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित.
*उदंती डाट काम, लोकगंगा, एवं ई पत्रिका में सक्रिय।

संपर्क : शुभम विहार कालोनी
बिलासपुर छ0ग0