बुधवार, 25 जून 2008

कविता






तेजिन्दर शर्मा की तीन कविताएं

दोहरा नागरिक

मुझसे अपना होने के मांगता है दाम
वो, जो कभी मेरा अपना था.
समझता है कमज़ोरी, दिल की मेरे
भावनाओं का मेरी उडाता है मज़ाक
कहता है सरे आम
चाहे रहो किसी और के हो कर भी
बस चुकाओ मेरे दाम
और लिखदो अपने नाम के साथ मेरा नाम !
मेरे बदन से नहीं आयेगी उसे
किसी दूसरे के शरीर की गंध
उसे नहीं रखना है मुझे
करके अपनी सांसों में बंद
कद्र ओहदे की करे, इंसां को नहीं जाने
मुझ से अपनी ज़ुबां में वो कभी न बात करे
उसे बस रहता है मेरी पूंजी से ही काम
फिर चाहे मैं लिख दूं उसके नाम के साथ अपना नाम !
अपना बनाने की भी रखता है शर्तें
भूल जाता है प्यार की पहली शर्त
कि प्यार शर्तों पर नहीं किया जाता
मेरे हर काम पर लगेगी पाबंदी
मुझे सदा होंगी अपनी हदें पहचाननी
कभी उससे नहीं रखनी होगी कोई अपेक्षा
हर वक्त पीना होगा बेरूख़ी का कडवा जाम
तभी लिख पाऊंगा उसके नाम के साथ अपना नाम !



आजकल शेरी ब्लेयर को अच्छी नींद आती है
आजकल शेरी ब्लेयर को, अच्छी नींद आती है खूब आराम होता है,
क्योंकि; टोनी ब्लेयर के सपनों में तो सद्दाम होता है.
अब उसे सौत का कोई डर नहीं न ही किसी गर्ल फ्रेन्ड का लफडा है
उसके पति का सारा समय जॉर्ज बुश के साथ तमाम होता है.
क्योंकि टोनी ब्लेयर के सपनों में तो सद्दाम होता हैं.
कभी कभी शेरी ब्लेयर होती है हैरान,
उसका पति तो प्रधानमन्त्री था ब्रिटेन का
फिर अमरीका के विदेश मन्त्री जैसा क्यों काम होता है
क्योंकि टोनी ब्लेयर के सपनों में तो सद्दाम होता हैं.
टोनी ब्लेयर बात बात में झाडी में क्यों घुस जाता है
बुश को मिलने का बहाना ढूंढ अटलांटिक पार कर जाता है
सुबह शाम बस उसको ही सलाम होता है
क्योंकि टोनी ब्लेयर के सपनों में तो सद्दाम होता हैं.
हिरोशिमा में बम्ब बरसाने वाला भी सद्दाम था
विएटनाम में मुंह की खाने वाला भी सद्दाम था
तानाशाहों को शह देने वाला भी सद्दाम था
झूठ बोलने वालों का बस यही अंजाम होता है
क्योंकि टोनी ब्लेयर के सपनों में तो सद्दाम होता हैं.
भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई से क्या डरना
इनकी मार से तो आम जनता को ही है
मरना राजनेता को गरीब की समस्याओं से
भला क्या काम होता है
क्योंकि टोनी ब्लेयर के सपनों में तो सद्दाम होता हैं.
टोनी ब्लेयर उठो ब्रिटेन की अस्मिता को पहचानो
अपने देश के इतिहास को जानो यहां सूर्य कभी अस्त नहीं होता था
क्या सूर्यास्त का अर्थ गहरी अंधेरी शाम होता है?
क्योंकि टोनी ब्लेयर के सपनों में तो सद्दाम होता हैं.





क्रूरता वीरता नहीं होती.


इक धमाके से
शरीर जो उधडे
पटरियों पर बहा
लहू जिनका
हाथ में जाके जिनकी
आंख गिरी
होंठ थे उनके जैसे
यह कह्ते
क्रूरता वीरता नहीं होती.
पति मरा जो किसी का
वो भाई भी था पुत्र भी
वो दोस्त भी था, बोझ
रिश्तों का उठाए हुए
मौत ने उसके क्ई
रिश्तों को सुला डाला
रिश्तों ने आसमां पे लिख डाला
क्रूरता वीरता नहीं होती.
कोई डाक्टर मरा
वकील कोई
बम धमाके न सुनते बात
न दलील कोई
काम कैसा कोई करे
तमाम होता है
कल तलक सबको
जो हंसाता था,
हर कोई उसके लिये रोता है
वो ज्वालामुखी* भी सोता है।
पेशे सारे ये बात माने हैं
क्रूरता वीरता नहीं होती.
*कवि श्याम ज्वालामुखी।


परिवार के साथ तेजिन्दर शर्मा

जन्म : 21 अक्टूबर 1952 को पंजाब के शहर जगरांवशिक्षा : दिल्ली विश्विद्यालय से बी.ए. (ऑनर्स) अंग्रेज़ी, एवं एम.ए. अंग्रेज़ी, कम्पयूटर कार्य में डिप्लोमा ।प्रकाशित कृतियाँ : काला सागर (1990) ढिबरी टाईट (1994), देह की कीमत (1999) यह क्या हो गया ! (2003), बेघर आंखें (2007) -सभी कहानी संग्रह। ये घर तुम्हारा है... (2007 - कविता एवं ग़ज़ल संग्रह) ढिबरी टाइट नाम से पंजाबी, इँटों का जंगल नाम से उर्दू तथा पासपोर्ट का रंगहरू नाम से नेपाली में भी उनकी अनूदित कहानियों के संग्रह प्रकाशित हुए हैं। अंग्रेज़ी में : 1. Black & White (biography of a banker – 2007), 2. Lord Byron - Don Juan (1976), 3. John Keats - The Two Hyperions (1977)कथा (यू.के.) के माध्यम से लंदन में निरंतर कथा गोष्ठियों, कार्यशालाओं एवं साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन । लंदन में कहानी मंचन की शुरू‏आत वापसी से की। लंदन एवं बेज़िंगस्टोक में, अहिंदीभाषी कलाकारों को लेकर एक हिंदी नाटक हनीमून का सफल निर्देशन एवं मंचन ।74-A, Palmerston RoadHarrow & WealdstoneMiddlesex UKTelephone: 020-8930-7778 / 020-8861-0923.E-mail: kahanikar@gmail.com , mailto:kathauk@hotmail.com

रविवार, 15 जून 2008

पुस्तक-चर्चा

पुस्तक: हिडिम्ब(उपन्यास)
लेखक: एस.आर.हरनोट,
प्रकाशक–आधार प्रकाशन प्रा0लि0,
एस.सी.एफ. 267, सेक्टर–16,
पंचकूला–134 113 (हरियाणा) मूल्य 250 रूपये।


हिडिम्ब : क्लासिक आख्यानों की सभी खूबियों से परिपूर्ण एक दुर्लभ उपन्यास
श्रीनिवास श्रीकान्त
एस. आर. हरनोट का उपन्यास हिडिम्ब पर्वतांचल के एक भूखण्ड, वहां की एथनिक संस्कृति और उसकी समकालीन सामाजिक वस्तुस्थिति को रेखांकित करता एक ऐसा यथार्थपरक आख्यान है जो देहात के उत्पीडि़त आदमी की जैवी कथा और उसके समग्र परिवेश का एक सही लोखाचित्र के फ्रेम में प्रस्तुत करता है। भाषा और भाव के स्तर पर उलटफेर से गुरेज़ करता हुआ, किन्तु पहाड़ी देहात के ज्वलंत जातीय प्रश्नों को उनकी पूरी पूरी तफ़सीलों के साथ उकेरता हुआ। कहानी यों चलती है जैसे कोई सिनेमेटोग्राफ हो। लेखक खुद भी एक क्रिएटिव छायाकार है इसलिए सम्भवत: उसने हिडिम्ब की कहानी को एक छाया चित्रकार की तरह ही प्रस्तुत किया है। अपने गद्य को सजीव लैण्डस्केपों में बदलता हुआ। इस प्रकार के कथा शिल्प में पहली बार यह महसूस हुआ कि यथार्थ के मूल तत्व को उसमे किस तरह महफूज रखा जा सकता है। ऐसा गल्पित और कल्पित यथार्थ एक साथ अर्थमय भी है और अपने परिप्रेक्ष्य में भव्य भी।

उपन्यासकार ने सबसे पहले अपने पाठक को मूल कथा-चरित्रों का परिचय दिया है। इस तरह के परिचय अक्सर पुराने क्लासिक उपन्यासों में देखे जा सकते हैं। हिडिम्ब में ऐसी पूर्व-प्रस्तुतियां आख्यान के लिये भूमिका का निर्माण करती हैं ताकि लक्षित पाठक उसकी सराहना के लिए उत्प्रेरित हो सके। ऐसे पूर्वविवरण कथा के लिए क्षुधाबोधक का काम करते हैं जिन्हें लेखक ने डूबकर लिखा है। ये वस्तुपरक नहीं, चरित्रांकन करते हुए आत्मीय विवरण हैं, जिससे कथा रूपी नाटक का प्रांगण तैयार होता है। विक्टर ह्यूगो से लेकर पास्तरनाक तक के अनेक उपन्यासकारों में यह परिपाटी कहीं कथारम्भ में तो कहीं कहीं बीच में और अन्त में भी देखने को मिलती है ताकि कथाविशेष के परिवेश की औपचारिक जानकारी मिल सके। कथा का यह एक ऐसा लचीला खोल है जिसमें वह न सिर्फ़ अपनी चाल में तल्लीन एक केंचुए की तरह आगे सरकने लगती है बल्कि अपने घटना क्रियागत परिमाण को भी मर्यादित करती चलती है।
उपन्यासकार ने शावणू नड़, उसकी घरवाली सूरमादेई, बेटी सूमा और बेटे कांसीराम की दुनिया को अपनी कलम से टटोला है। यह दुनिया है विषाद, अन्याय और अभाव को वहन करती दुनिया जो कहानी के अन्त तक- जब कि नड़ अकेला रह जाता है–उसका पीछा नहीं छोड़ती। बकौल लेखक नड़ वह जाति है ’जिसकी ज़रूरत क्षेत्र के लोगों को कभी सात, कभी बारह तो कभी बीस तीस बरस बाद काहिका के लिए पड़ती है।’ काहिका एक नरबलि की अति प्राचीन परम्परा है। ’नड़ इस उत्सव का मुख्य पात्र होता’ है। ’लेकिन जब उसकी ज़रूरत नहीं होती वह अछूत, चाण्डाल बन जाता’ है। उत्सव के समय ’वह ब्राह्मण हो जाता है’–देवता, पुजारी, गूर सब उत्सव की शोभायात्रा में उसका अनुगमन करते हैं। अन्यथा ’गांव–बेड़ के पिछवाड़े का’ वह ’एक आवारा कुत्ता’ है। ’पूजा पाठ करते हुए’ यदि ’ब्राह्मण’ उसे देख ले तो उसे’ गालियां देने’ लगे। नड़ परिवार विशेष में जन्म लेने के कारण उसे काहिका को एक बड़े दण्ड के रूप में भोगना ही है। उपन्यासकार ने उक्त देवोत्सव को रेशारेशा बयान किया है ताकि पाठक यह जान सकें कि किस तरह पहाड़ी समाज में आज भी ऐसे मुकाम हैं जहां आदमी से खुद उसके सामाजिकों द्वारा एक बलिपशु का-सा बर्ताव किया जाता है। उसके सभी विवरण इस बारे में प्रामाणिक हैं जो किसी सम्वेदनशील मन में सहज ही रूढि़यों के खिलाफ़ आक्रोश और खण्डन-भाव को संचरित कर सकते हैं।

काहिका उत्सव में उसके पिता की बलि के बाद शावणू को जमीन का एक टुकड़ा विरासत में मिला था। तब वह बच्चा ही था। कहानी में काहिका प्रकरण को लेखक ने फ्लैशबैक में लेकर अपने इस मुख्यपात्र के अन्दर के बनाव और बदलाव के लिए कथा के वर्तमान का आधार तैयार किया है। पश्चदर्शन की इस शैली से कथा के निकट वर्तमान के साथ-साथ अतीत को समोकर उसने एक साथ दो आयामों को खोजा है ताकि पूरी कथा एक लड़ी में पिरोयी जा सके। उपन्यासकार ने नदी किनारे की उसकी कृषि भूमि का हवाला भी रुचिकर ढंग से दिया है। यह महज़ लैण्डस्केपिंग नहीं, परिवेश और संस्कृति का मानवीय तत्वबोध भी उसमें समाहित है। जैसे–

’ज़मीन काफ़ी उपजाऊ थी। उम्दा किस्म की मिट्टी से सनी हुई।.... नीचे थोड़ी दूर एक पौराणिक नदी बहती थी।’

यहां पौराणिक नदी का होना यह साबित करता है कि वह एक प्रसिद्ध प्राचीन नदी होगी जिसका प्रसंग पुराणों में मिलता है। आगे–

’वहां कुदरत का नज़ारा बड़ा ही अद्भुत था। एकदम विलक्षण। विचित्रता अनूठी थी। काव्य के नौ रसों में से एक। पहाड़ी ढलान से नीचे उतरते खेत, मानो छन्दों में पिरोये हुए हों। दूर से देखने पर वह एक छोटा सा टापू लगता था।’

एक बेजोड़ सौन्दर्य बोध जिसकी उर्ध्व रेखाएं पूरे भूखण्ड को कथा की समानधर्मिता में ब्लेण्ड करती चलती है। प्रयोग काव्यात्मक है और चित्रात्मक भी, जो अन्तत: कथा के विकास और आने वाले बदलावों तक स्थायी रूप से ज़हन में बना रहता है। परिवेश के सामाजिक सांस्कृतिक तत्व को जानने के लिए निम्न उद्धरण सटीक होगा–
’ज़मीन के आगे एक बड़ा चरांद था जिसमें घाटी के कई गावों के पशु और भेड़-बकरियां चरा करते थे...बहुत पहले न कोई चरवाहा होता, न गवाला।...(पशु) दिनभर खूब चरते...शाम होने लगती तो खुद अपने अपने घरों को लौट आते...(लोगों) ने बाघों को भी (कई बार) नदी किनारे पशुओं के साथ सोते-जागते देखा था।’

उपन्यासकार ने यह चित्र खींच कर घाटी में व्याप्त पहले वक्तों की शान्ति को चित्रित किया है। एक ऐसा माहौल जहां बाघ-बकरी एक साथ रहते हैं।

शावणू की ज़मीन पर दौरे पर आये मंत्री की नज़र पड़ती है। यहां कथाकार ने लोलुप मंत्री का एक असुन्दर किन्तु कलात्मक व्यंगचित्र बनाया है। तन्जिया लहज़ा कहानी में उपयुक्त आवेग का संयोजन करता चलता है। एक छोटी सी बानगी–

’ज़मीन मंत्री के लिए जिस्मानी हवस की तरह हो गयी थी। वह जिस मकसद से दौरे पर आया था उसे भूल गया। सामने थी तो बस वही ज़मीन।...उसकी आंखों में वह नड़ परिवार और उसका घर चुभता चला गया।’

इस तरह की झांकियां आगे आने वाले हालात का न सिर्फ़ संकेत देती हैं बल्कि पाठक के रुझान का भी उद्दीपन करती हैं। यहां कहानी की आगामी लीक को लेखक ने बखूबी स्पष्ट कर दिया है। मंत्री के काल्पनिक प्रोजेक्शन और ज़मीन को लेकर उसकी महत्वाकांक्षाएं उसके लचर चरित्र को उघाड़ कर सामने रख देता है। हिडिम्ब की कहानी में जगह जगह रूपकों की रचना हुई है जो स्थिति विशेष की बेहतरीन ढंग से तजु‍र्मानी करते हैं। मंत्री के दरबार में ज़मीन के सौदे के लिए शावणू की हाजि़री वाला प्रसंग सटीक ढंग से रूपक में बांधा है। जैसे–

’मंत्री ने उसे भेड़िए की आंख से देखा। सिर से पांव तक...बाहर बंधा बकरा मिमियाया था।’

उपयु‍र्क्त रूपक को और ज्यादा सार्थक, उत्तेजक और अन्याय का द्योतक बनाती निम्न पंक्तियां स्थिति को संकेतात्मक रूप से सम्वेदनशील बना जाती हैं–
’शावणू ने....एक सरसरी नज़र कमरे की दीवारों पर डाली। सामने गांधी जी की फोटो टंगी थी। उस पर इतनी धूल और जाले जम गए थे कि पहचानना कठिन था।’..

मंत्री के साथ शावणू का साक्षात्कार, डाक बंगले में मंत्री का दारू पीना और ज़मीन बेचने में शावणू की साफ इन्कारी एक दलित के अन्दर की चिनगारी और नागवार हालात को बखूबी बयान करते हैं। उक्त दृश्य में बकरे का फिर वही रूपक स्थिति का कुछ इस तरह समाहार करता दिखायी देता है––

’बकरे के पास पहुंचकर शावणू के पैर अनायास ही रुक गये। उसे दया भरी दृष्टि से देखा। फिर आरपार घाटियों की तरफ। अनुमान लगाया होगा कि सांझ और बकरे की जिन्दगी में कितना फासला शेष रह गया है।....उस समय उसे अपने और बकरे में कुछ अधिक फर्क न लगा।’

फर्क था तो बस इतना कि बकरा शीघ्र ही शाम को मंत्री और उसके परिकरों की पार्टी के लिए जिबह होने वाला था जबकि शावणू को इन्तजा़र था उस दुखद घड़ी का जब मंत्री राजस्व के सेवादारों से मिलकर किसी न किसी प्रकार उसकी पुश्तैनी ज़मीन पर काबिज़ हो जाएगा। उस ज़मीन पर, जो अब तक उसे आजीविका देती रही थी। अपनी इस चाह को पूरा करने के लिये मंत्री स्थानीय तत्वों को उपयोग में लाता है। इनमें मुख्य हैं पंचायत का पूर्व प्रधान, शराब का ठेकेदार और डिपो का सेक्रेटरी। मंत्री के ये जीहजूरिये उसकी इच्छाओं का पूरा ध्यान रखते हैं। उसे खुश करने के लिये वे किसी से भी बदतमीज़ी पर आमादा हो सकते हैं। ’शावणू जानता’ है ’कि वे तीनों उस मंत्री के खासमखास हैं’ और उनके फैलाए जाल में ’कोई भी भला आदमी फंस सकता है।’ लेखक ने इन्हें लार टपकाते कुत्तों की संज्ञा दी है। ये लोग ज़मीन के मालिक शावणू पर हर तरह का दवाब डालते हैं मगर उसकी बीवी कड़ा रुख अपनाती है और उन्हें खदेड़ने के लिए ’विकट और विराट रूप’ भी धारण कर लेती है।

हिडिम्ब में न सिर्फ़ नड़ परिवार और उससे जुड़े प्रसंगों की कहानी कही गयी है बल्कि घाटी में आ रहे नये बदलावों की ओर भी इशारा किया गया है। यहां ’कुछ (लोग) चरस-भांग और विदेशी नशा बेचकर तो कुछ देवदार जैसी बेशकीमती लकड़ी की तस्करी करके’ मालामाल हुए हैं। आसपास के जनपदों पर सामाजिक टीका-टिप्पणी और व्याख्या उपन्यास को एक वचनबद्ध कृति का दर्जा देती है और बीच बीच में दिखायी देते काले स्पॉट पाठक को इस बात का भान करा देते हैं कि विकास के नाम पर पर्वतांचल का आदमी किस तरह अपने ही घर द्वार पर शोषक तत्व का बन्धक बना है।

शोभा लुहार ने इस कहानी में एक चरित्रशाली ग्रामीण दस्तकार की भूमिका निभाई है। वह वयोवृद्ध है। अपने से काफ़ी कम उम्र के शावणू से उसकी अभिन्न मित्रता है। दोनों जब-जब भी कहानी में एक साथ नज़र आये हैं कहानी को एक गम्भीर और अर्थमय वातावरण दे जाते हैं। नायक के संकटग्रस्त जीवन में कहीं इन्सानी उच्चता है तो वह यहीं है, शोभा की दोस्ती में। ’जैसे-जैसे उम्र ढलती गई, लुहार का काम पीछे छूटता रहा’। शोभा के बच्चों ने भी पुश्तैनी काम नहीं किया। जिससे इस वयोवृद्ध दस्तकार को अपना ’आरन बन्द करना पड़ा’। जाति-वर्ग के लिहाज़ से यद्यपि शोभा लोहार शावणू से श्रेष्ठ है फिर भी शावणू नड़ को वह पूरा सम्मान देता है। एक भेंट में उसको उसने ’मंजरी पर बैठने के लिए (भी) कहा था’।

उपन्यासकार ने इन पात्रों के मध्यम से जातिवाद पर करारी टिप्पणी की है। साथ यह भी दर्शाया है कि नये सामाजिक बदलाव ने किस प्रकार पारम्परिक दस्तकारी का खात्मा किया है। उसके एवज़ कोई दूसरा सम्मानजनक आर्थिक विकल्प भी नहीं दिया। यह है एक नये और खतरनाक संक्रमण की जीती-जागती तसवीर। पूरा हिडिम्ब मानवीय त्रासद की एक अत्यन्त दर्द भरी कहानी है जिसमें मानव निर्मित अवरोध प्रकृतिस्थ भूखण्ड को एकाएक क्षतिग्रस्त कर देते हैं। बस एक सपना है जो मरीचिका की तरह आगे से आगे सरकता जाता है। प्रलयान्त मोहभंग की स्थिति तक।

आंचलिक होते हुए भी यह उपन्यास क्लासिक आख्यानों की सभी खूबियों से परिपूर्ण है। यही वे प्रसंग हैं जो हमारे समकालीन विघटन को यथार्थ के धरातल पर प्रस्तुत करते हैं। मुसलसल उदासीनता और अंधेरा छाया है इस कहानी पर। घटित से उभरता हुआ उपेक्षित मानव जीव्य। पर्वतीय घाटी का कड़वा सच। प्रकृति का बेहिसाब दोहन, पर्यावरण में आदमी की दखलन्दाजी, नशीले पदार्थों की तस्करी इस उपन्यास के कुछ ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो हमारी आज की इन्सानी दुनिया के बदरूप मटियालेपन को उभार कर सामने लाते हैं।

घाटी को नशानोशी और उससे जुड़े काले व्यापार ने बुरी तरह अपनी गिरिफ्त में कस रखा है। स्थानीय दलाल/ठेकेदार इस काम के लिए ग़रीब और दलित परिवार के बच्चों को बूटलैगर बनाकर खुलेआम अपना धन्धा चला रहे हैं। बच्चे, जिनकी उम्र स्कूल जाने की थी, वे माल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने पर विवश किए जाते हैं। ऐसे माहौल में नशे के वे भी शिकार हुए हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण हैं खुद शोभा लोहार और शावणू नड़ के बच्चे। इन दर्दनाक स्थितियों की दुश्वारियों में खोए एक दूसरे की पारस्परिकता से बंधे दोनों मित्रों के सरोकार एक साथ अलग-अलग स्तरों पर कहानी को आगे बढ़ाते चलते हैं। जहां मंत्री और ज़मीन का किस्सा खत्म हुआ वहां शोभा की करुण कहानी शुरू हो जाती है। शोभा दुखी है अपने बच्चों के कारण। छोटा विदेशी नशे का शिकार हुआ जबकि बड़ा दारू-भांग पीता है। दुख की विशेष मन:स्थिति में शोभा की भावभंगिमा हृदय को छूने वाली है। जैसे कि–

’कोई देखता तो जानता कि उम्र के इस पड़ाव पर बैठे शोभा के दर्द कितने तीखे और गहरे थे। जिसने अपनी टोपी की ओट में बरसों से इज्ज़त-परतीत छिपा-बचा के रखी, बुढ़ापे में किस तरह जाती रही।’

’शोभा ने गीली आंखों से शावणू की तरफ देखा था। दर्दीली नज़रों का स्पर्श शावणू को भीतर तक बींध गया था। वह जानता था कि यह दर्द अकेले शोभा का नहीं है। इस घाटी के गावों में न जाने कितने बुजुर्ग होंगे जो अपने घर में पराए की तरह दिन काट रहे थे।’

शोभा और शावणू की आपसी हमदर्दी और अपने-अपने दुखों के विनिमय से भरी यह दोस्ताना जुगलबन्दी कथा के अन्त तक उपन्यास को एक ऐसा गाढ़ा रंग देती है जो इन्सानी ज़ात और उसकी नैतिकता के समूल विखण्डन की ओर इशारा करता है। इन दोनों के दुख भरे संवाद हिडिम्ब की कहानी के अभिन्न अंग है। उनके दुख में आदमी नहीं, जानवर भी शिरकत करते दिखाये गये हैं। एक उदाहरण –

’दोनों मेमने जो बड़ी देर से आंगन में उछल-कूद कर रहे थे, शोभा के पास आकर सो गए। कुत्ते की भी जुगाली खत्म हो गई थी। वह दुम हिलाता आया और शोभा से सट कर बैठ गया। आंखें उसकी तरफ थीं। भीगी-भीगी हुई सी।’

सहसा यह वृत्त चेखव के आयोना पोतेपोव और उसके गमज़दा घोड़े की याद ताज़ा कर जाता है। आदमी और जानवर के बीच का अनन्य जुड़ाव दर्शनीय है। लेखक के पास सजाने के लिए कोई अलंकार न सही वह ऐसे ही मार्मिक दृश्यों से सहज अलंकरण का काम अपने गल्प में अन्यत्र भी लेता है।

शावणू के बेटे कांसी की मौत भी ड्रग माफिया की वजह से होती है। एक साजिश के तहत ठेकेदार और प्रधान द्वारा उसे खाने के लिए ज़हर मिला प्रसाद दिया जाता है ताकि वे मंत्री को ज़मीन न देने वाले नड़ परिवार से बदला ले सकें। वे कांसी की हत्या ही नहीं करते, उसकी ’लाश को भांग के नशे में बर्बतापूर्ण लातों-घूसों से’ मार कर अपनी घृणित भावना की पूर्ति भी करते हैं। उनकी इस जाति संहारक साजि़श में कहीं स्कूल का नशेड़ी मास्टर भी शामिल है। मास्टर जो अन्यथा समाज में एक आदर्श रुतबा रखता है। लेखक ने यहां परोक्ष रूप से एक साथ दो सामाजिक संस्थानों और उनके संचालकों पर ज़ोरदार प्रहार किया है। उसने कांसी की दर्दनाक मौत के बाद स्कूल के आसपास के वातावरण को भी उदासीन कर दिया है। मानो प्रकृति भी उस मौत पर शोक मना रही हो––

’स्कूल की छत पर बैठा कौऔं का दल उड़ गया। वे कई पल कर्कश आवाज़ करते रहे। उनकी करकराहट किसी अनहोनी को कह रही थी। कोई उनकी भाखा जानता तो देखता विद्याघर में आज कितना अनर्थ हुआ था ?......’
’.....वहां ऐसा कौन था जो उनकी भाखा सुनता। थोड़ी देर बाद पता नहीं वे कहां चले गये। वहां जो कुछ घटा उसका डर पूरे मैदान में पसर गया। न हवा चल रही थी। न कोई कौआ या चिडि़या ही कहीं चहचहा रही थी।’

ऐसे विवरण एपिक तत्वों से परिपूर्ण हैं। हूबहू प्रेमचन्दीय गल्प जैसी सरल और इन्सान को छू सकने वाली सहज भावना से ओतप्रोत। इस कथा प्रकरण के अन्त में ’घास काटती’ हुई औरत द्वारा ’भियाणी नायिका का’ यह गीत पाठक को और ज्यादा स्पन्दित कर देता है जिसमें यह कहा गया है: ’अरी भियाणी, कानों में क्या कथनी सुन ली, नौजवान की मौत हो गई, चिडि़या शाख पर रो दी।’ इस तरह के गाथाई किस्से कथा को क्या और ज्यादा दारुण नहीं बना देते ? यह दुख का विषय है कि कहानी, उपन्यास आज सामान्य लोक से उठ कर विशेष लोक में चले गये हैं। कथाकार को अब गाथाओं में गुंथी पीड़ाओं की जगह नगर-लोक ज्यादा प्रिय है।

इस कहानी में अप्रत्याशित मोड़ तब आता है जब बेटी सूमा घाटी में आये एक विदिशी युवक एरी से इकरारनामे के आधार पर विवाह कर लेती है। पुराणपंथी समाज अब उन लोगों के लिए पराया है जो जातीय परिधि से बाहर होने के कारण अन्तर्जातीय व्यवहार में लगातार घृणा व उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। विदेशी इन रूढि़यों से सर्वथा मुक्त हैं। कॉण्ट्रेक्चुअल शादियां अब उन के लिए टाइमपास का एक सरलतम उपाय है। इसके बरक्स भारतीय समाज के लिए विवाह आज भी एक अहम संस्कार है। यह कोई व्यापारिक विनिमय का विषय नहीं। इकरारनामा जबकि एक गैर ज़िम्मेदाराना व्यवस्था है। इस की अवधि समाप्त होने पर विवाह अमान्य हो जाते हैं। पौर्वात्य भारत इसे कभी नहीं अपना सकता। यदि ऐसा हुआ तो इसके लिये जिम्मेदार है जातीय वर्गवाद। उपन्यासकार ने इस नयी विवाहपद्धति के परिणामस्वरूप आने वाले खतरों से भी सावधान किया है। यह उन कुलीन वर्गों पर एक गहरा कटाक्ष है। विशेषकर, आसपास निवास कर रहे उन ग़रीब तथा अकुलीन वर्ग के लोगों की ओर से जो अपनी जवान होती बेटियों के विवाह के लिए रिश्ते व साधन नहीं जुटा पाते। शावणू नड़ काण्ट्रेक्चुअल विवाह होने के बावजूद अपनी परम्परा और संस्कृति से विमुख नहीं हुआ है। कन्या की विदाई के समय उसके अन्दर वही भाव हैं जो एक भारतीय पिता के अन्दर ऐसे अवसरों पर स्पष्ट चीन्हे जा सकते हैं। ’दुल्हन मुन्नी उर्फ़ सूमा चली गई। सब कुछ पीछे छूटता रहा....पिता। घर। आंगन। गोशाला। पशु। खेत। क्यार। खलिहान....और पता नहीं क्या क्या ?’ शावणू के अन्दर का पिता, वियोग में पूरी तरह डूबा है जिसे लेखक ने लोकगीत की इन पंक्तियों से भावमय बना दिया है–

’इमली रा बूटा नीवां नीवां डालू
तिस्स पर बैठिया पंछी रूदन करे।
मां बोले बेटी बड़े घरे ब्याहणी
पलंगा पर बैठी बैठी राज करे।

हिडिम्ब महाभारत का एक मिथक पात्र है जिसे कथाकार ने एक बहुआयामी रूपक में बांधा है। हिडिम्ब और उसकी बहन हिडिम्बा के प्रक्षेपक, उपन्यास की कथा को एक ऐसी गाथा का रूप देते हैं जो पौराणिक होते हुए भी न सिर्फ़ लोक आस्था को व्यंजित करती है बल्कि एक ऊर्जा के रूप में निरात्म और आत्मिक दोनों स्तरों पर आज के मानवीय द्वन्द्व को भी प्रकाशित करती है। कहानी के अन्त में ये असुर आत्माएं अपने प्रकोप से चौफेर ताण्डव रचाती हैं जिसे हम एक छोटी सी किन्तु एक अर्थमय मैटाफोरिक प्रलय भी कह सकते हैं। कथा के अन्त का प्राकृति जनिक विध्वंस खुद मनुष्य के पापों और अतिवादिता का परिणाम है जिसके समाप्त होने पर ही नयी सुबह की उम्मीद की जा सकती है।


समीक्षक संपर्क : 9/ए, पूजा हाउसिंग सोसाइटी,
सन्दल हिल, कामना नगर–चक्कर,
शिमला–171005, हि0प्र0।
फोन–0177–2633272

शनिवार, 7 जून 2008

संस्कृति, समाज और योग










साहित्य सृजन में योग की भूमिका



जवाहरलाल गुप्त ’चैतन्य’



भारतीय संस्कृति को संपूर्ण विश्व में एक विलक्षण संस्कृति के रूप में गौरव प्राप्त है. इसे सनातन संस्कृति के नाम से भी जाना जाता है जिसका तात्पर्य है कि भारतीय संस्कृति नित्य है और जीवन्तता से परिपूर्ण भी. सच कहिए तो इस संस्कृति का यही वैशिष्ट्य है कि यह हमारी जीवनशैली और उदात्त जीवन मूल्यों को युगों से अपने कलेवर में संजोए हुए है. हम भारतीयों के लिए कितने गर्व की बात है कि जिस योग का आज सम्पूर्ण विश्व इतनी सह्रदयता से गले लगाकर स्वागत कर रहा है वह योग भारत की सबसे सशक्त और जीवन्त परम्पराओं में से है. आज जब भारत सारे संसार में आर्थिक सुधार, फिल्म, फैशन, शिक्षा, आदि विविध क्षेत्रों में अपनी धाक जमा रहा है, योग के द्वारा हमारी बहुमूल्यवान संस्कृति और इसके टूटते हुए सांस्कृतिक, सामाजिक व साहित्यिक मूल्यों को बचाया जा सकता है. कहने की आवश्यकत नहीं आजकी अर्थप्रधान-प्रतिस्पर्धा की बढ़ती हुई मशीनी जिन्दगी में सच्चाई, साहस, ईमानदारी और धैर्य जैसी बातें अर्थहीन होती जा रही हैं. चाहे वह सार्वजनिक जीवन हो या सरकारी, मनुष्य का व्यक्तिगत आचरण हो अथवा साहित्यिक संरचना, निरन्तर घटते हुए मानवीय मूल्य किसी भी जागृत मानस को आन्दोलित कर देते हैं. सच पूंछिए तो आज मनुष्यता जैसे शब्द खोखले हो चुके हैं. जहां भारत की माटी सह्रदयता, सहयोग, संवेदना और समत्व के भावों से सुवासित थी, जहां के साहित्य में सत्य, अहिंसा, करुणा, निश्छल प्रेम और निर्मल रस की गंगा बहती थी वहां छल छद्म, अहंकार, स्वार्थपटुता और कठोर ह्रदय की कालिमा ने जमकर डेरा डाल लिया है. आइए योग के आलोक में इन विद्रूपताओं के समाधान पर किंचित विचार करें.


कहावत है-- जैसा बोओगे वैसा काटोगे, जब अपने इर्दगिर्द गन्दगी का परिवेश पैदा करोगे तो वैसे ही घातक वैक्टीरिया को प्रश्रय मिलेगा और मानसिक तनाव, डिप्रेसन, ह्रदयाघात जैसे भयावह रोग स्वाभाविक रूप से पैदा होंगे. ’महाभारत’ में मनुष्य को सभी प्राणियों में श्रेष्ठतम बताया गया है. भारत की पवित्र माटी में जन्में मनुष्य का अच्छा खासा जीवन जिसमें सत्य, सौन्दर्य और शिवत्व की प्रतिष्ठा चाहिए थी और जो आज दुर्भाग्य से नर्क बनता जा रहा है उसे हम योग के नियमित अभ्यास से बचा सकते हैं. हम इस बात के लिए बड़े भाग्यशाली हैं कि हमारे पूर्वजों ने योग जैसी अद्भुत परम्परा दी. योग से वस्तुतः आज की बीमारियों के सभी निदान सम्भव हैं. योगाभ्यासी आज की रुग्ण नकारात्मक जीवनशैली को बदलकर स्वस्थ, सानन्द और सकारात्मक कर देता है. गलत दिशा में प्रवाहित हो रही व व्यर्थ में क्षीण हो रही शक्ति को योग ओजस या ऊर्ध्वागामी सकारत्मक शक्ति में परिणत कर देता है. आज जगह जगह पर सुनने में आ रहा है कि कोरियाई मशीन द्वारा लोग बड़ी तादात में स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रहे हैं. इस प्रक्रिया द्वारा अनेक बीमारियों को लाभ भी मिल रहा है. इसमें मेरुदण्ड में स्थित पांच केन्द्रों पर मशीन से तीव्र उष्मा देकर उन ऊर्जा केन्द्रों से नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक में तब्दील कर देते हैं और वे केन्द्र रुकी हुई ऊर्जा को प्रवाहित करने लग जाते हैं. चूंकि सब कार्य मशीन द्वारा होता है अतः लोगों का विशेष आकर्षण होना स्वाभाविक ही है. लोग सुविधाभोगी हैं तो रास्ता ही चागते हैं. अंग्रेजी गोलियां खाकर लोग पहले ही तंग हो चुके थे.



अब आपको अगर इस बारे में योग की बात कहें तो आप आश्चर्य करेंगे. सहस्रों वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने योग में चक्रों के ध्यानाभ्यास की अद्भुत साधना बताई. यह साधना है तो बड़ी सूक्षम लेकिन पूरी शारीरिक व मानसिक दशा में आमूल परिवर्तन पैदा कर देती है. लोग प्रयः योग में आसन प्राणायाम आदि को तो जानते हैं लेकिन चक्रों से कम परिचित हैं . मेरुदण्ड, जो गुदा के स्थान से चलकर ऊपर कंठ तक जाती है,इसके सबसे नीचे वाले गुदा के पास स्थित केन्द्र को मूलाधार चक्र कहते हैं. यहां से अनेकों सूक्ष्म नाड़ियां पूरे शरीर में व्याप्त हैं जो ऊर्जा को प्रवाहित करती हैं. यहीं से तीन प्रमुख नाड़ियां इडा, पिंगला और सुषुम्ना निकलती हैं जोमेरुदंड के साथ-साथ चलकर सिर में स्थित ब्रह्मरन्ध्र से जा मिलती हैं. मेरुदंड के मध्य से सुषुम्ना नाडी सीधे सिर में चोटी की जगह स्थित सहस्रार चक्र से मिलती है. बायीं नासिकारन्ध्र से इडा जिसे चन्द्र नाडी (शीतल) व दायीं से पिंगला अर्थात सूर्य नाडी (गर्म) प्रवाहित होती है. सुषुम्ना यानी मेरुदंड ही शरीर का सारसर्वस्व है. पूरे शरीर में यहीं से ऊर्जा का प्रवाह होता है. इस पर मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक सात चक्र अर्थात ऊर्जा के सात केन्द्र स्थित हैं-- गुदामार्ग से एक अंगुल ऊपर मूलाधार चक्र, जननेन्द्रिय के मूल में स्वाधिष्ठानचक्र, नाभि के मूल में मणिपूरचक्र, ह्रदय के मूल में अनाहतचक्र, कंठ के मूल में विशुद्धिचक्र , भ्रूमध्य में (दोनों भौंहों के बीच ) आज्ञाचक्र, शीर्ष पर सहस्रारचक्र. इन्हें ऊर्जा का द्वार कहा जा सकता है. ये सभी केन्द्र जब योगाभ्यास द्वारा संचालित होते हैं तो पूरे शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं और इन्हीं पर सारे शरीर का कार्यभार है.



इस संसार में आनन्दपूर्वक जीने के लिए मूलाधारचक्र का सक्रिय होना अति आवश्यक है क्योंकि यह अनन्त शक्ति का भंडार है. इसके अवरुद्ध हो जाने से अनेकानेक बीमारियों का जन्म होता है. आसन, प्राणायाम, बन्ध, व ध्यानाभ्यास के द्वारा ये चक्र सक्रिय होते हैं. मूलाधार में प्रसुप्त शक्ति (कुंडलिनी) जगकर मेरुदंड में स्थित सुषुम्ना नाड़ी के रास्ते चलकर सिर के शीर्ष पर स्थित सहस्रकमलदल में परम सत्य का साक्षात्कार करती है तथा मनुष्य में अपार शक्ति भर उठती है. इसके लिए विधिवत साधना करनी पड़ती है. जाड़े के दिनों में सूर्य की ओर पीठ करके मेरुदंड को ऊष्मा देकर चक्रों पर ध्यान करना चाहिए. बुद्धिजीवियों को आज्ञाचक्र यानी शिवनेत्र पर प्रकाशपुंज या ओम का ध्यान करने से बड़ी उपलब्धियां होती हैं. भावनाशील भक्तों के लिए ह्रदय के अन्तरतम गहराइयों में अपने इष्ट का ध्यान करने का विधान है. कंठ पर स्थित विशुद्धिचक्र के आन्दोलित होने से विद्या व वैदुष्य की छिपी हुई शक्ति जग जाती है व रचनाकार में अद्भुत क्षमता विकसित हो जाती है. ऎसा लगता है मानॊ संपूर्ण सर्जनात्मक शक्तियों का एक पारावार उमड़ पड़ा हो. यह सब कुछ मौलिक और स्वतः उद्भूत होता है. वास्तव में ऎसी परम शान्त व सौमनस्य स्थिति में ही सच्चा साहित्य लिखा जा सकता है. क्योंकि जो लिखा जाएगा वह छल छद्म से परे बिल्कुल विशुद्ध व मौलिक होगा. ह्रदय के गंभीर भावों से सना हुआ होगा. पठनीय होगा. संगीतज्ञों, राजनेताओं, व अभिनेताओं को इससे अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन हो सकता है. आज्ञाचक्र प्र ध्यान करने से मस्तिष्क में स्थित पीनियल व पिच्यूटरी ग्रन्थियां खुल जाती हैं जिससे मेरुदंड में हार्मोंन्स का स्राव होता है. अचेतन व अर्द्धचेतन मस्तिष्क के जगजाने से विद्या व बुद्धि का छिपा हुआ रहस्य खुल जाता है. अद्भुत साधना है. योग्य आचार्य के सानिध्य में बैठकर प्रेम और धैर्य से शान्तिपूर्वक ईगो का परित्याग करके यह साधना करनी चाहिए.



जानेमाने ह्रदयरोग विशेषज्ञ डा नरेश त्रेहान हमेशा योग और ध्यान पर बड़ा जोर देते हैं और इसके अभ्यास के लिए बार-बार कहते हैं. योग में अब पहले जैसी बात नहीं रही जब लोग इसके नाम से डरते थे. योग कोई संत - महात्माओं तक सीमित रहने वाली चीज नही, यह तो आपकी जीवनशैली है.



योग में आसन प्राणायाम आदि सभी का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है परन्तु प्राणायाम का विशेष महत्व है. प्राणायाम माने प्राण को आयाम देना. प्राण अर्थात जीवनशक्ति , वह अनमोल चीज जिसे हम सांस द्वारा ग्रहण करते हैं. प्राणायाम के द्वारा सांस के रूप में मात्र आक्सीजन ही नहीं, अपितु अन्य अनेकों तत्व शरीर के अन्दर ग्रहण किए जाते हैं जो हमारे शरीर को ऊर्जा से ओतप्रोत कर देते हैं. योगशास्त्र में हमारे शरीर में ७२००० नाड़ियां बतायी गयी हैं जो सामान्यतः मलयुक्त रहती हैं , निष्क्रिय पड़ी रहती हैं. हठयोग प्रदीपिका में कहा है -- मल से सनी हुई नाड़ियों में भला वायु को कैसे जगह मिल सकती है. ये नाड़ियां प्राणायाम करने से क्रियाशील होकर शरीर को ऊर्जस्वित ही नहीं नयी कोषिकाओं का निर्माण करती हैं, पुरानी को भी अनुप्राणित करती हैं और शनैः शनैः शरीर की रोगनिरोधक क्षमता को बढा़ती हैं. हमारा यह शरीर प्रकृति का एक विलक्षण उपहार है. यह एक दिव्य मंदिर है उसे अवांछित आहार-विहार व विचारों से अपवित्र न करें. नियमित प्राणायाम की क्रिया के द्वारा निर्मल व जीवन्त रखें. शायद इसी अज्ञानता के कारण लोगों को योग का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता. प्राणायाम प्रत्येक व्यक्ति के लिए कितना अपरिहार्य है मेरे पास शब्द नहीं हैं. आज जो हम मनुष्य की पीड़ा देख रहे हैं इसके अभ्यास से बह शारीरिक व मानसिक दोनॊं दुर्बलताओं पर विजय पा सकते हैं. क्योंकि प्राण की धारा जब सहज होकर हमारे नासिकारन्ध्रों से प्रवाहित होने लगती है तो आपका विचारों के संसार से भटकाव धीरे-धीरे प्रशान्त होने लगता है. विचार माने मन जोकि ठिकाने लग जाता है. महर्षि वसिष्ठ कहते हैं कि मन के स्पन्दन के साथ प्राण प्रवाहित होता है -- (योगवासिष्ठ). इतना ही नहीं प्राण और मन के प्रवाह के साथ ह्रदय का भी गहरा सम्बन्ध है. जब हम एक बार श्वास-प्रश्वास लेते हैं तो ह्रदय चार बार धड़कता है. प्राण का प्रवाह जितना सहज होगा, मन की गति भी उतनी शान्त होगी और ह्रदय की धड़कन भी उतनी ही सामान्य होगी, और हम स्वस्थ रहेगें. जब भी मौका मिले थोड़ा अपनी सांस को देखे, इसका खूब अभ्यास कीजिए बड़ा मजा आएगा. धीरे-धीरे आप स्वस्थ, सकारात्मक ही नहीं ध्यानस्थ हो जाएगें.

Jawaharalal Gupt 'Chaitanya'

C-3/36, Sadatpur Extension, Delhi-110094
Tel. no.011-22064406

Pustak sampadan mein dilli vishvavidyalay se P.G.diploma. Penman publishers ki sthapana. Bharatiya sanskriti va yoga ki 30 se jyada pustakein america va bharat se angareji mein prakashit.Hindi va sanskrit se hindi va angreji mein anekon pustakein anoodit. Yoga mein gahari paith. yoga ke mula granthon ka anuvad. Haal mein 'tantra, mantra, yog aur spritual bliss' evam 'miraculous effects of bhuta-shuddhi and chakra meditation' prakashit.


सी-३/२६, सादतपुर एक्स्टेंशन,


दिल्ली -११००९४


मोबाइल नं० ०९८९१००३२९६




US Recession





Slowdown in US Economy



Malavika Chandel





In 2007, the American economy began to slow significantly, mostly because of a real-estate slump and related financial problems. Many economists believe that the economy entered a recession at the end of 2007 or early in 2008. A committee of academic economists, overseen by the National Bureau of Economic Research, makes the most commonly cited determination about when recessions begin and end. Because the committee defines a recession as a broad-based and protracted downturn in economic activity, its members typically wait many months before announcing that the economy has entered a recession. They have made no such announcement lately. Instead, recent economic indicators point to the possibility of stagflation - a slowdown in economic activity combined with rising prices not seen since the 1970s.


Herewith, I am giving some of the important economic terminologies for the understanding of the readers:




  • Recession: Some economists define recession to be a period of two successive quarters of negative GDP (Gross Domestic Product) growth. But this is not universally accepted. The US national Bureau of Economic Research defines a recession as “a significant decline in economic activity spread across the economy, lasting more than a few months”. A recession, it says, may involve simultaneous decline in measures of overall economic activity like employment, investment, and corporate profits.









  • Depression: A severe or long Recession.









  • Stagflation: A period of time characterized by high inflation and recessionary conditions. It is an economic condition of both continuing inflation and stagnant business
    activity. Stagflation is a period of slow economic growth and high unemployment(stagnation) while prices rise (inflation).









  • Gross Domestic Product: The gross domestic product (GDP) or gross domestic income (GDI) is one of the measures of national income and output for a given country's economy. GDP is defined as the total market value of all final goods and services produced within the country in a given period of time (usually a calendar year).


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बुधवार, 28 मई 2008

पुस्तक चर्चा

बहुआयामी रचनाकार वीरेन्द्र कुमार गुप्त


२९ अगस्त १९२८ को सहारनपुर (उ०प्र०) में जन्मे वीरेन्द्र कुमार गुप्त उन वरिष्ठ रचनाकारों में हैं जो साहित्य की उठा-पटक से दूर १९५० से निरन्तर लेख रहे हैं. वीरेन्द्र जी की पहली रचना ’सुभद्रा-परिणय’(नाटक) १९५२ में प्रकाशित हुई थी. अब तक सात उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें तीन ऎतिहासिक उपन्यास हैं. दो प्रबंध काव्य-- ’प्राण-द्वंद्व’ और ’राधा कुरुक्षेत्र में’ के अतिरिक्त कुछ स्फुट कविताएं. अनेक चिन्तनपरक लेख.
१९६४ में वीरेन्द्र जी ने बहुत परिश्रम पूर्वक विश्व के महान व्यक्तियों के कुछ प्रेम पत्रों को संकलित किया जो ’प्रसिद्ध व्यक्तियों के प्रेम-पत्र’ शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हुए थे . हाल में यह पुस्तक ’किताबघर प्रकाशन’, २४, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली -११०००२ से पुनः प्रकाशित हुई है. इसी प्रकाशन संस्थान से वीरेन्द्र जी महत्वपूर्ण ऎतिहासिक उपन्यास - ’विष्णुगुप्त चाणक्य’ कुछ दिन पूर्व प्रकाशित हुआ, जिसकी चर्चा आगे की जायेगी.
ीरेन्द्र जी ने अंग्रेजी में भी प्रभूत मात्रा में लेखन कार्य किया है. अंग्रेजी में उनकी विवादित पुस्तक है : ’Ahimsa in India's Destiny' और दूसरी पुस्तक है -’The Inner self'.
वीरेन्द्र कुमार गुप्त का एक स्वरूप अनुवादक का भी है. उन्होंने लगभग १२ पुस्तकों के अनुवाद किये थे और ये सभी अनुवाद सठवें दशक में किए गए थे. जैक लडंन के नोबल पुरस्कार प्राप्त उपन्यास Call of the Wild' का अनुवाद ’जंगल की पुकार’ नाम से उन्होंने किया. यह एक अद्भुत अनुवाद है . अब तक हिन्दी में इस पुस्तक का यही अनुवाद उपलब्ध था, लेकिन जैसा कि इन दिनों हिन्दी के कुछ अवसरवादी प्रकाशक कर रहे हैं, एक सूचना के अनुसार वीरेन्द्र जी के इस अनुवाद को एक प्रकाशक ने किसी छद्म नाम से प्रकाशित कर दिया है.
वीरेन्द्र जी का एक और अभूतपूर्व कार्य है, जिसके विषय में नई पीढ़ी की क्या कहा जाये, मेरी या मुझसे पहली पीढ़ी के लेखकों तक को नहीं मालूम -- पाठकों की बात ही क्या !

विश्व का सबसे बड़ा साक्षात्कार

जैनेन्द्र जी के नाम से प्रकाशित पुस्तक -’समय और हम’ का श्रेय वीरेन्द्र कुमार गुप्त को है. दरअसल यह एक ही साक्षात्कार की वृहदाकार (लगभग ७०० पृष्ठों की) पुस्तक है, जिसमें वीरेन्द्र कुमार गुप्त के प्रश्नों के उत्तर जैनेन्द्र जी ने दिए हैं. मुझसे एक बार बातचीत के दौरान मेरे एक प्रश्न के उत्तर में वीरेन्द्र जी ने बताया था कि इस कार्य १९६३-६४ के दौरान प्रश्नावली लेकर प्रतिदिन साइकिल से वह जैनेन्द्र जी के निवास दरियागंज जाते थे . उनके प्रश्नों के उत्तर जैनेन्द्र जी उन्हें डिक्टेट करवाते थे. वहां से वह अपने विद्यालय चले जाते थे (वह दिल्ली सरकार में अध्यापक थे और प्रधानाचार्य के रूप में सेवा निवृत हुए थे). रात उत्तरों को लिखकर अगले दिन के प्रश्न तैयार करते थे. इसप्रकार निरन्तर एक वर्ष के अथक परिश्रम का परिणाम था ’समय और हम" जिसे जैनेन्द्र जी ने अपने नाम से प्रकाशित करवाया था. जबकि वीरेन्द्र जी के नाम से ही प्रकाशित होनी चाहिए थी. इस पर जैनेन्द्र जी और वीरेन्द्र जी के मध्य मामूली विवाद भी हुआ था, लेकिन संकोची और सरल स्वभाव वीरेन्द्र कुमार गुप्त ने उस विवाद को आगे बढ़ाने के बजाय चुप रहना अधिक बेहतर समझा था. संभव है जैनेन्द्र जी के प्रति उनके आदर भाव ने उन्हें रोका हो. बात जो भी हो, इस सचाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि वीरेन्द्र कुमार गुप्त के अथक श्रम के कारण विश्व का सबसे लंबा साक्षात्कार तैयार हुआ, जिसकी विशेषता यह है कि यह जीवन दर्शन पर आधारित आद्यन्त एक व्यक्ति का एक व्यक्ति द्वारा किया एक साक्षात्कार है, जिसे ’लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में अभी तक शामिल न किया जाना अपने में आश्चर्यान्वित करता है.
संपर्क : द्वारा - डॉ० प्रवीण कुमार गुप्त
३१/१, नीति नगर,
रुणकी विश्वविद्यालय, रुणकी (उत्तर प्रदेश)
फोन : ०१३३२-२७५५२८ / २८५५१९
मोबाइल: ०९४१०१६४६२५
प्रस्तुत है वीरेन्द्र जी के महत्वपूर्ण ऎतिहासिक उपन्यास ’विष्णुगुप्त चाणक्य’ की समीक्षा:

चाणक्य की प्रासंगिकता

* रूपसिंह चन्देल

विष्णुगुप्त चाणक्य - वीरेन्द्र कुमार गुप्त
किताबघर प्रकाशन, २४ अंसारी रोड,
दरियागंज, नई दिल्ली-११० ००२
पृष्ठ - ३६४, मूल्य - ३५०/-


कवि, कथाकार और चिंतक वीरेन्द्र कुमार गुप्त का छठवां उपन्यास है ’विष्णुगुप्त चाणक्य’. यह आश्चर्यजनक है कि लगभग पचास वर्षों से सृजनरत वीरेन्द्र जी को अपेक्षित चर्चा नहीं मिली. इसे हिन्दी साहित्य का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा. संपादक लोग अपने चाटुकारों की पुस्तकों की तीन-तीन समीक्षाएं अपनी पत्रिका के एक ही अंक देकर चर्चा करवाने के सद्प्रयास करते हैं , जहां कम और कमतर लिखने वाले रचनाकार ’गुट’ और ’वादों’ से जुड़कर चर्चा हासिल कर लेते हैं, लेकिन केवल रचनाकर्म को ईमानदारी से स्वीकार करने वाला एकाकी कर्मरत रचनाकार आंधकार में खोया रहता है . आवश्यकता है कि नयी पीढ़ी ऎसे रचनाकारों का मूल्यांकन -पुनर्मूल्याकंन करे. अन्यथा सदैव अच्छी कृतियां अचर्चा के गर्भ में खोयी रहेंगीं और पाठक उस उच्छिष्ठ को ही श्रेष्ठ मानता रहेगा, जो उन्हें कुछ साहित्यिक मठाधीशों द्वारा श्रेष्ठ बताया जाता रहेगा. भ्रष्ट राजनीति की भांति साहित्य में व्याप्त अव्यवस्था, भाई-भतीजावाद, मित्रता-प्रेमिकावाद को बेनकाब करने का दायित्व आज की पीढ़ी पर है, अन्यथा भविष्य में भी कितने ही युवा वीरेन्द्र कुमार गुप्त की भांति अच्छा लिखकर भी चर्चा से बाहर रहेगें और कितनी ही ’विष्णुगुप्त चाणक्य’ जैसी कृतियां सरकारी खरीद का अंग बनकर गोदामों में सड़्ती रहेंगी.

समीक्ष्य कृति के माध्यम से उपर्युक्त कथन मेरा दुस्साहस माना जा सकता है, किन्तु यह आवश्यक इसलिए लगा क्योंकि जिस लेखकीय दृष्टि का परिचय ’चाणक्य’ में हमें प्राप्त होता है वह अब तक चाणक्य संबंधी उपलब्ध कथा-साहित्य से अधिक मौलिक और तथ्यात्मक है. वर्तमान संक्रातिक परिस्थितियों को समझने और अतीत से प्रेरणा लेने की नवीन दृष्टि का समावेश कृति को महत्वपूर्ण बनाता है और ऎसी रचना पाठकों की दृष्टि से ओझल न हो, इसलिए उपर्युक्त कथन आवश्यक लगा.
’विष्णुगुप्त चाणक्य’ में लेखक की कुछ मौलिक स्थापनाएं हैं, जिनके लिए उसके पास शोधात्मक तर्क हैं. उसने चाणक्य को पाटलिपुत्र निवासी नहीं स्वीकार किया, प्रत्युत उसे तक्षशिला वासी माना है. चाणक्य अपने एक शिष्य कमंद को अपना परिचय देते हुए बताता है कि वह तक्षशिला के गोल्ल जनपद के छोटे-से ग्राम चण का निवासी है और उसके पिता का नाम शिवगुप्त था, जो तक्षशिला में अध्यापक थे और चाणक्य कहलाते थे.
इस बात के प्रमाण में लेखक भूमिका में बौद्धग्रंथों -महाबंशों और वशंत्थप्पाकासिनी में आए उल्लेखों की चर्चा करता है. लेखक का यह तर्क विवादास्पद हो सकता है कि चाणक्य तक्षशिला का ही था क्योंकि बौद्धग्रंथ भी गोल्ल जनपद की वास्स्तविक अवस्थिति के विषय में मौन हैं (भूमिका) . लेखक का यह अनुमान ही है कि गोल्ल जनपद देश के पश्चिमोत्तर अर्थात तक्षशिला में ही अवस्थित था.
चाणक्य चाहे पाटलिपुत्र का निवासी रहा हो या तक्षशिला का लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि वह एक दुर्द्धर्ष कूटनीतिज्ञ , राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री था. उसने एक स्वप्न देखा था संपूर्ण भारत में एक शासक के एक- छत्र राज्य का, जिससे यवन भारत भूमि को आक्रांत न कर सकें और वह जीवन पर्यन्त अपने उस स्वप्न को साकार करने में व्यस्त रहा. लेखक ने जिस सहजता से कथा का ताना-बाना बुना है, जिस प्रकार मूल कथा के साथ उप-कथाऎं अनुस्यूत हैं----- वे कथा को न केवल गति प्रदान करती हैं, प्रत्युत विश्वसनीय प्रतीत होती हैं. पाटलिपुत्र नरेश नंद के साम्राज्य की दुर्व्यवस्था-विलासिता (सामंतो की) कर्मचारियों-सैनिकों की निरंकुशता, धन-भोग लिप्सा, अराजकता , शोषित जनता की व्यथा को लेखक ने जिस यथार्थता के साथ चित्रित किया है, वह आज घटित प्रतीत होता है ------सब कुछ आंखों के समक्ष घटित होता हुआ.
मल्लिका जैसी युवतियों का अपहरण कर उन्हें राजविलास की वस्तु बना देना, रजविलास से मुक्ति के बाद महामात्य राक्षस द्वारा अपनी काम-लिप्सा की तृप्ति के साधन-स्वरूप बंदी बनाए रखना और अंत में नगरवधू के रूप में प्रतिष्ठित कर देना लेखक की कल्पना होते हुए भी वास्तविकता का एहसास करवाती है. मल्लिका अंत तक ’चाणक्य’ उपन्यास में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती दिखती है और चाणक्य द्वारा पुत्री रूप में स्वीकार किया जाना वर्तमान समाज के लिए ऎसा संदेश है कि विवशतः ऎसी स्थिति में पहुंची युवतियों को समाज के महापुरुषों द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए और उन्हें नवीन जीवन के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए.
आज तक यह प्रश्न भारतीय मानस को मथता रहा है कि चन्द्रगुप्त कौन था? लेखक ने प्रथमतः भूमिका में और बाद में कथा के माध्यम से स्पष्ट किया है कि चन्द्रगुप्त की मां का नाम मुरा था जिससे वह मौर्य कहलवाया . बौद्धग्रंथ महावंशों के अनुसार मोरिय खत्तियों (मौर्य क्षत्रियों) का एक गण पिपालिवन प्रदॆश में अवस्थित था और चन्द्रगुप्त इस गण के राजा का पुत्र था. लेखक के अनुसार यह स्थान पटना से ५८ मील पूर्व में था, जहां आज भी ’मोर’ नाम का स्टेशन है. लेखक का तर्क है कि नंद ने इस मोरिय नगर को ध्वस्त किया होगा और युद्ध में चन्द्रगुप्त के पिता की या तो मृत्यु हुई होगी या वह बंदी बनाया गया होगा.
चन्द्रगुप्त के पिता की मृत्यु हुई या वह बंदी बना हो, महत्वपूर्ण यह नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि यदि चन्द्रगुप्त चाणक्य को न मिला होता तो क्या अलेक्ष्येन्द्र या उसके परवर्ती सेल्यूकस से संपूर्ण भारत को पद दलित होने से रोका जा सकता था और यही महत्वपूर्ण इस उपन्यास के कथानक के मूल में है. ऎसा नहीं है कि हिन्दी पाठकों के लिए चाणक्य या चन्द्रगुप्त के जीवन पर आधारित कथा ’विष्णुगुप्त चाणक्य’ के माध्यम से पहली बार पढ़ने को मिल रही है लेकिन कुछ अकाट्य तथ्य पहली बार लेखक ने इसमें अवश्य प्रस्तुत किए हैं. यथा अलेक्षेन्द्र के समक्ष पुरु ने संधि प्रस्ताव नहीं भेजा था बल्कि अलेक्ष्येन्द्र ने पुरु के पास अपना दूत भेजा था क्योंकि उसे लगने लगा था कि यदि पुरु के साथ वह संधि नहीं करेगा तो उसका भारत-विजय का स्वप्न अधूरा रहेगा और संभवतः उसको पर्याप्त सैनिक शक्ति और सामान की क्षति भी उठानी पड़ेगी. दूसरा चाणक्य मात्र मूक निर्देशक ही न रहा था और न वह दूरस्थ युद्ध संचालक , बल्कि वह स्वयं लगभग सभी प्रारंभिक युद्धों में चन्द्रगुप्त के साथ था जिससे निकट से शत्रु की स्थिति पर दृष्टि रख सके और चन्द्रगुप्त को उचित निर्देश दे सके. तीसरी महत्वपूर्ण और विचारणीय बात यह कि पुरु के साथ अलेक्ष्येन्द्र के युद्ध के समय चन्द्रगुप्त स्वयं एक छोटी सेना का नेतृत्व संभालता हुआ पुरु की ओर से अलेक्ष्येन्द्र पर आकस्मिक आक्रमण करता है. चाणक्य पुरु के अनुरोध पर इस युद्ध के लिए चन्द्रगुप्त को सन्नद्ध नहीं करता, बल्कि स्वेच्छया उसमें सम्मिलित होता है. क्योंकि देश पर आसन्न संकट को केवल चाणक्य ही समझता है, दूसरे राज्य चाहे वह केकय हों, तक्षशिला, वाहीक, मालव या शक्तिशाली मगध, ---- नहीं समझते. वे अपने अहम के वशीभूत होते हैं और अपने पड़ोसी का पराभव देखना चाहते हैं. वे यह नहीं समझते कि निकटस्थ राज्य की पराजय उनके लिए जय कभी नहीं बन सकती, किन्तु आपसी वैमनस्य के चलते ही मूर्ख आम्भीक अलेक्ष्येन्द्र के साथ मिल जाता है और पुरु के विरुद्ध उसकी सहायता करता है.
चाणक्य के सभी प्रयास व्यर्थ जाते हैं और इन प्रयासों को ऎतिहासिक तथ्यों के आधार पर ही लेखक ने चित्रित किया है. निसंदेह उसने कल्पना को पर्याप्त स्थान दिय है और अनेक ऎसे पात्रों को स्थान दिया है जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए इस प्रकार कथा का अंग बन जाते हैं जिनके विषय में पाठक शंकालु नहीं हो पाता .इसे लेखकीय सफलता का अद्भुत कौशल कहा जाएगा और इस कौशल का चमत्कार उपन्यास को जीवंत बनाता है. कंकु, मल्लिका, सिंह, हेमा , रुचिशील, उसकी पत्नी आदि कितने ही ऎसे पात्र हैं जिनका ऎतिहासिक अस्तित्व कभी नहीं था, किन्तु वे इस उपन्यास के माध्यम से वास्तविक हो उठे हैं.
चाणक्य को आज तक पाठकों के समक्ष शुष्क, रुक्ष और कठोर रूप में ही सदैव प्रस्तुत किया जाता रहा है जिसके समक्ष अनुशासन ही सर्वस्व था और जो अपने प्रति भी निर्मम रहा था. किन्तु वीरेन्द्र कुमार गुप्त ने चाणक्य को एक ऎसे रूप को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है जो कठोर तो है लेकिन साथ ही सह्रदय भी है और प्रणयाकांक्षी भी. वह मल्लिका जैसी शोषिता को पुत्री स्वीकार करता है तो हेमा जैसी यवन सुन्दरी के प्रति युवावस्था में आकर्षित हो सुधबुध खो बैठता है. हेमा द्वारा एक सामंत के साथ विवाह करने और बाद में शशिगुप्त की प्रेमिका और उसके ठुकराए जाने पर पुनः चाणक्य के पास आने पर वह उसे उसी भांति स्वीकार करता जैसा उसने उसे युवावस्था में किया था. वह हेमा को अलेक्ष्येन्द्र के विरुद्ध गुप्तचर के रूप में सहयोगिणी बनाता है और तक्षशिला में हेमा चाणक्य के राजनैतिक उद्देश्यों कि पूर्ति के लिए वारवनिता तक बनना स्वीकार करती है. अंततः यह जानते हुए भी कि हेमा अनेक पुरुषों की अंकशायिनी बनी है चाणक्य उसके साथ गंधर्व विवाह करता है. अंत में वह उसे वृहद्दहट्ट भेज देता है जहां वह चाणक्य के पुत्र को जन्म देती है.
यद्यपि हेमा एक काल्पनिक पात्र है और उसका प्रादुर्भाव एक विवाद का विषय हो सकता है, किन्तु लेखक इस बात की पुष्टि करता हि कि एक जैन ग्रंथ में इस बात का उल्लेख मिलता है कि चन्द्रगुप्त के पुत्र बिंदुसार का महामात्य चाणक्य का पुत्र राधागुप्त था और उसी से प्रेरित होकर लेखक हेमा की कल्पना करता है. लेखक के अनुसार भले ही हेमा चाणक्य के जिवन में न रही हो ,किन्तु कोई स्त्री तो रही ही होगी, जिससे रधागुप्त का जन्म हुआ होगा.
उपन्यास में संवादों में एक विमुग्धकारी विशिष्टता है. सारगर्भित अकाट्य और तर्कपूर्ण कथोपकथन कथा को गतिशीलता प्रदान करते हैं. ’भाभी’ ’हेमाजी’, ’धंधा’ जैसे कुछ खटकने वाले शब्दों के अतिरिक्त भाषा प्राजंल - बोधगम्य और शैली आकर्षक है. पाठक को आद्यन्त बांध रकहने की क्षमता उपन्यास की सबसे बड़ी सफलता है. आज के परिप्रेक्ष्य में समीक्ष्य उपन्यास महत्वपूर्ण संदेश है. तब यदि एक यवन आक्रमण का खतरा ब्न्हारत के समक्ष था तो आज अनेक प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्श आक्रमणों का खतरा इस देश पर मंडरा रहा है. एक ओर पड़ोसी देश द्वारा प्रश्रित आतंकवादी गतिविधियां हैं तो दूसरी ओर अन्य बाहरी खतरे. आंतरिक स्थितियों की तुलना भी तत्कालीन स्थितियों से भिन्न नहीं है. आज भी आम्भीक पुरु, नंद दूसरे रूप में हैं और उनके अधिकारियों-सामंतों की भांति देश के नयमन और संचालन के जिम्मेदार लोग आज वैसे ही इसकी जड़ों को कमजोर कर अपना हित साधन कर रहे हैं जैसे तब हो रहा था. समय की मांग है कि आज के संदर्भ में चाणक्य की भूमिका को समझा जाए तभी यह देश और इसकी संस्कृति अक्षुण्ण रह सकती है. अन्यथा आक्रांता यवन हों या कोई और देश को नष्ट करना ही उनका परम उद्देश्य है और उसी की रक्षा का संदेश है ’विष्णुगुप्त चाणक्य’ जिसके लिए लेखक, और प्रकाशक साधुवाद के पात्र हैं.
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गुरुवार, 8 मई 2008

यात्रा संस्मरण

क्रान्ति दिवस (१० मई) पर विशेष
यात्रा संस्मरण

यह यात्रा संस्मरण 'पहल' पत्रिका एक अंक-58 में प्रकाशित हुआ था, लेकिन क्रान्ति दिवस (१० मई ) के अवसर पर 'रचना समय' के पाठकों के लिए पुनः प्रकाशित करने के मोह को नहीं रोक पा रहा हूं. यह संस्मरण अभी तक मेरी किसी पुस्तक में प्रकाशित नहीं हुआ है.

बिठूर : क्रान्ति के बाद
रूप सिंह चन्देल

जून का महीना और कानपुर की गर्मी… लग रहा था, जैसे शरीर झुलस जाएगा. आसमान में लपटें-सी तरंगित हो रही थीं. हम लोग प्रचंड दोपहर में निकले. कार्यक्रम था उस पवित्र भूमि को देखने जाने का, जिसे पुराणों में उत्पलावर्ण, ब्रह्मावर्त, बर्हिस्मतीपुरी तथा उत्पलावर्त कानन कहा गया है और जो आज बिठूर के नाम से जाना जाता है.
बिठूर कानपुर से लगभग पचीस किलोमीटर पश्चिमोत्तर में अवस्थित है. प्राचीनता की दृष्टि से इसकाजमऊ (जेजाक-भुक्ति) के बाद आता है. जाजमऊ कानपुर के पूर्व में (अब तो शहर के अन्दर ही) स्थित है, जिसके विषय में कहा जाता है कि यह महाराजा ययाति की राजधानी था. आज भी वहां ययाति का किला अपने गर्भ में अनेकों रहस्य छुपाये धरती पर पसरा हुआ है. वैसे तो कानपुर के आसपास अनेक ऎसे स्थान हैं जो पौराणिक-ऎतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. इनमें से अनेक की प्रामाणिकता सुनिश्चित होना शेष है. यही नहीं कानपुर के इतिहास के विषय में भी अनेक किंवदन्तियां प्रचलित हैं. कुछ लोगों के अनुसार वहां श्रीकृष्ण का कर्णवेध संस्कार हुआ था, अतः इसीलिये उसका नाम 'कान्हपुर' पडा़. कुछ लोगों के अनुसार यह कर्ण की निवास-भूमि थी, इसलिये इसका नाम 'कर्णपुर' था. लेकिन इन किंवदन्तियों पर सहज विश्वास नहीं होता.
मुंशी दरगाही लाल के मतानुसार (जो सन १८५७ की क्रान्तिकाल के इतिहासकार थे) कन्हैया अष्टमी के दिन गंगा स्नान के लिये आये संचेडी के राजा हिन्दू सिंह को इस स्थान की रमणीकता अत्यधिक पसंद आयी थी. अतः उन्होंने रमईपुर के चैहानवंशीय राजा घनश्याम सिंह को वहां एक गांव बसाने की आज्ञा दी थी. इस प्रकार कान्हपुर की नींव पड़ी थी, जिसे आज पुराना कानपुर कहा जाता है. लेकिन 'तारीखे शेरशाही' से इस बात का खण्डन होता है.
'तारीखे शेरशाही' में पहली बार कान्हपुर का उल्लेख आया है. सन १९१७ में प्रयाग हाईकोर्ट में एक मुकदमा दायर किया गया था. इस मुकदमे में मोतीलाल नेहरू तथा कैलाशनाथ काटजू वकील थे. मुकदमे में 'कान्हपुर' के जिस इतिहास का वर्णन किया है उसके अनुसार मुकदमा दायर होने से सात सौ वर्ष पहले एक बार 'प्रयाग' के राजा 'कान्हदेव' प्रयाग से कन्नौज जाते समय गंगा स्नान करने के लिये यहां कुछ दिन ठहरे थे. इस स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य ने उन्हें मुग्ध कर दिया था. उन्होंने उस स्थान को एक ब्राह्मण को गांव बसाने के लिये दान कर दिया था. इस प्रकार राजा कान्हदेव के नाम से उस ब्राह्मण ने जो गांव बसाया, वह कान्हपुर था, जो बाद में पुराना कानपुर (नवाबगंज क्षेत्र) कहलाया.
कानपुर की नींव तेरहवीं शताब्दी में पड़ी या उसके बाद, इस बात से अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि बिठूर सैकड़ों वर्षों से श्रद्धालुओं के लिये तीर्थस्थल बना हुआ था. बिठूर के विषय में कहा जाता है कि ब्रह्मा ने वहीं पर सृष्टि रचना की थी और सृष्टि रचना के पश्चात अश्वमेध यज्ञ किया था. उस यज्ञ के स्मारक स्वरूप उन्होंने घोड़े की एक नाल वहां स्थापित की थी, जो ब्रह्मावर्त घाट के ऊपर अभी तक विद्यमान है. उसे ब्रह्मनाल या ब्रह्मा की खूंटी कहते हैं. आज भी लोग उसकी पूजा करते हैं. (हालांकि वह नाल मुझे कहीं नहीं दिखी).
इस स्थान का नाम ब्रह्मावार्त कब पड़ा, इसके स्पष्ट प्रमाण प्राप्त नहीं होते. मनुस्मृति के अध्याय दो, श्लोक सत्रह के अनुसार सरस्वती तथा दृषद्वती (आज की घाघरा नदी) के बीच का भाग ब्रह्मावर्त होना चाहिये. अंतराल में बिठूर क्षेत्र को ही ब्रह्मावर्त कहा जाने लगा, जो बाद में बिठूर बन गया
कल्याणपुर पहुंचकर (जहां आई.आई.टी है) , ड्राइवर ने एक पान वाले से बिठूर का रास्ता पूछा. हमें दो रास्ते बताये गये थे. एक कल्याणपुर थाने के पास से मुड़ता है और दूसरा मन्धना से. मन्धना से मुड़ते ही मेरा मन दूर-दूर तक फैले खेतों में भटक गया. दूर बायीं ओर कांसों का जंगल दिखाई पड़ा. सोचने लगा, कभी वहीं नाना साहब और उनकी मुंह बोली बहन छबीली घोड़े दौड़ाते रहे होंगे और कभी यहीं बाल्मीकि ने तपस्या की होगी. महर्षि के मुख से सर्वप्रथम यहीं विश्व की पहली कविता फूटी होगी. राम द्वारा निर्वासित सीता ने बिठूर के बाल्मीकि आश्रम में अपने दिन गुजारें होंगे और यहीं लव-कुश का जन्म हुआ होगा. बिठूर के पास एक गांव है 'रमेल' , जिसके विषय में कहा जाता है कि यह 'रणमेल' का बिगड़ा रूप है. इसी स्थान पर लव-कुश और राम की सेना के मध्य युद्ध हुआ था और बाद में पिता-पुत्र में मेल. पहले युद्ध फिर मेल… अतः इस गांव का नाम पड़ा रणमेल. जो अब रमेल के रूप में जाना जाता है.
लगभग छह किलोमीटर रास्ता तय कर पहले हम बाल्मीकि आश्रम पहुंचे, जिसके विषय में कहा जाता है कि निर्वासन काल में सीता वहीं रहती थीं. उसके ठीक सामने एक कुण्ड है, जिसके विषय में कहते हैं कि जीवन के अंतिम दिनों में सीता के आव्हान पर वहीं पर पृथ्वी फटी थी और वह उसमें समा गयी थीं. सीता कुटी से सटकर पश्चिम की ओर है वह कुटी, जिसमें बाल्मीकि रहा करते थे. लेकिन इन कुटियों या आश्रम की अन्य वस्तुओं में प्राचीनता ढूंढना कठिन है.
बाल्मीकि आश्रम के पूर्व की ओर बाजीराव पेशवा द्वारा निर्मित 'स्वर्ग-सीढ़ी' नामक स्तंभ है. इस स्तंभ के चारों ओर हजारों छोटे-छोटे आले बने हैं, जिनमें पेशवा के समय दीपावली के दिन हजारों दीप जगमगा उठा करते थे और हजारों की संख्या में लोग उन दीपों की जगमगाहट देखने के लिये इकट्ठा हो जाया करते थे. स्तंभ की 48 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाने पर 'रणमेल'(रमेल) गांव, बिठूर का मृतप्राय वैभव और कानपुर नगर स्पष्ट दिखाई देते हैं.
कुछ इतिहासकार बाल्मीकि आश्रम को बिठूर में न मानकर इलाहाबाद के पास मानते हैं और शंकरदयाल सिंह ने उसे बिहार में बताया था. लेकिन अब तक प्राप्त प्रमाणों के अनुसार उसका बिठूर में होना ही सिद्ध होता है. वैसे आश्रम कहीं भी क्यों न रहा हो, लेकिन बिठूर के प्रति भक्तों की श्रद्धा में कोई फर्क नहीं पड़ता. आज भी अनेक अवसरों पर बाल्मीकि आश्रम में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ एकत्रित होती है. 'स्वर्ग-सीढ़ी स्तंभ' के ठीक सामने दक्षिण की ओर एक पेड़ है, जिसके विषय में बताया गया कि वह 2600 वर्ष पुराना है. उसकी शाखाओं-प्रशाखाओं से कुछ दूरी पर तीन और पेड़ों ने जन्म लिया , लेकिन इन पेड़ों के आपसी सम्बन्ध को पुरातत्व विभाग वालों ने नष्ट कर बीच में एक छोटा सा पार्क बना दिया. एक सज्जन ने बताया कि वे तो उस प्राचीन पेड़ को ही काट रहे थे, किन्तु अनेक प्रभावशाली लोगों से कहलवाने पर उनका यह कुचक्र रुका था. मैं सोचने लगा, काश ! पुरातत्व विभाग उन तीनों पेड़ों को उनके पिता से अलग कर मध्य में कृत्रिम क्यारियां न बनाता तो वहां के वास्तविक प्राकृतिक सौंदर्य से हम वंचित न हुये होते.
यहां से दो किलोमीटार दूर गंगा तट पर एक छोटी पहाड़ी है, जिसे ध्रुवटीला के नाम से जाना जाता है. यहां छोटा-सा ध्रुव मन्दिर है, जिसमें एक मजदूर परिवार रह रहा है. मन्दिर के पीछे का परकोटा टूटा हुआ है, जहां से दूर तक फैला कांसों का जंगल दिखाई देता है. मन्दिर के अंदर घुप अंधेरा था. उसके छोटे से द्वार से हमें ध्रुव की मूर्ति दिखाई गई. हम मजदूर पुजारी से मन्दिर की प्राचीनता के विषय में जानना चाहते हैं. वह केवल इतना ही बता पाता है कि देश में वही एक मात्र ध्रुव मन्दिर है. लेकिन ध्रुव कौन थे… वह यह नहीं जानता. कहते हैं उसी क्षेत्र में ध्रुव के पिता उत्तानपाद की राजधानी थी और पिता द्वारा निकाले जाने के बाद तपस्या करके लौटने पर ध्रुव ने वहीं रहकर शासन किया था. कुछ वर्ष पूर्व बिठूर के पास ताम्रयुग के भालों के फलकों एवं वाणों की प्राप्ति से इस स्थान की प्राचीनता का अनुमान लगाया जा सकता है. यदि ध्रुव- टीला क्षेत्र की खुदाई की जाये तो संभावना है कि इस स्थान के विषय में कुछ अधिक जानकारी प्राप्त हो सके.
मुगलकाल में जहांगीर ने कन्नौज का क्षेत्र बैरम खां के पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना को दे दिया था. अतः कुछ दिनों के लिये बिठूर हिन्दी के महाकवि रहीम के शासन में रहा. अपने शासनकाल में यदि रहीम यहां आये हों तो इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. सन 1658 में औरंगजेब खजुहा (फतेहपुर) में शुजा से युद्ध करने के लिये बिठूर के निकट से होकर गुजरा था… इस बात के प्रमाण मिलते हैं.
लेकिन बिठूर सदैव एक तीर्थ के रूप में ही जाना जाता रहा है. बुन्देलखण्ड के प्रसिद्ध मराठी शासक गोविन्द पंत बुन्देले ने गंगा तट पर एक प्रसिद्ध घाट बनवाकर इसकी महिमा इतनी अधिक बढ़ा दी थी कि यह काशी, मथुरा, अयोध्या, प्रयाग आदि तीर्थों की श्रेणी में परिगणित होने लगा.
अवध के शासनकाल में बिठूर सूबा इलाहाबाद में एक चकला(जिला) था और अल्मासअली खां उसका आमिल था. अल्मासअली ने अपनी बुआ के लड़के भागमल को पंजाब से बुलाकर रमेल की जागीर दी थी. राजा भागमल ने बिठूर में एक हवेली बनवाई थी और कई बाग लगवाये थे. अतः एक बार पुनः यह प्राचीन तीर्थ-भूमि चहल-पहल का केन्द्र बनने लगी थी.
लेकिन बिठूर का खोया वैभव वास्तव में वापस लौटा था वहां बाजीराव पेशवा के आगमन के साथ. सन 1818 में तृतीय मराठा युद्ध में हार जाने के बाद अंग्रेजों से पेंशन लेकर बाजीराव ने बिठूर में रहने का निर्णय किया था, क्योंकि अंग्रेजों ने उन्हें रहने के लिये केवल उत्तर भारत के किसी स्थान का चुनाव करने की ही अनुमति दी थी. निर्वासित पेशवा के साथ आये थे उनके पन्द्रह हजार संगी-साथी. पेशवा के आगमन से वहां के इतिहास में जो नवीन अध्याय प्रारंभ हुआ, उसने उसे सम्पूर्ण विश्व में महत्वपूर्ण बना दिया. बाजीराव अंग्रेजों से पराभूत होकर बिठूर में आकर रहने तो लगे थे, लेकिन शायद अपनी राज्यभूमि को पुनः हस्तगत करने की चाह उनके अन्दर धधकती रही थी. भले ही उन्होंने कभी इसे प्रकट न होने दिया हो. सन 1822 में लार्ड हेंस्टिग्सं ने पेशवा के विषय में लिखा था, "यद्यपि बाजीराव पेशवा का आचरण सन्तोषप्रद है, फिर भी उसने अपने प्राचीन स्थान को पुनः प्राप्त करने की आशा को सर्वथा त्यागा भी नहीं है."
पेशवा ने अपने दत्तक पुत्र नाना साहब, तात्या टोपे तथा अत्यन्त प्रिय मनु (छबीली) को जो संस्कार दिये थे, उसके पीछे निश्चित ही उनकी दूर दृष्टि रही होगी. उनके दिल के अंदर अवश्य यह भावना छुपी रही होगी कि जो कार्य वे स्वयं नहीं कर पाये वह उनके द्वारा तैयार यह पीढ़ी कर दिखाये. इसीलिये उन्होंने छबीली (लक्ष्मीबाई) को सदैव अस्त्र-शस्त्र चलाने तथा घुड़सवारी के लिये प्रोत्साहित किया. उन्होंने इन तीनों वीरों को संरक्षण-सुविधा ही नहीं प्रदान की, प्रत्युत सही मार्ग दर्शन भी दिया और उसी का परिणाम थी सन 1857 की क्रान्ति. अतः यह कहना अनुचित न होगा कि इस क्रान्ति की आधारशिला पेशवा की पराजय के समय ही रखी जा चुकी थी. भले ही वह बाजीराव द्वारा सम्पन्न न होकर उनके दत्तक पुत्र नाना साहब तथा उनके सहयोगियों द्वारा सम्पन्न हुई.
बिठूर आने पर पेशवा ने वहां एक भव्य महल (बाडा़) का निर्माण करवाया, जिसमें वह अपने परिवार के साथ रहते थे. इस विशाल - विस्तृत भवन के कुछ हिस्सों में उनके कुछ दरबारी रहते थे, जिनमें वाराणसी से उनकी सेवा में आये मोरोपंत ताम्बे भी थे. इन्हीं की पुत्री थी मनु, जो बाद में झांसी की रानी बनी.
बाजीराव पेशवा ने ग्यारह विवाह किये थे, उनमें से 1810 में उनकी एक रानी वाराणसी बाई से एक पुत्र उत्पन्न हुआ था, जो 1811 में मर गया था. उनकी दूसरी रानी बेणुबाई उर्फ कुसाबाई के भी एक पुत्र उत्पन्न हुआ था जो केवल 19 दिन जीवित रहा था. गंगाबाई नामक रानी से उन्हें ताई साहबा और बया साहबा नामक दो पुत्रियां थीं, जो पेशवा के मरने के बाद भी जीवित रहीं थीं.
पुत्रहीन होने के कारण पेशवा ने पूना के निकटवर्ती कर्जत तालुका के वेणु गांव के निवासी माधवराव भट्ट के तीन वर्षीय पुत्र धोण्डुपन्त , जो बाद में नानासाहब के नाम से विख्यात हुये, को 1827 में गोद लिया. 1838 में उन्होनें अपनी वसीयत नाना साहब के नाम लिख दी थी.
जब हम नाना साहब का विशाल भवन देखने पहुंचे तो आघातित हुए बिना नहीं रह सके. हमें अग्रेंजों की बेमिसाल क्रूरता का उदाहरण देखने को मिला. उस विशाल भवन के नाम पर उसकी एक पूर्वी दीवार का छोटा-सा टुकडा़ मात्र ही दिखाई पडा़, जिसके चारों ओर दरख्त, कुछ कांस तथा झाड़ियां उगी हुई थीं. यदि शीघ्र ही उसकी सुरक्षा की व्यवस्था न की गई तो पेशवा के महल की वह अंतिम निशानी भी नष्ट हो जायेगी और तब हम अपनी भावी पीढ़ी को कभी भी यह न बता पायेगें कि यही वह स्थान है, जहां वीरों ने एक ऎसी योजना बनाई थी जिससे विलायत का सिंहासन डोल उठा था. आश्चर्यजनक रूप से पेशवा के महल के भूभाग में युकलिप्टस के पेड़ और झाड़ियों का जंगल उगा हुआ है, जिसे देख मन विचलित हो उठा.
(हाल में अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली में कार्यरत डा० टोपे, जो अपने को तात्यां टोपे का वशंज बताते हैं, बिठूर यात्रा पर गये थे. उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह सरकार ने वहां कुछ कार्य किया है. आशा है वर्तमान सरकार के शीर्ष पर बिराजमान लोग अपनी मूर्तियों के निर्माण से मुक्त होकर इस दिशा में ऎसा कार्य करेगें जिससे 1857 के महान वीरों की स्मृतियां सुरक्षित रह सकें) .
1852 में पेशवा की मृत्यु के पश्चात नाना साहब ने उत्तराधिकारी के रूप में कार्यभार संभाला, लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें उत्तराधिकार से वंचित करके पेंशन बंद कर दी थी. परिणामतः नाना ने पेशवा की पेंशन प्राप्त करने के लिये अजीमुल्ला खां को 1853 में 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' के डायरेक्टर्स के नाम एक मेमोरियल लेकर इंग्लैंड भेजा था. बचपन में एक अंग्रेज के घर में बावर्ची के रूप में जीवन प्रारंभ करने वाले अजीमुल्ला खां न केवल महान देशभक्त थे, बल्कि हिन्दी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी के प्रकाण्ड विद्वान भी थे.
अजीमुल्ला खां को इंग्लैण्ड में अपने उद्देश्य में सफलता नहीं प्राप्त हुई. लेकिन वहां के समाज में उनके नवाबी आचार-विचार, वेशभूषा तथा रहन-सहन का अच्छा प्रभाव पड़ा. लोग उन्हें भारत का एक राजा समझने लगे थे. अजीमुल्ला खां सौन्दर्य के साक्षात प्रतिरूप थे. बोलचाल में निहायत नम्र. परिणाम यह हुआ कि अनेक संभ्रांत अंग्रेज परिवारों में उनका आवागमन हो गया था. कहते तो यहां तक हैं कि जब वह सड़क पर चलते थे, उनके पीछे अनेक अंग्रेज युवतियां हो लेती थीं. इस बात में भले ही अतिशयोक्ति हो किन्तु यह सत्य है कि जिन परिवारों में वह आते-जाते थे, उनकी अनेक युवतियां उन्हें प्यार करने लगी थीं और उनके साथ अजीमुल्ला खां के पत्र-व्यवहार होने लगे थे. पत्राचार का सिलसिला उनके बिठूर लौट आने के बाद भी चलता रहा था. 1857 की क्रान्ति के बाद इन प्रेम-पत्रों को अंग्रेज उठा ले गये थे. बाद में इन पत्रों की एक पुस्तक - "इण्डियन प्रिंस एण्ड दि इंग्लिस पियरेस" नाम से छपी थी.
जिन दिनों अजीमुला खां इंग्लैण्ड में थे, सतारा के राजा की ओर से राज्य वापस लौटाने की अपील करने के लिये रंगोजी बापू भी वहां गये थे, लेकिन उन्हें भी अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिली थी. अजीमुल्ला खां के साथ उनका सम्पर्क हुआ और दोनों ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अंग्रेजों से मुक्ति का एक ही मार्ग है… वह है उनके विरुद्ध सशस्त्र क्रान्ति. रंगोजी बापू दक्षिण भारत में क्रान्ति की ज्वाला धधकाने के लिये वापस लौट आये थे, किन्तु अजीमुल्ला खां पेरिस के रास्ते रूस गये थे तत्कालीन रूसी शासक (संभवतः निकोलस प्रथम) से अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता प्राप्त करने.
1857 की क्रान्ति की आधारशिला रखने का श्रेय जहां पेशवा बाजीराव को जाता है वहीं उसको व्यापक योजना का रूप दिया था अजीमुल्ला खां ने. उनके विदेश से लौटने के कुछ दिन बाद ही नाना साहब ने लखनऊ, झांसी, मेरठ, दिल्ली और पटियाला की रहस्यमय यात्रायें की थीं, जिन्हें धार्मिक यात्रायें कहा गया था. इन यात्राओं में अजीमुल्ला खां उनके साथ रहे थे.

दिसम्बर 1857 कॊ होपग्रण्ट ने बिठूर को अपने अधिकार में कर लिया था और नाना को न पाकर उसने उनके उस भव्य भवन को तोपों से उड़वा दिया था. महल के पास स्थित कुएं के पास एक पत्थर पर खुदा है कि प्रतिशोध की ज्वाला जब इतने से भी शांत नहीं हुई तो उसने महल के मलबे को हटवा कर वहां हल चलवा दिया था.
हम उस स्थान पर खड़े थे जो कभी महल का मध्य भाग रहा होगा. वहां नाना साहब की एक प्रतिमा स्थापित है, जिसे कंटीले तारों से घेर दिया गया है. उस प्रतिमा के विषय में पटना के मेरे मित्र श्री सत्यनारायण सिन्हा ने एक बार बताया था कि वास्तव में वह प्रतिमा नाना सहब की वास्तविक प्रतिमा नहीं हैं. किसी अंग्रेज ठेकेदार द्वारा तैयार करवाकर भारत सरकार ने 1947 में उसे वहां स्थापित किया था. यह बात तात्या टोपे के भतीजे नारायण राव ने कभी सिन्हा जी को बतायी थी. नाना साहब का वास्तविक चित्र आज भी टोपे परिवार के पास है, और यह परिवार बिठूर में ही रह रहा है.
प्रश्न केवल नाना साहब की वास्तविक प्रतिमा की स्थापना का ही नहीं, प्रश्न है उस पवित्र भूमि में तात्या टोपे, अजीमुल्ला खां, शमस्सुद्दीन, टीका सिंह, ज्वाला प्रासाद, लक्ष्मीबाई, बालासाहब आदि महानात्माओं की प्रतिमाओं की स्थापना और उसे पर्यटन-स्थल बनाने का भी है. उस स्थान की ऎतिहासिकता को अक्षुण रखते हुए वहां एक म्य़ूजियम भी स्थापित किया जाना चाहिए जहां इन महान पुरुषों से सम्बन्धित वस्तुओं को रखा जा सके. लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार की इच्छाशक्ति के अभाव और केन्द्र सरकार की उदासीनता के कारण शक्तिशाली ब्रितानी सरकार को हिला देने वाले वीरों की वह भूमि आज जंगल में बदल चुकी है. जहां कभी रातें नृत्य-संगीत और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों में डूबी रहती थीं, वहां अब श्रंगालों का कोरस स्वर गूंजता है.
हम वहां से कुछ कदम आगे गंगा की ओर बढ़े. हमें कुएं दिखाई दिये, जो हाथियों, घोड़ों आदि को पानी पिलाने के लिये प्रयुक्त होते थे. उनसे जुड़े हुये थे वे हौज जिनमें जानवर पानी पीते रहे होंगे. कुओं से पानी पुरों द्वारा निकाला जाता था. तीन में पानी था. नाना साहब के महल की दीवारों की ईटें भी दिखाई दीं जिन पर उगी घास सूख चुकी थी.
नाना साहब के महल को ध्वस्त करने से पूर्व होपग्रण्ट ने एक कुएं में छुपाए गए उनके खजाने को 15 दिसम्बर, 1857 से 26 दिसम्बर तक निकलवाया था. बारह दिनों तक रात-दिन कार्य होता रहा था. फोरबस मिचल के अनुसार, "उसमें से तीस लाख रुपये नकद, सोने के बर्तन, एक चांदी का हाथी का हौदा निकले थे." जिन सिपाहियों से खजाना निकालने का काम लिया गया था, उन्हें यह आश्वासन दिया गया था कि प्रति सिपाही एक हजार रुपया दिया जायेगा, किन्तु बाद में उन्हें कुछ भी न दिया गया था.
वहां और अधिक ठहरने की इच्छा हो रही थी, लेकिन समयाभाववश हमें आगे बढ़ना पड़ा. हम बिठूर गांव के मध्य से होकर निकले . यहीं तात्या टोपे का पुश्तैनी मकान है. अंग्रेजों ने उसे भी नहीं बख्शा था. अंग्रेजों ने तात्या टोपे को भारत का "गैरीबाल्डी" कहा था. इस वीर ने तो अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था. बाद के अनुसंधानों से यह सिद्ध हो चुका है कि अंग्रेजों ने जिस तात्या को 18 अप्रैल 1858 को फांसी दी थी वह असली तात्या न था. तात्या ने क्रान्ति की अलख जगाये रखने के लिये दो अन्य हमश्क्लों को अपनी ही भांति तैयार कर लिया था और फांसी पर चढ़ने वाला उनमें से कोई एक था. तात्या बाद में वर्षों तक मध्य प्रदेश में भटककर क्रान्ति की असफल तैयारी करते रहे थे. वे साधुवेश में गांव-गांव घूमते रहे हे, लेकिन अंग्रेजों की पकड़ से बाहर ही रहे थे.
गांव के मध्य से होकर हम गंगाघाट पर पहुंचे. यहां अनेक प्रसिद्ध घाट हैं. इनमें सबसे पुराना घाट गोविन्दराव बुन्देले का बनवाया हुआ है, जो बाजीराव प्रथम के समय में बुन्देलखण्ड का शासक था तथा जिसने सर्वप्रथम मराठा परिवारों को बिठूर में रहने के लिये भेजा था. यहीं पर है बह्मावार्त घाट, जिसे संचेड़ी के चन्देल राजा हिन्दू सिंह ने बनवाया था और बाद में जिसका जीर्णोद्धार बाजीराव पेशवा ने किया था. ब्रह्मावर्त घाट की सीढ़ियों के पास एक गुप्त मार्ग दिखाई दिया, जिसमें सीढ़ियां बनी हुई थीं. अनुमान लगाना कठिन नहीं कि वह मार्ग सीधे नाना साहब के महल तक जाता रहा होगा और राज-परिवार की स्त्रियां उसी गुप्त मार्ग से गंगा स्नान के लिये आती रही होंगीं.
घाटों में सबसे अच्छा है लखनऊ के नवाब गाजीउद्दीन हैदर के मंत्री राजा टिकैतराम श्रीवास्तव द्वारा बनवाया घाट. इसे देखकर इसकी तबकी भव्यता का अनुमान किया जा सकता है. पेशवा बाजीराव ने 'महाराज' नामक घाट बनवाया था. लेकिन अब ये सभी घाट जीर्णावस्था में हैं. अधिकांश की अंतिम सीढ़ियां टूट चुकी हैं और प्रायः यहां दुर्घटनायें होती रहती हैं. कुछ घाटों के साथ बने रिहायशी भवनों में कई परिवार रह रहे हैं. यहीं एक बारादरी है, जो 250 वर्ष पुरानी है. यहां बाल्मीकि आश्रम के अतिरिक्त कुछ अन्य आश्रम भी हैं, जो श्रद्धालुओं के ठहरने की सुविधा भी देते हैं.
यहां पेशवा द्वारा बनवाये गये अनेक मन्दिर हैं. आज भी 'नारायण बलि' के निमित्त लोग यहां दूर-दूर से आते हैं. गांव के मध्य में 1857 में अंग्रेजों की क्रूरता के शिकार होकर वहां से भागे अथवा देश के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले वीरों के मकानों के भग्नावशेष यह बताते हैं कि कभी उनके दरवाजे पर खड़ी गृहस्वामिनियां क्रान्तिकार्यों में व्यस्त अपने पतियों की प्रतीक्षा करती रही होंगी.
आज जहां सनाटा है, कभी वहां लोरियां गायी जाती रही होंगी.
सन्ध्या अपने डैने पसारने लगी थी. हम लोग वापस लौट पड़े. इस बार हम मैनावती मार्ग से कानपुर लौट रहे थे. यह मार्ग उसी मैनावती के नाम पर है, जिसे कुछ इतिहासकारों ने नाना साहब की बहिन तो किसी ने बेटी बताया है, जबकि वह एक दासी थी. होपग्रण्ट ने जब पेशवा के महल को ध्वस्त किया था, मैनावती महल के अंदर थी.
लौटते हुये हमारे मन उदास थे. हवा अभी भी गर्म थी और आसमान में परिन्दे क्षितिज की ओर दौड़ते नजर आ रहे थे.
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लेखक की पुस्तक - 'क्रान्तिदूत अजीमुल्ला खां' शीघ्र ही पंजाबी भाषा में प्रकाशित होगी. हिन्दी और असमिया में इसका प्रकाशन 'प्रकाशन विभाग' भारत सारकार द्वारा किया गया था और पंजाबी अनुवाद भी वही प्रकाशित कर रहे हैं. इसका अनुवाद पंजाबी के प्रसिद्ध युवा कवि और पंजाबी 'योजना' पत्रिका के सम्पादक श्री बलबीर मधोपुरी ने किया है.

शनिवार, 26 अप्रैल 2008

पुस्तक चर्चा

शहर गवाह है(उपन्यास)
लेखक : रूपसिंह चन्देल
प्रकाशक : भावना प्रकाशन, 109-ए,
पटपड़गंज, दिल्ली-110091

मूल्य : 450 रुपये
पृष्ठ : 384





नर्क होता शहर और गर्क होते संबंध
रमेश कपूर

यह कहना बहुत मुश्किल है कि किसी शहर की पहचान उसमें बसने वाले लोगों से होती है या लोगों की पहचान किसी शहर से। यही प्रश्न कथाकार रूपसिंह चन्देल के नवीनतम उपन्यास ‘शहर गवाह है‘ को पढ़ते हुए बार-बार मन में उठता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग दो दशक पूर्व के पारम्परिक गांवों से आरंभ होकर ‘शहर गवाह है’ की कहानी उत्तर प्रदेश के रायबरेली से कानपुर तक फैली हुई है। इन शहरों, विशेषकर कानपुर शहर का भीतरी फैलाव देश की तत्कालीन कई पीढ़ियों के फैलाव का प्रतिनिधित्व करता है। अपने जीवन-वृत्तांत को अपने यहां रहने वाले लोगों के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाते इन शहरों में जीवन की तेज रफ्तार इन्हें एक पहचान तो देती है, किन्तु ‘नर्क‘ होते इन शहरों में होते परिवर्तन बहुत तक़लीफदेह हैं। दरअसल एक नए शहर की कोख में एक और नए शहर के बस जाने की व्यथा बहुत उद्वेलित करती है।
शहर का यह उद्वेलन उसमें रहने वाले लोगों के जीवन को प्रभावित न करे, यह संभव ही नहीं है। वास्तव में जिस व्यथा का जिक्र मैं कर रहा हूँ, वह तीन पीढि़यों के माध्यम से व्यक्त होती है। जिस तरह एक इंसान अपना जीवन जीते हुए अपने वर्तमान, अतीत और अपने भविष्य में एक साथ जीता है, वही हाल किसी गांव-शहर का भी है। कानपुर इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। उसकी व्यथा यदि सामाजिक मूल्यों, व्यक्तिगत ईमानदारियों, भारत-पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासतों, हिन्दू-मुसलमान की व्यापारिक हिस्सेदारियों और देश की स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने को तत्पर क्रान्तिकारियों की छटपटाहट और संघर्ष से तौली जाए तो कह सकते हैं कि कुएं के एक छोर से कुएं के दूसरे छोर तक अंधेरे के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। ये अंधेरे न केवल जीवन-मूल्यों को ह्रास की स्थिति में ले जाते हैं, बल्कि पारस्परिक संबंधों को भी बुरी तरह प्रभावित करते हैं। संबंधों के इस फैलाव में एक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व दिलीपसिंह और समर बहादुर सिंह करते हैं तो उनसे अगली पीढ़ी की कमान राधिकारमण सिंह के हाथों में है, जो कानपुर के डी.ए.बी. कॉलेज में पढ़ते हुए चन्द्रशेखर आजाद और हलधर बाजपेई जैसे क्रान्तिकारियों के सान्निध्य में आते हैं। उनके पूरे जीवन पर इन क्रान्तिकारियों का प्रभाव बना रहता है। शायद यही कारण है कि राधिका रमण अधिक खुले विचारों के व्यक्ति हैं। किसी की भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में वह बाधा नहीं बनना चाहते। यहां तक कि अपनी सुपुत्री शैलजा के इस निर्णय पर भी वह कोई आपत्ति नहीं करते कि वह एक छोटे शहर से दिल्ली जैसे महानगर की भीड़ में नितांत अकेली रहकर नौकरी करे।
किन्तु आश्चर्य है कि उनकी यह ‘प्रोग्रेसिव’ सोच उनकी अगली पीढ़ी तक एक परंपरा के रूप में स्थापित नहीं हो पाती। भविष्य की यह पीढ़ी उनके सुपुत्र धर्मेंद्र और सुपुत्री शैलजा के तेज़-तर्रार क़दमों के साथ-साथ चलती है। इस पीढ़ी तक आते-आते संबंध अपनी महत्ता खोने लगते हैं। उनमें एक नामालूम-सा खोखलापन घर करने लगता है। संबंधों का यह खोखलापन जिस मुकाम पर आकर ठहरता है, जिस पड़ाव पर आकर रुकता है, वहां इंसान वापस लौटने को मजबूर हो जाता है। यहीं से वह आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया प्रारंभ करता है। और आत्मावलोकन के पश्चात् वह पाता है कि वह अपनी उन जड़ों से कट चुका है, जो धरती से जल लेकर उसे सींचने का काम करती हैं। तभी तो न दिलीप सिंह अपने गांव वापस जा पाते हैं, न ही राधिकारमण। इस बात का उन्हें दुख तो है ही। अपनी जड़ों से कट जाने का दुख हमेशा उन्हें सालता रहता है। शायद यही कारण है कि दिलीपसिंह हमेशा अपने को कानपुर में स्थापित करने की प्रक्रिया में लगे रहते हैं। वह कभी कपड़ों के व्यापार से जुड़ते हैं तो कभी कोयले के व्यापार से। जीवन में इतनी जद्दोजहद के बाद भी पहचान का संकट उनके साथ बना ही रहता है। संतुष्टि और स्थायित्व आसानी से मिल नहीं पाता।
इसके बावजूद एक पीढ़ी ऐसी भी है, जो अपनी जड़ों से कटने को तैयार नहीं है। बेशक उन्हें टूटना स्वीकार है। यह पीढ़ी है दिलीप सिंह के पिता भूरे सिंह और दिलीप के मित्र इकरामुर्रहमान के पिता खलीलुर्रहमान की। अपना गांव…अपनी गलियां…अपनी धरती उनकी सांसों में इस कदर रची-बसी हैं कि उसे छोड़कर कहीं अन्यत्र जाना उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। दिलीप के पिता तो स्पष्टत: नकारते हुए कहते हैं कि ‘‘दिलीप , मेरी ज़िंदगी गांव में कटी है्…यहीं मरूंगा।” ( पृ.135) –– और उधर खलीलुर्रहमान भी इसी सोच से घिरे हैं। उनकी पत्नी स्पष्ट तौर पर उनसे कहती हैं कि ‘‘इस शहर में हमारा है ही क्या ?… अगर आप भी अपना काम समेटकर लाहौर चलें… ।”( पृ. 152) लेकिन यह प्रस्ताव उन्हें पसंद नहीं। फिर भी वह उदास मन से कहते हैं कि ‘‘ … मेरा मन भी यहां से उखड़ गया है। लेकिन लाहौर जाकर गांव से पूरी तरह से कट जाऊंगा।” (पृ. 152)। कानपुर के उस दंगे के पश्चात् जिसमें गणेश शंकर विद्यार्थी शहीद हुए और आतताइयों द्वारा इकरामुर्रहमान की दुकान जला दी गई, खलीलुर्रहमान लाहौर निवासी अपने साले और इकराम के ससुराल वालों की सलाह पर इकराम को लौहार भेजने का निर्णय कर लेते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए भारतवासियों के संघर्ष से पूरे देश में आग लगी हुई है। भारत का कोई शहर इससे अछूता नहीं। कानपुर भी नहीं। शायद अपने भविष्य की सोच कर ही खलील बड़ी जद्दोजहद के पश्चात् स्वयं भी लाहौर चले जाते हैं।
इकराम और खलील के लाहौर प्रस्थान को लेखक ने हालांकि अधिक महत्व नहीं दिया है, फिर भी इसे भविष्य के लिए संकेत के रूप देखना उचित होगा। क्या मुसलमान लोगों का लाहौर या लाहौर से कानपुर-दिल्ली में हिन्दुओं का पलायन महज एक छोटी-सी घटना थी ? वह भी 1947 से पहले –– लेकिन यह अप्रत्याशित नहीं लगता। संभवत: इसके पीछे एक बड़ा कारण सामाजिक सुरक्षा का था। पलायन की यह प्रक्रिया एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। एक ऐसी लंबी प्रक्रिया, जिसके पीछे सांस्कृतिक कारण भी रहे हैं और राजनैतिक भी। अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य को बनाए रखने के लिए समाज की विभिन्न जातियों और संप्रदायों को आपस में लड़ाने और समाज को टुकड़ों में विभाजित करने की कुचेष्टा की थी। इसी के चलते विभिन्न वर्गों की मानसिकता में बदलाव आना स्वाभाविक था।
उपन्यास में आजादी से पूर्व कुछ हिन्दू-मुसलमान परिवारों के अपनी बिरादरी-बहुल शहरों की ओर पलायन पर अधिक प्रकाश डालने का प्रयास लेखक ने नहीं किया। इसके इतर उसने एक शहर की सोच और पात्रों की व्यक्तिगत सोच को उभारने में अपना विशेष ध्यान केन्द्रित किया है, जो अचंभित करता है। यही कारण है कि पात्रों और शहर की चिन्ताएं भी एक समान ही हैं। दोनों अपने भीतर होने वाले परिवर्तनों से आहत हैं। समाज के परिवर्तित होते चेहरे को… उसके मूल्यों को जहां दिलीप सिंह अपनी मेहनत, अपनी लगन से सींचते हैं, वहीं राधिकारमण अपनी ‘प्रोग्रेसिव‘ सोच को अपने उसूलों की पकी ज़मीन पर आजमाने की कोशिश करते हैं। किन्तु इस सोच को उनकी अगली पीढ़ी सदैव नकार देती है। ‘प्रोगेसिव’ सोच अगली पीढ़ी तक पहुँचकर ‘एग्रेसिव’ हो जाती है। इससे हैरान-परेशान राधिका इतिहास रचने की दहलीज पर आकर ठिठक जाते हैं– वहीं रुक जाते हैं। या कहें कि रोक दिए जाते हैं। संबंधों का ठंडापन उन्हें ऐसा करने से रोकता है।
यहीं से उनके भीतर कुछ टूटने लगता है। एक ऐसी टूटन, जिसकी आवाज़ उन्हें सुनाई नहीं देती। बस, हल्का-सा आभास मात्र ही होता है। और यहीं से आरंभ होता है दहलीज के इस ओर खड़े राधिका रमण –– और दहलीज के उस ओर खड़े उनके बच्चों के बीच वैचारिक अंतराल और एक शीत-युद्ध। इसे यदि ‘शहर गवाह है’ का प्रस्थान बिन्दु न भी माना जाए तो ऐसा बिन्दु तो अवश्य ही मान सकते हैं जहां से पारिवारिक, सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तनों की टोह ली जा सकती है। और गांव से कस्बे और कस्बे से शहर होने की परिवर्तनशील प्रक्रिया को बड़ी ही शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
इस परिवर्तनशील (और पतनशील) प्रक्रिया को लेखक ने एक बहुत बड़ा फलक देने का प्रयास किया है। और इसके प्रथम गवाह के रूप में स्वतंत्रतापूर्व के भारतीय जीवन और उसके द्वंद्व को क्रांतिकरियों के संघर्ष व शहादत से उकेरने की कोशिश की है। भगत सिंह, चंन्द्र्शेखर आजा़द से लेकर हलधर बाजपेई व अन्य क्षेत्रीय क्रांतिकारियों का स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष जहां कानपुर जैसे शहर को अपने लहू से सींचता है, वहीं क्रांतिकारियों की इस चिन्ता को भी बहुत तीखेपन से उभारता है कि ‘‘छुटभैया सत्ता में हिस्सेदारी के लिए बेताब हैं। यही नहीं, कल तक दबे-छुपे अंग्रेजों का साथ देने वाले राजे-महाराजे, जमींदार, जागीरदार –– आज कांग्रेस में घुस कर अपनी जगह मजबूत बनने की कोशिश में हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि नेहरू जैसे कुछ बड़े नेताओं को छोड़कर स्वार्थी लोगों की बड़ी संख्या है राजनीति में, जो केवल और केवल अपने लिए जीना चाहते हैं। मुझे देश का भविष्य बहुत उज्जवल नहीं दिख रहा। इनके शासन का ढंग अंग्रेजों से भिन्न नहीं होगा। क्या पता ये भी उनका अनुकरण करें… अभी न सही, बाद में - यानी जीतीय संघर्ष को बढ़ावा दो, बांटों और शासन करो… इसीलिए मुझे लगता है कि यह आजादी अधूरी है। पूरी आजादी के लिए हमें एक बार पुन: संघर्ष करना होगा।… और अब अपनों से…”(पृ. 187) । कानपुर के जुझारू क्रांतिकारी हलधर बाजपेई का राधिका रमण से कथन (पृ. 183) उल्लेखनीय है।
यह ‘वास्तवकि आजादी’ वास्तव में थी क्या ? दरअसल क्रांतिकारियों की इस सोच के पीछे भगतसिंह के विचारों का बहुत अधिक प्रभाव रहा है जिसके चलते उन पर यह आरोप भी लगता रहा कि वह अपने विचारों को दूसरों पर लादने का प्रयास करते रहे हैं। –– इस वास्तविक आजादी को भगतसिंह ने अपने लेख में स्पष्ट भी किया है कि –– ‘‘क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश को क्रांति से ही स्वतंत्रता मिलेगी। वे जिस क्रांति के लिए प्रयत्नशील हैं, और जिस क्रांति का स्वरूप उनके सामने स्पष्ट है, उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों और उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का केवल सशस्त्र संघर्ष हो, बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएं। - क्रांति से सबसे बड़ी बात – तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामाजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाये बैठे हैं।” ( संदर्भ : ‘बम का दर्शन’-, लेखक : भगत सिंह )
किन्तु यह स्वप्न न राजनैतिक रूप में साकार हो पाता है और न ही सामाजिक रूप में। उपन्यास के एक महत्वपूर्ण पात्र समर बहादुर सिंह की यह चिंता भी कोई रूप नहीं ले पाती कि ‘‘यहां के मजदूरों की स्थिति बहुत खराब है। जब तक देश आजाद नहीं हो जाता, उनकी हालत शायद ही बदले। –– बाद में बदलेगी, कैसे कहा जा सकता है। आज एक-एक जमींदार के पास हजारों बीघे खेत हैं जबकि मजदूरों के पास एक टुकड़ा भी नहीं है ज़मीन का। सरकार को चाहिए कि उनकी ज़मीनें छीनकर इनमें बांट दे। जो खेतों में श्रम करे, खेत उसके होने चाहिए।”(पृ. 181)
स्वप्नों के खंडित होने और पतनशीलता की यह प्रक्रिया समाज में इस कदर पैठ बना चुकी है कि इसका प्रभाव पारिवारिक संबंधों पर भी परिलक्षित होने लगता है। देश की भावी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती शैलजा इसका स्पष्ट उदाहरण है, जो अपनी कच्ची उम्र में भी उसके प्रेमी होने का दंभ भरने वाले देवेन्द्र आहूजा से फ्लर्ट करती रहती है। वह न तो अपनी नानी की सेवा करने को तैयार है, न ही किसी भी प्रकार का कोई घरेलू कार्य। इसके लिए उसके पास न तो समय है, न इच्छा। रिश्ते-नाते उसके लिए बस एक माध्यम हैं, जो उसे उसके ध्येय तक पहुँचने में सहायक हों। उसका एक ही ध्येय है - पद और पैसा। पैसे की भूख उसमें इतनी है कि वह सही और गलत की पहचान भी नहीं करना चाहती। तभी वह एक स्वाभिमानी और ईमानदार पिता की संतान होकर भी उनकी सोच- संस्कारों को अपना नहीं पाती। कानपुर जैसा शहर उसकी महत्वाकांक्षाओं के लिए छोटा पड़ने लगता है और वह दिल्ली महानगर में ‘शिफ्ट’ कर जाती है। हमेशा के लिए तमाम संबंधों, तमाम मूल्यों, तमाम सच्चाइयों, तमाम पारिवारिक प्रतिबद्धताओं को तिलांजलि देकर। दिल्ली में वह पुन: अपने शातिराना सोच को सक्रिय कर एक ऐसे शख़्स से प्रेम विवाह कर लेती है, जो शादी से पूर्व ही अनेक लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध स्थापित कर चुका था। लेकिन महत्वाकांक्षाएं विचार-कुविचार और पात्र-अपात्र में अंतर नहीं कर पातीं। बेशक इसके लिए शैलजा को अपने पिता की सारी जायदाद धोखे से अपने नाम ही क्यों न लिखवानी पड़े। बेशक अपनी बेसहारा बहन को विक्षिप्तावस्था में धकेलकर सड़कों पर भटकने के लिए विवश क्यों न करना पड़े। लेकिन महत्वाकांक्षाएं हर हाल में जीवित रहनी चाहिएं … अपनों की लाश पर पैर रखकर आगे बढ़ने के लिए। यह है नई पीढ़ी का यथार्थ। यह है उसके समक्ष संबंधों की महत्ता।
लेकिन इस समूचे सफर के दौरान इतना कहने की मैं इजाज़त अवश्य चाहता हूँ कि लेखक ने पूरी सामाजिकता को उपन्यास के अंत तक आते-आते उसे अत्यंत व्यक्तिगत लड़ाई में परिवर्तित कर दिया है। हालांकि उपन्यास का अंत बहुत उद्वेलित करता है और संबंधों की एक नई परिभाषा गढ़ता है –– अपने वर्तमान को साथ लिए हुए। इसमें घटनाओं की तीव्रता भी अहम भूमिका निभाती है और पाठकों को सकते की स्थिति में ला खड़ा करती हैं।
उपन्यास में लेखक ने अपनी किस्सागोई शैली का बखूबी प्रयोग किया है। यह विशेषता उनके अन्य उपन्यासों – ‘रमला बहू’ , ‘पाथरटीला’ और ‘नटसार’ में भी स्पष्ट थी। हां, इस विशेषता के चलते वह उपन्यास –– और उसके परिवेश को उभारने में शिल्प को अवश्य अनदेखा कर जाते हैं, जो उपन्यास के वातावरण को क्षतिग्रस्त करता है। फिर भी, इतना तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि कथ्य के स्तर पर यह उपन्यास लेखक की परिपक्वता को सिद्ध करता है। उपन्यास की पठनीयता अबाध्य है।
कुछ बातें खटकती हैं। यथा – क्रांतिकारियों से संबंधित प्रसंगों को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया और ऐसा प्रतीत होता है कि कुछेक पात्रों के प्रति लेखक का दृष्टिकोण सहानुभूतिपूर्ण रहा है। मेरा अपना मानना है कि लेखक को रचना में एक पर्यवेक्षक की भूमिका में रहना चाहिए। फिर भी समग्रत: कथ्य और संवेदना के स्तर पर और लेखकीय विकासक्रम के स्तर पर भी यह उपन्यास अद्भुत एवं सुखद अनुभूति देता है।


रमेश कपूर
जन्म: 14 नवम्बर 1957, दिल्ली
शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य स्नातक
लेखन: विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में कहानियां, समीक्षाएं व ग़ज़लें
प्रकाशित।
संप्रति: व्यवसाय के साथ-साथ स्वतंत्र लेखन भी। इसके अतिरिक्त शीघ्र प्रकाश्य हिन्दी साहित्यिक प​त्रिका ‘कथाशिखर’ ( त्रैमासिकी ) का सम्पादन।
सम्पर्क:ए–4/14, सैक्टर–18,
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