शनिवार, 15 मई 2010

कविता



डॉ० मधु संधु की दो कविताएं
बाजारवाद
ईश्वरीय सत्ता की तरह
सर्वव्यापक है बाजारवाद
देशकालातीत है बाजारवाद।
क्या तब नहीं था बाजारवाद ?
जब
कानन-कन्या शकुन्तला
सम्राट दुष्यन्त की तरफ आकर्षित हुई
और गंधर्व विवाह कर चल पड़ी
मदमस्त विहार-गृह में प्रियतम संग
अथवा
जब पति के स्वर्गगमन के साथ-साथ
मीराबाई को
राज महलों से
लेना पड़ा था प्रवास।
क्या तब नहीं था बाजारवाद ?
जब महमूद गजनवी ने
सोमनाथ के
मंदिर को लूटा था
अथवा
तेल के कुओं के देशों ने
इसी अपराध में
नित्य नए
विस्फोटों को झेला है/था।
कैकेयी का बाजारवाद
सत्ता हथियाता है।
दुर्योधन का बाजारवाद
वचनबद्धता की नीति से
आंखें चुराता है।
अपने पड़ोसी पाक का बाजारवाद
सत्ता बचाता है।
बाजारवाद तो जीने नहीं देता
अनासक्त महात्माओं को भी
सभी के सभी बन गये हैं
स्वास्थ्य-पंडित
फार्मेसियां, योगाश्रम उनकी पहचान हैं।
एक बाजारवाद मेरे घर में भी है
जहां
रिश्ते हो गए हैं
बैंक अकाउंट
कुछ डालते निकालते रहिए
वरना हो सकते हैं मृतप्रायः।
*****
लड़कियां
कैरियर की खोज में
दौड़ती भागती लड़कियां
बसों, आटो गाडि़यों में
धक्कम-धक्का होती लड़कियां
मुस्काती, सकुचाती, बातें करती
आगे, आगे और आगे जाती लड़कियां।
फर्क नहीं है
मेरे तेरे और उनमें
पूरे विश्व की परिक्रमा के बाद भी
किसी राहुल या शोएब की ओर
मुड़ती
उनके अवैधनिक कार्यों के कारण
पुलिस/ टी वी चैनल्स से
श्वेता या सान्या बन पंजे लड़ाती
लड़कियां।
शादी समझौता है
मां, नानी, पड़नानी का
यह टैग गले में बांध
घुटती अंसुआती लड़कियां।
मेरे देश की लड़कियां
तेरे देश की लड़कियां
छत की खोज में
पांव तले की जमीन को भी
खो रही लड़कियां।
****
डा. मधु संधु हिन्दी में एम. ए. पी एच. डी. हैं. पीएच. डी. का विषयः सप्तम दशक की हिंदी कहानी में महिलाओं का योगदान
सम्प्रति गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की बृहद शोध परियोजना की प्रिंसिपल इनवेस्टीगेटर(2010-2012)
सम्पर्क madhu_sd19@yahoo.co.in/ 9876251563
प्रकाशित साहित्यः
कहानी संग्रहः 1. नियति और अन्य कहानियां, दिल्ली, शब्द संसार,20012. आवाज का जादूगर, नेशनल, (प्रकाशनाधीन), कहानी संकलनः 3. कहानी श्रृंखला, दिल्ली, निर्मल, 2003, गद्य संकलन4. गद्य त्रायी, अमृतसर, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, 2007.
आलोचनात्मक एवं शोधपरक साहित्यः5. कहानीकार निर्मलवर्मा, दिल्ली, दिनमान, 1982 6. साठोत्तर महिला कहानीकार, दिल्ली, सन्मार्ग, 19847. कहानी कोश, (1951-1960) दिल्ली, भारतीय ग्रन्थम, 19928. महिला उपन्यासकार, दिल्ली, निर्मल, 20009. .हिन्दी लेखक कोश,(सहलेखिका) अमृतसर, गुरु नानक देव वि.वि., 200310. कहानी का समाजशास्त्रा, दिल्ली, निर्मल, 200511. कहानी कोश, (1991-2000) दिल्ली, नेशनल, 2009
सम्पादनः 12. प्राधिकृत (शोध पत्रिाका) अमृतसर, गुरु नानक देव वि.वि., 2001-04
समकालीन भारतीय साहित्य, हंस, गगनांचल, परिशोध, प्राधिकृत, वितस्ता, कथाक्रम, संचेतना, हरिगंधा, साहित्यकुंज, अभिव्यक्ति, अनुभूति, रचनाकार, परिषद पत्रिाका, हिन्दी अनुशीलन, पंजाब सौरभ, साक्षात्कार, युद्धरत आम आदमी, औरत, पंजाबी संस्कृति, शोध भारती, अनुवाद भारती, वागर्थ, मसि कागद, चन्द्रभागा संवाद, गर्भ नाल आदि पत्रिाकाओं में सौ के आसपास शोध पत्रा तथा सैंकड़ों आलेख, कहानियां, लघु कथाएं एवं कविताएं प्रकाशित.
पच्चास से अधिक शोध प्रबन्धों एवं शोध अणुबन्धों का निर्देशन।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

कविता



पेटिगं - देव प्रकाश चौधरी



अपराजिता

वीरेन्द्र कुमार गुप्त

सम्पादकीय टिप्पणी : ’अपराजिता’ वरिष्ठ कवि-कथाकार वीरेन्द्र कुमार गुप्त का काव्योपन्यास है. वीरेन्द्र जी ने इसमें न केवल काव्यगत प्रयोग किये हैं, बल्कि काव्य-कथा के माध्यम से अपनी विचारधारा को भी प्रस्तुत किया है. इस देश की हजारों वर्षों की गुलामी के लिए वह बुद्ध की अहिंसा को दोष देते है. उनकी पुस्तक Ahimsa in India's Destiny' में इसपर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है. उनके उपन्यासों ’विष्णुगुप्त चाणक्य’, ’प्रियदर्शी’ और ’विजेता’ में भी उनकी यह दृष्टि परिलक्षित है. ’अपराजिता’ का प्रथम प्रकाशन उनके छोटे भाई कथाकार स्व. योगेश गुप्त ने छठवें दशक में किया था, लेकिन योगेश की प्रकाशकीय अनुभवहीनता के कारण इसे प्रचार नहीं मिल सका.

हाल में इसका पुनर्मुद्रण ’पेनमैन पब्लिशर्स’
सी-२६(बी), गली नं. ३,
सादतपुर विस्तार , करावलनगर रोड, दिल्ली-११००९४ ने किया है.
१९९ पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य १९०/- है.

कवि का वक्तव्य
ईसा-पूर्व के भारत में जहां मगध जैसा साम्राज्य और अनेक छोटे-बड़े राज्य थे, वहीं अनेक गण अर्थात नगर राज्य भी पूरे उत्तरी भारत में अपनी स्वतन्त्र सत्ता बनाए हुए थे. राजा और सम्राट इन नगर राज्यों को किसी भी उपाय से अपने राज्य में मिलाने को व्यग्र रहते थे. पर ये गणराज्य भी अपने उन्मुक्त अस्तित्व की रक्षा के लिए हर बलिदान देने को कटिबद्ध मिलते थे. बुद्ध के काल में वैशाली के गणतन्त्र को मगध सम्राट अजातशत्रु ने भारी नर-संहार के बाद अपने साम्त्राज्य का अंग बनाया था और अशोक द्वारा कलिंग पर किया गया आक्रमण तो इतिहास प्रसिद्ध है ही. राजनीतिक तल पर चलते इस द्वन्द्व के समानान्तर उस काल के वैयक्तिक-सामाजिक जीवन में एक और द्वन्द्व कहना चाहिए, अंतर्द्वन्द्व , भी सर्वव्याप्त था, जो बुद्ध द्वारा पारिवारिक-सांसारिक जीवन को त्याग कर निर्वाण की साधना को व्यक्ति का चरम लक्ष्य प्रचारित करने के बाद अत्यन्त गहन और व्यापक रूप ले गया था. यह था गृहस्थ और सन्यास के बीच का अन्तर्द्वन्द्व . बुद्ध ने गृहस्थ और समाज के नैसर्गिक दायित्वों से पलायन को ऎसी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा प्रदान कर दी थी कि हर व्यक्ति, वह भिक्षु हो या गृहस्थ, संसार को असार, मोह-बन्ध और विपथ मान बैठा था; और यह धारणा उसके अवचेतन में समा गई थी. तब से आज तक हिन्दू मानसिकता इससे मुक्त नहीं हो पाई है, यह देखते हुए भी कि भिक्षु या सन्यासी बनकर एक काल्पनिक निर्वाण या मोक्ष की साधना करने वालों का भौतिक अस्तित्व बस कुत्सित संसार पर ही निर्भर रहा है. संसार के बोझ को और उसकी चुनौतियों को हम विवश भाव से और बेमन से ही झेलते आए हैं. विगत दो हज़ार वर्षों के बीच हमारी अगणित पराजयों के पक्ष में हमारी यही रुग्ण मानसिकता रही है. उपरोक्त राजनीतिक द्वन्द्व पर और इस आध्यात्मिक पलायनवाद पर चिन्तन ही इस काव्य का मूल विषय बना है. मेरी सोच है कि मोक्ष या निर्वाण की वायव्य कल्पना ने व्यक्ति और समाज की नैसर्गिक स्वस्थ परस्परता को विकृत और अस्वस्थ बनाया है, क्योंकि निर्वाण का लक्ष्य अपरिहार्य रूप से व्यक्तिवादी और समाज-निरपेक्ष है. यथार्थ यह है कि भौतिक संसार और अध्यात्म मानव-जीवन की सरल रेखा के दो अनिवार्य सिरे हैं; ये एक ही नदी के दो तट हैं. मनुष्य दो पैरों पर चलता है और दो हाथों से काम करता है. एक पैर या एक हाथ के अशक्त होने या न रहने पर विफलता और कुण्ठा ही उसकी झोली में पड़ती है. अध्यात्म का लक्ष्य जीवन-सापेक्ष अन्तर्दृष्टि का और अन्तरंग ऊर्जा का विकास ही हो सकता है, मोक्ष या निर्वाण नहीं.
’अपराजिता’ का कथानक जातकों में एक ’वेस्सन्तर’ जातक पर आधारित है, जिसमें दान के माहात्म्य को दर्शाया गया है. यह मूल कथा काव्य में पूरी तरह परिवर्तित हो गई है. केवल पात्रों के नाम - वेस्सन्तर, माद्री, संजय, जालि, कृष्णा - ही सुरक्षित रहे हैं. शेष पात्र- इला, सुमन, रत्न, रुद्र आदि काल्पनिक हैं. यह काव्य काव्यशास्त्र के नियमों से बंध कर नहीं, उन्मुक्त उपन्यास शैली में लिखा गया है. इसलिए इसे ’काव्योपन्यास’ कहना अधिक संगत होगा.
पुस्तक से :
कहानी के प्रति

आता, बह जाता सरिता-जल;
आते, बह जाते युग, दिन, पल!
तरी काल-लहरों पर खेता
मानव भी आता, चल देता .

पर भू पर खिच जाती रेखा-
किसने यह विधि-लेख न देखा ?
मिल जन-जन, युग-युग की वाणी
बनती एक अटूट कहानी.

मानव-जलधि-गर्भ के मोती
मानो माया मूक पिरोती
हंसती-हंसती, रोती-रोती,
पाती-पाती, खोती-खोती.

मानव का इतिहास इसी में;
उसका रुदन-विलास इसी में,
विकृति-कृति-, उन्नति-नति इसमें;
उर-मति, वैर-क्षोभ-रति इसमें.

शोषण-पोषण, जन्म-मृत्यु-क्षय;
हिंसा-स्वार्थ-घृणा-साहस-भय;
भूख-प्यास, विषयों की ज्वाला;
इसमें जय-विजयों की हाला .

कोई सौ-सौ रंगों से भर
चीत रहा सारा भू अम्बर--
मानव को न कहानी आती,
तो बहती गंगा रुक जाती !
*****
२९ अगस्त १९२८ को सहारनपुर (उ०प्र०) में जन्मे वीरेन्द्र कुमार गुप्त उन वरिष्ठ रचनाकारों में हैं जो साहित्य की उठा-पटक से दूर १९५० से निरन्तर लेख रहे हैं. वीरेन्द्र जी की पहली रचना ’सुभद्रा-परिणय’(नाटक) १९५२ में प्रकाशित हुई थी. अब तक सात उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें तीन ऎतिहासिक उपन्यास हैं. दो प्रबंध काव्य-- ’प्राण-द्वंद्व’ और ’राधा कुरुक्षेत्र में’ के अतिरिक्त कुछ स्फुट कविताएं. अनेक चिन्तनपरक लेख. १९६४ में वीरेन्द्र जी ने बहुत परिश्रम पूर्वक विश्व के महान व्यक्तियों के कुछ प्रेम पत्रों को संकलित किया जो ’प्रसिद्ध व्यक्तियों के प्रेम-पत्र’ शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हुए थे . यह पुस्तक ’किताबघर प्रकाशन’, २४, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली -११०००२ से पुनः प्रकाशित हुई है. इसी प्रकाशन संस्थान से वीरेन्द्र जी महत्वपूर्ण ऎतिहासिक उपन्यास - ’विष्णुगुप्त चाणक्य’ कुछ दिन पूर्व प्रकाशित हुआ. इससे पूर्व यह राजकमल प्रकाशन, दरियागंज से पेपर बैक संस्करण के रूप में १९९४ में प्रकाशित हुआ था.

वीरेन्द्र जी ने छठवें दशक में स्व. जैनेन्द्र जी से साहित्य और दर्शन पर लंबी बातचीत की थी, जो पुस्तकाकार रूप में ’समय और हम’ शीर्षक प्रकाशित हुई थी. यह लगभग ७०० पृष्ठों की पुस्तक है और अनुमानत: यह विश्व का सबसे बड़ा साक्षात्कार है.

वीरेन्द्र जी ने अंग्रेजी में भी प्रभूत मात्रा में लेखन कार्य किया है. अंग्रेजी में उनकी विवादित पुस्तक है : ’Ahimsa in India's Destiny' और दूसरी पुस्तक है -’The Inner self'. वीरेन्द्र जी का एक स्वरूप अनुवादक का भी है. उन्होंने लगभग १२ पुस्तकों के अनुवाद किये थे और ये सभी अनुवाद सठवें दशक में किए गए थे. जैक लडंन के नोबल पुरस्कार प्राप्त उपन्यास Call of the Wild' का अनुवाद ’जंगल की पुकार’ नाम से उन्होंने किया.

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

कविता



अभिनव शुक्ल की दो कविताएं
हम भी वापस जाएंगे
आबादी से दूर,
घने सन्नाटे में,
निर्जन वन के पीछे वाली,
ऊँची एक पहाड़ी पर,
एक सुनहरी सी गौरैया,
अपने पंखों को फैलाकर,
गुमसुम बैठी सोच रही थी,
कल फिर मैं उड़ जाऊँगी,
पार करूँगी इस जंगल को.
वहाँ दूर जो महके जल की,
शीतल एक तलैया है,
उसका थोड़ा पानी पीकर,
पश्चिम को मुड़ जाऊँगी,
फिर वापस ना आऊँगी,
लेकिन पर्वत यहीं रहेगा,
मेरे सारे संगी साथी,
पत्ते शाखें और गिलहरी,
मिट्टी की यह सोंधी खुशबू,
छोड़ जाऊँगी अपने पीछे ....,

क्यों न इस ऊँचे पर्वत को,
अपने साथ उड़ा ले जाऊँ,
और चोंच में मिट्टी भरकर,
थोड़ी दूर उड़ी फिर वापस,
आ टीले पर बैठ गई .....।

हम भी उड़ने की चाहत में,
कितना कुछ तज आए हैं,
यादों की मिट्टी से आखिर,
कब तक दिल बहलाएँगे,
वह दिन आएगा जब वापस,
फिर पर्वत को जाएँगे,
आबादी से दूर,घने सन्नाटे में।
******
चेहरा
अब कोई इंतजाम चलता नहीं,
एक चेहरे से काम चलता नहीं,
घर का चेहरा,
बाहर का चेहरा,
दफ्तर का चेहरा,
चेहरा दोस्तों के बीच वाला,
चेहरा रिश्तेदारों वाला,
चेहरा कमाई का,
चेहरा गंवाई का.
इस प्रश्न पर जीवन मौन सा है,
कि मेरा असली चेहरा कौन सा है?
मैं चाहता हूँ,
रखना चेहरा एक,
धुला पुछा,
मन से नेक,
चेहरा जो हँसी में हँस सके,
ग़म में आसुओं में धंस सके,
चेहरा वैसा,
पार्क में खेलते हुए बच्चों का है जैसा,
या फिर किसी काम करते किसान का है जैसा,
निश्चल, निर्मल.

चेहरा मुस्कान वाला,
चेहरा इंसान वाला,
चेहरा शत प्रतिशत हिन्दुस्तान वाला.
मेरे एक मित्र नें मुझे बतलाया है,
कि एक चेहरा उन्होंने विदेश से मंगवाया है,
बड़प्पन का गर्वीला,
चमाचम चेहरा,
धन चन्द्रिका से लबालब,
दमादम चेहरा,
पर यह चेहरा भी कितने दिन टिकेगा,
चार दिन में शहर के फुटपाथ कि रेड़ी पर बिकेगा,
चेहरा ऐसा हो जो चले,
न आग से झुलसे,
न पानी में गले,
बेकार में ही बात इतनी बढ़ाई है,
असल में ये सब अपने अपने अस्तित्व कि लड़ाई
है,
उस अस्तित्व कि,
जो अभी है, अभी नही,
बात गहरी है,
तभी तो यहाँ आकर ठहरी है.
*****

प्रकाशन: "अभिनव अनुभूतियाँ" - काव्य संग्रह एवं "हास्य दर्शन" - (आडियो सीडी श्रंखला)
ब्लॉग: http://ninaaad.blogspot.com
संपर्क: shukla_abhinav@yahoo.com ,
फोन. 001-206-694-3353

गुरुवार, 25 मार्च 2010

लघुकथा

बलराम अग्रवाल की तीन लघुकथाएं

लड़ाई

दूसरा पैग चढ़ाकर मैंने जैसे-ही गिलास को मेज पर रखा—सामने बैठे नौजवान पर मेरी नजरें टिक गईं। उसने भी मेरे साथ ही अपना गिलास होठों से हटाया था। बिना पूछे मेरी मेज पर आ बैठने और पीना शुरू कर देने की उसकी गुस्ताखी पर मुझे भरपूर गुस्सा आया लेकिन…बोतल जब बीच में रखी हो तो कोई भी छोटा, बड़ा या गुस्ताख नहीं होता—अपने एक हमप्याला अजीज की यह बात मुझे याद हो आई। इस बीच मैंने जब भी नजर उठाई, उसे अपनी ओर घूरते पाया।
“अगर मैं तुमसे इस कदर बेहिसाब पीने की वजह पूछूँ तो तुम बुरा नहीं मानोगे दोस्त!” मैं उससे बोला।
“गरीबी…मँहगाई…चाहते हुए भी भ्रष्ट और बेपरवाह सिस्टम को न बदल पाने का नपुंसक-आक्रोश—कोई भी आम-वजह समझ लो।” वह लापरवाह अंदाज में बोला,“तुम सुनाओ।”
“मैं!” मैं हिचका। इस बीच दो ‘नीट’ गटक चुका वह भयावह-सा हो उठा था। आँखें बाहर की ओर उबल आयी थीं और उनका बारीक-से-बारीक रेशा भी इस कदर सुर्ख हो उठा था कि एक-एक को आसानी से गिना जा सके। मुझे लगा कि कुछ ही क्षणों में बेहोश होकर वह मुँह के बल इस टेबल पर बिछ जाएगा।
“है कुछ बताने का मूड?” वह फिर बोला। अचानक कड़वी डकार का कोई हिस्सा उसके दिमाग से जा टकराया शायद। उसका सिर पूरी तरह झनझना उठा। हाथ खड़ा करके उसने सुरूर के उस दौर के गुजर जाने तक मुझे चुप बैठने का इशारा किया और सिर थामकर, आँखें बंद किए बैठा रहा। नशा उस पर हावी होने की कोशिश में था और वह नशे पर; लेकिन गजब की ‘कैपिसिटी’ थी बंदे में। सुरूर के इस झटके को बर्दाश्त करके कुछ ही देर में वह सीधा बैठ गया। कोई भी बहादुर सिपाही प्रतिपक्षी के आगे आसानी से घुटने नहीं टेकता।
“मैं…एक हादसा तुम्हें सुनाऊँगा…।” सीधे बैठकर उसने सवालिया निगाह मुझ पर डाली तो मैंने बोलना शुरू किया,“लेकिन… उसका ताअल्लुक मेरे पीने से नहीं है…हम तीन भी हैं…तीनों शादीशुदा, बाल-बच्चों वाले…माँ कई साल पहले गुजर गई थी…और बाप बुढ़ापे और…कमजोरी की वजह से…खाट में पड़ा है…कौड़ी-कौड़ी करके पुश्तैनी जायदाद को…उसने…पचास-साठ लाख की हैसियत तक बढ़ाया है लेकिन…तीनों में-से कोई भी भाई उस जायदाद का…अपनी मर्जी के मुताबिक…इस्तेमाल नहीं कर सकता…।”
“क्यों?” मैंने महसूस किया कि वह पुन: नशे से लड़ रहा है। आँखें कुछ और उबल आयी थीं और रेशे सुर्ख-धारियों में तब्दील हो गए थे।
“बुड्ढा सोचता है कि…हम…तीनों-के-तीनों भाई…बेवकूफ और अय्याश हैं…शराब और जुए में…जाया कर देंगे जायदाद को…।” मैं कुछ कड़ुवाहट के साथ बोला,“पैसा कमाना…बचाना…और बढ़ाना…पुरखे भी यही करते रहे…न खुद खाया…न बच्चों को खाने-पहनने दिया…बाकी दोनों भाई तो सन्तोषी निकले…लात मारकर चले गए स्साली प्रॉपर्टी को…लेकिन मैं…मैं इस हरामजादे के मरने का इन्तजार कर रहा हूँ…”
“तू…ऽ…” मेरी कुटिलता पर वह एकदम आपे-से बाहर हो उठा,“बाप को गालियाँ बकता है कुत्ते!…लानत है…लानत है तुझ जैसी निकम्मी औलाद पर…।”
क्रोधपूर्वक वह मेरे गिरेबान पर झपट पड़ा। मैं भी भला क्यों चुप बैठता। फुर्ती के साथ नीचे गिराकर मैं उसकी छाती पर चढ़ बैठा और एक-दो-तीन…तड़ातड़ न जाने कितने घूँसे मैंने उसकी थूथड़ी पर बजा डाले। इस मारधाड़ में मेज पर रखी बोतलें, गिलास, प्लेट नीचे गिरकर सब टूट-फूट गए। नशे को न झेल पाने के कारण आखिरकार मैं बेहोश हो गिर पड़ा।
होश आया तो अपने-आप को मैंने बिस्तर पर पड़ा पाया। हाथों पर पट्टियाँ बँधी हुई थीं। माथे पर रुई के फाहे-सा धूप का एक टुकड़ा आ टिका था।
“कैसे हो?” आँखें खोलीं तो सिरहाने बैठकर मेरे बालों में अपनी उँगलियाँ घुमा रही पत्नी ने पूछा।
“ये पट्टियाँ…?” दोनों हाथों को ऊपर उठाकर उसे दिखाते हुए मैंने पूछा।
“इसीलिए पीने से रोकती हूँ मैं।” वह बोली,“ड्रेसिंग-टेबल और उसका मिरर तोड़ डाला, सो कोई बात नहीं; लेकिन गालियों का यह हाल कि बच्चों को बाहर भगा देना पड़ा…रात को ही पट्टी न होती तो सुबह तक कितना खून बह जाता…पता है?”
मुझे रात का मंजर याद हो आया। आँखें अभी तक बोझिल थीं।
“वॉश-बेसिन पर ले-चलकर मेरा मुँह और आँखें साफ कर दो…।” मैं पत्नी से बोला और बिस्तर से उठ बैठा।


आदमी और शहर

शहर से दूर, बाहरी इलाके में बना उसका रेलवे-स्टेशन। घटाटोप अँधेरी रात। प्लेटफॉर्म के उस दूसरे छोर पर अँधेरे में लपलपाता छोटा-सा एक अलाव और उसको घेरे बैठीं चार मानव आकृतियाँ। नाइट-शिफ्ट कर रहे सब-इंसपेक्टर जीवनसिंह ने उधर देखा। कौन लोग हैं?—वह अपने भीतर बुदबुदाया—रात, दो बजे वाली ट्रेन की सवारियाँ हैं या…चोरों-कंजरों का गैंग?
अपने बूटों की ठक-ठक से रात के सन्नाटे को भंग करता हुआ वह अलाव की ओर बढ़ा।
“राम-राम साबजी!” वह निकट पहुँचा तो वे चारों एक-साथ बोले।
“राम-राम भाई!” जीवनसिंह ने कड़क आवाज में अभिवादन स्वीकार किया; फिर पूछा,“यहाँ, प्लेटफॉर्म पर कैसे डेरा डाल लिया?”
“डेरा नहीं है जी!” उसकी इस बात पर उनमें-से एक ने जवाब दिया,“दो बजे तक का टैम बिताना है, बस।”
“बस!” अलाव के एकदम निकट पहुँचकर जीवनसिंह बोला,“ तब तक चलो, मैं भी हाथ सेंक लेता हूँ तुम लोगों के साथ बैठकर।” इतना कहकर वह वहीं बैठ गया। वह दरअसल तय कर लेना चाहता था कि वे लोग वाकई दो बजे वाली ट्रेन के इंतजार में हैं या…।
“अलाव तापने का मजा चुप बैठे रहने में नहीं है भाई!” बातों में लगाकर उन्हें कुरेदने की गरज से माहौल में छाई चुप्पी को तोड़ते हुए कुछ देर बाद वह बोला,“कुछ न कुछ बोलते जरूर रहो।”
“इस बेमजा जिन्दगी के बारे में क्या बोलें साबजी!” एक ने कहा।
“कुछ भी बोलो।” जीवनसिंह बोला,“यह बेमजा कैसे है, यही सुनाओ।”
“ठीक है जी,” दूसरा बोला,“एक किस्सा मैं आपको सुनाता हूँ।”
“सुनाओ।”
“किस्सा यों है कि—एक गाँव में पाँच दोस्त थे।” उसने सुनाना शुरू किया,“पाँचों पढ़े-लिखे। पाँचों बेरोजगार। अपनी बेरोजगारी और गाँववालों के तानों से तंग आकर एक दिन उन्होंने तय किया कि शहर में जाकर कुछ काम किया जाए। बस, उसी दिन वे शहर के लिए चल पड़े। गाँव और शहर के बीच में एक जंगल पड़ता था। बेहद घना और खतरनाक। गाँववाले लाठी-भाला जैसा कोई न कोई हथियार साथ लेकर ही उसमें घुसते थे। लेकिन काम की धुन में उन पाँचों ने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और हाथ हिलाते हुए घुस गए जंगल में। तेज कदमों से चलते हुए करीबन पूरा जंगल पार कर लिया था उन्होंने कि दाईं ओर से अचानक किसी शेर की भयानक दहाड़ उनके कानों में सुनाई पड़ी। एक पल के लिए पाँचों जहाँ के तहाँ ठिठक गए। डरी हुई निगाहों से उन्होंने एक-दूसरे को देखा। जंगल अब अधिक शेष नहीं बचा था। इसलिए उन्होंने शहर की ओर दौड़ लगा दी, बेतहाशा। पीछे-से शेर की दहाड़ लगातार उनका पीछा करती चली आ रही थी…।” इतना किस्सा सुनाकर उसने अपनी जेब-से बीड़ी का एक बंडल निकालकर जीवनसिंह के आगे कर दिया। बोला,“लो, बीड़ी पिओ साबजी।”
“नहीं, मैं बीड़ी नहीं पीता।” जीवनसिंह बोला।
“पीते तो हम भी नहीं हैं।” बंडल में से चार बीड़ियाँ निकालकर उन्हें अलाव की आँच से सुलगाते हुए वह बोला।
“नहीं पीते तो बंडल क्यों रखते हो साथ में?” जीवनसिंह ने पूछा।
“कभी-कभार भीतर का धुआँ भी तो बाहर निकाला होता है न साबजी!” उसने कहा।
“ठीक है…” हथेलियों को अलाव की आग पर सेकने के बाद उन्हें आपस में रगड़ते हुए जीवनसिंह ने उत्सुकतापूर्वक पूछा,“फिर क्या हुआ?”
“फिर?…वे दौड़ते रहे, दौड़ते रहे तब तक…जब तक कि उन्हें दहाड़ सुनाई देनी बन्द न हो गई।” सुलगी हुई बीड़ियों को बारी-बारी अपने साथियों की ओर बढ़ाते हुए उसने आगे सुनाना शुरू किया,“जब दहाड़ सुनाई देनी बन्द हो गई तो उसके बाद एक जगह बैठकर सबने अपनी टूटी हुई साँसों को जोड़ा। कुछ सँभले, तो उन्होंने पाया कि वे सिर्फ चार रह गए हैं। सब सन्न रह गए। पाँचवाँ कहाँ गया? उसे शायद शेर खा गया—ऐसा सोचकर एक ने दूसरे की ओर ताका। उसकी आशंका से सहमत दूसरे से तीसरे और तीसरे ने चौथे की ओर देखा। उसे खोजने के लिए वापस जंगल में घुस जाने की हिम्मत उनमें से किसी के भी अन्दर नहीं थी। कुछ भी कर नहीं सकते थे इसलिए उसकी याद में वहीं बैठकर वे खूब रोए। रोते-रोते उन्होंने तय पाया कि—‘शेर अगर भूखा हो, तो किसी पर दया नहीं करता, बेरोजगार पर भी नहीं। यानी कि प्राणी की पहली जरूरत भोजन है, दया नहीं।’ बस, उन्होंने तुरन्त अपने-अपने आँसू पोंछ डाले और भूखे शेर की तरह शहर में घुस गए।”
इतना कहकर वह चुप हो गया।
“फिर?” जीवनसिंह ने पूछा।
“फिर क्या?…शहर उनसे ज्यादा भूखा और निर्दय था।” तीसरा बोला,“जो-जो उसमें घुसा वो-वो शहर के गाल में समाता रहा। इस तरह से वह उन चारों को चट कर गया…कहानी खत्म!”
“खत्म!…कहानी खत्म?” इतना सुनना था कि जीवनसिंह होठों ही होठों में बुदबुदाया और फफक-फफककर रो पड़ा।
“आप को क्या हुआ साबजी?” उसको रोता देखकर चारों ने एक-साथ पूछा।
“कुछ नही।” किसी तरह अपनी रुलाई को रोककर उसने बोलना शुरू किया,“आज तक मैं समझता रहा कि उस दिन सबसे पीछे मुझे छोड़ डरकर भाग गए मेरे सभी दोस्त शहर में जिंदा होंगे। वो मुझे ढूँढ रहे होंगे और कभी न कभी मिलेंगे जरूर। …लेकिन आज…आज तुम्हारे मुँह से उन सब के मारे जाने की कहानी सुनकर रोना रुक नहीं पा रहा है…काश, वे समझ पाते कि भूख के दिनों में आदमी की पहली जरूरत चौकन्ना रहना और धीरज से काम लेना है, जानवर बन जाना नहीं…।”

गुलामयुग
गुलाम ने एक रात स्वप्न देखा कि शहजादे ने बादशाह के खिलाफ बगावत करके सत्ता हथिया ली है। उसने अपने दुराचारी बाप को कैदखाने में डाल दिया है तथा उसके लिए दुराचार के साधन जुटाने वाले उसके गुलामों और मंत्रियों को सजा-ए-मौत का हुक्म सुना दिया है।
उस गहन रात में ऐसा भायावह स्वप्न देखकर भीतर से बाहर तक पत्थर वह गुलाम सोते-सोते उछल पड़ा। आव देखा न ताव, राजमहल के गलियारे में से होता हुआ उसी वक्त वह शहजादे के शयन-कक्ष में जा घुसा और अपनी भारी-भरकम तलवार के एक ही वार में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
सवेरे, दरबार लगने पर, वह इत्मीनान से वहाँ पहुँचा और जोर-जोर से अपना सपना बयान करने के बाद, बादशाह के भावी दुश्मन का कटा सिर उसके कदमों में डाल दिया। गुलाम की इस हिंसक करतूत ने पूरे दरबार को हिलाकर रख दिया। सभी दरबारी जान गए कि अपनी इकलौती सन्तान और राज्य के आगामी वारिस की हत्या के जुर्म में बादशाह इस सिरचढ़े गुलाम को तुरन्त मृत्युदण्ड का हुक्म देगा। गुलाम भी तलवार को मजबूती से थामे, दण्ड के इंतजार में सिर झुकाकर खड़ा हो गया।
शोक-संतप्त बादशाह ने अपने हृदय और आँखों पर काबू रखकर दरबारियों के दहशतभरे चेहरों को देखा। कदमों में पड़े अपने बेटे के कटे सिर पर नजर डाली। मायूसी के साथ गर्दन झुकाकर खड़े अपने मासूम गुलाम को देखा और अन्तत: खूनमखान तलवार थामे उसकी मजबूत मुट्ठी पर अपनी आँखें टिका दीं।
“गुला…ऽ…म!” एकाएक वह चीखा। उसकी सुर्ख-अंगारा आँखें बाहर की ओर उबल पड़ीं। दरबारियों का खून सूख गया। उन्होंने गुलाम के सिर पर मँडराती मौत और तलवार पर उसकी मजबूत पकड़ को स्पष्ट देखा। गुलाम बिना हिले-डुले पूर्ववत खड़ा रहा।
“हमारे खिलाफ…ख्वाब में ही सही…बगावत का ख्याल लाने वाले बेटे को पैदा करने वाली माँ का भी सिर उतार दो।”
यह सुनना था कि साँस रोके बैठे सभी दरबारी अपने-अपने आसनों से खड़े होकर अपने दूरदर्शी बादशाह और उसके स्वामिभक्त गुलाम की जय-जयकार कर उठे। गुलाम उसी समय नंगी तलवार थामे दरबार से बाहर हो गया और तीर की तरह राज्य की गलियों में दाखिल हो गया।
*****


जन्म : 26 नवम्बर, 1952 को उत्तर प्रदेश(भारत) के जिला बुलन्दशहर में जन्म।
शिक्षा : एम ए (हिन्दी), अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, आयुर्वेद रत्न।
पुस्तकें : प्रकाशित पुस्तकों में कथा-संग्रह ‘सरसों के फूल’(1994), ‘ज़ुबैदा’(2004) तथा ‘चन्ना चरनदास’(2004। ‘दूसरा भीम’(1997) बाल-कहानियों का संग्रह है। ‘संस्कृत नाट्य:चिन्तन परम्परा और समाज’ (अप्रकाशित), ‘समकालीन हिन्दी लघुकथा का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन’ (अप्रकाशित)।
सम्पादन व अन्य : मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ(1997) के अतिरिक्त प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बालशौरि रेड्डी आदि वरिष्ठ कथाकारों की कहानियों/उपन्यासों के लगभग 15 संकलनों एवं कुछेक पत्रिकाओं का संपादन/अतिथि संपादन। ‘अण्डमान व निकोबार की लोककथाएँ’ का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद व पुनर्लेखन(2000)। इनके अलावा ‘सहकार संचय’(जुलाई,1997) व ‘आलेख संवाद’(जुलाई,2008) के लघुकथा-विशेषांकों का अतिथि संपादन। अनेक वर्षों तक हिन्दी-रंगमंच से जुड़ाव। कुछेक रंगमंचीय नाटकों हेतु गीत-लेखन भी।
हिन्दी ब्लॉग्स: जनगाथा(Link:http://www.jangatha.blogspot.com),
कथायात्रा(Link:
http://kathayatra.blogspot.com)
लघुकथा-वार्ता(Link:
http://wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
सम्प्रति : अध्ययन और लेखन।
संपर्क : एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032 (भारत)
दूरभाष : 011-22323249 मो0 : 09968094431
ई-मेल :
2611ableram@gmail

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

गज़ल



यतीन्द्रनाथ राही की तीन गज़लें
(१)
महकते दिन

फिर उतर आए पलाशों इन दहकते दिन
वादियों की देह दुलराते थिरकते दिन .

हो गए गैं फिर हवाओं के चलन चंचल
छेड़ते गैं हर गली-आंगन बहकते दिन .

बांधकर पायल, फसल के पांव में रुन-झुन,
झुरमुटों में झूलते हैं , फिर कुहकते दिन .

शकुन आंगन, डाल पर फूटे नए पीके
बोलते हैं फिर मुंडेरी पर फुदकते दिन .

चढ़ रहे पीली उमर पर , रंग कुमकुम के
लग रहे अंगूर के आसव छलकते दिन .

हैं दिशाओं के पलक पर,मौंन आमंत्रण
प्यार के अनुबध लिखते हैं, महकते दिन .

*****


(२)

क्या कहें

पूछा तो आपने, भला हालात क्या कहें ?
गुज़रे हैं किस तरह से ये, लम्हात क्या कहें ?

तरसे हैं छटपटाए हैं, अलफा़ज के लिए,
मेरे घुटे घुटे से ये , जज़बात क्या कहें ?

अन्याय-झूठ-भ्रष्टता , छल -छद्म- नफरते ,
जो मिल रहे हैं रोज़, इनामात क्या कहें ?

भूखों के हाथों रोटियां, साबुत नहीं लगीं
बांटी गई लंगोटियों की, बात क्या कहें ?

लेने में सांस सत्य का,घुटने लगा है दम,
बिकते हुए ईमान की, औका़त क्या कहें ?

सब जल गया , ज़मीर-मोहब्बत-खुलूस-इल्म,
ऎसी हुई तेज़ाब की, बरसात क्या कहें ?

सूरज भी बिक चुका है, स्याह रात के हाथों,
हम कल सुबह के और, अलामात क्या कहें ?

आओ! कि एक बार तो, आईना देख लें ,
चेहरों पर पुती कालिखों की, बात क्या कहें ?

राही कही इंसानियत, हमको भुला न दे ,
कल पीढि़यां भोगेंगीं जो, आघात क्या कहें ?

*****

(३)

सौ जनम के लिए

सोचते हम रहे सौ जनम के लिए .
सांस में दम नहीं, दो कदम के लिए .

कंठ तक पंक में डूबने को खड़े,
हाथ ऊंचे हैं पूजा-धरम के लिए .

आदमी, आदमी है , कि चट्टान है,
शीश झुकता नहीं , शरम के लिए .

एक चेहरा गुनाहों का, घूंघट में है ,
एक चेहरा धरे हैं, भरम के लिए .

ज़िन्दगी का खुलापन, गज़ब हो गया,
अब न पर्दे रहे हैं, हरम के लिए .

आचरण, नीति-निष्ठा हुए बेदखल ,
अब बचा ही कहां कुछ, क्सम के लिए.

क्या सितम तख्त पर, आज शैतान है,
हाथ बांधे है आदम, करम के लिए .

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परिचय

यतीन्द्रनाथ राही का जन्म ३१ दिसम्बर, १९२६ को भारौल, जिला मैंनपुरी (उ.प्र.) में हुआ था.
शिक्षा : एम.ए. बी-एड.
मध्य शिक्शा विभाग से सेवा निवृत्त.
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन .
प्रकाशित पुस्तकें : पुष्पांजलि , बांसुरी, दर्द पिछड़ी जि़न्दगी का, रेशमी अनुबन्ध, बाहों भर आकाश, महाप्राण (खंड काव्य).

संपर्क : ए-५४, रजत विहार, होशगांबाद रोड, भोपाल-२६

मोबाईल : ०९६८५३४१०२०
०९९९३५०११११

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

पुस्तक चर्चा




‘दक्षिण भारत के पर्यटन स्थल’ पर एक पाठक के पत्र के बहाने
रचनाकार को पाठकों पर ही भरोसा करना चाहिए
मैंने अनेक वरिष्ठ और समकालीन साहित्यकारों से आलोचना और समीक्षा को लेकर जब चर्चा की तब सभी ने इनकी दयनीय स्थिति और व्याप्त राजनीति पर चिन्ता व्यक्त की । स्व॰ कमलेश्वर जी ने उत्तेजित स्वर में कहा था - ‘‘आज आलोचना है ही कहां ?’’ उन्होंने यह भी कहा था कि पाठकों से बड़ा कोई आलोचक नहीं होता । महान रूसी लेख लियो तोल्स्तोय ने भी अपने एक मित्र से चर्चा के समय कहा था कि किसी भी लेखक को आलोचको की परवाह न करते हुए उसे अपने पाठकों पर ही भरोसा करना चाहिए ।
उपरोक्त विद्वानों की बातों को जब मैं अपनी पुस्तकों के संदर्भ में देखता हूं तब पाता हूं कि पाठक की ईमानदार प्रतिक्रिया पर शक की कोई गुजांइश नहीं होती । 12 मार्च 1999 को मेरे उपन्यास ‘ पाथरटीला ’ पर प्रकाशक की ओर से संगोष्ठी का आयोजन किया गया । अध्यक्ष वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव और मुख्य अतिथि वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पाण्डेय थे । वक्ताओं में पंकज बिष्ट ,डा॰ कुमुद शर्मा , डा॰ ज्योतिश जोशी , महेश दर्पण , रमेश उपाध्याय , रामशरण जोशी , मैत्रेयी पुष्पा और हीरालाल नागर थे ।
प्रथम वक्ता के रूप में कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहना प्रारंभ किया , ‘‘ मैंने राजेन्द्र जी से पूछा कि आपने कहा था कि पाथरटीला में गांव है ..... कहां है गांव........? मुझे तो उसमें कहीं गांव नजर ही नहीं आया ......... ’’ अपने लंबे वक्तव्य में मैत्रेयी जी यही सिद्ध करने का प्रयास करती रहीं कि ‘पाथरटीला ’ में गांव नामकी की कोई चीज नहीं है अर्थात उनके अनुसार उसमें ग्राम्य जीवन चित्रित ही नहीं हुआ । यहां यह बता देना अनुचित न होगा कि मैंने उसके बाद भी कई बार मैत्रेयी पुष्पा को वक्तव्य देते सुना और हर बार उनके वक्तव्य का प्रारंभ राजेन्द्र यादव जी का उल्लेख करते हुए ही हुआ । शायद राजेन्द्र जी का नामोल्लेख उन्हें बल देता होगा । मनोविज्ञान की भाषा में इसे शायद एक साहित्यकार के अंदर जमी असुरक्षा का भाव ही कहेगें । ‘पाथरटीला’ की वास्तविकता यह है कि उसमें गांव के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । बाद के वक्ताओं ने इसे सिद्ध भी किया । मैत्रेयी जी की पीड़ा मैं समझ रहा था । ‘अहम सर्वोपरि ’ से ऐसे कुतर्कों का जन्म होता है । गांव क्या होता है इसे मेरी तरह गांव से जुड़कर ही जाना जा सकता है वर्ना वातानुकूलित घर में बैठकर लोग नकली गांव की ही सर्जना कर रहे हैं और अपने जोड़-जुगाड़ से चर्चा भी बटोर रहे हैं । मैत्रेयी जी ने जो कुछ कहा वह वही था जिसे हिन्दी की सड़ी राजनीति के रूप में हम जानते हैं । मेरे उपन्यास से केवल वही परेशान थीं ऐसा नहीं था । वे भी थे जिनके लिए मैंने दूसरों से बुराई ली थी और वे भी थे जो अपने पहले उपन्यास से अपने को हिन्दी का रांगेय राघव मानने लगे थे । उनमें से एक युवा उपन्यासकार भी थे जिनका पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ था । यद्यपि उनका उपन्यास कम चर्चित नहीं रहा था लेकिन मेरे और उपन्यास के खिलाफ उन्होंने असफल कुत्सित षडयंत्र किए । मेरे प्रकाशक श्री जगदीश भारद्वाज ने कहा , ‘‘ आपको परेशान नहीं होना चाहिए । यह उसकी परेशानी है क्योंकि उसे अपने शब्दों पर विश्वास नहीं है । आपको प्रसन्न होना चाहिए क्योंकि आपके उपन्यास ने उसकी नींद हराम कर रखी है ......।’’

इस सबके बावजूद पाठकों ने ‘पाथरटीला’ को इस प्रकार सिर-माथे लिया कि यह उपन्यास मेरे नाम का पर्याय बन गया ।

उपरोक्त बातें मेरी पुस्तक ‘ दक्षिण भारत के पर्यटन स्थल ’ पर प्राप्त एक पाठकीय पत्र ने लिखने के लिए मुझे विवश किया । इस पुस्तक के विषय में यह बताना उचित लग रहा है कि इसका प्रथम संस्करण 2000 में और चौथा 2009 में प्रकाशित हुआ । यह मेरी एक ऐसी पुस्तक है जिसे प्रकाशनोपरांत कभी किसी पत्र-पत्रिका में समीक्षार्थ प्रस्तुत नहीं किया गया । यह यात्रा संस्मरणों की पुस्तक है जिसका शीर्कष मैंने - ‘ सागर के आसपास ’ रखा था लेकिन प्रकाशक ने विशेष अनुरोध के बाद व्यावसायिक कारणों से इसका शीर्षक बदल लिया । निश्चित ही उसे इसका लाभ भी मिला और मुझे अप्रत्याशित पाठक मिले । इसे पढ़कर अयोध्या से बद्रीनाथ उपाध्याय ने मुझे जो पत्र लिखा उसे मैं रचना समय के मित्रों को पढ़वाने के उद्देश्य से ज्यों का त्यों यहां प्रस्तुत कर रहा हूं ।

प्रसंगतः यहां ऐसी ही एक घटना का उल्लेख अनुचित न होगा । यह बात 2000 की है । विवरण लंबा है । केवल इतना ही कि जालना (महाराष्ट्र ) के एक महाविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापक कमलेश ठाकुर ( अब डाक्टर ) ने हैदराबाद में ,जहां के वह मूलतः निवासी हैं , मेरा कहानी संग्रह ‘आखिरी खत’ पढ़ा और निर्णय किया कि वह मेरे साहित्य पर पी-एच.डी. करेंगें और उन्होंने वह किया । ये उदाहरण तोल्स्तोय और कमलेश्वर की बातों को सही सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं और ऎसी घटनाओं ने सदैव अपने पाठकों के प्रति मेरे विश्वास को मजबूत किया है ।

प्रस्तुत है बद्रीनाथ उपाध्याय का पत्र जो कल ही मुझे प्राप्त हुआ है । पत्र में लेखक तिथि का उल्लेख करना भूल गये हैं ।

’दक्षिण भारत के पर्यटन स्थल’
नीलकंठ प्रकाशन
१/१०७९ ई महरौली; नई दिल्ली-११००३०
मूल्य : २००/- पृष्ठ - १८७

आदरणीय परम श्रध्येय रूप सिंह जी चन्देल ,

सादर प्रणाम ।
सर्वप्रथम मैं आपको अपनी तरफ से ‘‘ दक्षिण भारत के दर्शनीय (पर्यटन ) स्थल ’’ ऐसी अद्वितीय पुस्तक लिखने के लिये कोटिशः धन्यवाद देता हूं तथा विद्यादायिनी मां सरस्वती से यह प्रार्थना करता हूं कि वह आपकी लेखनी को और जन कल्याण की ओर लिखने में सहायता प्रदान करे ।

मैंने आपकी यह पुस्तक जिला पुस्तकालय से लाकर पढ़ी है । हजारों पुस्तकों के बीच में से मैंने आपकी यह पुस्तक पढ़ने को चुनी । उस समय मैंने यह सोचा था कि इस पुस्तक में दक्षिण भारत के मंदिरों के बारे में जिक्र होगा । परन्तु जब मैंने पुस्तक पढ़नी शुरू की तो आपके द्वारा अपने परिवार की मनःस्थिति एवं व्यक्तियों के विचारों को शब्दरूप में लिखने की शैली को देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया । आपने शुरूआत के दो-तीन खण्डों में जिस प्रकार रेलवे में व्याप्त अव्यवस्था का जिक्र किया उसकी तारीफ मैं शब्दों से नहीं कर सकता । मैं तो शुरू में समझ ही नहीं पाया कि आप दक्षिण भारत के बारे में लिखने जा रहे हैं या ट्रेन की यात्रा के सम्बद्ध में ।

परन्तु धीरे-धीरे मैं जैसे-जैसे आपकी यात्रा के बारे में आगे पढ़ने लगा तो जैसे मैं उसमें डूब गया । मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं भी अपरोक्ष रूप से आपके परिवार के साथ दक्षिण भारत की यात्रा कर रहा हूं । मुझे भी देशाटन का बहुत शौक है । प्रकृति के बीच में अपने आप को पाकर मुझे बहुत खुशी होती है । आपकी यह पुस्तक पढ़कर मुझे केरल जाने की बहुत इच्छा है । देखिये प्रभु मेरी यह इच्छा कब पूरी करता है ।

मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं , एक साफ्टवेयर इंजीनियर भी हूं । साथ ही साथ उत्तर प्रदेश सरकार के अंतर्गत राजस्व विभाग में कार्य कर रहा हूं । मुझे पुस्तकों के पढ़ने का शौक हैं । नयी चुनौतियों को स्वीकार करने में मुझे खुशी होती है । यह मेरा स्वयं का परिचय है ।

आपने पुस्तक में इतना सब कुछ लिख दिया है कि एक आम आदमी अब दक्षिण भारत के उन स्थलों की आसानी से बिना गाइड के ही यात्रा कर सकता है । आपने जितने सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है उसे देखकर एक बार आपसे मिलने की प्रबल इच्छा हो रही है । मैं चाहता हूं कि एक बार आप भगवान राम की नगरी अयोध्या में जरूर आयें और यहां के बारे में भी लिखकर आम आदमी को भगवान राम की पवित्र नगरी के बारे में अवश्य बतायें । आपके शब्दों का जादू श्रद्धालुओं को काफी सहयोग प्रदान करेगा एवं उनके अन्दर अयोध्या आने की प्रेरणा देगा । मैं अयोध्या का रहने वाला हूं । आपको अपने स्तर से सभी सुविधा देने का प्रयास करूंगा । आप सपरिवार अयोध्या पधारने की कृपा करें । यहां मैं आपका स्वागत करूंगा ।

बस मुझे आपकी किताब में केवल केरल के एक बीच को बताते समय कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग मिला जिसको यदि आप नहीं करते तो मेरे अपने अनुसार शायद और उचित होता ।
अंत में , मैं आपको इतनी अच्छी यात्रा वृत्तांत लिखने के लिये धन्यवाद देता हूं । आपकी अन्य किताबें मैं खोजकर अवश्य पढ़ूंगा । मैं कोई साहित्य का आदमी नहीं हूं । यह मेरी टूटे-फूटे शब्दों में भावना मात्र है । आशा है आप मेरी गल्तियों को अपनी महानता का परिचय देकर माफ कर देगें ।
धन्यवाद ।
भवदीय
ह॰/-
बद्रीनाथ उपाध्याय रानोपाली (पुलिस चौकी के पास)अयोध्या फैजाबाद (उ0प्र0 ) - 224123मे0 09450775146

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

पुस्तक चर्चा

वरिष्ठ कथाकार हृदयेश के सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘संगत’ मे दो उपन्यास शामिल हैं - ‘सांड़’ और ‘दंडनायक’ । सांड़ उपन्यास के केन्द्र में हमारी शिक्षा व्यवस्था है । प्रस्तुत उपन्यास विस्तृत फलक पर शिक्षण जगत की अराजक और आतंकी गतिविधियों का लेखा-जोखा है । उपन्यास में यह भी चित्रित किया गया है कि बेहद सामान्य से दीखने वाले उत्पीडि़त लोगों में से कुछ ऐसे जन भी निकल आते हैं जो इस स्थिति का सक्रिय प्रतिवाद करने को उठ खड़े होते हैं । शुरू में वे अपने प्रतिरोध में अकेले होते हैं , सुबह की धूप के छितरे हुए टुकड़ों की मानिंद , लेकिन जल्द ही वे सब मिलकर गर्म धूप का सैलाब बन जाते हैं और उस सैलाब के दबाव के आगे भ्रष्ट-तंत्र व नौकरशाही को झुकना पड़ता है ।


दंडनायक उपन्यास में स्वतंत्र भारत की मानव-विरोधी व्यवस्था की चक्की में पिस गए एक ऐसे व्यक्ति की व्यथा-कथा चित्रित है जो अपने देश की आजादी के लिए फांसी पर चढ़े एक क्रांतिकारी ( शहीद रोशन सिंह) की तीसरी पीढ़ी में पैदा हुआ था । यह उपन्यास उन अनेक प्रश्नों को उठाता है जो वर्तमान जन-मानस को बराबर परेशान किए हुए हैं । क्या आज के हिन्दुस्तान की तस्वीर वही है जो क्रान्तिकारियों के दिलो-दिमाग में थी और जिसके लिए उन्होंने भरी जवानी में फांसी के फंदे को चूमा था ?


दोनों ही उपन्यासों में अलग-अलग विषय-वस्तु होकर भी मानव-विरोधी व्यवस्था से भिड़ने -जूझने का संकल्प और साथ ही उस दिशा में भरसक प्रयास किया है ।


‘संगत’ - हृदयेश
पृष्ठ - 414 मूल्य : 450/-

भावना प्रकाशन109 ए ,

पटपड़गंज , दिल्ली - 110091

वरिष्ठ कथाकार बलराम हिन्दी के उन लब्धप्रतिष्ठ कथाकारों में हैं जिहोंने पत्रकारिता के साथ अपनी सृजन क्षमता को अक्ष्क्षुण रखा है । ‘कलम हुए हाथ’ और ‘मालिक के मित्र’ जैसी महत्वपूर्ण कहानियां लिखने वाले बलराम का सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह है - ‘गोवा में तुम’ , जिसमें शीर्षक कहानी के अतिरिक्त सोलह अन्य कहानियां सम्मिलित हैं । संग्रह की यद्यपि सभी कहानियां पठनीय हैं , लेकिन गोवा में तुम , शुभ दिन , मालिक के मित्र , सामना , इतना खटराग , समर्पण गाथा , उनके फतवे कहानियां लेखक की चमत्कारिक भाषा , शिल्प और कथानक का उललेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करती हैं ।
प्रकाशक - वही

पृष्ठ- 135 , मूल्य - 150/-