बुधवार, 23 मार्च 2011

कविताएं


युवा कवयित्री अल्पना भारती की दो कविताएं

(१)
आदमी का खोल पहनकर,
कुछ-कुछ आदमी हो जाता हूँ
रोता हूँ, हँसता हूँ,
पर ज़्यादातर चुप रहता हूँ

सोचता भी हूँ
बड़ी बातों पर कम,छोटी बातो पर ज्यादा
जब वक़्त पुकारता है,उठ, खड़ा हो,
अपनी सोच को आवाज़ दे,बोल!
तो चुप रह जाता हूँ.
और जब बोलने से बात बिगड़ जाती है,
मन मैं कुछ चिटक कर रह जाता है
और सोचता हूँ की मैं क्यों बोला,
तो पाता हूँ की मैं बोल जाता हूँ

अभी कल,
उन्होंने बुलाया बोलने
मैं गया नहीं
लगा ,क्यूँ बोलूं,बोलने से क्या होगा
तो आदमी की तरह चुप रह और नहीं बोला.

आज उन्होंने नहीं बुलाया,मुझे बोलने नहीं बोला .
पर पता नहीं क्यूँ ?कुछ कसमसा रहा है,
कुछ है जो जीने नहीं दे रहा
सांस खुलकर नहीं आ रही
बड़ी बैचैनी सी है
क्या चुप रहूँ ?या कुछ बोलूं?
ये चक्रवात सा क्या है?
मेरी आत्मा में
अर्रें आत्मा!!
ये क्या है? क्या बला है ?
कभी लगा ही नहीं की मुझ में भी एक आत्मा है,
जिसका रिश्ता सिर्फ मेरे बदन से नहीं,
सिर्फ मेरे वजूद से नहीं, पूरी कायनात से है
हर आत्मा से है,भगवान् से है
(सुनते तो यही आये हैं,शायद सच हो?)
मुझमें भी आत्मा है!
अब सिर्फ एक "आदमी" नहीं रहा मैं
हाँ!

हाँ!जो कल रात मेरे घर मैं आग लगाई गयी तो मेरा खोल जल गया शायद
मेरा आदमी का खोल जल गया
अब आदमी नहीं रहा मैं
आदमी का खोल नहीं पहनता
खुल कर बोलता हूँ
अपनी आत्मा की आवाज़ पर
हर किसी के लिए
हाँ! हर किसी आत्मा के लिए





(२)

लरज़ती आवाज़ से जब निकलते हैं दहकते सवाल
ज़माना सहम जाता हैं
ज़वाब कहीं नहीं होते,
देने पड़ते है इम्तिहान,
खून की स्याही से लिख-लिख कर,
तब कहीं जाकर अखब़ार के कुछ पन्नो पर खबर छपती हैं.
ग़र खूं पानी हैं तो ख़बर भी बासी होंगी
ग़र खूं में उबाल नहीं तो ख़बर क्यों कर झकझोर पाएगी

नसों मैं जोश उबाला ले
खूं लावे की तरह गर्म
और दिल मैं अपना ही नहीं ,ज़माने का दर्द हो तो उठो,और पीछे देखो,
एक हुजूम तुम्हारे साथ है
तुम्हारे तेवर उसका बर्दाश्त है,
आगे बढ़ो
कायनात तुम्हारे साथ है.....
****
अल्पना भारती

जन्म-३१ जुलाई १९७४
शिक्षा-स्नातकोत्तर (इतिहास).
• भरतनाट्यम में पारंगत
• विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और कहानियां प्रकाशित.
पता - के -१,साऊथ पार्क,सेरिलिंगाम्पल्ली,
हैदराबाद.
ई मेल : alpanabharati@gmail.com

सोमवार, 7 मार्च 2011

आलेख

चित्र : बलराम अग्रवाल

वातायन में ’हम और हमारा समय’ के अंतर्गत प्रकाशित मेरे छोटे-से आलेख - ’हिन्दी साहित्य बनाम प्रवासी हिन्दी साहित्य’ पर्याप्त चर्चित हुआ, जिसपर साहित्यकारों और पाठकों ने अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए. न्यूजर्सी (अमेरिका) वासी हिन्दी और सिन्धी साहित्यकार देवी नांगरानी ने मेरे आलेख में अपनी प्रतिक्रिया तो व्यक्त की ही उन्होंने अलग से एक आलेख भी लिखा, जो रचना समय के इस अंक में प्रकाशित है. देवी जी के अतिरिक्त मुझे हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक डॉ. कमलकिशोर गोयनका जी का आलेख भी मिला, जो उनके हस्तलेख में नौ पृष्ठों का है और जिसमें डॉ. गोयनका ने अपने तर्कों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि प्रवासी लेखकों द्वारा लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य के लिए ’प्रवासी हिन्दी साहित्य’ का प्रयोग अनुचित नहीं है. इस आलेख को भी मैं प्रकाशित करना चाहता हूं, लेकिन कुछ असुविधाओं के कारण इसे तत्काल नहीं प्रकाशित कर पा रहा हूं.
मित्रो से आग्रह है कि देवी नांगरानी जी के प्रस्तुत आलेख पर अपनी प्रतिक्रिया से मुझे और उन्हें अवश्य अवगत कराएंगे.
****

हिंदी साहित्य बनाम प्रवासी हिंदी साहित्य

देवी नांगरानी

श्री रूपसिंह चँदेल जी के इस ब्लाग पर <http://www.vaatayan.blogspot.com/>

"हिंदी साहित्य बनाम प्रवासी हिंदी साहित्य" नाम का लेख पढ़ा और साथ में यू.के. के ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की यह रचना, जिसने सोच में फिर से एक बार तहलका मचा दिया :
"साहित्य के उपासको, ए सच्चे साधको "
कविता कथा को तुमने प्रवासी बना दिया
मुझको लगा कि ज्यों इन्हें दासी बना दिया "
प्रसव पीड़ा की गहराई और गीराई उनकी इस रचना में महसूस की जाती है जब देश के बाहर रहने वाले सहित्यकार को प्रवासी के नाम से अलंक्रित किया जाता है. क्या कभी अपनी मात्र भाषा भी पराई हुई है? कभी शब्दावली अपरीचित हुई है? इस वेदना को शब्दों का पैरहन पहनाते हुए वे भारत माँ की सन्तान को निम्मलिखित कविता में एक संदेश दे रहे है.... यही परम सत्य है, अनुज नीरज का कथन
"शब्द, भाव प्रवासी कैसे हो सकते हैं.?????
साहित्य को चार दीवारों में बाँध कर नहीं रखा जा सकता...खुशबू कभी बंधी है किसी से....!! बिलकुल इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है. और अनेक लेखकों ने अपनी अपनी राय यहाँ दर्ज की है ..
<http://www.blogger.com/comment.g?blogID=417740764999982630&postID=187777425560164328>
भारत माँ हमारी जन्मदातिनी है. क्या देश से दूर परदेस में जाने से रिश्तों के नाम बदल जाते हैं? अगर नहीं तो प्रवासी शब्द किस सँदर्भ में उपयोग हो रहा है? भाषा का विकास हमारा विकास है, और यह सिर्फ देश में ही नहीं, यहाँ विदेश में भी हो रहा है इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता. एक लेखक ने यहाँ तक कहा है "व्यक्ति प्रवास करता है, कविता नहीं। कविता तो हृदय की भाषा है" सूरज की रोशनी की तरह भाषा पर हर हिंदोस्तानी का उतना ही अधिकार है जितना एक बालक का माँ की ममता पर होता है. ये उसका हक़ है और इस विरासत को उससे कोई नहीं छीन सकता!.पानी पर लकीरे खींचने से क्या पानी अलग होता है.
ह्यूसटन की जानी मानी साहित्यकार इला प्रसाद का, (प्रवासी नहीं कहूँगी) का इस विषय में अपना मत है, वे कहती हैं :
"होना यही चाहिए कि हम प्रवासी सम्मेलनों से बचें प्रवासी के लेबल के साथ छपने से इनकार करें मेरी मुसीबत तो यह है कि जो पत्रिकाएँ मुझे अतीत में बिना इस शीर्षक के छापती रहीं आज उस शीर्षक के साथ छाप रही हैं यह बताता है कि यह शब्द किस तेजी से प्रयोग में आ रहा है यह ध्यानाकर्षित करने का तरीका हो सकता है किन्तु इस बैसाखी की जरूरत नहीं होनी चाहिए "
साहित्य और समाज का आपस में गहरा संबंध है. एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, एक का प्रभाव दुसरे पर अनिवार्य रूप से पड़ता ही है, दोनों एक दूसरे के निर्माण में सहयोगी हैं. इसमें भारतीय संस्कृति की आत्मा की संवेदनशीलता, उदारता, सदाचरण, एवं सहस जैसे मानवीय गुण हैं. आदमी प्रवासी होता है, साहित्य नहीं. देस विदेस के बीच एक नयी उड़ान भरता प्रवासी साहित्य हर बदलती विचारधारा के परिवर्तित मूल्यों से परिचित कराता हुआ, अपने विचार निर्भीकता से, स्पष्टता से और प्रमाणिकता से व्यक्त करके यथार्थ की परिधि में प्रवेश पाता है. प्रवास में रहकर यहाँ का लेखक दोहरी मान्यताओं तथा रोज़मर्रा के अनुभव को कलमबंद कर रहा है. इसमें क्या प्रवासी है? भाषा प्रवासी नहीं होती, सोच प्रवासी नहीं होती तो अभिव्यक्ति कैसे "प्रवासी" के नाम से अलंकृत हो सकती है? किसी भाषा में समुचित योग्यता के विकास के लिए उस भाषा पर कार्य करना तथा उस भाषा का नियमित प्रयोग करना अनिवार्य है. पर यहाँ तो बात हमारी मात्रभाषा और राष्टभाषा हिंदी की है. हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है. हिंदी का विकास हो रहा है और बढ़ावा मिल रहा है उसमें प्रवासी भारतीयों की भागीदारी बराबर रही है.
दरअसल साहित्य एक ऐसा लोकतंत्र है जहाँ हर व्यक्ति अपनी कलम के सहारे अपनी बात कह और लिख सकता है, यह आज़ादी उसका अधिकार है..हाँ नियमों की परिधि में रहकर! लेखक का रचनात्मक मन शब्दों के जाल बुनकर अपने मन की पीढ़ा को अभिव्यक्त करता है. लिखता वह अपने देश की भाषा में है, पर परदेस में बैठकर, और उसे प्रवासी साहित्य कहा जाता है. लेखक सोच के ताने बने बुनता है हिज्दी में, लिखता है हिंदी में, पर वह साहित्य कहलाया जाता है प्रवासी. ऐसे लगता है जैसे भाषा को ही बनवास मिल गया है.!!
द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारिशस में प्रस्तुत डॉ. ओदोलेन स्मेकल के भाषण के एक अंश में हिन्दी-राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता के संदर्भ में कहा था- ''मेरी दृष्टि में जो स्वदेशी सज्जन अपनी मातृभाषा या किसी अपनी मूल भारतीय भाषा की अवहेलना करके किसी एक विदेशी भाषा का प्रयोग प्रात: से रात्रि तक दिनों दिन करता है, वह अपने देश में स्वदेशी नहीं, परदेशी है।'' अगर यह सच है तो प्रवास में हिंदी साहित्य लिखने वाला भारतीय प्रवासी कैसे हो सकता है? (प्रवासी व्याकुलता से)
तमिलनाडू हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष डा॰ बालशौरि रेड्डी का इस विषय पर एक सिद्धाँतमय कथन है "हिंदी का साहित्य जहाँ भी रचा गया हो और जिसने भी रचा हो, चाहे वह जंगलों में बैठ कर लिखा गया हो या ख़लिहानों में, देश में हो या विदेश में, लिखने वाला कोई आदिवासी हो, या अमेरिका के भव्य भवन का रहवासी, वर्ण, जाति धर्म और वर्ग की सोच से परे, अपनी अनुभूतियों को अगर हिंदी भाषा में एक कलात्मक स्वरूप देता है, तो वह लेखक हिन्दी भाषा में लिखने वाला क़लमकार होता है और उसका रचा साहित्य हिन्दी का ही साहित्य है।" (प्रवासी व्याकुलता से)
गर्भनाल के ३७ अंक में रेनू राजवंशी गुप्ता का आलेख" अमेरिका का कथा-हिंदी साहित्य" पढ़ा. हिंदी भाषा को लेकर जो हलचल मची हुई है वह हर हिन्दुस्तानी के मन की है, जहाँ कोई प्रवासी और अप्रवासी नहीं, बस देश और देश की भाषा का भाव जब कलम प्रकट करती है तो जो मनोभाव प्रकट होते हैं उन्हें किसी भी दायरे में कैद करना नामुमकिन है. न भाषा की कोई जात है न लेखन कला की. रेणुजी का कथन "हिंदी लेखकों ने कर्मभूमि बदली है" इस बात का समर्थन है!
साहित्य कोई भी हो, कहीं भी रचा गया हो, अगर हिंदी में है तो निश्चित ही वह हिंदी का साहित्य है.
*****
रचनाकार परिचय:-
देवी नागरानी
जन्मः ११ मई, १९४१ कराची
शिक्षाः बी.ए अर्ली चाइल्डहुड में, न्यू जर्सी, गणित का भारत व न्यू जर्सी से डिगरी हासिल .
सम्प्रतिः शिक्षिका, न्यू जर्सी.यू.एस.एक्रुतियां
प्रकाशन : "ग़म में भींजीं ख़ुशी" सिंधी भाषा में पहला- गज़ल संग्रह २००४
"चरागे-दिल" हिंदी में पहला गज़ल-संग्रह, २००७
"उडुर-पखिअरा" ( सिंधी भजन- संग्रह, २००७)
“ दिल से दिल तक" (हिंदी ग़ज़ल- संग्रह २००८)"
आस की शम्अ" (सिंधी ग़ज़ल -सँग्रह २००८)"
सिंध जी आँऊ जाई आह्याँ" (सिंधी काव्य- संग्रह, २००९) -कराची में छपा
"द जर्नी " (अंग्रेजी काव्य- संग्रह २००९)
कलम तो मात्र इक जरिया है, अपने अँदर की भावनाओं को मन की गहराइयों से सतह पर लाने का. इसे मैं रब की देन मानती हूँ, शायद इसलिये जब हमारे पास कोई नहीं होता है तो यह सहारा लिखने का एक साथी बनकर रहनुमाँ बन जाता है.
संपर्कःAdd: 9-D Corner View Society, 15/33 Road, Bandra, Mumbai 4000५0, Ph: 9867855751Email:dnangrani@gmail.com

रविवार, 19 दिसंबर 2010

पुस्तक चर्चा

छाया - बलराम अग्रवाल

भूमिका

अबाधित पठनीयता

रूपसिंह चन्देल

‘विष्णुगुप्त चाणक्य’ जैसे कालजयी उपन्यास के प्रणेता वरिष्ठ रचनाकार वीरेन्द्रकुमार गुप्त की कृतियों में न केवल जीवन की वैविध्यता परिलक्षित है प्रत्युत उनका विशिष्ट जीवन-दर्शन भी उद्भासित है । उनके उपन्यास ‘प्रियदर्शी’ और ‘विजेता’ बौद्धदर्शन की एकदम नवीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं तो पस्तुत उपन्यास ‘जीवन के सात रंग’ में वह प्रेम के सात रूपों को सहज और सरल रूप में चित्रित करने में सफल रहे हैं । न केवल उनके पूर्व प्रकाशित उपन्यासों बल्कि प्रस्तुत उपन्यास से भी यह सिद्ध होता है कि वह कथाकार मात्र नहीं , चिन्तक , विचारक और विश्लेशक भी हैं और ये विशेषताएं उन्हें अन्य समकालीन रचनाकारों से अलगाती हैं ।

आजीवन साहित्य और शिक्षा , अध्ययन और अध्यापन के लिए समर्पित वीरेन्द्र जी सदैव भीड़ से अलग रहकर एक साधक की भांति कर्मलीन रहे, आत्म-प्रक्षेपण की कला वे न सीख सके और शायद यही कारण रहा कि उनके साहित्यिक अवदान का प्राप्य उन्हें नहीं मिल सका । उन्होंने जैनेन्द्र जी का अभूतपूर्व साक्षात्कार किया , जो ‘समय और हम’ शीर्षक से जैनेन्द्र जी के नाम से प्रकाशित हुआ । यह विश्व में एक साहित्यकार का एक साहित्यकार द्वारा किया गया सबसे वृहद् साक्षात्कार है , जिसमें साक्षात्कर्ता अर्थात वीरेन्द्र जी को पृष्ठभूमि में डाल दिया गया।

वीरेन्द्र जी परिवेश , वातावरण और पात्रानूकूल भाषा का निर्वाह कर कृति को प्रवाहमय और सरस बना देते हैं । शिल्प के प्रति न वह लापरवाह हैं और न ही दुराग्रही । पात्रों और घटनाओं को वे उनके अपने अंतर्वेग से बहने देते हैं, उन पर छाते नहीं । पाठक भी उनकी दृष्टि से कभी ओझल नहीं होता ।

‘जीवन के सात रंग’ का केन्द्रीय विषय प्रेम है । ‘प्रेम’ शब्द कहने-सुनने में जितना सामान्य प्रतीत होता है उतना ही यह गूढ़ है । दो खण्डों में विभक्त इस उपन्यास में वर्तमान से लेकर पूर्वजन्म के प्रेम से पाठक का साक्षात होता है । मंजु और कमल का प्रेम उनमें से एक है जिसमें नारी का एक ऐसा स्वरूप प्रकट होता है जो अपने पूर्व प्रेमी अर्थात् कमल से घृणा करने के बावजूद उसे अंत तक अंतर्तम से प्रेम करती रहती है । प्रेम के भिन्न-भिन्न रूपों को चित्रित करते इस उपन्यास में आद्यंत औत्सुक्य और अबाधित पठनीयता विद्यमान है ।

01.03.2010

बी-3/230 , सादतपुर विस्तार ,
दिल्ली - 110 094
मो. 09810830957
******
जीवन के सात रंग - वीरेन्द्र कुमार गुप्त
भावना प्रकाशन, A-109, पटपड़गंज,
दिल्ली - ११० ०९१
पृष्ठ -२२५, मूल्य - २५०/-

रपट

चित्र - बलराम अग्रवाल

संगोष्ठी रिपोर्ट

महेशः दर्पण की पुस्तक पूश्किन के देस में ने मुझे 60 साल पीछे पहुंचा दिया है। चेखव को मैंने आगरा में पढऩा शुरू किया था। कोलकता की नैशनल लायब्रेरी में भी मैं चेखव के पत्र पढ़ा करता था। इस पुस्तक में एक पूरी दुनिया है जो हमें नॉस्टेल्जिक बनाती है। यह विचार हंस के संपादक और वरिष्ठï कथाकार राजेन्द्र यादव ने सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पूश्किन के देस में पर आधारित संगोष्ठी में व्यक्त किए। इसे रशियन सेंटर और परिचय साहित्य परिषद ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था।

श्री यादव ने कहा : सन् 1990 में मैं भी रूस गया था। कुछ स्मृतियां मेरे पास भी थीं। इसे पढक़र वे और सघन हुई हैं। एक कुशल यात्रा लेखक की तरह महेश दर्पण ने बदले हुए रूस को देखते हुए भी बताया है कि अब भी रूस में बहुत कुछ बाकी है। यह पुस्तक मेरे स्मृति कोश में बनी रहेगी। ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं, जैसे काफी पहले एक किताब प्रभाकर द्विवेदी ने लिखी थी-‘पार उतर कहं जइहों’।
प्रारंभ में कवि-कथाकार उर्मिल सत्यभूषण ने कहा : यह पुस्तक हमें रूसी समाज, साहित्य और संस्कृति से परिचित कराते हुए ऐसी सैर कराती है कि एक-एक दृश्य आंखों में बस जाता है। अब तक हम यहां रूस के जिन साहित्यकारों के बारे में चर्चा करते रहे हैं, उनके अंतरंग जगत से महेश जी ने हमें परिचित कराया है।
महेश दर्पण को फूल भेंट करते हुए रशियन सेंटर की ओर से येलेना श्टापकिना ने अंग्रेजी में कहा कि एक भारतीय लेखक की यह किताब रूसी समाज के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करती है। इस पठनीय पुस्तक में लेखक ने कई जानकारियां ऐसी दी हैं जो बहुतेरे रूसियों को भी नहीं होंगी।

कथन के संपादक और वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय ने कहा कि महेश दर्पण ने इस पुस्तक के माध्यम से एक नई विधा ही विकसित की है। यह एक यात्रा वृतांत भर नहीं है। इसे आप एक उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं। रचनाकारों के म्यूजियमों के साथ ही महेश दर्पण की नजर सोवियत काल के बाद के बदलाव की ओर भी गई है। अनायास ही उस समय से इस समय की तुलना भी होती चली गई है। श्रमशील और स्नेही साहित्यकर्मी तो महेश हैं ही, उनका जिज्ञासु मन भी इस पुस्तक में सामने आया है। मुझे ही नहीं, मेरे पूरे परिवार को यह पुस्तक अच्छी लगी।

वरिष्ठ उपन्यासकार चित्रा मुद्गल ने कहा : मैं महेश जी की कहानियों की तो प्रशंसिका तो हूं ही, यह पुस्तक मुझे विशेष रूप से पठनीय लगी। रूसी समाज को इस पुस्तक में महेश ने एक कथाकार समाजशास्त्री की तरह देखा है। यह काम इससे पहले बहुत कम हुआ है। रूसी समाज में स्त्री की स्थिति और भूमिका को उन्होंने बखूबी रेखांकित किया है। बाजार के दबाव और प्रभाव के बीच टूटते-बिखरते रूसी समाज को लेखक ने खूब चीन्हा है। यह पुस्तक उपन्यास की तरह पढ़ी जा सकती है। बेगड़ जी की तरह महेश ने यह किताब डूबकर लिखी है। रूस के शहरों और गांवों का यहां प्रामाणिक विवरण है जो हम लोगों के लिए बेहद पठनीय बन पड़ा है।
सर्वनाम के संस्थापक संपादक और वरिष्ठï कवि-कथाकार विष्णु चंद्र शर्मा ने कहा : महेश मूलत: परिवार की संवेदना को बचाने वाले कथाकार हैं। इस किताब में भी उनका यह रूप देखने को मिलता है। उन्होंने बदलते और बदले रूस के साथ सोवियत काल की तुलना भी की है। वह रूसी साहित्य पढ़े हुए हैं। वहां के म्यूजियम और जीवन को देखकर उन्होंने ऐसी चित्रमय भाषा में विवरण दिया है कि कोई अच्छा फिल्मकार उस पर फिल्म भी बना सकता है। अनिल जनविजय के दोनों परिवारों को आत्मीय नजर से देखा है। यह पुस्तक बताती है कि अभी बाजार के बावजूद सब कुछ नष्टï नहीं हो गया है। आजादी मिलने के बाद हिन्दी में यह अपने तरह की पहली पुस्तक है जिससे जाने हुए लोग भी बहुत कुछ जान सकते हैं।

प्रारंभ में कथाकार महेश दर्पण ने कहा : जो कुछ मुझे कहना था, वह तो मैं इस पुस्तक में ही कह चुका हूं। जैसा मैंने इस यात्रा के दौरा महसूस किया, वह वैसा का वैसा लिख दिया। अब कहना सिर्फ यह है कि रूसी समाज से उसकी तमाम खराबियों के बावजूद, हम अभी बहुत कुछ सीख सकते हैं। विशेषकर साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण के बारे में। यह सच है कि अनिल जनविजय का इस यात्रा में साथ मेरे लिए एक बड़ा संबल रहा है। दुभाषिए का इंतजाम न होता तो बहुत कुछ ऐसा छूट ही जाता जिसे मैं जानना चाहता था।
इस संगोष्ठी में हरिपाल त्यागी, नरेन्द्र नागदेव, प्रदीप पंत, सुरेश उनियाल, सुरेश सलिल, त्रिनेत्र जोशी, तेजेन्द्र शर्मा, मृणालिनी, लक्ष्मीशंकर वाजपेई, भगवानदास मोरवाल, हरीश जोशी, केवल गोस्वामी, रामकुमार कृषक, योगेन्द्र आहूजा, वीरेन्द्र सक्सेना, रूपसिंह चंदेल, प्रेम जनमेजय, हीरालाल नागर, चारु तिवारी, राधेश्याम तिवारी, अशोक मिश्र, प्रताप सिंह, क्षितिज शर्मा और सत सोनी सहित अनेक रचनाकार और साहित्य रसिक मौजूद थे।
प्रस्तुति : दीप गंभीर

बुधवार, 24 नवंबर 2010

पुस्तक चर्चा

चित्र : एस. राजशेखर
स्व. कन्हैयालाल नन्दन की आत्मकथा का एक अंश

कवि-पत्रकार स्व. कन्हैयालाल नन्दन की आत्मकथा के दो खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं. पहला खण्ड – ’गुजरा कहां कहां से ’ ’राजपाल एण्ड संस, मदरसारोड,कश्मीरी गेट, दिल्ली – ११० ००६से प्रकाशित हुआ, नदंन जी के अनुसार (दूसरे खंड की भूमिका), जिसे पाठकों का अपार प्यार मिला. उससे उत्साहित होकर उन्होंने दूसरा खण्ड लिखा जिसे –’कहना जरूरी था’ शीर्षक से सामयिक प्रकाशन , दरिया गंज , नई दिल्ली – ११० ००२ ने २०१० में प्रकाशित किया. प्रस्तुत है इसी खण्ड से एक महत्वपूर्ण अंश.

कोरा कागज कोरा ही रह गया

वह कोशिश भी मैंने तब की जब मैंने भारतीजी के मन में यह पूरी तरह स्थापित कर दिया कि कानूनी तौर पर मेरी गलतियां निकालकर और मुझे दोषी करार देकर वे मुझे ’टाइम्स ऑफ इंडिया’ से नहीं निकाल सकते. मेरे इस विश्वास के पीछे बहुत बड़ा हाथ था – इस्टैब्लिशमेंट डिपार्टमेंट के पहले उपप्रमुख और बाद में प्रमुख बने श्री कनैयालाल लालचंदानी का, जो मेरी संवेदनशीलता, मानसिक त्रास, मेरी सज्जनता और मेरी सहृदयता , सभी के गहरे प्रशंसक थे. मेरी कर्मनिष्ठा से वे ’धर्मयुग’ में एक-एक कदम से परिचित थे और भारतीजी के भेजे शिकायत-पत्रों के भी वे श्रेष्ठतम गवाह थे. उन्होंने तो मुझे यहां तक कह रखा था कि कोई भी बात मुझे इतनी गंभीरता से नहीं लेनी चाहिए कि वह मेरे स्वास्थ्य पर असर डाले. जहां तक नौकरी का सवाल है, उनके शब्द थे – ’मेरे रहते भारतीजी आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे, ऎसा मैं आपको वचन देता हूं.”

मैंने उनसे जिरह की कि भारतीजी जब जान जाएंगे कि आप मेरे प्रति सहृदय हैं, तो वे मेरे खिलाफ किसी इंक्वायरी में आपको नहीं रहने देंगे. इस पर उनका कहना था कि “नंदन जी, ऎसी स्थिति तभी आएगी, जब ’टाइम्स ऑफ इंडिया’ मुझे नौकरी से निकाल देगा और यदि ऎसी स्थिति भी आई, तो मैं उनके नौकरी छोड़ने तक की स्थिति पैदा कर दूंगा.”

बहरहाल, इस सीमा तक की आश्वस्ति ने मुझे और मेरे जीवन को काफी सहज बना दिया था, लेकिन मैं आश्वस्ति की अभिव्यक्ति भी अपने व्यवहार से नहीं होने देना चाहता था. शायद भारतीजी भी बहुत कुछ इस बात को समझ गए थे कि कंपनी के कायदे-कानून ऎसे हैं कि वे मुझे तो क्या, अब एक मामूली क्लर्क आर.डी. शाह तक को नहीं निकाल सकते. भले कोई खुद ही हारकर नौकरी छोड़ जाए तो बात दूसरी है.

कुछ इन्हीं स्थितियों में मैंने एक दिन अपने मन को टटोला और जब उस दिन का सारा काम समाप्त हो अया, तो मैंने भारतीजी से इंटरकाम पर उनसे कुछ विचार-विमर्श करने की अनुमति मांगी. उन्होंने केबिन में आने को कहा, तो मैं एक कोरा कागज लेकर उनके पास पहुंचा और बोला, “डॉ. साहब, मैं आपसे एक बात करना चाहता हूं कि आप मुझे रोज-रोज जलील होने की स्थितियों में डाल देते हैं, मैं इसके योय व्यक्ति नहीं हूं. आप मुझे नहीं रखना चाहते, निकालना चाहते हैं, तो प्रेम से निकालिए, जलील करके नहीं. इसलिए आप मुझे निकालिए तो प्रेमपूर्वक. यह कोरा कागज मैं दस्तखत करके आपको सौंपता हूं, आप इस पर जो चाहें लिख लें.”

भारतीजी उस समय पेंसिल-रबड़ हाथ में लेकर अपने डमियों के शिड्यूल की उठापटक कर रहे थे. चौथे पेज को चौदहवें पर और चौदहवें को चौंतीसवें पेज पर. ’धर्मयुग’ के स्वरूप को सुष्ठ बनाने के लिए वे अक्सर ऎसा करते ही रहते थे. उनके एक हाथ में रबड़ थी और एक हाथ में पेंसिल. मेरी बात सुनते ही वे इस कदर नाराज हुए कि हाथ की रबड़ डमी पर जोर से पटककर मारी और बोले, “गेटआउट फ्राम हीयर, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है.” उन्होंने रबड़ इतने जोर से पटकी थी कि वह मेज से उछलकर केबिन के एक कोने में जाकर पड़ी.

मैंने सहमकर रबड़ उठाई, क्योंकि मैंने जानबूझकर ’ आ बैल मुझे मार’ किया था, और चुपचाप उनकी मेज पर रखकर केबिन से गेटआउट हो गया. मेरा कोरा कागज मेरे हाथ में मुझे उस शाम लगातार चिढ़ाता रहा और भारतीजी का सख्त नाराज होकर रबड़ पटकना एवं उस गुस्से की अभिव्यक्ति रबड़ की उछाल में करते हुए मुझे गेटआउट कहना, रह-रहकर मेरे दिमाग में घूमता रहा. भारतीजी ने इतनी जोर से शायद ही कभी किसी को ’गेट-आउट’ कहा हो.
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--- कहना जरूरी था – कन्हैयालाल नंदन
सामयिक प्रकाशन
३३२०-२१, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग,
दरियागंज, नई दिल्ली – ११० ००२

पृष्ठ : १७६, मूल्य : २५०

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पत्रिका

’समीक्षा’ पत्रिका अपने नए कलेवर में

४३ वर्ष पहले हिन्दी के वरिष्ठ और चर्चित आलोचक डॉ. गोपाल राय ने ’समीक्षा’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था. पुस्तक समीक्षा केन्द्रित इस पत्रिका ने कम समय में ही इतनी चर्चा प्राप्त की कि यह डॉ. राय के नाम का पर्याय बन गई. विश्वविद्यालय से अवकाश ग्रहण करने के बाद डॉ. राय जब दिल्ली आ गए तब पत्रिका का उनके साथ दिल्ली आना स्वाभाविक था. लेकिन दिल्ली आने के बाद पत्रिका उस प्रकार चर्चा में नहीं रही, जिसप्रकार वह पटना काल में रही थी. कारण जो भी रहे हों, लेकिन पत्रिका का प्रकाशन नियमित होता रहा. लंबे समय तक इसके प्रकाशन का दायित्व ’अभिरुचि प्रकाशन’ के श्री श्रीकृष्ण जी निभाते रहे और इस कार्य में डॉ. हरदयाल की अहम भूमिका रही. श्रीकृष्ण की अस्वस्थता के कारण ’अभिरुचि प्रकाशन’ के बंद हो जाने के बाद पत्रिका का प्रकाशन अन्यत्र से होने लगा … जो संतोषजनक नहीं था.

हाल में सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली के महेश भारद्वाज के इस पत्रिका से जुड़ने के बाद पत्रिका के स्वरूप में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ---- एक प्रकार से कायापलट कहना होगा. न केवल सामग्री के स्तर पर बल्कि कलेवर के स्तर पर भी. भारद्वाज की भूमिका इस पत्रिका में प्रबन्ध सम्पादक की है . सामग्री का चयन और सम्पादन सत्यकाम (डॉ. राय के पुत्र) करते हैं और उसका प्रकाशन और वितरण महेश भारद्वाज. महेश एक सुरुचि सम्पन्न युवा प्रकाशक हैं और प्रकाशन के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करना उन्हें पसंद है…… ’समीक्षा’ में यह प्रतिभाषित है.

महेश भारद्वाज के प्रबंध सम्पादकत्व में ’समीक्षा’ का दूसरा अंक हाल में प्रकाशित हुआ है, जिसमें सुरेन्द्र चौधरी को याद करते हुए डॉ. गोपाल राय का आलेख ’सांच कहौं--- ’, डॉ. नामवर सिंह की आलोचना पुस्तक –”हिन्दी का गद्यपर्व’ पर रवि श्रीवास्तव की समीक्षा, परमानन्द श्रीवास्तव की आलोचना पुस्तक ’ रचना और आलोचना के बदलते तेवर’ पर पूनम सिन्हा की समीक्षा, सहित कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक आदि विधाओं की लगभग १७ अन्य पुस्तकों की पुस्तकों की समीक्षा को इस अंक में स्थान दिया गया है.

’समीक्षा’ – (जुलाई-सितम्बर २०१०)
सम्पादक – सत्यकाम
प्रबंध सम्पादक – महेश भारद्वाज

प्रबंध कार्यालय
सामयिक प्रकाशन
३३२०-२१ जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग,
दरियागंज, नई दिल्ली-११००२

फोन नं ०११-२३२८२७३३

सम्पादकीय कार्यालय
एच-२, यमुना, इग्नू, मैदानगढ़ी,
नई दिल्ली – ११००६८

फोन : ०११-२९५३३५३४

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

पुस्तक चर्चा





समीक्षा से पहले कुछ बातें:

’पाथर टीला’ पर वरिष्ठ कवि-कथाकार अशोक आन्द्रे ने संचेतना के
लिए समीक्षा लिखी थी. समीक्षा प्रकाशित होने के पश्चात उपन्यास पर
राजनीति करने वाले कथाकारों में से एक ने (जिसका उपन्यास उन्हीं दिनों एक
नामी प्रकाशक के यहां से प्रकाशित हुआ था) प्रकाशक को फोन करके अपनी भड़ास
निकाली. उसके बाद उस लेखक ने छद्म नामों से मेरे पास फोन करना प्रारंभ
किया. कभी वह स्वयं आवाज बदलकर करता तो कभी अपने किसी मित्र से करवाता.
एक दिन फोन करने वाले व्यक्ति ने कहा कि वह जी.टी.वी. से बोल रहा है और
वह ’पाथर टीला’ पर जी.टी.वी. के लिए फिल्म बनाना चाहता है, क्योंकि यह
उपन्यास प्रेमचन्द्र की याद दिलाता है. प्रकाशक से अपनी भड़ास निकालते समय
भी कथाकार महोदय ने यह बात कही थी. जी.टी.वी. के नाम पर फोन करने वाले
व्यक्ति की बात से मैंने अनुमान लगा लिया कि इसे उन कथाकार महोदय ने वैसा
कहने के लिए कहा होगा. मैंने उससे कहा कि वह आकर मुझसे मिल ले. मिलने से
उसने इंकार करते हुए कहा कि मैं केवल मौखिक अनुमति मात्र दे दूं.

"मेरी जानकारी के अनुसार जी.टी.वी. किसी उपन्यास पर फिल्म नहीं
बनाता---फिर मेरे उपन्यास पर क्यों ?" मैंने पूछा.

"क्योंकि आपका उपन्यास पाठकों को प्रेमचन्द की याद दिलानेवाला एक
महत्वपूर्ण उपन्यास है."

"ओ.के.----" मैंने कुछ देर तक सोचने का नाटक किया फिर बोला, "आप
जी.टी.वी. के लेटर पैड पर अनुमति के लिए किसी वरिष्ठ अधिकारी से लिखवाकर
मुझे पत्र लिख भेजें .मैं उसका उत्तर दे दूंगा."

"उसकी आवश्यकता नहीं है. आपको मेरी बात का यकीन करना चाहिए."

"मेरी अनुमति तभी मिलेगी."

उसने फोन काट दिया.

इस घटना के कुछ दिनों बाद ही किन्हीं बरनवाल के नाम से फोन आया. आवाज
बदलकर वह फोन लेखक महोदय ही कर रहे थे. उसने कहा, "मैं आपके उपन्यास
’पाथर टीला’ पर जे.एन.यू. से एम.फिल. करना चाहता हूं. यह एक महत्वपूर्ण
उपन्यास है. प्रेमचन्द की परम्परा को आगे बढ़ाता है. आपसे अनुमति चाहिए."

"एम.फिल. या पी-एच.डी. करने के लिए किसी शोधार्थी को लेखक से अनुमति लेने
की आवश्यकता नहीं होती. मैं यह अवश्य जानना चाहता हूं कि आपका निर्देशक
कौन है ?"

"निर्देशक का नाम तय नहीं हुआ.. मैं आपसे फोन पर उसके बारे में कुछ
डिस्कस करना चाहता हूं."

"मिलकर बात करना बेहतर होगा. या तो आप मेरे कार्यालय आ जाएं या कॉफी होम
में मिलें और उससे बेहतर होगा कि मेरे घर पधारें."

"मिलने की क्या आवश्यकता---- आप फोन पर ही बता दें." उसने कहा.

"आप ’पाथर टीला’ पर कभी शोध नहीं कर पाएगें." मैंने फोन काट दिया था.

यह बात मैंने प्रकाशक स्व. जगदीश भारद्वाज जी (महेश भारद्वाज के पिता) को
बताई. उन्होंने उस कथाकार का नाम लेते हुए कहा, "चन्देल जी आप क्यों
परेशान हैं इस बात से --- परेशान तो वह है --- उसे रहने दें. आपके
उपन्यास की चर्चा ने उसकी दिन-रात की नींद उड़ा दी है. आप मस्त रहें---
अपना ध्यान लिखने में केन्द्रित करें और उन्हें इन सब मामलों में उलझे
रहने दें."

और मैंने जगदीश जी की बात मानकर उस विषय में सोचना बंद कर दिया था.

यहां यह उद्घाटित कर दूं कि यह वही कथाकार था जिसपर पिछले दिनों करोड़ों
रुपए के सरकारी घोटाले का आरोप लगा था.

प्रस्तुत है अशोक आन्द्रे की वह समीक्षा .

समीक्षा :

प्रेमचन्द की याद दिलाता है ’पाथर टीला’

* अशोक आन्द्रे

हिन्दी कथा साहित्य में गांव की बात आते ही अनायास प्रेमचन्द की याद ताजा
हो उठती है. प्रेमचन्द की रचनाओं में गांव की जिन समस्याओं को अभिव्यक्त
किया गया था, क्या आज के गांव उन समस्याओं से निजात पा चुके हैं ? यह
प्रश्न हिन्दी पाठक के मन को कुरेदता है और गांव से निकट से परिचित और
गांव से असंबद्ध ; किन्तु विभिन्न माध्यमों से गांव की आज की वास्तविकता
का परिचय पाते रहने वाले पाठक जानते हैं कि आजादी से पूर्व अर्थात
प्रेमचन्द काल में गांव जहां था, उसकी जो समस्याएं थीं, जितना अंधविशासों
में वह डूबा हुआ था, स्वतंत्रता के इतने वर्षों पश्चात भी वह वहीं है----
बल्कि तब से कहीं अधिक दारुण स्थिति में जी रहा है, आज का ग्रामवासी.

कथाकार रूपसिंह चन्देल का उपन्यास ’पाथर टीला’ आज के गांव की वास्तविक
छवि प्रस्तुत करता है. ’पाथर टीला’ एक गांव है, जिस पर उपन्यासकार ने
उपन्यास का शीर्षक दिया है, लेकिन यह केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश का ही
गांव नहीं है, बल्कि यह समस्याओं, राजनीतिक उठा-पटक, धार्मिक उन्मादों और
जीवन की विसंगतियों, विषमताओं आदि के कारण अपनी समग्रता में किसी भी
भारतीय गांव की यथार्थपरक छवि प्रस्तुत करता है.

’पाथर टीला’ एक खलनायक प्रधान उपन्यास है अर्थात उपन्यास का मुख्य पात्र
गजेन्द्र सिंह (जिसके काले कारनामें गांव को श्मसान में परिवर्तित कर
देना चाहते हैं ) उपन्यास का नायक है. हिन्दी में खलनायक प्रधान
उपन्यासों की परम्परा नहीं दिखती. इस दृष्टि से ’पाथर टीला’ के लेखक ने
जोखिम उठाते हुए जो कथा प्रस्तुत की है वह महत्वपूर्ण है. अंग्रेजी
साहित्य में ’गॉड फादर’ जैसे खलनायक प्रधान उपन्यासों की उल्लेखनीय
परम्परा हमें प्राप्त होती है. इस दृष्टि से ’पाथर टीला’ को हिन्दी में
उस परम्परा का प्रथम उपन्यास यदि कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी.

विवेच्य उपन्यास में उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद के गांव को कथानक का
आधार बनाया गया है. गांव की भाषा, खेत, खलिहान, तीज-त्यौहार, मेला,
व्यवसाय, रीति-रिवाज, संस्कार आदि विशेषताएं उपन्यास को आंचलिक उपन्यासों
की श्रेणी में भी ला खड़ा करती हैं, लेकिन फिर भी हम उसे एक अंचल विशेष
में सीमित नहीं कर सकते. जो कुछ हम ’पाथर टीला’ में पाते हैं वही सब
बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, या मध्य प्रदेश के किसी भी गांव में
देखा जा सकता है. हर गांव में आज एक गजेन्द्र सिंह उपस्थित है, जो
नव-पूंजीवादी -सामन्ती व्यवस्था का प्रतिरूप बन गांव का शोषण इस हद तक
करने के लिए तत्पर है कि गांव के लोग गोविन्द श्रीवास्तव या नत्थू की
भांति पलायन करने के लिए अभिशप्त हैं, या जमींदार के अत्याचारों को सहते
हुए गांव में ही घुटते रहते हैं.

’पाथर टीला’ का प्रारंभ गांव के बाहर एक ऊंचे टीले पर स्थापित बरियार
बाबा के चबूतरा के सामने मैंदान में लगने वाले मेला से होता है. गजेन्द्र
सिंह उस मेला का आयोजन करता है. बरियार बाबा एक किवदंती पुरुष हैं, जिनके
विषय में बुजुर्ग गोधन माली तक को अधिक कुछ पता नहीं. गोधन ने अपने
पूर्वजों से और उन्होंने अपने पूर्वजों से जो सुना था वह यही कि बरियार
सिंह उसी गांव के थे और गांव में एक मात्र पढ़े -लिखे धार्मिक पुरुष थे,
अविवाहित रहे थे जीवन भर. नीति-नियम के पक्के और लोगों का उन पर अटूट
विश्वास था कि वे किसी भी विपत्ति में गांव के लोगों की रक्षा करने में
सक्षम हैं. वृद्धावस्था में वे गांव के बाहर उस टीले पर आकर रहने लगे थे.
वे कितने वर्ष पहले थे यह कोई न जानता था, लेकिन गोधन का अनुमान था कि वे
ढाई-तीन सौ वर्ष पहले रहे होंगे. लेकिन गजेन्द्र सिंह का शातिर दिमाग
गांव के लिए देवत्व प्राप्त बरियार सिंह का भी यह कहकर इस्तेमाल करता है
कि वे उसके खानदानी थे. वह वहां प्रतिवर्ष मेला लगवाने की घोषणा करता है,
जिससे मूर्ति पर चढ़ावे के रूप में आए धन से वहां मंदिर बनवा सके. वह
मंदिर के लिए एक समिति गठित करता है, चंदा उगाहता है और सारी राशि शहर के
अपने बैंक खाते में जमा कर देता है. चंदे के रूप में डाक्टर गोविन्द की
दी हुई ईंट और सीमेण्ट से वह अपने घर का कुछ भाग बनवा लेता है. वह नत्थू
पहलवान का गलत कामों के लिए इस्तेमाल करना चाहता है, लेकिन उसके विरोध
करने पर उसे गांव छोड़ने के लिए विवश कर देता है. पुलिस के साथ किसी भी
आधुनिक माफिया की भांति उसका गहरा संबन्ध है.बाद में वह नत्थू के भाई को
पुलिस हिरासत में भेजवा देता है और छुड़ाने के लिए मध्यस्थता के बहाने
पैसा खाता है.

उसकी चौपाल के कई स्थाई सदस्य हैं जिनका इस्तेमाल अलग-अलग कामों के लिए
वह करता है. उसका जानवरों का घेर जुआ का अड्डा है और वहीं से वह अफीम और
चरस जैसे मादक पदार्थों का धंधा करता है. जुआ की लत गांव के अनेक लोगों
को डालकर वह उनकी सम्पत्ति हड़पता है तो मादक पदार्थों से अनेक परिवारों
को तबाह करता है. शहर से गांव में आ बसे बाबू बलजीत सिंह को एक शहरी
जुआरी के कत्ल के जुर्म में झूठे ही फंसा देता है. बलजीत सिंह का मित्र
बुधवा अहीर उसके पास जेवर रेहन रख पुलिस को रेश्वत दे बलजीत सिंह को
छुड़वाता है. रिश्वत में गजेन्द्र सिंह का हिस्सा निश्चित है. वह अपने घेर
में मादक द्रव्यों के धंधे के लिए भी पुलिस को निश्चित रिश्वत देता है.
पुलिस उसके हर अनुचित कार्य को जानते हुए भी ग्राम प्रधान हरिहर अवस्थी,
जो एक सरल हृदय व्यक्ति हैं, के दरवाजे न उतरकर उसी के दरवाजे उतरती है.
वास्तव में गजेन्द्र सिंह का गांव में इतना दबदबा है कि अवस्थी भी उससे
डरते हैं. शहरी के हत्यारे रामदीन से गजेन्द्र गांव के गरीब चरवाहे
सिड़िया के घेर में सेंध लगवाता है, लेकिन अनायास ही रामदीन सिड़िया की
हत्या कर देता है. सिड़िया के यहां रामदीन को कुछ नहीं मिलता; फिर भी
पुलिस का भय दिखाकर गजेन्द्र सिंह रामदीन से धन ऎंठना चाहता है, और
आतंकित रामदीन आत्महत्या कर लेता है.

गजेन्द्र सिंह अपनी मातृ-पितृ विहीना भतीजी कमली तक को नहीं छोड़ता. धन की
लिप्सावश वह कमली को दूर गांव में ब्याह देना चाहता है, जिससे वह अपने
पिता के सम्पत्ति की मांग न कर सके. विरोध करने पर वह उसे मारता-पीटता
है, उसके पढ़ने पर रोक लगाता है, लेकिन बाबू बलजीत सिंह के बेटे अजय और
उनकी बेटी अनीता से प्रेरित कमली पढ़ने की जिद करती है और बाहर शेर बना
रहने वाला गजेन्द्र सिंह घर में हारने लगता है. वह गांव के मजदूरों से भी
हारता है. जब वे उसके अत्याचार और कम मजदूरी के विरोध में फसल बुआई के
सही वक्त पर काम पर जाना बंद कर देते हैं. वह विवश होकर उनसे समझौता करता
है . वह गांव में साम्प्रदायिक सद्भाव को नष्ट करने का प्रयास करता है.
मुसलमानों की मस्जिद न बनने देने के षड़यंत्र करता है, लेकिन उसका मंदिर
तो नहीं बन पाता, मस्जिद की नीव हरिहर अवस्थी और बाबू बलजीत सिंह जैसे
प्रतिष्ठ्त ग्रामीणों द्वारा रखी जाती है. वह डाक्टर गोविन्द के घर डकैती
डलवाता है और उसे शहर पलायन के लिए विवश करता है. यही नहीं रेलवे स्टेशन
के सामने पचासों वर्षों से खाली पड़ी धर्मशाला में वह कब्जा करता है और
मिडिल स्कूल खोलता है, लेकिन उसके काले कारनामों से परिचित न तो ’पाथर
टीला’ का कोई व्यक्ति वहां अपना बच्चा भेजता है, न दूसरे गांव वाले. इसे
भी वह अपनी पराजय मानता है. वह तब और अधिक तड़फड़ाता है जब उसकी अवहेलना
करती कमली दलितों के बच्चों को एकत्र कर बुधवा के घर में अनीता के साथ
स्कूल चलाने लगती है. उसके पाले हुए बिल्ले, रंगा, कुक्कू जैसे लोग उसकी
अनुमति के बिना जब दूसरे गांव में डकैती डालते पकड़े जाते हैं, तब वह
बौखला जाता है और यहीं से उसमें विक्षिप्तता के लक्षण स्पष्ट होने लगते
हैं. अंत में वह विक्षिप्त हो पाण्डु नदी में डूब मरता है.

चन्देल एक कुशल शिल्पी की भांति विवेच्य उपन्यास में कथा कहते दिखते
हैं.अनेक उप-कथाएं उपन्यास को बल प्रदान करती हैं और लेखक की किस्सागोई
शैली (जिसका आज हिन्दी कथा साहित्य में प्रायः लोप होने लगा है) चन्देल
को प्रेमचन्द की परम्परा से जोड़ती है. लेकिन उपन्यासकार कई प्रश्न भी
छोड़ता है. पहला प्रश्न तो यही कि गजेन्द्र सिंह का मरना आवश्यक क्यों था
? क्या ऎसे पात्र मरते हैं ? यदि वह न मरता तो क्या उपन्यास का प्रभाव कम
होता ? दूसरा - कमली, हरिहर अवस्थी, अजय जैसे पात्र जब और विकास की दरकार
कर रहे थे तब उपन्यास का सिमट जाना अखरता है. गोविन्द और रमा के प्रसंग
को किंचित सीमित करके भी चित्रित किया जा सकता था. यदि इन जैसी कुछ
बातों को छोड़ दें तो कहना उचित होगा कि ’पाथर टीला’ बीसवीं सदी के अंतिम
दशक का एक उल्लेखनीय और अवस्मरणीय उपन्यास है.

****
अशोक आन्द्रे
१८८, एस.एफ.एस. फ्लैट्स,
जी.एच.-4/जी-17,
निकट मीरा बाग,
पश्चिम विहार,नई दिल्ली

मोबाइल : 09818967632

’पाथर टीला’ - रूपसिंह चन्देल
(संस्करण अक्टूबर,२०१०)
भावना प्रकाशन, 109-A, पटपड़गंज,
दिल्ली - 110 091

पृष्ठ - 327, मूल्य : 400/-

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

पुस्तक चर्चा



हाल में अप्रवासी चर्चित हिन्दी कथाकार और कवयित्री इला प्रसाद का कहानी संग्रह - ’उस स्त्री का नाम’ भावना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है. संग्रह की भूमिका मैंने लिखी, जो अविकल रूप से रचना समय के पाठकों के लिए प्रस्तुत है :
****
गहन जीवनानुभव की कहानियां

रूपसिंह चन्देल

अपनी रचनात्मक वैविध्यता के कारण प्रवासी हिन्दी साहित्यकारों में इला
प्रसाद की अपनी एक अलग पहचान है। वह न केवल एक सक्रिय और सशक्त कहानीकार
हैं बल्कि एक कवयित्री के रूप में भी उन्होंने अपनी रचनात्मकता को
सार्थकता प्रदान किया है। उनकी कहानियां जीवनानुभवों की सहज और स्वाभाविक
अभिव्यक्ति हैं जिनमें उनकी सूक्ष्म पर्यवेक्षक दृष्टि परिलक्षित है ।
छोटे वाक्य विन्यास और काव्यात्मक भाषा उन्हें आकर्षक बनाते हैं । संग्रह

की एक मार्मिक कहानी ‘एक अधूरी प्रेम कथा’ जिसमें बिना विवाह जन्मी
निमी की पीड़ा को इला ने गहनता से व्याख्यायित किया है, से एक छोटा
उदाहरण दृष्टव्य है ..‘‘वह सहसा उठकर बैठ गई । दीवार से पीठ टिका ली ।
तकिया गोद में । आंखें झुकीं । मुंह से पहली बार बोल फूटे -------
थैं क्यू दीदी ।’’

मैंने सदैव अनुभव किया कि जो कथाकार प्रकृति से कवि होते हैं उनकी
-रचना में काव्यात्मक स्पर्श अनायास ही संभव होता है और अनायास
काव्य-स्पर्शित रचना में प्रभावोत्पादकता अवश्यंभावीरूप से प्रादुर्भूत
हो उठती है । रचना में एक चुंबकीय पठनीयता होती हैए पाठक जिससे आद्यंत
गुजरे बिना मुक्त नहीं हो पाता । इला प्रसाद की कहानियों की यह विशेषता
है । उनकी कहानियों की विशेषता यह भी है कि वे ऐसे विषयों को भी अपने
कथानक का हिस्सा बना देती हैं ,जिनकी ओर सामान्यतया लेखकों का ध्यान
आकर्षित नहीं हो पाता । संग्रह की ‘हीरो’ या ‘मेज’ ऐसी ही कहानियां हैं ।

‘हीरो’ में गार्बेज डिस्पोजर खराब होने से प्रारंभ हुई कहानी प्लंबर जिम
के बहाने अमेरिकी जीवन को सहजता से रेखांकित करती है ,जहां ,‘‘हर जगह
पैसा। हर रिश्ते को ये पैसों से क्यों तौलते हैं ? सारी संवेदनाएं मर गई
हैं जैसे !’’

अमेरिका में रिश्ते किस प्रकार बेमानी हो चुके हैं ,इसका दिल दहला देने
वाला वृत्तांत है ‘उस स्त्री का नाम ’ । यह एक ऐसी भारतीय स्त्री की
कहानी है जो पति की मृत्यु के पश्चात दिल्ली की अपनी नौकरी छोड़कर अमरिका
में बेटे के रियल एस्टेट के व्यवसाय में सहायता करने के लिए अमेरिका जा
बसती है । रहस्य और रोमांच से आवेष्टित इस कहानी में लेखिका अंत में यह
उद्घाटित करती हैं कि जिस बेटे के लिए वह मां दिल्ली की अपनी नौकरी और
बिन ब्याही पैंतालीस वर्षीया बेटी को छोड़ आयी वह अमेरिकी जीवन.”शैली
जीता अपने व्यवसाय और अपने परिवार में डूबा वृद्धा मां को ‘ओल्ड एज लोगों
के रिटायरमेण्ट होम में रहने के लिए छोड़ देता है । संग्रह की अधिकांश
कहानियां अमेरिकी पृष्ठभूमि पर आधारित हैं जो प्रवासी भारतीयों के
जीवनचर्या को आधार बनाकर लिखी गई हैं । ‘मेज’ ,‘होली’ ,‘चुनाव’ ,
‘हीरो’ ,‘मिट्टी का दीया’ ,‘कुंठा’ आदि ।

इला प्रसाद की कहानियों में हमें मानवीय संवेदनाओ का सूक्ष्म विवेचन
प्राप्त होता है । ‘एक अधूरी प्रेम कथा’ए ‘मेज’ ए ‘उस स्त्री का नाम ’
आदि कहानियां इसका ज्वलंत उदाहरण हैं । प्रवासी भारतीयों की मनः स्थिति
को पकड़ पाने में लेखिका सफल रही हैं । इनमें जीवन गहनता से चित्रित हुआ
है । अमेरिका की अनेक संस्थाएं भारत के गांवों में अस्पताल /विद्यालय और
आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए धन संग्रह कर भारत भेजती हैं । लेकिन
कितना विकास होता है यहां और कितने विद्यालय/अस्पताल खुलते हैं या खुलकर
अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं ! ‘मिट्टी का दीया’ में इला प्रसाद की
दुश्चिंता स्पष्ट है .. ‘‘उसे इन संस्थाओं से जुड़े लोगों की नीयत पर
भरोसा न हो यह बात नहीं । पैसा भारत पहुंचता होगा ,लेकिन क्या सही लोगों
तक भी पहुंच जाता होगा घ् सारा का सारा ? क्या जानकीवल्लभ शास्त्री की
पंक्तियां .. ‘ऊपर.ऊपर पी जाते हैं जो पीनेवाले हैं ,कहते ऐसे ही जीते
हैं जो जीने वाले हैं ए या दुष्यंत कुमार . ‘यहां तक आते.आते सूख जाती
हैं नदियां ए मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा ।’------
गैर.सरकारी संस्थाओं में उस मनोवृत्ति के लोग नहीं होते होगें क्या ?’’
इसी कहानी में तन्वी पड़ोसी के बारह वर्ष के बेटे को अपनी ओर घूरते देख
कह उठती है . ‘‘यहां बच्चे कितनी जल्दी बड़े हो जाते हैं ।’’ और वह देख
रही थी .. ‘‘ वे कच्ची कलियां तोड़ रहे हैं । लगातार तोड़ते जा रहे हैं
..... आत्मविश्वास से भरे हुए हैं । वे केवल कच्ची कलियां ही नहीं
तोड़ेंगे ,एक दिन पूरा बगीचा ही उठा ले जाएंगे वे । आने वाला कल उन्हीं
का है ।"

उसे घर पर सो रही अपनी नन्ही कली का खयाल आया । सिन्धु !’’

इला प्रसाद ने अपनी कहानियों के माध्यम से जहां अमेरिकी संस्कृति ;या
अपसंस्कृतिद्ध से दो.चार होते और उसका हिस्सा बनते प्रवासी भारतीयों के
सामाजिक ,आर्थिक और धार्मिक जीवन का वास्तविक चित्रण किया है वहीं
भारतीय परिवेश की उनकी कहानियों में जीवन की विसंगतियां ,विद्रूपताएं और
विश्रृंखलताएं अपनी सम्पूर्णता में उद्घाटित हुई हैं । उनका ”शिल्प
प्रभुविष्णु और भाषा सहज है और यह उनकी कहानियों की शक्ति है । उनकी
कहानियों में एक सम्मोहक पठनीयता है ।

दिल्ली . 110 094
31 मार्च ए 2010
*****
उस स्त्री का नाम - इला प्रसाद
भावना प्रकाशन
109-A, पटपड़गंज, दिल्ली - ११००९१

मूल्य : १५०/- , पृष्ठ : १२८