बुधवार, 17 सितंबर 2008

लघु कहानी



प्राण शर्मा की पांच लघुकहानियां

अक्ल के अंधे

प्रवीण कुमार के एक मित्र हैं--- हितैषी राय . कुछ-एक लोगों के साथ मिलकर उन्होंने एक कल्याणकारी संस्था बनायी. संस्था का नाम रखा -- 'जन कल्याण.'

हालांकि उनकी संस्था छोटी है , लेकिन उनकी भावी योजनाएं बड़ी हैं. फिलहाल उनकी योजना एक अनाथालय भवन निर्माण की है .

एक दिन हितैषी राय दान लेने के लिए प्रवीण के पास गए. बोले- "प्रवीण जी, आप मेरे परम मित्र हैं. हमारे शुभ कार्य अनाथालय के भवन-निर्माण के लिए दिल खोलकर दान दीजिए और दान देने के लिए अपने सेठ मित्रों के नाम भी सुझाइए."

दान देने के बाद प्रवीण कुमार ने नगर के उद्योगपति गिरधारी लाल का नाम सुझाया और बात-बात में यह भी बता दिया -- "गिरधारी लाल ऎसी तबियत के शख्स हैं कि दान देने के लिए उन्हें किसी मित्र के सिफारिशी ख़त की ज़रूरत नहीं पड़ती.

दूसरे दिन ही हितैषी राय अपने कुछ साथियों के साथ दान लेने के लिए गिरधारी लाल के पास पहुंच गये. रास्ते में उन्होंने अपने सथियों को सावधान कर दिया --'हमें गिरधारी लाल से यह कहने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है कि दान लेने के लिए प्रवीण कुमार ने हमे आपके पास भेजा है. खामखा प्रवीण कुमार का एहसान हम क्यों लें?

गिरिधारी लाल से मिलते ही हितैषी राय ने अपना और अपने साथियों का परिचय दिया और दान लेने के लिए भारी-भरकम पोथी खोल ली.

"हितैषी राय जी, मैंने तो आपकी संस्था 'जन-कल्याण' का नाम आज तक नहीं सुना और पोथी आप भारी-भरकम उठा लाये हैं." गिरिधारी लाल ने दान न देने की मानसिकता से कहा.

"सारा नगर जानता है कि आप दिल खोलकर दान देते हैं. आप इस नगर के राजा हरिश्चन्द्र हैं. " हितैषी राय बोले.

"पहले मैं ऎसा ही किया करता था. अब तो दान लेने वालों का तांता लग गया है. रोज कोई न कोई दान लेने आ जाता है. किसीकी अस्पताल बनवाने की योजना है तो किसी की वृद्धाश्रम . हमारे नगर में अस्पतालों और वृद्धाश्रमों को बनानेवालों की बाढ़-सी आ गयी है. बुरा नहीं मानिए, आपकी तरह कई लोग किसी न किसी योजना के साथ दान के लिए आ जाते हैं. दान लेकर वे कहां गायब हो जाते हैं, राम ही जाने. जाइये, आप किसी हमारे परिचित का पत्र लेकर आइये. हम आपको भी जरूर दान देगें."

मेहमान

घर में आए मेहमान से मनु ने पूछा --"क्या पीएगें, गर्म या ठंडा?"

"नही, कुछ नहीं." मेहमान ने अपनी मोटी गर्दन हिलाकर कहा.

"कुछ तो चलेगा?"

"कहा न कुछ नहीं."

'शराब?"

"वो भी नहीं"

"ये कैसे हो सकता है? आप हमारे घर में पहली बार पधारे हैं. कुछ तो चलेगा ही."

मेहमान इस बार चुप रहा.

मनु शिवास रीगल की महंगी शराब की बोतल अंदर से उठा लाया.

मेहमान की जीभ लपलपा उठी पर उसने पीने से न कह दी.

मनु के बार-बार कहने पर आखि़र उसने एक छोटा सा पैग लेना स्वीकार कर लिया. उस छोटे पैग का नशा मेहमान पर कुछ ऎसा तारी हुआ कि देखते ही देखते वो आधी से जिआदा बोतल खाली कर गया. मनु का दिल बैठ गया. मेहमान रुखसत हुआ. मनु मेज़ पर मुक्का मारकर चिल्ला उठा -- "मैंने तो इतनी महंगी शराब की बोतल उसके सामने रख कर दिखावा किया था लेकिन हरामी आधी से जिआदा गटक गया, गोया उसके बाप का माल था."

वाह री लक्ष्मी

"लक्ष्मी, देख लेना, एक दिन मेरा पांसा ज़रूर सीधा पड़ेगा. एक दिन मैं ज़रूर लॉटरी जीतूगां.तब मैं तुम्हें ऊपर से लेकर नीचे तक सोने-चांदी के गहनों से लाद दूंगा. तुम्हें सचमुच की लक्ष्मी बना दूंगा. सचमुच की लक्ष्मी.तुम्हें देख कर लोग दांतों तले अपनी उंगलियां दबा लेगें. अरी, दुर्योधन भी पहले धर्मराज युधिष्ठिर से जुए में हारा था. सब दिन होत न एक समान . भाग्य ने उसका साथ दिया. और वो पांडवों का राजपाट जीतकर राज कुंवर बन गया."

सुरेश के उत्साह भरे शब्द भी आग में घी का काम करते. सुनते ही लक्ष्मी तिलमिला उठती -- "भाड़ में जाए तुम्हारी लॉटरी. सारी की सारी कमाई तुम लॉटरी, घोड़ॊं और कुत्तों पर लगा देते हो . इन पर पानी की तरह धन बहाने की तुम्हारी लत घर में क्या-क्या बर्बादी नहीं ला रही है?तुम्हारा बस चले तो धर्मराज युधिष्ठिर की तरह तुम मुझे भी दांव पर लगा दो. "

सुरेश और लक्ष्मी में तू-तू, मैं - मैं का तूफ़ान रोज़ ही आता.

बुधवार था. रात के दस बज चुके थे. बी.बी.सी. पर लॉटरी मशीन से नम्बर गिरने शुरू हुए -- १, ५, ११, १६, २५, ४० और सुरेश की आंखें खुली की खुली रह गयीं. वह खुशी के मारे गगनभेदी आवाज़ में चिल्ला उठा --"आई ऎम ऎ मिल्लियनआर नाओ."

जुआ को अभिशाप समझने वाली लक्ष्मी रसोईघर से भागी आयी . सुरेश को अपनी बांहों में भर कर वो भी चिल्ला उठी -- "हुर्रे, वी आर मिल्लियनआर."

वक्त वक्त की बात

सरिता अरोड़ा की देवेन्द्र साही से जान-पहचान कॉलेज के दिनों से है. कभी दोनों में एक-दूसरे के प्रति प्यार भी जागा था.

आज देवेन्द्र साही का फ़िल्म उद्योग में बड़ा नाम है. उसने एक नहीं तीन-तीन हिट फिल्में दी हैं. उसकी फिल्में साफ़ -सुथरी होती हैं. सरिता अरोड़ा के मन में इच्छा जागी कि क्यों न वो अपनी रूपवती बेटी अरुणा को हेरोइन बनाने की बात देवेन्द्र से कहे. मन में इच्छा जागते ही उसने मुम्बई का टिकट लिया और जा पहुंची अपने पुराने मित्र के पास.

देवेन्द्र साही सरिता अरोड़ा के मन की बात सुनकर बोला -- "ये फ़िल्म जगत है. इसके रंग-ढंग बड़े निराले हैं. सुनोगी तो दांतों में उंगलियां दबा लोगी. यहां हर हेरोइन को पारदर्शी कपड़े पहनने पड़ते हैं. कभी-कभी तो उसे निर्वस्त्र भी-----."

तो क्या हुआ ? हम सभी कौन से वस्त्र पहन कर जन्मे थे? सभी इस संसार में नंगे ही तो आते हैं."

सरिता अरोड़ा अपनी बात कहे जा रही थी और देवेन्द्र साही सोचे जा रहा था कि क्या यह वही सरिता अरोड़ा है जो अपने तन को पूरी तरह से ढक कर कॉलेज आया करती थी.


बचत

मूसलाधार बारिश में विमला दौड़ी-दौड़ी सुकीर्ति के पास आयी. हांफते हुए बोली,"सुकीर्ति, कान्ले पार्क में सैन्स्बुरी सुपर स्टोर में बटर की सेल लगी है. ढाई सौ ग्राम की लारपाक बटर की टिकिया सिर्फ़ पचासी पेनिओं में. एक टिकिया के पीछे दस पेनिओं की छूट है. सुनहरी मौका है बटर खरीदने का. आ चलें खरीदने. "

स्टोक और कान्ले पार्क में पूरे छः मील का फासला . सुकीर्ति फिर भी तैयार हो गयी.

विमला और सुकीर्ति अपने-अपने सिर पर छतरी ताने बस स्टॉप पर आ गयीं. कान्ले पार्क पहुंचने के लिए उन्होंने दो बसें पकड़ीं. पहले २७ नम्बर और फिर सिटी सेंटर से १२ नम्बर. दोनों ने डे ट्रिप टिकट लिया. लगभग दो घंटों के सफर के बाद वे कान्ले पार्क पहुंचीं.

लोगों की भारी मांग के कारण विमला और सुकीर्ति पच्चीस-पच्चीस टिकियां ही खरीद पायीं. पच्चीस - पच्चीस टिकियों से दोनों को ढाई-ढाई पाउंड का लाभ हो गया था. दोनों खुश थीं.

घर पहुंचते ही विमला और सुकीर्ति ने अपनी खुशी की वजह अपने पति्यों को बतायीं. पति बरस पड़े. "क्या खा़क ढाई-ढाई पाउंड की बचत की है तुम दोनों ने? अरे मूर्खों तुम दोनों बसों में फ्री तो गयी और आयी नहीं. ढाई-ढाई पाउंड बस के किराए का भी हिसाब लगाओ न!"

प्राण शर्मा का जन्म १३ जून १९३७ को वजीराबाद (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में. पंजाब विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी). १९५५ से लेखन . फिल्मी गीत गाते-गाते गीत , कविताएं और ग़ज़ले कहनी शुरू कीं.

१९६५ से ब्रिटेन में.

१९६१ में भाषा विभाग, पटियाला द्वारा आयोजित टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार. १९८२ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार. १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स, लेस्टर द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार.

लेख - 'हिन्दी गज़ल बनाम उर्दू गज़ल" पुरवाई पत्रिका और अभिव्यक्ति वेबसाइट पर काफी सराहा गया. शीघ्र यह लेख पुस्तकाकार रूप में प्रकाश्य.

२००६ में हिन्दी समिति, लन्दन द्वारा सम्मानित.
"गज़ल कहता हूं' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित.

Coventry CVESEB, UK3, Crakston Close, Stoke Hill Estate,
E-mail : pransharma@talktalk.net

बुधवार, 10 सितंबर 2008

संस्मरण







शीर्ष से सतह तक की यात्रा

रूपसिंह चन्देल

सीढ़ियां चढ़कर मैं पहली मंजिल पर उनके कमरे के दरवाजे पर पहुंचा .दरवाजा बंद था. कमरे में टेलीविजन ऊंचे वाल्यूम में चल रहा था. कई बार खटखटाया, लेकिन कोई उत्तर नहीं . काफी प्रातीक्षा और प्रयास के बाद दरवाजा खुला. भाभी जी थीं. मुझे देखकर हत्प्रभ. "अन्दर आइये" कहकर पीछे मुड़ीं और उंची आवाज में बोलीं, "अरे देखो तो कौन आया है?" लेकिन उन्होंने सुना नहीं और आंखे टी.वी. पर गड़ाये रहे. भाभी जी ने टी.वी. धीमा कर दिया और बोली,"चन्देल जी आये हैं."

बनियाइन और पाजामे में वह लेटे हुए टी.वी. देख रहे थे. पत्नी के साथ मुझे देखकर तपाक से उठे और "अरे आप!" कहते हुए नीचे उतरे. चप्पलें नहीं मिलीं तो नंगे पैर मेरे पास आये, "सभी मुझे भूल गये. " एक मायूसी उनके चेहरे पर तैर गयी, " चलिए आपने याद तो रखा." स्वर में शिकायत थी.

"आपने वायदा किया था कि नये घर में जाकर मुझे पता और फोन नम्बर देंगे. " आवाज कुछ ऊंची करके बोलना पड़ा. जबसे मस्तिष्क में कीड़े हुए थे, उन्हें कम सुनाई देने लगा था. वैसे टी.वी. इसलिए भी ऊंची आवाज में सुन रहे होगें, लेकिन उनके यहां टी.वी. सदैव ऊंची आवाज में ही सुना जाता था.

मैं कमरे का जायजा ले रहा था. यह चौदह बाई दस का कमरा रहा होगा, जिसमें एक डबल बेड और तीन कुर्सियां, एक आल्मारी और कुछ अन्य सामान रखा था. सामने छोटी-सी रसोई और उससे आगे बाल्कानी , जिसपर उन्होंने टीन-शेड डलवा रखी थी. दिल्ली के विश्वास नगर के लम्बे-चौड़े दो मंजिले मकान में रहने वाले ( जिसमें नीचे हिस्से में उनके प्रकाशन की पुस्तकों का भण्डार और कार्यालय था, और ऊपर रिहायश. उससे ऊपर भी कमरा) श्रीकॄष्ण जी का जीवन नोएडा के उस छोटे-से जनता फ्लैट में सिमटकर रह गया था.

श्रीकृष्ण जी से मेरी पहली मुलाकात १९८४ के आसपास हुई थी. मैं लेखक होने के शुरूआती दौर से गुजर रहा था .कभी-कभार पत्र -पत्रिकाओं में जाया करता . यह यात्रा प्रायः शनिवार को होती . उस दिन हिन्दुस्तान टाइम्स में 'साप्ताहिक हुन्दुस्तान' में हिमांशु जोशी से मिलने गया था. हिमांशु जी उन दिनों वहां विशेष संवाददाता होने के अतिरिक्त साहित्य भी देखते थे . उनसे मेरा परिचय एकाध साल पहले ही हुआ था.

उस दिन हिमांशु जी के पास दो सज्जन पहले से ही बैठे हुए थे. एक औसत कद, गोरे और स्लिम और दूसरे नाटे , सांवले और दुबले . मैं दोनों को ही नहीं जानता था. हिमांशु जी ने उनके परिचय दिए . गोरे सज्जन थे आबिद सुरती और दूसरे थे पराग प्रकाशन के श्री श्रीकृष्ण . परिचय के आदान- प्रदान के दौरान श्रीकृण जी पूरे समय मुस्कराते रहे थे. बाद में पता चला कि श्रीकृण जी ने हिमांशु जी का तब तक का लगभग पूरा साहित्य प्रकाशित किया था. कुछ लोगों के अनुसार साहित्य जगत में पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित कर पाठकों तक हिमांशु जी को पहुंचाने वाले पहले प्रकाशक श्रीकृष्ण जी थे. हालांकि 'साप्ताहिक हिन्दुस्ता" में धारावाहिक रूप में प्रकाशित होने वाले हिमांशु जी के उपन्यास और कहानियों से पाठक पहले से ही परिचित रहे होगें. जोशी जी की भांति नरेन्द्र कोहली के बहुचर्चित उपन्यास 'दीक्षा' आदि को सर्वप्रथम 'पराग' ने ही प्रकाशित किया था . बाद में हिमांशु जी ने अपनी पुस्तकें पराग से ले ली थीं . एक समय ऎसा भी आया जब किसी बात पर उनके मध्य विवाद भी हुआ और जोशी जी ने पराग को वकील का नोटिस भी भेजा था. श्री कृष्ण जी मुझे सब बताते और चाहते कि मैं मध्यस्थता करूं लेकिन मैं मध्यस्थता की स्थिति में न था. वकील की नोटिस से श्रीकृष्ण जी बहुत आहत थे. अन्ततः वह मध्यस्तता शरदेन्दु जी ने की थी और उसी रात श्रीकृष्ण जी ने मुझे फोन करके सारा प्रकरण बताने के बाद कहा था, "आज एक बहुत बड़ा टेंशन से मुक्त हो गया हूं , लेकिन मैंने उनसे (हिमांशु जी) ऎसी आशा नहीं की थी."

श्रीकृष्ण जी से परिचय के समय तक मेरी दो पुस्तकें - एक बाल कहानी संग्रह और एक अपराध विज्ञान की पुस्तक ही प्रकाशित हुई थीं, लेकिन एक-दो पाण्डुलिपियां प्रकाशकों के यहां पहुंचने की राह देख रही थीं. हिमांशु जी के कार्यालय में श्रीकृष्ण जी से परिचित होने के बाद उनसे अगली मुलाकात १९८६ या ८७ में हुई थी. मैं किसी के साथ (शायद कथाकार बलराम के साथ) उनके घर कर्ण गली, विश्वासनगर गया था. उन दिनों तक 'पराग प्रकाशन' हिन्दी के महत्वपूर्ण प्रकाशकों में अपनी अलग पहचान पा चुका था. पराग को ही अमृता प्रीतम की 'रसीदी टिकट' प्रकाशित करने का पहला अवसर मिला था , जिसकी बहुत चर्चा हुई थी. नरेन्द्र कोहली के रामायण पर आधारित उपन्यास भी चर्चा बटोर चुके थे. स्थिति यह थी कि अधिकांश युवा लेखक वहां छपना चाहते थे और पराग ने अनेकों को छापा भी था. लेकिन कुछ युवा लेखकों ने उन्हें बाद में परेशान भी किया था. उन दिनों श्रीकृष्ण जी ने जिससे भी - स्थापित या नये लेखकों से पाण्डुलिपियां मांगी , शायद ही किसी ने उन्हें निराश किया होगा. उसका सबसे बड़ा कारण था उनका 'प्रोडक्शन'. एक बार चर्चा के दौरान उन्होंने बताया था कि उनके प्रोडक्शन से राजकमल प्रकाशन की शीला सन्धु इतना प्रभावित थीं कि उन्होंने प्रकाशन के प्रबन्धक श्री मोहन गुप्त को उनकी टाइटल्स दिखाते हुए कहा था - "मोहन जी इस मामले में हमें श्रीकृष्ण जी से सीखना चाहिए. अकेले दम पर प्रकाशन चला रहे हैं और प्रोडक्शन इतना गजब का !"

सम्भवतः मेरे मन में भी पराग से प्रकाशित होने की ललक मुझे उनके यहां तक खींच ले गयी होगी. बहरहाल , उनसे मिलने का सिलसिला चल निकला और कई मुलाकातों के बाद मैंने उनसे अपना कहानी संग्रह प्रकाशित करने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहजता से स्वीकार कर लिया. १९९० में 'आदमखोर तथा अन्य कहानियां ' प्रकाशित हुआ. उसके पश्चात श्रीकृष्ण जी की जो आत्मीयता मुझे मिली उसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं. रॉयल्टी को लेकर मुझे कभी उनसे शिकायत नहीं रही. उन्हीं दिनों मेरा परिचय उनके मित्र श्री योगन्द्रकुमार लल्ला से हुआ . लल्ला जी 'रविवार' पत्रिका में संयुक्त सम्पादक थे. लला जी ने बताया था कि उन्होंने और श्रीकृष्ण जी ने अपने कैरियर की शुरुआत एक साथ ’आत्माराम एण्ड सन्स’ से की थी. दोनों ही लेखक थे और बच्चों के लिए लिख रहे थे. लल्ला जी आज मेरठ में रह रहे हैं लेकिन आज भी उनकी मित्रता बरकरार है.
श्रीकृष्ण जी ने मेरा दूसरा कहानी संग्रह १९९५ में प्रकाशित किया - 'एक मसीहा की मौत'. लेकिन तब तक उनके प्रकाशन की स्थिति नाजुक हो आयी थी. कारण थे दिल्ली के एक लेखक जो उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की खरीद योजना के एक उच्च अधिकारी के दलाल थे. खुदा उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे. उन्होंने दिल्ली के अनेक प्रकाशकों को सब्जबाग दिखाया था . श्रीकृष्ण जी भी (स्वयं उनके अनुसार जिन्दगी में पहली बार ) उसके सब्जबाग में आ गये और डूब गये. हासिल कुछ हुआ नहीं था --- कर्जदार अलग हो गये थे. उन्हीं दिनों एक और घटना घटी थी उनके साथ. उनका पराग प्रकाशन रजिस्टर्ड नहीं था. उनके एक मित्र प्रकाशक ने इस नाम को रजिस्टर्ड करवा लिया . परिणामतः उन्हें प्रकाशन का नाम बदलना पड़ा था. मेरा दूसरा कहानी संग्रह उनके नये प्रकाशन 'अभिरुचि प्रकाशन' से प्रकाशित हुआ था.

श्रीकृष्ण जी बहुत उत्साही व्यक्ति हैं. प्रकाशन की डांवाडोल स्थिति के बावजूद वह मोटी -मोटी पुस्तकें प्रकाशित कर रहे थे. उन्होंने एक दिन फोन करके मुझे बुलाया और बोले- "आपसे एक काम करवाना चाहता हूं." पूछने पर बताया कि वह सभी विधाओं पर शताब्दी का उत्कृष्ट साहित्य प्रकाशित करना चाहते हैं और चूंकि मैंने आंचलिक कहानियां और उपन्यास लिखें हैं अतः वह मुझसे 'बीसवीं शताब्दी की उत्कृष्ट आंचलिक कहानियां' का सम्पादन करवाना चाहते हैं. मैंने सहर्ष स्वीकृति दे दी और १९९७ में दो खण्डों में वह कार्य ८०० पृष्ठों में प्रकाशित हुआ जिसकी न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी चर्चा हुई. पाठकों को यह बताना आवश्यक है कि उन्होंने मुझे सम्पादक के रूप में जो रॉयल्टी दी उसकी कल्पना मैं किसी बड़े प्रकाशक से नहीं कर सकता था.

उनके अति-उत्साह, बढ़ती उम्र और बिक्री की समुचित व्यवस्था के अभाव (क्यॊंकि वह अकेले थे--- उनके सात बेटियां थीं और उनकी शादी हो चुकी थी) के कारण प्रकाशन चरमरा रहा था. उनपर कर्ज का बोझ बढ़ रहा था, लेकिन पुस्तकें प्रकाशित करने के उनके उत्साह में कोई कमी नहीं आ रही थी. उन्होंने 'मेरी तेरह कहानियां' नाम से कहानी संग्रहों की एक श्रृखंला प्रारम्भ की और कई लेखकों को छाप डाला. अंतिम कड़ी में, कमलेश्वर, प्रेमचन्द, और मुझ सहित पांच लेखकों को प्रकाशित किया. लेकिन इसी दौरान वह भयंकर बीमारी का शिकार होकर लम्बे समय तक शैय्यासीन रहे. उनके मस्तिष्क में कीड़े हो गये थे, जो आज एक आम बीमारी होती जा रही है. कहते हैं बन्ध- गोभी खाने वालों को इस बीमारी का शिकार होने की अधिक सम्भावना होती है.

अन्ततः स्थिति यह हुई कि श्रीकृष्ण जी को प्रकाशन बन्द करना पड़ा. यही नहीं उन्हें मकान भी बेच देना पड़ा. एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और मेरी पुस्तकों की बची प्रतियां मेरी गाड़ी में रखवा दीं, जिसमें 'मेरी तेरह कहानियां' की तीस प्रतियां और 'वीसवीं शताब्दी की उत्कृष्ट आंचलिक कहानियां' की लगभग ४४ प्रतियां थीं. "इतनी पुस्तकों का मैं क्या करूंगा.?" पूछने पर सहज- भाव से बोले थे, "मित्रों में बाट दीजिएगा."

उन्होंने मकान बेचने की बात बताते हुए कहा था, "जाने के बाद आपको नयी जगह का पता और फोन नम्बर दूंगा. आप जैसे कुछ ही लेखक हैं जो निस्वार्थ मुझसे सम्पर्क बनाए रहे--- उन्हें कैसे भूल सकता हूं." लेकिन या तो वह भूल गये अपनी असाध्य बीमारी के चलते या उन्हें अपना नया पता बताने में संकोच हुआ था. बात जो भी हो. व्यस्तता के चलते एक वर्ष तक मैं भी उनसे सम्पर्क नहीं साध सका. इतना पता था कि नोएडा में कहीं जनता फ्लैट लेकर वह रह रहे हैं. गत वर्ष इन्हीं दिनों किसी कार्यवश मुझे नोएडा जाना था. उनका पता किससे मिल सकता है यह सोचता रहा. उनकी एक बेटी श्यामलाल कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक है, लेकिन उनका फोन नं मेरे पास नहीं था. अंततः बलराम अग्रवाल ने बताया कि डॉ हरदयाल मेरी सहायता कर सकते हैं. डॉ हरदयाल से श्रीकृष्ण जी का पता लेकर मैं जब नोएडा के उनके जनता फ्लैट में पहुंचा तब उन्हें देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि यह वही श्रीकृष्ण हैं जो कभी हिन्दी प्रकाशन जगत में छाये हुए थे. और कहां विश्वासनगर में उनका भव्य मकान और कहां जनता फ्लैट!

मैं लगभग डेढ़ घण्टा उनके साथ रहा . वह गदगद थे . उस हालत में भी उनका लेखन कार्य चल रहा था. बच्चों के लिए कुछ लिख रहे थे. उनकी लगभग पचास पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें १४ पुस्तकें बड़ों के लिए हैं. उन्हें देखकर मैं सोचने के लिए विवश हुआ कि ईमानदारी और बिना छल-छद्म के प्रकाशन व्यवसाय चलाने वाले व्यक्ति का भविष्य श्रीकृष्ण जैसा हो सकता है. मुझे बहुत पहले भीष्म साहनी जी की साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित कहानी याद हो आयी जिसमें लेखक की स्थिति तो नहीं बदलती--- वह जैसा होता है वर्षों - वर्षों लिखने के बाद भी वैसा ही बना रहता है, जबकि एक प्रकाशक कुछ वर्षों में ही पूंजीपति हो जाता है. लेकिन ऎसे प्रकाशकों के मध्य अपवादस्वरूप श्रीकृष्ण जी जैसे प्रकाशक भी हैं, जो अपनी ईमानदारी के कारण वह जीवन जीने के लिए विवश हैं जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी. लेकिन वह इस बात से दुखी नहीं हैं---उनका दुख इस बात का है कि प्रकाशन जगत में भ्रष्टाचार गहराई तक फैल चुका है. अब बड़े -बड़े प्रकाशक नये लेखकों से पैसे लेकर उनकी पुस्तकें छाप रहे हैं. कुछ ऎसे भी हैं जो अप्रवासी हिंदी पंजाबी लेखकों की अनभिज्ञता और का लाभ उठाकर उनसे मोटी रकमें लेकर उनकी पुस्तकें प्रकाशित कर रहे हैं. उनके बल विदेश की यात्राएं कर रहे हैं. खरीद में बैठे अधिकारी का कुछ भी छाप रहे हैं. ऎसे अधिकारी मालामल भी हो रहे हैं और लेखक भी बन रहे हैं. परिणामतः हिन्दी साहित्य का स्तर गिर रहा है.

श्रीकृष्ण जी ने अपने प्रकाशकीय जीवन में कभी कुछ ऎसा नहीं किया . और जब किसी लेखक के खरीद करवा देने के छद्मजाल में फंसे तो उबर नहीं पाये. उन्हें प्रकाशकों की आजकी स्थिति से कष्ट होना स्वाभाविक है.

मैं उनके दीर्घायु होने की कामना करता हूं.

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

लघु कहानी



चित्र अवधेश मिश्र

अशोक मिश्र की पांच लघुकहानियां

अंतर

रामप्रसाद बाबू के हाथों में बेटी राधा का पत्र था, जिसमें उसने लिखा था कि बाबूजी मकान खरीद रही हूं. एक लाख रुपये कम हैं, भेज दें. जैसे ही होंगे तुरंत वापस भेज दूंगी.

रामप्रसाद बाबू सोच में पड़ गए. बेटी को धन देना तो चाहिए पर वापसी तो ठीक नहीं है. फिर दूसरा रास्ता क्या है?

अंत में रामप्रसाद बाबू ने बेटी को पत्र लिखा - 'बेटी बहुत मजबूरी है कि तुम्हारी जरूरत पर मेरे हाथ खाली हैं' और फिर डाकघर जाकर पत्र पोस्ट कर दिया.

एक हफ्ता ही बीता था कि बेटे का पत्र दिल्ली से आया - 'बाबूजी मकान खरीद रहा हूं कुछ मदद करें.'

रामप्रसाद बाबू ने तुरंत पत्नी से बातचीत कर बैंक से रुपये निकलवाए और बैंक ड्राफ्ट बनवाकर बेटे को भेज दिया.

इधर रामप्रसाद बाबू काफी बीमार थे, उन्होंने बेटे और बेटी दोनों को तार कर दिया था. बेटे का कहीं पता न था जबकि बेटी तीसरे दिन पहुंच गई और साथ चलने की जिद कर रही थी.

रामप्रसाद बाबू मौन, बिस्तर पर लेटे बस बेटी का हाथ अपने हाथ में लेकर रोते जा रहे थे.


अवमूल्यन

एक अध्यापक अक्सर अपने छात्रों को पढ़ाते समय आदिकाल की सम्मानजनक गुरु-शिष्य परंपरा को बड़े ही गर्व के साथ शिष्यों को बताया करते और लंबी सांस लेकर कहते - तब गुरु का सम्मान शिष्य करते थे और सही मायने में विद्या ग्रहण करते थे, उनके अंदर जिज्ञासा थी, गुरुओं के प्रति सम्मान था. आजकल के छात्र अध्यापक को गाली, धौंस , चाकू दिखा परीक्षा में नकल के लिए प्रतिदिन बेइज्जत करते हैं, अब यह कार्य सम्मान का नहीं रहा.

रोज-रोज के धाराप्रवाह भाषण से ऊबकर एक दिन एक छात्र ने कहा - " तब से अब के इस लंबे अंतराल के बीच क्या आप गुरुजनों के अंदर परिवर्तन नहीं आया. तब शिक्षा देना आप अपना आदर्श, कर्तव्य, जीवन का ध्येय समझते थे और अब आपका ध्यान शिक्षा पर कम अपने वेतनमान और ट्यूशन पर अधिक रहता है सर."

अध्यापक महोदय सोच रहे थे कि अवमूल्यन कहां से हुआ है.

आंखें

एक निर्दोष युवक को जब फांसी होने लगी तो जेलर ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी, "तुम्हारी मरने से पूर्व कोई अंतिम इच्छा हो तो बताओ."

"क्या आप पूरी कर सकेंगे?"

"पूरा प्रयास करेंगे."

" तो सुनिए और कान खोलकर सुनिए. मैं अपनी दोनों आंखें इस देश की अंधी न्याय-व्यवस्था को देना चाहता हूं."


उनका दुःख

आज चारों ओर दीपावली का प्रकाश जगमगा रहा था परंतु हमारे घर के ठीक पड़ोस में तिवारी जी के घर में बड़ा सन्नाटा था. मुझे इसका कारण कुछ समझ में न आया.

घर में दीये जलाने के बाद जब पूजा समाप्त हो गयी तो मां ने प्रसाद दिया और कहा, "इसे तिवारी बाबा के यहां दे देना और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ग्रहण कर लेना."

तिवारी जी के घर पहुंच मैंने पुकारा, "तिवारी बाबा."

"कौन हय, अंदर आय जाव".

मैं अंदर गया तो देखा कि वे एक खटिया पर लेटे हुए थे. मैंने पूछा, "बाबा, आपके तीन लड़्के हैं, पर दीपावली पर कोई नहीं आया?"

"अरे बेटवा पहिलका लड़का अमेरिका में बस गवा, दुसरका दिल्ली मा इंजीनियर है, तीसरका बैंक अफसर ---."

"बाबा मगर आपके लड़कन का आप कय खबर तो लेय का चाही."

"बेटवा ऎसन है कि उन्हें पढ़ावा-लिखावा जौन हमार फर्ज रहा. अब वय सब बड़मनई बन गए और हम ठहरेन गांव का आदमी, उनके साथ एडजस्टमेंट कैसे करित?" कहते हुए उन्होंने दीर्घ निश्वास लिया और फिर बोले, "इससे ज्यादा नीक होत कि हम उनका गंवार राखित तब वै खेती करत और साथय-साथ हमार सेवा टहल करत, यहि बात कय हमय बहुत दुःख है."
इअतने में बाहर किसी बम का धमाका हुआ और धमाके से, हम दोनों काम्पकर रह गए.

मैं तो छोटा बच्चा हूं

रमेश की चार वर्षीय बेटी ईशा जब नर्सरी स्कूल में प्रवेश कराने लायक हो गयी तो वह उसे पर्याप्त रूप से तैयारी करा ए, बी, सी, दी, वन, टू, थ्री----- व ए फार एपल, बी फार बर्ड और काफी कुछा रटाकर ले गया.

बाल भारती स्कूल की प्रधानाचार्य ने ईशा से पूछा, "बेबी व्हाट इज योर नेम?"

उसने जवाब दिया, "माई नेम इज ईशा मिश्रा."

प्रधानाचार्य ने फिर पूछा, "बेटे आपके पापा क्या करते है?"

बेटी ईशा ने उत्तर दिया, "पापा पत्रकार हैं."

प्रधानाचार्य ने फिर गिनती और कई शब्दों के अर्थ पूछे . बेटी ने सारे प्रश्नों के उत्तर दिए.

प्रधानाचार्य ने फिर पूछा, "बेटे आपका धर्म कौन-सा है?"

ईशा ने उत्तर दिया, "हमारा कोई धर्म थोड़े है. मैं तो छोटा बच्चा हूं."

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अशोक मिश्र : युवा कथाकार और पत्रकार अशोक मिश्र का जन्म १५ मई, १९६५ को उत्तर प्रदेश के जनपद फैजाबाद के एक गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम श्री एच.एल.मिश्र है. रममनोहर लोहिय अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद से एम.ए.बी-एड. करने के बाद १९९४ से पत्रकारिता से जुड़े. पिछले पन्द्रह वर्षों में आधा दर्जन से अधिक नौकरियां बदलीं.

*१९८२ के आसपास साहित्य से जुड़ाव और लघुकहानी लेखन की शुरुआत. बाद में कहानी, समीक्षा, फीचर, रिपोर्ताज, न्यूज स्टोरी आदि विधाओं में लेखन.

*अब तक सात सौ से अधिक लेख, कहानियां, लघुकहानियां, पुस्तक समीक्षाएं, फीचर, साक्षात्कार आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित.

*सम्प्रति दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका 'इंडिया न्यूज' के संपादकीय विभाग में सहायक संपादक के रूप में कार्यरत. पत्रिका के साहित्य एवं सांस्कृतिक पृष्ठों के प्रभारी.

*वर्ष २००२ में दीनानाथ की चक्की कहानी को आर्य स्मृति साहित्य सम्मान. सपनों की उम्र लघुकहानी संग्रह वर्ष २००४ में प्रकाशित.

सम्पर्क: डी-१/१०४-डी , जनता फ्लैट्स,
कोंडली, दिल्ली - ११००९६
मोबाइल : ९९५८२२६५५४

ई-मेल :
akmishrafaiz@yahoo.co.in

शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

आलेख

बागों में दफ्न हैं इतिहास की यादें

रूपसिंह चन्देल

देश की धड़कन कही जाने वाली दिल्ली जहां अनेक ऐतिहासिक स्थलों, भवनों, गली-कूचों आदि के लिए प्रसिद्ध है वहीं यहां अनेक ऐतिहासिक बाग और आधुनिक पार्क हैं। 'बेगम बाग', 'रोशनआरा बाग', 'शालीमार बाग' और 'कुदसिया बाग' जैसे ऐतिहासिक महत्व के बागों के अतिरिक्त 'लोदी बाग' (1936) , 'तालकटोरा बाग', 'मुगल गार्डन' (राष्ट्रपति भवन), बुद्ध जयंती पार्क, महावीर जयंती पार्क, कमला नेहरू पार्क आदि के कारण यदि दिल्ली को बागों और पार्कों का शहर भी कहा जाये तो अत्युक्ति न होगी। लेकिन अधिकांश बागों-पार्कों की स्थिति आज सोचनीय है। यहां के तीन ऐसे बाग हैं जिनका इतिहास शाहजहां से जुड़ता है।

लालकिला आगरा से ग्यारह वर्षों तक हिन्दुस्तान पर शासन करने के पश्चात शाहजहां ने अपनी राजधानी दिल्ली ले जाने का निर्णय किया था। परिणामतः एक नया शहर बसाने की योजना बनी, जिसका नाम शाहजहानाबाद रखा गया। आगरा और लाहौर किलों की तर्ज पर बादशाह के निवास के लिए 'लालकिला' का निर्माण 1638 ई में इज्जत खां की देखरेख में प्रारंभ हुआ। बाद में इस कार्य को अलीवर्दी खां और मकरावत खां ने अंजाम दिया , जिनके साथ अहमद और हमीद नामक इंजीनियरों का अमूल्य सहयोग रहा था। ग्यारह वर्ष पश्चात 1647 में लालकिला बनकर तैयार हुआ तो 8 अप्रैल 1648 को शाहजहां की दिल्ली में ताजपोशी हुई थी। उसके साथ उसके परिवार का दिल्ली आना स्वाभाविक था। बीमार होकर 1657 में आगारा वापस लौटने तक शाहजहां दिल्ली से हिन्दुस्तान पर शासन करता रहा था। अपने शासन काल के इस दौर में बादशाह ने न केवल विश्वप्रसिद्ध जामा मस्जिद और अन्य भवनों का निर्माण करवाया , बल्कि उसके परिवार के सदस्यों ने कई महत्वपूर्ण बाग लगवाये ।

शाहजहां की बड़ी बेटी थी जहांआरा , जिसने पिता की खिदमत में अपना जीवन ही अर्पित कर दिया था। जहांआरा ने चांदनी चौक से सटा (आज के टॉऊन हाल के सामने) एक बड़ा बाग लगवाया था, जिसे 'जहांआरा बाग' या 'बेगम बाग' कहा जाता था। रंग-बिरंगे सुगन्धित फूलों से सज्जित था वह बाग। उसने बाग के मध्य में एक सराय का निर्माण भी करवाया था। प्रसिद्ध इतिहासकार बर्नियर के अनुसार सराय अपनी मेहराबों और स्थापत्य के कारण उस काल की खूबसूरत इमारतों में से एक थी। बाद में अंग्रेजों ने इस बाग का नाम बदलकर 'कंपनी बाग' रख दिया था। यही नहीं इसके बड़े भाग को नष्ट करवाकर दिल्ली रेलवे स्टेशन का निर्माण करवाया । आजादी के बाद इसे पुनः 'बेगम बाग' कहा जाने लगा । चांदनी चौक से पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर जाने वाली सड़क इस बाग को दो भागों में बांटती है। आजादी के कुछ वर्षों पश्चात ही इस बाग का पुनः नामकरण किया गया। इसके एक भाग को 'आजाद पार्क' और दूसरे को 'कंपनी बाग' कहा जाने लगा। इस प्रकार 'बेगम बाग' या 'जहांआअरा बाग' इतिहास के पन्नों में दफ्न होकर रह गया, जबकि अपना अतीत का गौरव तो वह बहुत पहले ही खो चुका था।
लोदी बाग
'जहांआरा' या 'बेगम बाग' की भांति दिल्ली के उत्तर-पश्चिम में 'बादली की सराय' के निकट कश्मीर और लाहौर के शाही 'शालीमार बाग' के अनुकरण पर शाहजहां की एक बेगम अज्जून्निसां ने, जो बीबी अकबराबादी के नाम से जानी जाती थीं, शालीमार बाग लगवाया था। बाग के मध्य में शीश महल नामकी भव्य इमारत बनवायी थी, जिसमें बैठकर वह बाग के सौंदर्य, उसके झरनों, फव्बारों और छोटी नहरों का अवलोकन करती थी। कहा जाता है कि यह वही बाग है, जिसमें ताज के दावेदार भाइयों से मुक्ति पाने के पश्चात आनन-फानन औरंगजेब की ताजपोशी की गई थी। बर्नियर लिखता है कि दिसम्बर, 1664 में कश्मीर और लाहौर प्रस्थान (बीमारी की हालत में) करते समय औरंगजेब ने इसी बाग में पहला पड़ाव डाला था। 1803 के बाद कुछ समय के लिए शीश महल को अंग्रेज रेजीडेण्ट के ग्रीष्मकालीन निवास के रूप में प्रयोग करते रहे थे। कहते हैं सर चार्ल्स मेटकॉफ को यह महल बहुत पसंद था। वह अपनी भारतीय पत्नी के साथ प्रायः वहां आकर रहता था। बाद में उसे 'मेटकॉफ साहब की कोठी' के नाम से जाना जाने लगा था। बाग के विषय में 1825 में पादरी हर्बर ने आहत भाव से कहा था, "यह पूर्णतया नष्ट हो चुका है।" 1857 की क्रान्ति के बाद यह बाग मुगलों की सम्पत्ति नहीं रहा । उसे बेच दिया गया था। पादरी हर्बर के कथन से बाग की आज की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। उसके सभी फव्बारे और पानी के स्रोत पूरी तरह मिट्टी में छुप चुके हैं और यह पता लगाना भी कठिन है कि बाग में निरतंर प्रवाहित होने वाले पानी का उद्गम कहां से होता था।
कंपनी बाग
'शालीमार बाग' की भांति ही अति- ऐतिहासिक महत्व का बाग है 'रोशनारा बाग' । लालकिला से पश्चिम में लगभग तीन मील की दूरी पर शाहजहां की दूसरी बेटी रोशनआरा बेगम ने यह बाग लगवाया था । जहांआरा जहां अपने पिता की चहेती थी, वहीं रोशनआरा औरगजेब की प्रिय। एक प्रकार से वह पिता के विरुद्ध ही रही थी और औरंगजेब के बादशाह बनने के लिए उसने हर संभव प्रयत्न किए और सहयोग दिया था। औरगंजेब के बादशाह बनने के पश्चात उसने प्रथम महारानी (बेगम) के सभी अधिकार प्राप्त कर लिए थे। दरबारियों और जनता में 'बेगम साहिबा' के नाम से प्रसिद्ध रोशनआरा का शासन में पर्याप्त हस्तक्षेप और दबदबा था। एक प्रकार से वह औरगंजेब की मुख्य सलाहकार की भूमिका निभाती थी। सर यदुनाथ सरकार के अनुसार वह इतनी ताकतवर थी कि कई बार औरंगजेब उसकी बात की उपेक्षा नहीं कर पाता था। शिवाजी को आगरा में कैद करवाने के पीछे 'बेगम साहिबा' की ही सलाह थी। उसी रोशनआरा ने लालकिला से बाहर निकल प्रकृति का आनंद लेने और शांति-पूर्वक कुछ क्षण व्यतीत करने के उद्देश्य से 1650 में यह बाग लगवाया था, जो कालांतर में उसीके नाम से चर्चित हुआ। हालांकि तब औरंगजेब बादशाह न था, लेकिन रोशनआरा का दबदबा प्रारंभ से ही था।

रोशनआरा ने बाग के मध्य में एक 'ग्रीष्म महल' (समरहाउस) बनवाया था, जिसके विषय में बर्नियर का कथन है कि वह स्थापत्य कला का अनूठा नमूना था । बाग के चार दिशाओं से चार स्रोत इस 'समर हाउस' तक जाते थे, जिनसे अनवरत पानी इसमें पंहुचता रहता था। जाहिर है ये स्रोत यमुना से निकलते थे। यही नहीं महल के चारों ओर फव्बारे, झरने और बेगम के स्नान के लिए खूबसूरत तालाब था। 'समर हाउस' का जो वर्णन मिलता है उससे स्पष्ट है कि वह आज प्राप्त तालाब और 'रोशनआरा क्लब' के मध्य अवस्थित रहा होगा, जिसे 1875 में कर्नल क्रैक्राफ्ट ने नष्ट करवा दिया था। तालाब यहां आज भी है, लेकिन वह तालाब नहीं किसी गड़ैय्या की भांति है, जिसके पूर्वोत्तर की ओर केवल दो स्थानों पर सीढ़ियां और लाल पत्थर की दीवारें शेष हैं। दक्षिण-पश्चिम की ओर के भाग को समय के हस्तक्षेप ने मिट्टी से ढक दिया है। तालाब के उत्तर-दक्षिण की ओर बेगम के बैठने के लिए छतरियां बनवायी गयी थीं, जो आज भी विद्यमान हैं। बेगम ने बाग को न केवल हरे-भरे वृक्षों से सजाया था, बल्कि रंग-बिरंगे फूल भी लगवाये थे । गर्मी के दिनों में प्रायः बेगम बाग में तशरीफ लाती थी। बर्नियर लिखता है, "जब बेगम का काफिला लालकिला से चलता , उसमें अनेक हाथी होते , जिन पर स्वर्ण जड़ित झूले और झालरें पड़ी होतीं और चांदी की घण्टियों की मधुर टुनटुनाहट से वातावरण झंकृत होता रहता । बेगम स्वर्ण-जड़ित कपड़े से ढकी पालकी में होती थी और उसके आगे-पीछे दो छोटे कद के हाथी चलते थे। बेगम कुछ घण्टे फूलों की मादक सुगंध, ऊर्ध्वगमित फव्बारों और निरंतर प्रवहित झरनों के मध्य शांतिपूर्वक व्यतीत करती थी।"

औरंगजेब की विश्वासपात्र और चहेती बहन इस बेगम का अंत अतंतः दुखद था । 1664 में औरंगजेब अत्यधिक बीमार पड़ा। रोशनआरा को उसके बचने की कोई आशा न दिखी। ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर बेगम ने षडयंत्र कर राजकीय मुद्रिका प्राप्त कर ली और औरंगजेब के वास्तविक उत्तराधिकारी उसके बड़े पुत्र शाह आलम को बेदखलकर औरंगजेब के छः वर्षीय पुत्र आजमशाह को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। ऐसा इसलिए, जिससे वह आजमशाह के बालिग होने तक उसके नाम पर शासन कर सके। लेकिन रोशनआरा के दुर्भाग्य से औरंगजेब स्वस्थ हो गया और बेगम के षडयंत्र का पर्दाफाश हो गया। इससे दरबार में न केवल बेगम के अधिकार कम हुए, बल्कि औरगंजेब ने उसे जहर देकर मरवा दिया था। 1671 में बेगम को रोशनआरा बाग में दफना दिया गया, जहां आज भी उसका खण्डहरनुमा मकबरा अवस्थित है। मकबरे के चारों ओर चार कमरे हैं, जो बंद हैं। बेगम की मजार असुरक्षा और देखरेख के अभाव में नष्टप्रायः है। मकबरे के चारों ओर पतली नहर है, जिसमें कभी पानी के फव्बारे चलते रहे होगें। मकबरे के ठीक सामने पूर्व की ओर मुख्य द्वार है, जो ढहने की स्थिति में है। मुख्य द्वार पर जंग खाया लोहे का विशाल दरवाजा अतीत की कहानी कह रहा है। द्वार के सामने रोशनआरा मार्ग के उस पार लाल पत्थर की एक इमारत है,जिसके विषय में कहा जाता है कि उसे भी रोशनआरा ने बनवाया था। आज उसमें दिल्ली नगार निगम का प्राइमरी स्कूल चल रहा है।

रोशनआरा की मृत्यु के लगभग दो सौ वर्षों के अंदर न केवल बाग की स्थिति खराब हो चुकी थी, बल्कि 'समर हाउस' भी ढह गया था। 1875 में दिल्ली के तत्कालीन कमिश्नर कर्नल क्रैक्राफ्ट ने रोशनआरा के मकबरे को छोड़कर 'समर हाउस' सहित सभी इमारतों को गिरवा दिया था और बाग को नया रूप देने का प्रयास किया था। उत्तर की ओर गुलाब के फूलों का बाग लगवाया गया था, जिसके एक ओर पैंतीस फीट चौड़ी नहर खुदाई गई थी। बाग में सर्वत्र रंग-बिरंगे फूलों के पौधे लगवाये गये थे। बाग को लोदीबाग
दर्शनीय 'सौन्दर्य स्थल' के रूप में विकसित करने का प्रयास किया था । शायद यह सब कुछ वर्षों तक रहा भी होगा। लेकिन आज उसके निशान भी शेष नहीं हैं। बाग के पूर्व दिशा में मुख्य द्वार के निकट इन दिनों एक व्यायामशाला बाग की जमीन का अतिक्रमण कर चलायी जा रही है। उत्तर की ओर प्रशासन की ओर से बाग के एक हिस्से को बच्चों के 'ट्रफिक खेल' के लिए विकसित कर लिया गया है। इसी दिशा में काफी बड़े भाग में सी पी डब्लू डी का दफ्तर है। कुछ दिनों पहले तक इसके उत्तर-पश्चिम में 'राजोरिय नर्सरी' हुआ करती थी।

बाग की छाती को दो सड़कें चीरती हैं। एक गुलाबी बाग (यह भी ऐतिहासिक बाग रहा है, लेकिन बढ़ती आबादी और अतिक्रमण के कारण छोटे से भूखण्ड में ही सिमट गया है) से रोशनआरा मार्ग की ओर और दूसरी शक्तिनगर की ओर निकलती है। बाग को रौंदते भारी प्रदूषण छोड़ते वाहन इन सड़कों पर रात-दिन दौड़ते रहते हैं। बाग के नाम पर जो भी पेड़ पौधे बचे हैं प्रदूषण उनके लिए कितना घातक है, न इस विषय में उद्यान विभाग गंभीर है और न ही पुरातत्व विभाग। सातवें दशक में जापानी प्रकृति विशेषज्ञ मोरी इस बाग को देखने आये थे। उन्हें इसमें अपरिमित संभावनाएं दिखी थीं और उन्होंने यहां जापानी ढंग के बाग का सुझाव दिया था, जिसमें झूले, पतली नहरें, जापानी किस्म की छतरियां आदि बनवाया जाना था और बाग को एक खूबसूरत दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित किया जाना था। लेकिन योजना का क्रियान्वयन न हो सका। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने अपने कार्यकाल में बाग को पर्यटन योग्य बनाने के लिए तेरह लाख रुपये मुकर्रर किए थे, लेकिन बाग जैसा था आज भी वैसा ही है।
रोशनआरा
बाग की जीवन्तता किंचित रोचनआरा क्लब के रूप में है। बाग के पश्चिमी छोर के बड़े भू भाग को जहां से कभी 'समर हाउस' के लिए एक जलस्रोत जाता था, दिल्ली गजेटियर (1970) के अनुसार 7 जुलाई, 1923 को रोशनआरा क्लब को तीस वर्षों के लिए मामूली किराये पर लीज पर दे दिया गया था। क्लब में यह तारीख 1922 उल्लखित है। बाद में यह लीज अगले तीस वर्षों के लिए और बढ़ा दी गई थी। आश्चर्य यह कि क्लब के इतिहास से सम्बन्धित क्लब में कोई रिकार्ड नहीं है। क्लब के बीस संस्थापक सदस्यों के नामों के अतिरिक्त क्लब के लोग कुछ भी बताने मे असमर्थ थे। क्लब में आधी रात के बहुत बाद तक लक्ष्मीपुत्रों की गतिविधियों का साक्षी बना रहता है अंधेरे में खोया बाग का पूर्वी हिस्सा। बाग के शेष भाग में उद्यान विभाग को मुंह चिढ़ाते बच्चे दिन भर क्रिकेट खेलते रहते हैं। कभी-कभी बेगम की मजार के पास सत्संग होते भी देखा जा सकता है। बाग के चारों ओर कूड़े के ढेर हर मौसम में सड़ान्ध पैदा करते रहते हैं। अतीत का यह गौरव आज कितना उपेक्षित है !

दिल्ली का एक और ऐतिहासिक बाग है -- 'कुदसिया बाग।' इसे 1748 में बादशाह मुहम्मदशाह की बेगम और अहमद शाह की मां कुदसिया बेगम ने लगवाया था। कुदसिया एक दासी थी, जो बादशाह की बेगम बनने का गौरव प्रप्त कर सकी थी। बाग के लिए उसने कश्मीरी दरवाजे की ओर यमुना का किनारा चुना था। उसमें उसने एक खूबसूरत मस्जिद और एक चबूतरा बनवाया था। चबूतरे पर बैठकर यमुना को निहारा जा सकता था। यमुना की ओर दो मीनारें और पत्थरों की चौरस छत भी बनवायी थी। आज मस्जिद का कुछ भाग ही शेष बचा है, शेष सब नष्ट हो चुका है। आज ये सभी ऐतिहासिक बाग जिस रूप में हैं, यदि समय रहते ध्यान न दिया गया तो इनकी उपस्थिति मात्र इतिहास की पुस्तकों में ही देखी जा सकेगी।

सोमवार, 28 जुलाई 2008

कविता


पांच कविताएं

(सभी कविताओं के अनुवाद : पीयूष दईया)


नॉर्वेजियन कविता
मेरा, गो कि कड़वा__

पाल ब्रेक्के

तुमने इंतजार किया, पीछे तुम्हारे खिड़की का।
आधी मुड़ी तुम्हारी पीठ
और तुम्हारे चारों ओर रोशनी
ऐसे थी मानो तुम कर रही हो आराम एक हाथ में।
यह ऐसे था मानो तुम वहां खड़ी थी
औरमुझे छोड़ दिया ओह तिनके--तिनके
ज्यों तुमने सुना गरदन झुकाए
किसी को जो गुजरा था

तुम्हें जीत ले गया जो
मुद्दत पहले के आवास में;
दूर और बेगाना मैं वहां खड़ा था
एक्बार, हम जिसे कहत हैं 'अभी'।
रोशनी के हाथ में तुम डोलती हो
सुदूर बाहर समय के ---
नहीं, वे मेरे नहीं थे, कभी भी,
डग जिनका तुमने इंतजार किया!

लेकिन मैं यहां खड़ा होउंगा छयाओं में--
अंधेरा मुझ से पी सकता है
महान रोशनी के तट पर
जो झुकती है तुम्हारे बालों के गिर्द।
पहर है मेरा, गो कि कड़वा।
ओ इसे तोड़ तो, इसे मत तोड़ो
सब संग मैं खड़ा हूं और याद करता हूं
पहुंच नहीं सकता मैं उस जगह से।

जापानी कविता
एक पत्ती, हवा और रोशनी

अत्सूओ ओहकी

मैं लिपटूंगा
घास की एक पत्ती से
हवा की तरह।

मैं झूलूंगा
एक मकड़ी के जाले से
एक पत्ती भांति।

मैं छनूंगा
एक चिउरे की पांखों से
जैसे रोशनी।

मैं बनूंगा हवा, रोशनी
और एक पत्ती।
इतना खाली है मेरा ह्रदय।

इतालवी कविता
बड़ा दिन
उंगारेती (1888-1970)

सड़कों के
एक जाल में
गोता लगाने की
मेरी कोई चाहना नहीं

ऐसी थकान
मैं महसूस करता हूं
अपने कंधों पर

जो छोड़ दे मुझे इस तरह
जैसे
एक चीज
अर्पित
एक कोने में
और भूली हुई

यहां
होता है महसूस
नहीं कुछ
सिर्फ भली गर्माहट

मैं ठहरा हूं
धुएं की
चार
कुलांचों संग
अंगीठी से आती

रोमानियाई कविता
रास्ता
त्रिस्तान जारा (1896-1963)

यह कौन सा मार्ग है जो हमें अलगता है
जिसके आर-पार मैं फैलाये हूं हाथ अपने विचारों का
हरेक उंगली की पोर पर लिखा है एक फूल
और मार्गान्त एक फूल है जो चलता है तुम संग

ऑस्टियन कविता
ग्रीष्म
जॉर्ज त्राकल (1887-1914)

शाम होने पर, कोयल की कुहू
थमती है वन में।
नीचे की ओर झुकती है सतह दानेदार,
लाल खसखस।

काले बादल गरजते हैं बौराते
पहाड़ी ऊपर।
झींगुर का चिरन्तन गान
लुप्त हो जाता मैदानों में।

पात पांगर
पेड़ के और नहीं खड़कते।
पेचदार जीने पर
तुम्हारा वेश सरसराता है।

नीरव बत्ती एक चमकती है
सियाह कमरे में;
रुपहला हाथ एक
इसे बुझाता है;

न हवा, न तारे! रात।


स्वभाव से अन्तर्मुखी व मितभाषी युवा लेखक, सम्पादक, अनुवादक व संस्कृतिकर्मी पीयूष दईया का जन्म 27 अगस्त 1973, बीकानेर (राज.) में हुआ। आप हिन्दी साहित्य, संस्कृति और विचार पर एकाग्र पत्रिकाओं ''पुरोवाक्'' (श्रवण संस्थान, उदयपुर) और ''बहुवचन'' (महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा) के संस्थापक सम्पादक रहे हैं और लोक-अन्वीक्षा पर एकाग्र दो पुस्तकों ''लोक'' व ''लोक का आलोक'' नामक दो वृहद् ग्रन्थों के सम्पादन सहित भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर की त्रैमासिक पत्रिका ''रंगायन'' का भी बरसों तक सम्पादन किया है। पीयूष ने हकु शाह द्वारा लिखी चार बाल-पुस्तकों के सम्पादन के अलावा अंग्रेज़ी में लिखे उनके निबन्धों का भी हिन्दी में अनुवाद व सम्पादन किया है। हकु शाह के निबन्धों की यह संचयिता,''जीव-कृति'' शीघ्र प्रकाश्य है। ऐसी ही एक अन्य पुस्तक पीयूष चित्रकार अखिलेश के साथ भी तैयार कर रहे हैं। काव्यानुवाद पर एकाग्र पत्रिका ''तनाव'' के लिए ग्रीक के महान आधुनिक कवि कवाफ़ी की कविताओं का हिन्दी में उनके द्वारा किया गया भाषान्तर चर्चित रहा है। वे इन दिनों विश्व-काव्य से कुछ संचयन भी तैयार कर रहे ।
संपर्क : विश्राम कुटी, सहेली मार्ग, उदयपुर (रजस्थान) - 313001
ई-मेल : todaiya@gmail.com

सोमवार, 21 जुलाई 2008

पुस्तक चर्चा



चित्र : अशोक गुप्ता

सम्बन्धों की लाशों पर गिद्धों का उत्सव

रमेश कपूर

उत्सव अभी शेष है(उपन्यास)
*अशोक गुप्ता,
शिल्पायन, १०२९५, लेन नं० १, वैस्ट गोरखपार्क,
शाहदरा -११००३२
पृष्ठ संख्या : २१४, मूल्य : २२५/-


संबन्ध अपनी सामाजिकता को ओढ़कर समय को क्रूर (कहां क्रूरतम माना जाए) चक्र के मध्य ही अपने आप को स्थापित करते हैं और वैयक्तिक आवश्यकताओं के साथ अपनी महत्ता सिद्ध करते हैं। इन मायनों में वे स्वयंसिद्ध होते हैं। किन्तु इस स्वयंसिद्ध होने में कितनी जद्दोजहद और कितना संघर्ष शामिल रहता है, यही देखना महत्वपूर्ण है। क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए इसी जद्दोजहद---इसी संघर्ष और इसी महत्ता को जानना अथवा समझ पाना संभव नही हो पाता। तब तो और भी कठिन हो जाता है, जब वे वैयक्तिक स्तर पर एक-दूसरे की भावनाओं के साथ पूरी अंतरंगता से जुड़े हों… पूरी वचनबद्धता में जकड़े हों और संबन्धों को एक नए धरातल पर अपने-आपको परखने की प्रक्रिया में हों।

शायद ऐसे ही सम्बन्ध नीलकंठ और उसकी पत्नी रोहिणी के बीच हैं, जो वरिष्ठ कथाकार अशोक गुप्ता के सद्यः प्रकाशित प्रथम उपन्यास 'उत्सव अभी शेष है' में एक नया अर्थ खोजने का प्रयत्न करते हैं। हालांकि पति-पत्नी का यह संबन्ध अपने-आप में पूरी तरह सफल और आलोढ़ित दिखाई नहीं देता। ऐसा दिखाने की लेखक की कोई चेष्टा भी नहीं रही है। क्योंकि यही शायद लेखक का अभीष्ट भी है। लेकिन जैसी विस्फोटक स्थितियों का सामना उपन्यास के आरंभ में रोहिणी करती या जिनसे पाठक की पहली भिड़तं होती है, वे विस्मित कर देने वाली स्थितियां हैं ---- वीणा के पूरी तरह कस दिए गए तारों की तरह -- टूटने की कगार पर।

मदिरा--और शायद धन भी ---- और शायद अवसर भी पाने के नशे में आकंठ डूबे नीलकंठ को, बाजारू और शातिर औरतों के शरीर को भरपूर भोगने, लेकिन फिर भी उनमें वांछित आनन्द न ढूंढ़ पाने वाले अपने मित्र राठौर के समक्ष 'कापुरुष' की तरह अपनी पत्नी रोहिणी को परोस देने की मजबूरी झेलने में जो मक्कार साझेदारी निभानी पड़ती है, वह रोहिणी को भी हत्प्रभ कर देती है। इस तरह आरंभ होता है नैतिकता और अनैतिकता का वह अध्याय, जिसका प्रभाव (---- और तनाव- उपन्यास में देर तक ---(और दूर तक) दिखाई पड़ता है। इस तनाव को 'हैंडल' कर पाने की क्षमता और उसके प्रभाव पर हम आगे चर्चा करेंगे। फिलहाल प्रश्न नैतिकता-अनैतिकता का है। यह सच है कि एक इन्सान के अपने लिए जो चीज नैतिक है, वही दूसरे के संबन्ध में अनैतिक हो जाती है। यह फर्क वह दृष्टि लाती है, जो चीजों को देखती है। शायद इसीलिए ही पात्रों में किसी भी प्रकार का अवरोधबोध जागृत नहीं होता। सबके पास अपने हक में दिए जाने वाले तर्क (या कुतर्क) उपस्थित हैं। चाहे वह नीलकंठ हो, जो अपनी पत्नी को एक वस्तु समझकर राठौर के समक्ष प्रस्तुत करता है। और बड़े ही नाटकीय और धूर्त अपराधबोध से ग्रस्त होने का भ्रम पैदा करता है। इसके साथ ही वह पुनः वहीं , उसी बिन्दु पर लौट आना चाहता है, जहां से उसने अपने कायराना इरादों को अन्जाम दिया था। किन्तु लौटना उसके लिए इतना आसान नहीं सिद्ध होता। क्योंकि वापस लौटने की स्थितियां उतनी अनुकूल नहीं रह पातीं।

--यही स्थिति चन्द्रा की भी है, जो अपने पति की अनुपस्थिति में अपनी दैहिक जरूरतों को नीलकंठ से पूरी करती है। वह भी नैतिकता-अनैतिकता के द्वंद्व से पर है। न वह अपने पति के प्रति अपराधबोध से ग्रस्त है, न ही रोहिणी के प्रति।

--याफिर राठौर, जो नीलकंठ की पत्नी को 'किसान स्क्वैश' के एक उत्पाद की तरह 'इट इज डिफरेंट' कहकर उसे चटकारे लेकर चखता है और नीलकंठ को अपनी पत्नी को पुनः शीशे में उतार लेने कामशविरा देताहै।

लगता है कि उपन्यास के सारे संबन्ध बाजारवाद से ही संचालित होते हैं। एक 'बिकाऊ' चीज की तरह। यह हमारे वर्तमान समाज का बदला हुआ चेहरा है। न कहीं कोई लगाव---- न कहीं कोई भावना--- न कोई सामाजिक मूल्य… मात्र एक उत्पाद। शानदर 'पैकेजिंग' में लिपटा। चमचमाता---आकर्षित करता--- निमंत्रण देता। --- समाज और सामाजिक बन्धनों की संरचना में जिस तरह का बदलाव--- और जिस तरह का अवमूल्यन हमारे आसपास दिखाई पड़ता है, उसी की पड़ताल करता है यह उपन्यास। अवमूल्यन की ज्ञान पगडंडी से रोहिणी अपने लिए एक नया मार्ग तलाशने का प्रयास करती है और उसकी तलाश राजबीर तक जाकर रुक जाती है, जो हमेशा खामोश रहकर रोहिणी को हालात से लड़ते---- और लड़खड़ाते देखता है और उसकी असह्यता की स्थिति में आगे बढ़ कर उसका हाथ थाम लेता है।

इस नई शुरूआत में स्त्री के स्वावलम्बन और स्वतंत्रता का प्रश्न भी खड़ा होता है, जो इस उपन्यास की आधारशिला बनता है। यहां फिर वही प्रश्न है कि आखिर स्त्री अपनी स्वतंत्रता चाहती किससे है ? अपने समाज से, जो उसे गर्त में धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ता ? या अपने उस संबन्ध से, जो पहले ही बिस्तर पर कुचल दिया गया था?-- या फिर अपने-आपसे, जो वह चाहकर भी नहीं कर पाती? -- या फिर अपनी देह से, जिसके कारण ही वह इतनी बड़ी त्रासदी झेलती है-- और जिसका अधिकार वह किन्हीं कमजोर-कंपकंपाते क्षणों में --- बेहद मासूम चुप्पियों के बीच राजबीर को सौंप देती है? यहीं वह महत्वपूर्ण बिन्दु है, जो उपन्यास का प्रस्थान बिन्दु बनते-बनते रह जाता है। क्योंकि रोहिणी के लिए सम्बन्धों के होने--- उनके टूटने-बिखरने --- और पुनः उठ खड़े होने के बीच एक नया रास्ता तलाश करने का निर्णय उसका अपना नहीं है। क्योंकि सम्बन्धों को तोड़ने का निर्णय भी उसका अपना नहीं है। क्योंकि इस निर्णय के पीछे उसका अपना कोई चुनाव--- या विचार नहीं है। ऐसा भी इसलिए है क्योंकि अपने साथ होने वाली किसी भी ज्यादती --- या त्रासदी--- या धोखाधड़ी के लिए उसके अन्तस्तल में किसी भी प्रकार का कोई प्रतिरोध नहीं है । प्रतिरोध होता तो संभव है प्रतिशोध भी होता, जो परिस्थितियों से लड़-झगड़ कर अपने अस्थित्व --- अपने 'होने' को सिद्ध करता। कम से कम तब वह स्वयं को एक 'वस्तु' मात्र में परिवर्तित नहीं होने देता।

नैतिकता-अनैतिकता की ज्ञान विस्फोटक उदासीनता का प्रभाव यह कि तमाम सम्बन्ध उस संवेदनशील स्थिति पर आकर ठहर जाते हैं, जहां अपराधबोध जैसी किसी सम्भावना की गुंजाइश ही नहीं रह जाती। इन परिस्थियों में यह पता ही नहीं चल पाता कि तमाम पात्र सम्बन्धों को किस धरातल पर स्थापित करना चाहते हैं। प्रेम में देह को ढूंढना चाहते हैं या देह में प्रेम को ? क्योंकि प्रेम को प्रेम के स्तर पर --- और देह को देह के स्तर पर जानने का प्रयास तो कहीं है ही नहीं। यहां तक कि राजबीर-रोहिणी का प्रेम-प्रसंग (यदि इसे वास्तव में एक प्रेम-प्रसंग माना जाए तो) भी इससे अछूता नहीं है। क्योंकि वह भी एक समझौते के फलस्वरूप ही पनपा है। किसी मजबूरी की तरह जो एक विकल्पहीन स्थिति में मात्र ओढ़ने-बिछाने -- ढोते जाने की प्रक्रिया बन जाता है। ऐसे में, यदि हर व्यक्ति की कमियों-खूबियों को एक तरफ रख दें, तो वे किसी 'फ्रायडीय' अवधारणा से ग्रस्त महसूस होने लगते हैं। जिनका प्रत्येक क्रिया-कलाप --- या प्रत्येक हरकत-- प्रत्येक सोच यौनिक क्रियाओं या प्रतिक्रियाओं से संचालित होती है।

और यह मानने में हमें बिल्कुल भी संकोच नहीं करना चाहिए कि उनका यह आचरण मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। यहीं लेखक उनके (पात्रों के) मनोविज्ञान को पकड़ने में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक कर गया है। यहां महादेवी वर्मा का यह उदाहरण देना भी आवश्यक जान पड़ता है कि -"महत्वपूर्ण सिर्फ यह नहीं कि क्या लिखा गया है बल्कि यह अधिक महत्वपूर्ण है कि कैसे लिखा गया है।"

शायद इसी चूक के कारण पात्रों में पूर्ण तथ्यपरकता नहीं आ पाई जिसकी यहां बहुत आवश्यकता थी। लेखक स्वयं 'भीतर की बात' उभारने में बहुत सक्षम है, जिसकी साक्षी हैं उनकी कहानियां, जो मनोवैज्ञानिक कसौटी पर अपनी उपादेयता सिद्ध करती हैं। किन्तु यहां पात्रों का मनोविज्ञान--- या उनका व्यवहार --- या उनकी सोच स्वय उनके ही अनुकूल नहीं बैठती। वरना क्या कारण है कि चन्द्रा जैसी शातिर औरत, जो अपनी बात कह गुजरने में माहिर है--- जो बात से घायल को फुसलाने-बहलाने की कला जानती है--- जो अपनी इसी काबलियत के दम पर नीलकंठ को बांधती और भोगती है किन्तु रोहिणी की त्रासदी जानकर किसी संवेदनशील भारतीय नारी की तरह व्यथित होकर रो उठती है--- और उसे अपनी ही देह से घिन आने लगती है। उसकी यह मनःस्थिति भी उसके शातिराना व्यवहार की तरह नाटकीय है।

और क्या कारण है कि रोहिणी चन्द्रा के साथ अपने पति के अवैध सम्बन्धों को भली-भांति जानते हुए भी चन्द्रा के साथ अत्यन्त सहजता के साथ उसकी 'सहेली' बनकर रहती है। और अपने सुख-दुःख को उसके साथ बांटती नजर आती है। अनैतिकता को यह सीधा-सीधा उसका मौन समर्थन नहीं तो फिर क्या है? इससे क्या वह किसी भी प्रकार की शिकायत किसी से भी करने से अपना अधिकार नहीं खो बैठती? स्त्री-विमर्श की राह में यही क्या सबसे बड़ी बाधा नहीं है? उदासीनता का यह प्रकटीकरण क्या यथार्थ-परकता को संदेहास्पद नहीं बना देता?

और क्या कारण है कि रोहिणी की दस वर्षीय बेटी सरस्वती किसी विद्वान व्यक्ति की तरह धाराप्रवाह प्रवचन देने से चूकती नहीं और चाहती है --"मेरी एक बात सुन लो पहले। इतने दिन से नहीं कहा मैंने, आज बताती हूं। पापा, ताई की नीयत हमें खेत , मकान और नकदी कुछ भी देने की नहीं है। वह बार-बार कहती है कि मेरे जीते जी इसमें से सूत भी किसी को नहीं मिलेगा। सब सुनते हैं इस बात को । बुआ भी सुनती हैं। मेरा वहां रहना खटकता था ताई की आंख में। उन्हें लगता था कि मैं किसी भी समय उनके इस इरादे को समझ कर आपको बुला सकती हूं--- वह डरती थीं कि मैं उनके इरादे उन्हें बताकर तुम्हारे हक में आवाज न बटोर लूं।"(पृष्ठ - 195)

उपन्यास में पात्रों की पारिवारिक पृष्ठभूमि या शैक्षणिक परिवेश को देखते हुए आम बोलचाल में जम कर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग आश्चर्य पैदा करता है। यहां तक कि रोहिणी भी अंग्रेजी भाषा की ज्ञाता होने का भ्रम पैदा करते हुए कहती है कि "साथ सोने से बड़ा सुख साथ रोने में होता है--- शायद इसीलिए अंग्रेजी में 'स्लीप' का नाद 'वीप' से जुड़ता है। रोज - ब-रोज की जिन्दगी में रोना अपने सही माने में कहां जीता है आदमी---- सिर्फ 'क्राई' करता है। (पृष्ठ - 193)

शब्दों का ऐसा विश्लेषण वास्तव में कोई विलक्षण व्यक्ति ही कर सकता है। इसके कारणों की पृष्ठभूमि की चर्चा करने से पहले मैं उपेन्द्रनाथ अश्क के दो खण्डों में प्रकाशित श्रेष्ठ कृतित्व 'अश्क 75 - दूसरा खण्ड' में स्वयं अश्क जी का मानना है कि 'लेखक के जीने का उसके लेखन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। वह जैसे जीता है, जिस दृष्टि से जीता है, जिन्दगी से उसकी जो आकांक्षा है, उसी के अनुसार उसका लेखन ढलता है। --- और 'जिन्दगी को लिखने के लिए जिन्दगी का सीधा सम्पर्क जरूरी है।

यह प्रसंग कृतित्व में समाज के सीधे प्रभाव और चित्रण में आता है, जो सीधे-सीधे भाषा के साथ जुड़ता है और औपन्यासिक परिवेश व पात्रों को गढ़ता है। जबकि 'उत्सव----' में लेखकीय निष्कर्षों ने तो परिवेश को क्षति पहुंचाई ही है, भाषा भी सभी पात्र वही बोलते हैं, जो लेखक की अपनी भाषा है। यह प्रत्यक्ष रूप से पत्रों के जीवन में हस्तक्षेप है, जिससे सब लेखकों को बचना चाहिए ताकि कृति में यथार्थपरकता को बनाए रखा जा सके। यदि ऐसा होता तो यह संभव ही नहीं था कि चन्द्रा , राठौर , नीलकंठ के परिवार, राजबीर-रोहिणी, सरस्वती-आशीष , जिनमें आततायी और पीड़ित सभी सम्मिलित हैं , एक साथ किसी उत्सव का आयोजन करते, जो अन्ततः सम्बन्धों की लाश पर किन्ही गिद्धों के उत्सव से अधिक कुछ नहीं है---- और जिसके सम्बन्ध में पूरे विश्वास के साथ यह कहा जा सके कि 'इट इज डिफरेन्ट'।


ए-4/14, सैक्टर-18,



रोहिणी, दिल्ली-110089



मो न 09891252314




29 जनवरी 1947 को देहरादून में जन्म। इंजीनियरिंग और मैनेजमेण्ट की पढ़ाई। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढाई के दौरान ही साहित्य से जुड़ाव ।

अब तक सौ से अधिक कहानियां, अनेकों कविताएं, दर्जन भर के लगभग समीक्षाएं, दो कहानी संग्रह, एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। एक उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य। बेनजीर भुट्टो की आत्मकथा Daughter of the East का हिन्दी में अनुवाद।

सम्पर्क : बी -11/45, सेक्टर 18, रोहिणी, दिल्ली - 110089
मोबाईल नं- 09871187875

E-mail : mailto:ashok267@gmail.com

रविवार, 13 जुलाई 2008

कविता


दिव्या माथुर की कविताएं

पहला प्यार

‘मिट्टी पड़े
तेरे पहले प्यार पर’
कहा था अम्मां ने
इक बार दुखी होकर
और ब्याह दिया था
मुझे बिदेश
पर न तो समय
और न ही दूरी
कर पाये धूमिल
रंग रूप गंध
सभी तो ताज़ा हैं
मिट्टी पड़े
मेरे पहले प्यार पर।

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ऐत तहानी औल मम्मा

‘बहुत रात हो गई मुन्ना
बेटा अब तो तू सो जा’
‘बछ ऐत तहानी औल मम्मा
छुना बी दो ना’
अब मुन्ना बड़ा हो गया है
कहता है - मैं बहुत बोलती हूँ
मुन्ना ज़रा जल्दी चल
स्कूल को देर हो जायेगी
‘मम्मा मेले छोते छोते पाँव
मैं दल्दी दल्दी तैछे तलूँ?’
अब मुन्ना बड़ा हो गया है
कहता है कि
मैं बहुत ‘स्लो‘ हो गई हूँ
‘मम्मा, मुदे दल लदता है
तुमाले छात छोऊँदा तुमाली दोदी में’
अब मुन्ना बड़ा हो गया है
और उसके मुन्ने को चाहिये एक कमरा
उस बड़े से बूढ़ाघर में
मम्मा के नन्हे से प्राण अटके हैं
अपने मुन्ने की राह में।
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दायरा

इच्छा नहीं की
कहीं भागने की
न जीवन को ही
कोसा कभी
हल को कंधे पर साधे सदा
बस आँख झुकाए जुगाली की
रस्सी तुड़ाते
लात मारते
और किसी भी
दिशा भागते
सिर पर जब थे सींग लदे
क्यों झेले तुमने डंडे
आँख पर पी बँधवाए
क्यों रहे घिसटते जीवन भर
एक ही दायरे के भीतर
क्यों सदा लगाते रहे चक्कर
बेतुकी बात, न पैर न सिर
एक ज़रा से तेल की खातिर
बैल ने मुझे दो टूक जवाब दिया,
ये तुम कह रही हो?

क्या कीजे

ग़ुंचों की तबाही का क्या कीजे
आँधी की गवाही का क्या कीजे
अच्छे अच्छों के क़तर दे पर
उस तिरछी नज़र का क्या कीजे
गुदगुदी-सी करती है दिल में
उनकी गाली का क्या कीजे
सूखी की सूखी है चोली
ऐसी होली का क्या कीजे
कह तो दें हम, मासूम हैं वो
इस खून-अ-जिगर का क्या कीजे
पहलू में किसी के वो बैठे
इस बुरी खबर का क्या कीजे
मुस्काना तो चाहा था
बह निकले आँसू क्या कीजे
माशूक़ सभी के पहलू में
कोई जख़्म हमारे भी सी दे
पैरहन टँगा है खूँटी पर
पर उनके सब्र का क्या कीजे
जान के जाने पर जानी
मेरी जान गई तो क्या कीजे
उम्मीद पे इक जी सकते हैं
इस अगर-मगर का क्या कीजे
उनके दीदार को बैठे हैं
इस अपनी ग़रज़ का क्या कीजे।


0 झूठ -कुछ कविताएं


(1)मिज़ाज़्

है झूठ का अपना एक मिज़ाज़
यदि करनी पर आ जाए
तो ये करता नहीं लिहाज़
चाहे तो आलसी-सा
सदियों सोता रहे
पारे सा या फिर
झटपट पोल खोल दे!

(2)सबूत

तुम झूठे हो
मैं सच्ची
तुम सच्चे हो
मैं झूठी
क्या जीवन बीतेगा
यूं ही
सबूत इकट्ठा करते
अग्निपरीक्षा देते
संबंधों को स्थगित करते ?

(3)झूठ के भागीदार

झूठ और सच
एक ही सिक्के के
दो पासे हैं
मुंह खुलते ही
पचास प्रतिशत झूठ के
भागीदार तो हम
हो ही जाते हैं।

(4)अकेलापन

सोचती हूँ
सच बोलना छोड़ दूँ
कम से कम
अकेलापन तो जाएगा भर ।
अंतर में सुलगती रहे
चाहे अँगीठी
आत्मा की जली कुटी
सुनने से
कहीं बेहतर होंगी
दुनिया की बातें
मीठी मीठी।

(5)सज़ा

एक दो ज़ख्मों से सज़ा पूरी नही हो जाती
एक दो आंसुओं से
पीड़ा धुल नहीं पाती
झूठ अजर है, अमर है
झूठ को मौत नही आती!

(6)सती हो गया सच

तुम्हारे छोटे, मँझले
और बड़े झूठ
उबलते रहते थे मन में
दूध पर मलाई-सा
मैं जीवन भर
ढकती रही उन्हें
पर आज उफन के
गिरते तुम्हारे झूठ
मेरे सच को
दरकिनार कर गये
तुम मेरी ओट लिये
साधु बने खड़े रहे
और झूठ की चिता पर
सती हो गया सच।

(7) समझौता

एक अदृष्ट
समझौता है
परिवार के बीच
यदि मैंने ज़ुबान खोली
तो वे समवेत स्वर में
मुझे झुठला देंगे
तुम्हारे झूठ की
ओढ़नी में लिपटी
मैं खुद से भी
रहती हूँ छिपी।
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शिक्षा : एमए (अंग्रेजी) के अतिरिक्त दिल्ली एवं ग्लास्गो से पत्रकारिता में डिप्लोमा। आइ टी आई दिल्ली में सेक्रेटेरियल प्रैक्टिस में डिप्लोमा एवं चिकित्सा आशुलिपि का स्वतंत्र अध्ययन।कार्यक्षेत्र : रॉयल सोसायटी आफ आर्टस की फेलो दिव्या का नेत्रहीनता से सम्बंधित कई संस्थाओं में योगदान रहा हैं। वे यू के हिंदी समिति की उपाध्यक्ष कथा यू के की पूर्व अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन की सांस्कृतिक अध्यक्ष भी रही हैं। आपकी कहानियां और कविताएं भिन्न भाषाओं के संकलनों में शामिल की गई हैं। रेडियो एवं दूरदर्शन पर प्रसारण के अतिरिक्त इनकी कविताओं कहानियों व नाटकों का मंचन प्रसारण व ब्रेल लिपि में प्रकाशन हो चुका है। दिव्या जी को पदमानंद साहित्य एवं संस्कृति सेवा सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है। लंदन में कहानियों के मंचन की शुरूआत का सेहरा भी आपके सिर जाता है।प्रकाशित रचनाएं : ‘अंत:सलिला’ ‘रेत का लिखा’ ‘ख्याल तेरा’ ‘आक्रोश’ ‘सपनों की राख तले’ एवं ‘जीवन ही मृत्यु’.

संप्रति : नेहरू केन्द्र (लंदन में भारतीय उच्चायोग का सांस्कृतिक विभाग) में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी.

संपर्क : 3-A Deacon Road,London NW2 5NNE-mail : divyamathur@aol.com